कार्नो प्रमेय क्या है, परिभाषा एवं सिद्ध कीजिए | Carnot’s Theorem in Hindi

कार्नो प्रमेय क्या है

कार्नो की प्रमेय को निम्न दो भागों में व्यक्त किया जा सकता है –
1.प्रथम भाग – इस प्रमेय के अनुसार, “दो दिए गए तापों के बीच कार्य करने वाला कोई भी इंजन उन्हीं दो तापों के बीच कार्य करने वाले उत्क्रमणीय (कार्नो इंजन) से अधिक दक्ष नहीं हो सकता है।”
2.द्वितीय भाग – इस प्रमेय के अनुसार, “दिए गए दो तापों के बीच कार्य करने वाले सभी उत्क्रमणीय इंजनों की दक्षताएं समान होती हैं, चाहे कार्यकारी पदार्थ कुछ भी क्यों न लिया गया हो।”

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कार्नो प्रमेय की उत्पत्ति

इस प्रमेय के दोनों भागों को निम्न प्रकार सिद्ध किया जा सकता है –

कार्नो प्रमेय की प्रथम भाग की उत्पत्ति

कार्नो की प्रमेय को सिद्ध करने के लिए I तथा R दो ऊष्मा इंजन लेते हैं जिनमें I अनुत्क्रमणीय तथा R उत्क्रमणीय इंजन है। जैसे कि चित्र में दिखाया गया है। माना इंजन T1 (स्त्रोत का ताप) तथा T2 (सिंक का ताप) के बीच कार्यरत है। माना कि अनुत्क्रमणीय इंजन I ताप T1 पर स्त्रोत से Q1 ऊष्मा लेता है तथा W कार्य करने के पश्चात शेष ऊष्मा (Q1 – W) ताप T2 पर सिंक को वापस कर देता है। अतः इंजन की दक्षता

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कार्नो प्रमेय
कार्नो प्रमेय

ηI = कार्य में परिवर्तित ऊष्या W/स्त्रोत से ली गई ऊष्मा Q1
या ηI = \frac{W}{Q_1} ….(1)

इसी प्रकार यदि उत्क्रमणीय इंजन R तथा T1 पर स्त्रोत से Q’1 ऊष्मा लेता है और W कार्य करके शेष ऊष्मा (Q’1 – W) सिंक को वापस कर देता है, तब इंजन की दक्षता
ηR = \frac{W}{Q'_1} ….(2)
माना कि इंजन I, इंजन R की अपेक्षा अधिक दक्ष है, अर्थात्
ηI > ηR
या \frac{W}{Q_1} > \frac{W}{Q'_1}
या Q’1 = Q1
अतः (Q’1 – Q1) एक धनात्मक राशि है।
अब माना कि दोनों इंजनों R को एक बैल्ट के द्वारा इस प्रकार से युग्मित कर दिया जाता है कि इंजन I जब आगे की दिशा में कार्य करता है, तो इंजन R को विपरीत दिशा में चलता है। इस समय इंजन R एक प्रशीतित्र की तरह कार्य करता है अर्थात् अब इंजन R ताप T2 पर सिंक से (Q’1 – W) ऊष्मा लेता है तथा इस पर इंजन I द्वारा W कार्य किया जाता है तथा यह ताप T1 पर स्त्रोत को Q’1 ऊष्मा देता है। चूंकि प्रशीतित्र चलाने के लिए आवश्यक कार्य W इंजन I से मिल जाता है अतः इंजन I तथा प्रशीतित्र R मिलकर एक स्वतः चालित मशीन बना देते हैं।
इस समय स्त्रोत Q1 ऊष्मा इंजन I को दे देती है तथा Q’1 ऊष्मा इंजन R से लेती है। अतः सिंक से ऊष्मा की क्षति = Q’1 – Q1
जो कि एक धनात्मक राशि है (चूंकि Q’1 > Q1).
अतः यह मशीन बिना किसी बाह्य ऊर्जा स्त्रोत के प्रत्येक चक्र में (Q’1 – Q1) ऊष्मा की मात्रा को सिंक (शीतलन वस्तु) से लेकर स्त्रोत (तप्त वस्तु) को दे रही है लेकिन से ऐसा होना असम्भव है। अतः यह माना जा सकता है, कि उत्क्रमणीय इंजन R की दक्षता अन्य किसी भी इंजन I की दक्षता से कम है। असत्य होगा अर्थात् “कोई भी इंजन उत्क्रमणीय इंजन की तुलना में अधिक दक्ष नहीं हो सकता है।’ यही कार्नो प्रमेय का प्रथम भाग है।”

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कार्नो प्रमेय की द्वितीय भाग की उत्पत्ति

इस प्रमेय के द्वितीय भाग को सिद्ध करने के लिए अनुत्क्रमणीय इंजन I के स्थान पर एक उत्क्रमणीय इंजन R’ की कल्पना की जाती है। अतः अब दो उत्क्रमणीय इंजन R व R’ एक समान स्त्रोत व समान सिंक के मध्य कार्य कर रहे हैं। माना कि इंजन R, R’ को विपरीत दिशा में चलाता है, तब उपर्युक्त की भांति R, R’ से अधिक दक्ष नहीं हो सकता है। अतः ‘दोनों इंजनों की दक्षता एकसमान है।’ अर्थात् यह कहा जा सकता है कि “किसी भी उत्क्रमणीय इंजन की दक्षता स्त्रोत तथा सिंक के तापों पर निर्भर करती है लेकिन कार्यकारी द्रव की प्रकृति व गुणों पर निर्भर नहीं करती।” यही कार्नो प्रमेय का द्वितीय भाग है।

Note – कार्नो प्रमेय से सम्बन्धित प्रशन पूछें जाते हैं।

Q. 1 कार्नो प्रमेय को लिखिए तथा सिद्ध कीजिए ?
Q. 2 कार्नो की प्रमेय क्या है ? चित्र की सहायता से इसके दोनों भागों को सिद्ध कीजिए ?
Q. 3 कार्नो की प्रमेय बताइए तथा इसके कितने भाग होते हैं। सिद्ध कीजिए ?
Q. 4 सिद्ध कीजिए कि दो तापों के बीच कार्य करने वाले उत्क्रमणीय इंजन से अधिक दक्ष कोई इंजन नहीं हो सकता है ?

  1. अणुगति एवं ऊष्मागतिकी नोट्स (Kinetic Theory and Thermodynamics)
  2. यान्त्रिकी एवं तरंग गति नोट्स (Mechanics and Wave Motion)
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