चाणक्य नीति – कौटिल्य के अर्थशास्त्र, मौर्य सम्राट की सैन्य व्यवस्था एवं युद्धकला | Chanakya Niti in hindi

चाणक्य कौन था

आचार्य चाणक्य (लगभग 375 ईसा पूर्व – 283 ईसा पूर्व), जिन्हें ‘कौटिल्य’ नाम से भी जाना जाता है ये मौर्य साम्राज्य के संस्थापक चन्द्रगुप्त मौर्य के शासनकाल में महामंत्री थे। इनका जन्म एक ब्राह्मण परिवार में चणक नामक व्यक्ति के यहां हुआ जिस कारण ये चाणक्य कहलाए। ये तक्षशिला विश्वविद्यालय के आचार्य थे। इन्होंने अनेक ग्रंथों की रचना की है, जिनमें ‘अर्थशास्त्र’ प्रसिद्ध है। अर्थशास्त्र को मौर्यकालीन सम्राट का दर्पण माना जाता है। इसके अलावा इन्हें विष्णुगुप्त कूटनीति और सूक्तियों के संग्रह ‘चाणक्य नीति’ के लेखक के रूप में भी जाना जाता है। राजनीति के महाविद्वान और अपने महाज्ञान का ‘कुटिल’ सदुपयोग जनकल्याण तथा अखण्ड भारत के निर्माण जैसे सृजनात्मक कार्यो में करने के कारण ही ये ‘आचार्य कौटिल्य’ कहलाये।

कौटिल्य के अर्थशास्त्र

आचार्य कौटिल्य के प्रयत्नों के फलस्वरूप ही भारत प्रभुता सम्पन्न राष्ट्र के रूप में सर्वप्रथम विकसित हो सका। युद्ध के हर क्षेत्र में सर्वाधिकार हस्तक्षेप करने वाले इस महान् दार्शनिक के युद्ध दर्शन एवं कृतित्व को मौर्यकालीन सैन्य पद्धति (जो वस्तुतः इसी युद्धशास्त्री की देन थी) का विवरण देकर सरलता से स्पष्ट किया जा सकता था। संक्षेप में, चाणक्य के युद्ध दर्शन को मौर्यकालीन सैन्य पद्धति के रूप में निम्नवत् प्रदर्शित किया जा सकता है—

सैन्य संगठन एवं सेनांग

मौर्यकाल में भी चतुरंग वर्ण की ही प्रधानता परिलक्षित होती है। इस काल में रथ सेना की तुलना में अश्वारोही एवं गज सेना को अधिक महत्त्व प्राप्त था, कौटिल्य ने चतुरंग के अलावा 4 अन्य बलों— नौ-बल, विशिष्ट बल, चर बल एवं देशिक बल का उल्लेख अपने अर्थशास्त्र में किया है तथा अश्व सेना को प्रधान मानते हुए प्राथमिकता प्रदान की है।

कौटिल्य ने सेना को भी 6 भागों बाँटा है—

(1) मौल बल – राजधारी की रक्षा करने वाली सुप्रशिक्षित क्षत्रिय सैनिकों द्वारा निर्मित सर्वाधिक विश्वसनीय सेना।
(2) भूतक बल – मौल बल की सैन्य संख्या में कमी को दूर करने के लिए रखी गई वेतनभोगी सेना।
(3) मित्र बल – मित्र राजाओं की सेना।
(4) श्रेणी बल – विभिन्न श्रेणियों में संघों द्वारा निर्मित गिरोह बनाकर लड़ने वाली सेना जो शत्रु द्वारा धोखे की लड़ाई के लिए प्रयुक्त होती है।
(5) अमित्र बल – शत्रु राजा के पराजित होने पर अपने अधिकार में ली गई सेना।
(6) अटवी बल – शत्रु प्रदेश में लूटपाट करने के लिए मार्गदर्शन में सहायक समीपवर्ती असभ्य एवं जंगली जातियों द्वारा निर्मित सेना।

उपर्युक्त सेनांगों की समुचित व्यवस्था एवं कुशलता हेतु कौटिल्य ने इनके लिए अश्वाध्यक्ष, हस्ताध्यक्ष, रथाध्यक्ष, पत्पाध्यक्ष की नियुक्ति का निर्देश दिया है। अश्वों एवं गजों के प्रशिक्षण के बारे में भी कौटिल्य ने स्पष्ट निर्देश दिये हैं। चतुरंग की सहायता के लिए सहायक अंगों, रसद एवं शस्त्रादि के प्रबन्ध के लिए विष्ट विभाग, शत्रु नौकाओं एवं समुद्री डाकुओं को नष्ट करने वाली नौकाओं की देखभाल के लिए नावाध्यक्ष की नियुक्ति का निर्देश भी दिया है। यौद्धिक कार्यवाहियों में सफलता के लिए दूत एवं चरों की नियुक्ति (चल बल) तो दूसरी ओर विशेष स्थलों पर देशिक बल की उपादेयता पर भी प्रकाश डाला है। इसके अतिरिक्त इस काल में चिकित्सक वर्ग के साथ महिला सेविकाओं का उल्लेख भी प्राप्त होता है।

सैन्य प्रशिक्षण

मौर्यकाल में सैन्य शिक्षा पर विशेष बल दिया जाता है। इस दृष्टि से तक्षशिला विश्वविद्यालय और उसके आचार्य कौटिल्य का योगदान सराहनीय है। स्थानीय सेना के प्रशिक्षण के साथ ही राजकुमार व क्षत्रियों को सैन्य प्रशिक्षण प्राप्त करना अनिवार्य था। इस काल में स्थायी सैनिकों के दैनिक ड्रिल की भी व्यवस्था थी, जिसका निरीक्षण राजा स्वयं करता था। इसके अतिरिक्त घोड़ों एवं हाथियों को प्रशिक्षित किया जाता था।

भर्ती, वेतन एवं भत्ता

इस काल की सेना में क्षत्रियों को प्रमुख स्थान प्राप्त था। आवश्यकतानुसार अन्य जाति के व्यक्तियों को भी सेना में भर्ती किया जाता था। इस काल में सैनिकों को वेतन की समुचित व्यवस्था थी। वार्षिक वेतन की धनराशि 250 पण से 4800 पण तक होती थी। चाणक्य (कौटिल्य) ने राजा को विद्या की योग्यता तथा कार्य की कुशलता देखकर कर्मचारियों को वेतन देने की सलाह दी है। वेतन के अलावा इस काल में विशेष स्थितियों में भत्ते की भी व्यवस्था थी। युद्ध में मृत सैनिकों के परिवारों को भत्ते के रूप में राजकीय सहायता दी जाती थी और युद्धोपरान्त विजयी होने पर वीर सैनिकों को पुरस्कृत करने की भी परम्परा थी।

चाणक्य नीति एवं शस्त्रास्त्र

मौर्यकाल में महाकाव्यकालीन हथियारों में आवश्यक सुधार करने के साथ ही अनेक प्रकार के आक्रमणात्मक एवं सुरक्षात्मक हथियारों का विकास एवं निर्माण किया गया। बाण एवं तलवारों की भेदन-छेदन शक्ति अपेक्षाकृत तेज हो गई थी। कौटिल्य ने आयुधागाराध्यक्ष के कर्तव्यों में दोनों प्रकार के (आक्रमणात्मक एवं सुरक्षात्मक) शस्त्रों के निर्माण करने व उनकी देख-रेख करने की व्यवस्था का उल्लेख तो किया ही है, साथ ही अपने अर्थशास्त्र में उसने 10 प्रकार के स्थिर पत्रों और 17 प्रकार के चल पत्रों का उल्लेख कर अपने पांडित्य का परिचय दिया है। स्थिर पत्रों में सर्वतोभद्र, जामदग्न्य, घाती, संघाती, पर्जन्यक आदि प्रमुख थे। इसी प्रकार चल पत्रों में ताल वृन्त, स्पृक्तला, आस्फोटिक, मुगदर, शतघ्नी और वक्र आदि प्रमुख थे। इसके अतिरिक्त कौटिल्य ने 11 प्रकार के भालों (हलमुख), 5 प्रकार के ने बाणों, 3 प्रकार की तलवारों (खड्ग), 4 प्रकार के धनुष, 7 प्रकार के क्षुर तथा 5 प्रकार के आयुधों का भी वर्णन किया है। इसके साथ ही सुरक्षात्मक शस्त्रों लौह जाल पट्ट, लौह कवच, शिरस्त्राण, कंठत्राण तथा नागोदारिक आदि का भी उसने उल्लेख किया है।

नगर सुरक्षा तथा किले

नगर सुरक्षा को दृष्टिगत रखते हुए इस काल में किलों के विकास पर विशेष बल दिया गया। कौटिल्य के अनुसार, “राजा देश के चारों ओर सीमाओं पर युद्धोचित प्राकृतिक दुर्गा का निर्माण कराये और देश के बीच में धन वृद्धि के केन्द्र, नगरों और राजधानी की स्थापना करे।” नगरों की सुरक्षा के लिए खाई खोदने की भी व्यवस्था थी।

दुर्गों को मनु की भाँति कौटिल्य ने भी 4 मार्गों में बाँटा है—
(1) औदिक दुर्ग – चारों ओर स्वाभाविक जल (नदी, तालाब) से घिरा हुआ द्वीप भाँति प्रतीत होने वाला दुर्ग।
(2) पर्वत दुर्ग – पर्वत की कन्दराओं अथवा बड़े-बड़े पत्थरों की दीवारों द्वारा निर्मित दुर्ग ।
(3) धान्वन दुर्ग – जल और घासरहित भूमि ।
(4) वन दुर्ग – चारों ओर दल-दल अथवा काँटेदार झाड़ियों से घिरे दुर्ग ।
कौटिल्य ने दुर्गों की सुरक्षा के लिए चारों तरफ से खाइयाँ खोदने का सुझाव भी दिया है जिससे आपत्ति काल में अपनी पूर्ण सुरक्षा हो सके।

युद्ध कला और यात्रा विधि

मौर्यकाल में भी महाकाव्यकाल की भाँति उपयुक्त समय पर आवश्यक तैयारी पूरी कर यात्रा करने का उल्लेख मिलता है। कौटिल्य के अनुसार, “साधारणतया विजयेच्छुक राजा, देश और काल में समन्वित होकर सेना के तिहाई या चौथाई भाग को राजधानी, पृष्ठ भाग पर सीमा प्रान्तों पर नियुक्त कर अपने विषय के कार्य को सिद्ध करने योग्य कोष और सेना लेकर मार्गशीर्ष माह में चढ़ाई कर दें। इस समय शत्रु की पुरानी खाद्य सामग्री समाप्त हो चुकी होती है और नवीन संगृहीत नहीं हो पाती, अभी तक दुर्गों की मरम्मत भी नहीं हुई होती चैत्र माह की चढ़ाई बसन्त माह में उत्पन्न होने वाले अन्न को नष्ट करने में उत्तम होती है। वर्षाकाल में उत्पन्न होने वाले अन्न के नाश के लिए ज्येष्ठ काल की चढ़ाई श्रेष्ठ है।”

व्यूह तथा शिविर रचना

कौटिल्य ने संग्राम भूमि में व्यूहों की महत्ता को स्वीकार कर चार प्रकार के व्यूहों का उल्लेख किया है-

(i) दण्ड व्यूह – सैनिक पंक्तिबद्ध खड़े होते हैं।
(ii) भोग व्यूह – जिसमें एक कतार में सर्पाकार अथवा गोमूत्र द्वारा भूमि पर बनी आकृति की भाँति खड़े हों।
(iii) मण्डल व्यूह – जिसमें सैनिक मण्डल बनाकर गोलाई में खड़े होते हैं।
(iv) असंहत व्यूह – जिसमें सैनिक अलग-अलग टुकड़ियों में बँटकर खड़े होते हैं।
मौर्यकाल में व्यूह-रचना की भाँति सेना के ठहराव तथा युद्ध सामग्री की सुरक्षा हेतु स्थिति के अनुकूल शिविर रचना भी की जाती थी ।

दूर एवं चर

आचार्य चाणक्य ने अपने अर्थशास्त्र में निम्न तीन प्रकार के दूतों का उल्लेख किया है—

  1. निःसृष्टार्थ – सुयोग्य एवं सम्पत्तिशाली वे दूत जिन्हें राजा की ओर से कोई निश्चय एवं निर्णय लेने का अधिकार प्राप्त हो।
  2. परिमितार्थ – सीमित उत्तरदायित्वों का निर्वाह करने वाले वे दूत राजा की स्वीकृति के बिना कोई अन्तिम निर्णय नहीं ले सकते।
  3. शासन हर – मात्र सन्देशवाहक का कार्य करने वाले वे दूत जो अपनी ओर से कोई बात नहीं कर सकते थे।
    कौटिल्य ने दूतों के अलावा निम्न 5 प्रकार के गुप्तचरों का उल्लेख किया है—

(i) कापटिक (कंपट वैषधारी),
(ii) उदास्थित (मचामी वेषधारी),
(iii) गृहपतिक (गृहस्थ वेषधारी),
(iv) तापक (सिर मुड़ाकर अथवा जटावेषधारी)।

इसके अतिरिक्त कर्मचारियों की शुद्धता पता करने के लिए 4 अन्य प्रकार के गुप्तचरों का उल्लेख प्राप्त होता है—
(1) सत्री, (2) तोक्ष्ण, (3) रसद, (4) भिक्षुकी ।

कार्य-क्षेत्र के आधार पर उसने अन्य दो प्रकार के चरों का भी उल्लेख किया है—
(1) संस्था चर – अपने राज्य की घटनाओं के बारे में राजा को जानकारी देने वाले।
(2) संचार चर – दूसरे राज्यों में जाकर सूचनाएँ प्राप्त कर अपने राज्य को उपलब्ध कराने वाले।

युद्ध-कौशल

युद्धकला की दृष्टि से यह काल अति विकसित हो चुका था। युद्धों का स्थान शनैः-शनैः कूट युद्धों में ले लिया था। शत्रु को येन-केन पराजित करना ही विजेता का परम लक्ष्य बन चुका था। कूटनीतिक चालों को इस समय विशेष स्थान दिया गया था।

संकेत प्रणाली एवं युद्ध वाद्य-यन्त्र

सेना को एकत्र करने, रोकने एवं आक्रमण आदि के लिए वाद्य एवं ध्वजाओं का प्रयोग किया जाता था। इतना ही नहीं अपनी सेना को उत्साहित तथा शत्रु सेना को निरुत्साहित करने के लिए वाद्य-यन्त्रों के प्रयोग के प्रमाण मिलते हैं।

युद्ध विभाग एवं कार्यालय

मौर्यकाल में युद्ध संचालन हेतु विभिन्न विभागों की स्थापना की जाती थी, जिनमें युद्ध समिति, युद्ध वित्त विभाग, आयु आधार विभाग, गुप्तचर विभाग तथा परराष्ट्र विभाग आदि प्रमुख थे। कौटिल्य ने अपने अर्थशास्त्र में विभिन्न विभागों की रचना एवं कार्यों के बारे में सविस्तार से वर्णन किया है।

इस प्रकार चाणक्य नीति से यह स्पष्ट होता है कि सैन्य-संगठन, शस्त्रास्त्र, युद्धक एवं कूटनीति आदि दृष्टियों से मौर्यकाल पर्याप्त प्रगतिशील रहा और प्रगति तथा विशाल साम्राज्य की स्थापना के पीछे कौटिल्य के अमूल्य योगदान को भुलाया नहीं जा सकता है। उनका सैन्य दर्शन अनूठा और बेजोड़ है और अर्थशास्त्र जैसी कृति का निर्माण करके उसमें गागर में सागर भरने की कहावत को चरितार्थ कर दिया। डॉ. एम. सी. सरकार के शब्दों में, “उसमें स्तालिन का प्रजातन्त्र, हिटलर की निपुणता, विल्सन का विज्ञानवाद, चर्चिल का साम्राज्याभिमान और च्यांग की देशभक्ति एक साथ समायोजित है।”

नोट – परीक्षाओं में पूछे जाने वाले प्रश्न —
प्रश्न 1. कौटिल्य के अर्थशास्त्र के आधार पर मौर्य सम्राटों द्वारा अपनायी गयी सैन्य व्यवस्था एवं युद्ध-कला की विवेचना कीजिए।
प्रश्न 2. “आचार्य चाणक्य एक प्रतिभाशाली सैन्य विशेषज्ञ था। उसके सैनिक विचार आगामी कई शताब्दियों के लिए नियम बन गये।” समीक्षा कीजिए।
प्रश्न 3. “कौटिल्य के युद्ध दर्शन को ही मौर्यकालीन सैन्य पद्धति कहा जाता है।”
प्रश्न 4. “चाणक्य एक महान् सैन्य दार्शनिक था।” चाणक्य नीति एवं उसके सैन्य संगठन, आयुध और समरतन्त्र से सम्बन्धित विचारों की संक्षेप में व्याख्या कीजिए।

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