सेतु दिष्टकारी (ब्रिज रेक्टिफायर) की कार्यविधि, चित्र, लाभ व हानियां लिखिए | Bridge Rectifier in Hindi

सेतु दिष्टकारी (ब्रिज रेक्टिफायर) किसे कहते हैं – पिछले अध्याय में हमनें पूर्ण तरंग दिष्टकारी के बारे में जाना था। तथा इस अध्याय में हम सेतु दिष्टकारी के बारे में विस्तार से सरल भाषा में अध्ययन करेंगे। और इसकी कार्यविधि परिपथ आरेख तथा यह कैसे काम करता है अतः इसके लाभ व हानि के बारे में भी समझेंगे।

सेतु दिष्टकारी क्या है

पूर्ण तरंग सेतु दिष्टकारी एक महत्वपूर्ण परिपथ समायोजन सेतु दिष्टकारी (अथवा द्विपथी दिष्टकारी) है, जिसका परिपथ आरेख चित्र-1 में दर्शाया गया है। इसमें चार p-n संधि डायोड D1, D2, D3 व D4 इस प्रकार व्यवस्थित किए जाते हैं कि वे एक व्हीटस्टोन सेतु नेटवर्क MNOP के रूप में परस्पर जुड़े होते हैं। चूॅंकि व्हीटस्टोन सेतु की चार प्रतिरोध भुजाओं का निर्माण करते हैं। इस सेतु दिष्टकारी परिपथ में दो आमने-सामने के सिरे M व N एक ट्रांसफार्मर की द्वितीयक कुण्डली के सिरों S1 तथा S2 से जुड़े रहते हैं। तथा सिरे N व P एक लोड प्रतिरोध R से जुड़े रहते हैं।

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सेतु दिष्टकारी
चित्र-1. सेतु दिष्टकारी

सेतु दिष्टकारी की कार्यविधि

जब ट्रांसफार्मर की प्राथमिक कुण्डली पर आरोपित प्रत्यावर्ती वोल्टेज के प्रभाव के अन्तर्गत द्वितीयक कुण्डली के सिरों पर आरोपित वोल्टेज निम्न प्रकार लिखा जा सकता है-
E1 = E0Sinωt
जो कि चित्र-2(a) के अनुसार परिवर्तित होता है।

सेतु दिष्टकारी की कार्यविधि
चित्र-2. सेतु दिष्टकारी की कार्यविधि

निवेशी प्रत्यावर्ती वोल्टेज के प्रथम अर्धचक्र में जब ट्रांसफार्मर के बिन्दु S1 का विभव धनात्मक और S2 का विभव ऋणात्मक होता है, तो टर्मिनल M धनात्मक तथा टर्मिनल O के सापेक्ष धनात्मक होता है जिससे डायोड D1 व D3 अग्र अभिनति होते हैं। तथा डायोड D2 व D4 उत्क्रम अभिनति होते हैं। अतः धारा का चालन डायोड D1 व D3 के द्वारा लोड प्रतिरोध R से होता है। अतः धारा i1 परिपथ में S1MNRPOS2S1 के मार्ग से होकर प्रवाहित होती है।

निवेशी प्रत्यावर्ती वोल्टेज के दूसरे अर्धचक्र में जब S2 सिरे S1 के सापेक्ष धनात्मक होता है, तो टर्मिनल O, M के सापेक्ष धनात्मक होता है जिससे डायोड D2 व D4 अग्र अभिनति होते हैं। तथा डायोड D1 व D3 उत्क्रम अभिनति होते हैं। अतः चालन डायोड D2 व D4 के द्वारा लोड प्रतिरोध R से होता है अतः धारा i2 परिपथ में S2ONRPMS1S2 के मार्ग से होकर प्रवाहित होती है।
स्पष्टतः यह प्रक्रिया प्रत्यावर्ती वोल्टेज के प्रत्येक अर्धचक्र के पश्चात दोहराई जाती है, परन्तु लोड प्रतिरोध R के द्वारा दोनों अर्ध-चक्रों में समान धारा एक ही दिशा में प्रवाहित होती है। अतः धारा एकदिशीय होती है व इसका आकार चित्र-2(b) के समान होता है और सेतु दिष्टकारी में तरंग की आकृति पूर्ण तरंग दिष्टकारी की भांति होती है।

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सेतु दिष्टकारी (ब्रिज रेक्टिफायर) का क्या काम है

इसमें दो सन्धि डायोड श्रेणीक्रम में कार्य करते हैं अतः स्पन्द धारा को निम्न रूप में प्रदर्शित किया जाता है।
यदि जब 0 ≤ ωt ≤ π हो, तो
i1 = ( \frac{E_0}{2R_f + R} )Sinωt = i0Sinωt या i2 = 0
अर्थात् यदि जब π ≤ ωt ≤ 2π हो, तो
i2 = – ( \frac{E_0}{2R_f + R} )Sinωt = – i0Sinωt
यहां Rf प्रत्येक डायोड का गतिक अग्र प्रतिरोध है तथा i0 अधिकतम धारा है जो निम्न है।
i0 = \frac{E_0}{2R_f + R}
औसत दिष्ट धारा के लिए व्यंजक (= \frac{2i_0}{π} ), वर्ग-माध्य-मूल मान (= \frac{i_0}{ \sqrt{2}} ) एवं ऊर्मिका गुणांक (= 0.48) मध्य निकासी पूर्ण तरंग दिष्टकारी के समान होगी परन्तु दक्षता,
η = \frac{81.2}{(1 + 2R_f/R)} %

सेतु दिष्टकारी की स्थिति में शिखर उत्क्रम वोल्टेज प्रत्येक डायोड पर वोल्टेज के बराबर होता है एवं E0 के बराबर होता है जो ट्रांसफार्मर की द्वितीयक कुण्डली पर अधिकतम वोल्टेज है।

सेतु दिष्टकारी के लाभ

  1. चूॅंकि ट्रांसफार्मर की सम्पूर्ण द्वितीयक कुण्डली का प्रयोग होता है। अतः द्वितीयक कुण्डली में मध्य निकासी की आवश्यकता नहीं होती है। यह सेतु दिष्टकारी में व्यय को घटाता है।
  2. समान दिष्ट धारा निर्गत के लिए सेतु दिष्टकारी में प्रत्येक डायोड पर शिखर उत्क्रम वोल्टेज मध्य निकासी पूर्ण तरंग दिष्टकारी की तुलना में आधा होता है।
  3. ट्रांसफार्मर की प्राथमिक एवं द्वितीयक दोनों कुण्डलियों में धारा निवेशी वोल्टेज के पूर्ण चक्र के दौरान प्रवाहित होती है। अतः छोटा ट्रांसफार्मर प्रयुक्त किया जा सकता है।

सेतु दिष्टकारी की हानियाॅं

  1. इसमें दो अतिरिक्त डायोड की आवश्यकता होती है।
  2. निवेशी प्रत्यावर्ती वोल्टेज के प्रत्येक अर्धचक्र में श्रेणीक्रम में जुड़े दो डायोडों से धारा प्रवाहित होती है। अतः सेतु दिष्टकारी के आन्तरिक प्रतिरोध में वोल्टेज पतन, मध्य निकासी पूर्ण तरंग दिष्टकारी की तुलना में अधिक होता है, इससे दिष्टकारी दक्षता घट जाती है तथा वोल्टेज नियन्त्रण भी कम हो जाता है।

Note – सेतु दिष्टकारी से सम्बन्धित प्रशन –
Q.1 सेतु दिष्टकारी क्या है? इसकी कार्यविधि, लाभ व हानियां तथा सेतु दिष्टकारी (ब्रिज-रेक्टिफायर) का क्या काम होता है।
Q.2 उचित आरेख की सहायता से सेतु दिष्टकारी (ब्रिज-रेक्टिफायर) की कार्यविधि समझाइए।
Q.3 सेतु दिष्टकारी की व्याख्या स्पष्ट परिपथ आरेख की सहायता से कीजिए? तथा रेक्टिफिकेशन को भी समझाइए।

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