P-N संधि डायोड का अभिलाक्षणिक वक्र खींचिए, P-N संधि में जेनर भंजन व ऐवेलांशी भंजन क्या है।

P-N संधि डायोड का अभिलाक्षणिक वक्र

माना P-N संधि पर आरोपित विभवान्तर V है तो व्यापक रूप से सन्धि से बहने वाली नेट धारा निम्न सूत्र द्वारा दी जाती है-
i = is[e(eV/ηkT) – 1] …(1)
यहां is पश्च संतृप्त धारा, e इलेक्ट्रॉनिक आवेश, k वोल्टेजमैन नियतांक, T सन्धि का परम ताप, η एक नियतांक है जिसका मान जर्मेनियम के लिए η = 1 तथा सिलिकॉन के लिए η = 2 तथा V सन्धि पर विभवान्तर है। सन्धि की अग्र अभिनति में V का मान धनात्मक तथा पश्च अभिनति में V का मान ऋणात्मक माना जाता है। अतः सामान्य ताप T = 300k पर, अर्थात्
\frac{e}{kT} = \frac{1.6 × 10^{- 19}}{1.38 × 10^{- 23} × 300}
या = 38.6 ≈ 39 (लगभग माना)
तब समीकरण (1) से, i = is[e(39V/η) – 1] …(2)

(1). अग्र अभिनति में – अर्थात् V का मान धनात्मक होने पर, e39V/η >> 1,
तब समीकरण (2) से, i = ise(39V/η) …(3)
अतः समीकरण (3) से स्पष्ट होता है कि जैसे-जैसे V का मान बढ़ता है धारा i का मान भी चरघातांकी रूप से बढ़ता जाता है।

(2). पश्च अभिनति में – अर्थात् V का मान ऋणात्मक होने पर, तब समीकरण (1) से,
i = is[e(- 39V/η) – 1] …(4)
अतः समीकरण (4) से स्पष्ट होता है कि ऋणात्मक विभव लगाने पर धारा शीघ्र ही संतृप्त हो जाती है अर्थात् (i = – is) ।

P-N संधि डायोड का अभिलाक्षणिक वक्र में P-N संधि डायोड के लिए धारा i तथा V के बीच अभिलाक्षणिक वक्र खींचा गया है। अग्र अभिनति में धारा मिली-ऐम्पियर की कोटि की होती है, जबकि पश्च अभिनति में संतृप्त धारा is का मान माइक्रो-ऐम्पियर की कोटि का होता है।

इसे भी पढ़ें… p-n संधि डायोड क्या है? के उपयोग (p-n Junction Diode in Hindi)

P-N संधि डायोड का अभिलाक्षणिक वक्र
P-N संधि डायोड का अभिलाक्षणिक वक्र

चित्र-1 में अभिलाक्षणिक वक्र से स्पष्ट है कि बिन्दु B के संगत ऋणात्मक विभव पर धारा का मान एकदम बढ़ता है। इस भाग में संधि डायोड को ‘भंजन डायोड’ अथवा ‘जेनर डायोड‘ कहते हैं।

P-N संधि में भंजन डायोड क्या है

जैसा कि चित्र-1 से स्पष्ट होता है कि P-N सन्धि की पश्च अभिनति में जब विभवान्तर एक निश्चित बिन्दु B के संगत विभव से थोड़ा-सा ही बढ़ाया जाता है तो धारा का मान एकदम बढ़ता है। इस स्थिति में सन्धि-स्थल पर ऐसी क्षति हो जाती है कि सन्धि पर वोल्टेज शून्य करने पर यह पुनः अपनी पुरानी स्थिति पर वापस नहीं आ पाता है। इस स्थिति में सन्धि डायोड को ‘भंजन डायोड’ कहते हैं। तथा बिन्दु B ‘भंजन बिन्दु’ कहलाता है।
इस भंजन के मुख्य दो भाग होते है-
(1). ऐवेलांशी-भंजन (avalanche breakdown) तथा (2). जेनर-भंजन (zener breakdown)।

1. ऐवेलांशी भंजन क्या है

यदि जब P व N अर्धचालकों में अशुद्धि कम मात्रा में मिलाई जाती है तो जेनर-भंजन नहीं होता है चूंकि तब इलेक्ट्रॉन की टनल प्रायिकता नगण्य होती है लेकिन इस स्थिति में उत्क्रम अभिनति वोल्टेज के बहुत अधिक हो जाने पर अल्पसंख्यक आवेश वाहक काफी अधिक गतिज ऊर्जा अर्जित कर लेते हैं जिससे कि सन्धि के समीप सह-संयोजक बन्ध टूट जाते हैं। तथा इलेक्ट्रॉन-होल युग्म मुक्त हो जाते हैं। यह आवेश वाहक भी त्वरित होकर उसी प्रकार से अन्य इलेक्ट्रॉन-होल युग्मों को मुक्त करते हैं जिसके फलस्वरूप बहुत अधिक संख्या में मूल परमाणुओं का आयनन होने से बहुत अधिक संख्या में इलेक्ट्रॉन-होल युग्म उत्पन्न होते हैं।
ये नवीन इलेक्ट्रॉन पुनः त्वरित होकर अन्य परमाणुओं का आयनन करते हैं तथा यह क्रिया चलती रहती है तथा परमाणुओं के स्थायी आयनन हो जाने से सन्धि का भंजन हो जाता है। अतः इस प्रकार के भंजन को ‘ऐवेलांशी भंजन’ कहते हैं। ताप बढ़ने पर ऐवेलांशी भंजन वोल्टेज भी बढ़ता है।

2. जेनर भंजन क्या है

जेनर भंजन तब होता है जब P-N सन्धि पर पश्च अभिनति वोल्टेज इतना हो कि यह बद्ध इलेक्ट्रॉन पर अति तीव्र बल लगाकर उसे सह-संयोजक बन्ध से अलग कर दें। इस प्रकार सह-संयोजक बन्ध के टूटने से बहुत अधिक संख्या में इलेक्ट्रॉन-होल जोड़े उत्पन्न हो जाते हैं जिसके फलस्वरूप पश्च धारा अचानक बढ़ जाती है।

जेनर भंजन क्या है

चित्र-2 की भांति जब P व N अर्धचालकों में अपमिश्रण अधिक होता है तो सन्धि के पास N व P क्षेत्र में क्रमशः इलेक्ट्रॉनों व होलों की संख्या अधिक होती है तथा P-N सन्धि का फर्मी ऊर्जा स्तर P-क्षेत्र के संयोजी बैंड के अधिक समीप व N-क्षेत्र के चालन बैंड के अधिक समीप आ जाता है। चूंकि पश्च अभिनति लगाने पर विभव प्राचीर की ऊंचाई बढ़ जाती है अतः N-क्षेत्र का चालन बैंड, P-क्षेत्र के संयोजी बैंड की सीध में आ जाता है।
इस स्थिति, में P-क्षेत्र के संयोजी बैंड के इलेक्ट्रॉन विभव प्राचीर में सुरंग बनाते हुए N-क्षेत्र में अपनी संगत ऊर्जा अवस्थाओं में प्रवेश करते हैं। इस प्रकार एक बड़ी संख्या में P-क्षेत्र में संयोजी इलेक्ट्रॉन सन्धि को पार करके N-क्षेत्र में पहुंचते हैं जिसके फलस्वरूप P-क्षेत्र में उतने ही होल उत्पन्न हो जाते हैं। फलस्वरूप संधि-स्थल में बहने वाली धारा एकदम बढ़ जाती है । ताप बढ़ने पर जेनर भंजन वोल्टेज घटता हैं।

Note – सम्बन्धित प्रशन –
Q.1 p-n संधि डायोड के अभिलाक्षणिक वक्र खींचिए तथा P-N संधि में जेनर भंजन व ऐवेलांशी भंजन क्यों होता है? समझाइए।
Q.2 P-N संधि में भंजन डायोड से क्या तात्पर्य है? तथा जेनर व ऐवेलांशी भंजनों को भी परिभाषित कीजिए। P-N संधि डायोड का अभिलाक्षणिक वक्र भी खींचिए?

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