छंद : परिभाषा, भेद, प्रकार व उदाहरण, छंद हिंदी व्याकरण | Chhand in Hindi

Chhand in Hind – इस अध्याय में आपको हिंदी व्याकरण का एक और बहुत ही महत्वपूर्ण टॉपिक ‘छंद’ (chhand in Hindi), छंद की परिभाषा, भेद, प्रकार एवं छंद के उदाहरण की जानकारी दी जा रही है। यह जानकारी इसलिए आवश्यक है, क्योंकि यह विषय लगभग सभी प्रतियोगी परीक्षाओं एवं बोर्ड परीक्षाओं में पूछा जाता है, तो दोस्तों हमनें आपके लिए यहां छंद की परिभाषा, भेद, प्रकार एवं उदाहरण को सरल भाषा में विस्तार से अध्ययन किया है। तो आप इसे पूरा जरूर पढ़ें, तो चलिए शुरू करते हैं।

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छंद की परिभाषा (Chhand ki Paribhasha)

छंद शब्द संस्कृत भाषा के ‘चंद्’ धातु में आसन् श्रेय् लगने से बना है। ‘छंद’ धातु का शाब्दिक अर्थ है- ‘आह्लादित (प्रसन्न) करना’ या ‘खुश करना’ अथवा ‘बन्धन’ । अर्थात् वर्ण, मात्रा, विराम, गति (लय) एवं तुक आदि नियमों पर आधारित शब्द रचना को ही ‘छंद (Chhand in Hindi)’ कहा जाता है। छंद को ‘पिंगल’ भी कहते हैं।

नोट – विद्यार्थी ध्यान दें कि, छंद में निश्चित मात्रा या वर्णों की गणना होती है। छंद शब्द का प्रथम उल्लेख ‘ऋग्वेद’ में मिलता है। ‘छंद शास्त्र’ को ‘पिंगल शास्त्र’ भी कहते हैं क्योंकि इसके आदि प्रणेता आचार्य पिंगल ऋषि माने जाते हैं। जिस प्रकार गध का रेगुलेटर (नियामक) व्याकरण है उसी के आधार पर पध का छंद शास्त्र होता है।

छंद का अर्थ

  • डॉ जगदीश गुप्त (हिंदी साहित्य कोश) के अनुसार – “अक्षर, अक्षरों की संख्या एवं क्रम, मात्रा/गणना तथा यदि/गति आदि से सम्बन्धित विशिष्ट नियमों से नियोजित पध-रचना ही ‘छंद’ कहलाती है।”
  • आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार – “छोटी-छोटी सार्थक ध्वनियों के प्रवाह पूर्ण संगति का नाम ही ‘छंद’ है।”
  • अज्ञेय के अनुसार – “छंद का अर्थ केवल तुक या बधी हुई समान स्वर मात्रा या वर्ण संख्या से नहीं है। छंद एक योजना का नाम है। अर्थात् जहां भाषा की गति नियंत्रित हो, वहां ‘छंद’ होता है।”

छंद काव्य के प्रवाह को लय युक्त, संगीतात्मक, सुव्यवस्थित और नियोजित करता है। छंदबध्द होकर भाव अधिक प्रभावशाली अधिक हदय ग्राही और स्थाई हो जाता है छंद काव्य को स्मरण योग्य बना देता है। अर्थात् छंदों के सभी चरणों में वर्णों या क्रमों अथवा मात्राओं की संख्या निश्चित होती है।

छंद के अंग

छंद के मुख्य रूप से कुल सात 7 अंग माने जाते हैं जो इस प्रकार से है-
(1). चरण/पद/पाद
(2). वर्ण और मात्रा
(3). संख्या/क्रम
(4). गण
(5). गति (लय)
(6). विराम/यति
(7). तुक ।

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(1). चरण/पद/पाद

प्रत्येक छंद चरणों में विभाजित होता है इनको पद या पाद कहते हैं। एक छंद में प्रायः चार 4 चरण होते हैं, जो सामान्यतः चार पंक्तियों में लिखें जाते हैं। किन्तु एक छंद में चार से अधिक चरण भी हो सकते हैं।
अधिकतर छंदों में एक चरण एक पंक्ति में लिखा जाता है। किन्तु कुछ छंदों में दो-दो चरण मिलाकर एक पंक्ति में लिखें जाते हैं, जैसे- दोहा व सोरठा आदि। दो चरणों से मिली हुई एक पंक्ति को ‘दल’ कहते हैं। अतः किन्हीं छंदों में छह 6 चरण भी होते हैं, जैसे- छप्पय व कुण्डलियां आदि।

चरण दो प्रकार के होते हैं- (क). विषम चरण, (ख). सम चरण।
(क). विषम चरण – छंद के पहले और तीसरे चरण को ‘विषम चरण’ कहते हैं।
(ख). सम चरण – छंद के दूसरे और चौथे चरण को ‘सम चरण’ कहते हैं।

(2). वर्ण और मात्रा

वर्ण – वर्णों की गणना करते समय वर्ण चाहे ‘हास्व स्वर’ (लघु स्वर) हो अथवा ‘दीर्घ स्वर’ (गुरु स्वर), उसे एक ही माना जाता है। अर्थात् एक स्वर वाली ध्वनि को ही ‘वर्ण’ कहा जाता है। वर्ण को ‘अक्षर’ भी कहते हैं।

मात्रा – वर्णों के उच्चारण काल को मापने की सबसे छोटी इकाई ‘मात्रा’ कहलाती है। किसी स्वर का उच्चारण करने में जितना समय लगता है, उसे एक मात्रा काल कहते हैं।
हास्व स्वर (वर्ण) की एक मात्रा और दीर्घ स्वर (वर्ण) की दो मात्रा गिनी जाती हैं। मात्रा केवल स्वरों की होती हैं। व्यंजनों की मात्रा नहीं होती है।

मात्राओं के आधार पर वर्णों (स्वरों) के भेद – व्याकरण शास्त्र के अनुसार वर्णों के दो भेद होते हैं – (क). हास्व स्वर (लघु स्वर), (ख). दीर्घ स्वर (गुरु स्वर) ।

(क). हास्व स्वर – जिस स्वर के उच्चारण में एक मात्रा का समय लगता है, उसे हास्व स्वर या लघु स्वर कहते हैं। हिंदी में चार हास्व स्वर है – अ, इ, उ, ऋ ।
(ख). दीर्घ स्वर – जिस स्वर के उच्चारण में दो मात्रा अर्थात् हास्व से दोगुना का समय लगता है, उसे दीर्घ स्वर या गुरु स्वर कहते हैं। हिंदी में आठ दीर्घ स्वर हैं – आ, ई, ऊ, ऋ, ए, ऐ, ओ, औ ।

लघु व गुरु वर्ण का परिचय – विद्यार्थी ध्यान दें कि, छंदों में मात्राओं तथा वर्णों की गणना तथा वर्ण क्रम समझने के लिए लघु व गुरु का ज्ञान होना बहुत आवश्यक है। इसके नियम पढ़ें –
लघु वर्ण – हास्व स्वर को छंद शास्त्र में लघु कहते हैं। लघु वर्ण की एक मात्रा गिनी जाती है।
गुरु वर्ण – दीर्घ स्वर को छंद शास्त्र में गुरु कहते हैं। गुरु वर्ण की दो मात्राएं गिनी जाती हैं।

लघु और गुरु वर्ण का प्रतीक चिन्ह – लघु वर्ण के लिए (I) चिन्ह तथा गुरु वर्ण के लिए (S) चिन्ह लगाया जाता है। जैसे- क I, था S व मा S, न ।

(3). संख्या/क्रम

वर्णों और मात्राओं की गणना को ‘संख्या’ कहते हैं। तथा लघु-गुरु के स्थान निर्धारण को ‘क्रम’ कहते हैं। मात्रिक छंदों में केवल मात्राओं की संख्या का नियम होता है, किंतु वर्णिक छंदों में वर्णों की संख्या का नियम होता है इनमें लघु-गुरु वर्णों का एक क्रम भी निश्चित रहता है। वर्णों का क्रम गणों द्वारा सूचित किया जाता है।

(4). गण

तीन वर्णों के समूह को एक ‘गण’ कहा जाता है अर्थात् तीन वर्णों का एक गण होता है। वर्णिक छंदों में गणों की गणना की जाती है।
गणों की संख्या आठ 8 होती है –

  1. यगण
  2. मगण
  3. तगण
  4. रगण
  5. जगण
  6. भगण
  7. नगण
  8. सगण ।

इन गणों को याद करने के लिए यह सूत्र उपयोगी है- “यमाताराजभानसलगा” ।

इस सूत्र से आठों गण प्राप्त करने का तरीका –

गण का नामसंकेतसूत्रगत उदाहरणसार्थक उदाहरण
यगणISSयमातायशोदा
मगणSIIमातारामायावी
तगणSSIताराजतालाब
रगणSISराजभारामजी
जगणISIजभानजलेश
भगणSSSभानसभारत
नगणIIIनसलनगर
सगणIISसलगासरिता

(5). गति (या लय)

छंदों में मधुरता लाने के लिए एक प्रकार का प्रवाह होना आवश्यक है। गति या प्रवाह से हमारा तात्पर्य लयपूर्ण पाठ-प्रवाह से है जिससे पढ़ने में किसी प्रकार की रुकावट न हो, अर्थात् कविता के पढ़ने के प्रवाह को ही ‘गति’ कहते हैं।

(6). यति/विराम

किसी छंद के चरण को पढ़ते समय बीच में जहां कहीं रुक कर विश्राम किया जाता है, उसे ‘यति या विराम’ कहते हैं।
दूसरे शब्दों में – किसी छंद में विराम या रुकने के स्थल को ही यति या विराम कहते हैं। अर्थात् चरण के बीच में जहां थोड़ी देर रुका जाता है वहां ‘ , ‘ अल्पविराम चिन्ह और चरण के अंत में जहां कुछ अधिक देर रुका जाता है वहां ‘ । ‘ पूर्णविराम चिन्ह लगाया जाता है।

(7). तुक

किसी चरण के अंत में आने वाले समान वर्णों को ही ‘तुक’ कहते हैं। तुक को छंद का प्राण माना जाता है। इसके दो प्रकार होते हैं-
(क). तुकांत छंद – जिन छंदों के अंत में तुक हो, उसे तुकांत छंद कहते हैं।
(ख). अतुकांत छंद -जिन छंदों के अंत में तुक न हो, उसे अतुकांत छंद कहते हैं।

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छंद के भेद

छंद के मुख्य रूप से तीन भेद होते हैं, जो कि इस प्रकार है –

  1. मात्रिक छंद
  2. वर्णिक छंद
  3. मुक्तक छंद ।
Chhand in Hindi
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1. मात्रिक छंद (Matrik Chhand ki Paribhasha)

मात्रा की गणना पर आधारित छंद ‘मात्रिक छंद’ कहलाते हैं।
मात्रिक छंदों में केवल मात्राओं की व्यवस्था होती है, वर्णों के लघु और गुरु के क्रम का विशेष ध्यान नहीं रखा जाता है। इन छंदों के प्रत्येक चरण में मात्राओं की संख्या नियत रहती है।

मात्रिक छंद के भेद

मात्रिक छंद के निम्न तीन भेद होते हैं –
(क). सम मात्रिक छंद
(ख). अर्द्ध-सम मात्रिक छंद
(ग). विषम मात्रिक छंद ।

(क). सम मात्रिक छंद – जिन छंदों के चारों चरणों की मात्राएं एवं वर्ण एक-समान हो, वे ‘सम मात्रिक छंद’ कहलाते हैं।

सम मात्रिक छंद का परिचय

(1). चौपाई (इसके प्रत्येक चरण में 16 मात्राएं होती हैं)
(2). रोला (इसके प्रत्येक चरण में 24 मात्राएं होती हैं)
(3). गीतिका (इसके प्रत्येक चरण में 26 मात्राएं होती हैं)
(4). हरिगीतिका (इसके प्रत्येक चरण में 28 मात्राएं होती है)
(5). अहीर (इसके प्रत्येक चरण में 11 मात्राएं होती हैं)
(6). तोमर (इसके प्रत्येक चरण में 12 मात्राएं होती हैं)
(7). आल्हा या वीर (इसके प्रत्येक चरण में 31 मात्राएं होती हैं)
(8). दिगपाल (इसके प्रत्येक चरण में 24 मात्राएं होती हैं)
(9). रूपमाला (इसके प्रत्येक चरण में 24 मात्राएं होती हैं)
(10). लावनी (इसके प्रत्येक चरण में 22 मात्राएं होती है)
(11). तांटक (इसके प्रत्येक चरण में 30 मात्रा होती है)
(12). सार (इसके प्रत्येक चरण में 28 मात्राएं होती हैं)

(ख). अर्द्ध-सम मात्रिक छंद – जिन छंदों के पहले और तीसरे तथा दूसरे और चौथे चरणों की मात्राओं या वर्णों में समानता हो, वे ‘अर्द्धसम मात्रिक छंद’ कहलाते हैं।

अर्द्ध-सम मात्रिक छंद का परिचय

(1). दोहा (इसके विषम चरण में 13 मात्राएं एवं सम चरण में 11 मात्राएं होती हैं)
(2). सोरठा (इसके विषम चरण में 11 मात्राएं एवं सम चरण में 13 मात्राएं होती हैं)
(3). बरवै (इसके विषम चरण में 12 मात्राएं एवं सम चरण में 7 मात्राएं होती हैं)
(4). उल्लाला (इसके विषम चरण में 15 मात्राएं एवं सम चरण में 13 मात्राएं होती हैं)

(ग). विषम मात्रिक छंद – जिन छंदों में चार से अधिक छह चरण हो, और वह एक-समान न हो, तो वे ‘विषम मात्रिक छंद’ कहलाते हैं।

विषम मात्रिक छंद का परिचय

(1). कुण्डलिया (यह दोहा + रोला को जोड़कर बनता है)
(2). छप्पय (यह रोला + उल्लाला को जोड़कर बनता है)

प्रमुख मात्रिक छंदों का परिचय

1. चौपाई छंद10. उल्लाला छंद
2. दोहा छंद11. वीर या आल्हा छंद
3. सोरठा छंद12. तोमर छंद
4. रोला छंद13. अहीर छंद
5. कुण्डलिया छंद14. रूपमाला छंद
6. हरिगीतिका छंद15. तांटक छंद
7. बरवै छंद16. दिगपाल छंद
8. गीतिका छंद17. लावनी छंद
9. छप्पय छंद18. सार छंद

(1). चौपाई छंद की परिभाषा

चौपाई एक सम मात्रिक छंद है इसमें चार चरण होते हैं। और प्रत्येक चरण में 16 मात्राएं होती है। इसके पहले चरण की तुक दूसरे चरण से तथा तीसरे चरण की तुक चौथे चरण से मिलती है इसके प्रत्येक चरण के अंत में यति होती है। चरण के अंत में जगण (ISI) एवं तगण (SSI) का प्रयोग नहीं होना चाहिए। अर्थात् अंतिम दो वर्ण गुरु-लघु (SI) नहीं होने चाहिए। उदाहरण-

I I I S I S I I I I S I
निरखि सिद्ध साधक अनुरागे।
सहज सनेहु सराहन लागे।।
होत न भूलत भाउ भरत को।
अचर-सचर चर-अचर करत को।।

(2). दोहा छंद की परिभाषा

दोहा एक अर्द्ध-सम मात्रिक छंद है इसमें चार चरण होते हैं। इसके पहले और तीसरे चरण में 13-13 मात्राएं तथा दूसरे और चौथे चरण में 11-11 मात्राएं होती हैं। चरण के अंत में यति होती है। इसके पहले और तीसरे (विषम) चरणों के अंत में जगण (ISI) नहीं होना चाहिए। तथा दूसरे और चौथे (सम) चरणों के अंत में लघु (।) होना चाहिए। अतः इसके सम चरणों में तुक भी होना चाहिए। उदाहरण-

SS I I S S I S S S S I I S I
मेरी भव बाधा हरौ, राधा नागरि सोय।
जा तन की झाई परे, श्याम हरित दुति होय।।

(3). सोरठा छंद की परिभाषा

सोरठा एक अर्द्ध-सम मात्रिक छंद है इसमें चार चरण होते हैं। इसके पहले और तीसरे चरण में 11-11 मात्राएं तथा दूसरे और चौथे चरण में 13-13 मात्राएं होती हैं। यति चरण के अंत में होती है। विषम चरण के अंत में लघु (।) होना चाहिए। तथा सम चरण के आरंभ में जगण (ISI) नहीं होना चाहिए। तथा इसके विषम चरण में तुक भी होती है। यह दोहे का उल्टा होता है। उदाहरण-

S I S I I I S I I S I I I I I S I I I
कुंद इंद सम देह, उमा रमन करुना अयन।
जाहि दीन पर नेह, करहु कृपा मर्दन मयन।।

(4). रोला छंद की परिभाषा

रोला एक सम मात्रिक छंद है इसमें चार चरण होते हैं। इसके प्रत्येक चरण में 24 मात्राएं होती हैं। तथा 11 और 13 मात्राओं पर यति होती है। इसके प्रत्येक चरण के अंत में दो गुरु (SS) या दो लघु (।।) वर्ण होते हैं। इसके दो-दो चरणों में तुक भी आवश्यक है। उदाहरण-

I I I I S S I I I S I S S I I I I S
नित नव लीला ललित, ठानि गोलोक अजिर में।
रमत राधिका संग, रास रस रंग रुचिर में।।

(5). कुण्डलिया छंद की परिभाषा

कुण्डलिया एक विषम मात्रिक संयुक्त छंद है इसमें छह 6 चरण होते हैं और प्रत्येक चरण में 24 मात्राएं होती हैं। इसमें एक दोहा और रोला जोड़कर कुण्डलिया छंद बनता है। दोहे का चौथा चरण रोला के प्रथम चरण में दोहराया जाता हैं। तथा दोहे का प्रथम शब्द ही रोला के अंत में आता है। इस प्रकार, कुण्डलिया का प्रारम्भ जिस शब्द से होता है, उसी शब्द से इसका अंत भी होता है। उदाहरण-

SS SI I S I S I I S I I I I S I
साईं वैर न कीजिए, गुरु पंडित कवि यार।
बेटा वनिता पौरिया, यज्ञ करावन हार।।
यज्ञ करावन हार, राज मंत्री जो होई।
विप्र पड़ोसी वैध आपुनौ, तपै रसोई।।
कह गिरधिर कविराय, जुगत सो यह चलि आई।
इस तेरह को तरह दिए, बनि आवै साई।।

(6). हरिगीतिका छंद की परिभाषा

हरिगीतिका एक सम मात्रिक छंद है इसमें चार चरण होते हैं। इसके प्रत्येक चरण में 28 मात्राएं होती हैं। प्रत्येक चरण में 16 और 12 मात्राओं पर यति होती है। तथा चरण के अंत में लघु-गुरु (IS) का प्रयोग होता है। उदाहरण-

I I S I S S S I S S S I I I S I I I S
कहते हुए यो उत्तरा के, नेत्र जल से भर गए।
हिम के कणों से पूर्ण मानों, हो गए पंकज नए।।

(7). बरवै छंद की परिभाषा

बरवै अर्द्ध-सम मात्रिक छंद है इसमें चार चरण होते हैं। इसके पहले और तीसरे (विषम) चरण में 12-12 मात्राएं तथा दूसरे और चौथे (सम) चरण में 7-7 मात्राएं होती हैं। चरण के अंत में यति होती है। तथा दूसरे और चौथे चरण के अंत में जगण (ISI) या तगण (SSI) के होने से इस छंद की मिठास बढ़ जाती है। उदाहरण-

S I I I I S I I I I I I I I S I
चंपक हरवा अंग मिलि, अधिक सुहाय।
जानि परै सिय हियरै, जब कुॅंभिलाय।।

(8). गीतिका छंद की परिभाषा

गीतिका एक सम मात्रिक छंद है इसमें चार चरण होते हैं। इसके प्रत्येक चरण में 26 मात्राएं होती हैं‌‌।‌ तथा प्रत्येक चरण में 14 और 12 मात्राओं पर यति होती है तथा चरण के अन्त में लघु-गुरु (IS) का प्रयोग आवश्यक होता है। उदाहरण-

S I S S S I S S S I S I I S I S
साधु भक्तों में सुयोगी, संयमी बढ़ने लगें।
सभ्यता की सीढ़ियों पर, सूरमा चढ़ने लगें।।

(9). छप्पय छंद की परिभाषा

छप्पय एक विषम मात्रिक छंद है इसमें छह 6 चरण होते हैं। यह रोला और उल्लाला को जोड़कर बनता है। इसके पहले चार चरण रोला के तथा अंतिम दो चरण उल्लाला के होते हैं। पहले चार चरणों में 24 मात्राएं तथा अंतिम दो चरणों में 26 या 28 मात्राएं होती हैं। उदाहरण-

I S I S I I S I I I I S I I S I I S
जहां स्वतंत्र विचार न बदले मन में मुख में।
जहां न बाधक बने सबल निबलो के सुख में।।
सबको जहां समान निजोन्नति का अवसर हो।
शांति दायिनी निशा हर्ष सूचक वासर हो।।
सब भांति सुशासित हों जहां समता के सुखकर नियम।
बस उसी स्वशासित देश में जागे हे जगदीश हम।।

(10). उल्लाला छंद की परिभाषा

उल्लाला एक अर्द्ध-सम मात्रिक छंद है इसमें चार चरण होते हैं। इसके पहले और तीसरे चरण में 15-15 मात्राएं तथा दूसरे और चौथे चरण में 13-13 मात्राएं होती हैं। यति चरण के अंत में होती है। चरण के अंत में लघु-गुरु (IS) आवश्यक है। उदाहरण-

S I I I S I S S I S I I S I I S I S S
हे शरण दायिनी देवि तू, करती सबकी रक्षा है।
तू मातृ भूमि संतान हम, तू जननी तू प्राण है।।

(11). वीर या आल्हा छंद की परिभाषा

ये एक सम मात्रिक छंद है इसमें चार चरण होते हैं। इसके प्रत्येक चरण में 31 मात्राएं होती हैं। तथा 16 और 15 मात्राओं पर यति होती है। चरण के अंत में गुरु-लघु (SI) का प्रयोग होता है। इसे आल्हा या मात्रिक सवैया छंद भी कहते हैं। उदाहरण-

S S S I I I S I S S I I S S I S I S S I
आल्हा ऊथल बड़े लड़ेया, पहुंचे कूदि-कूदि आकाश।
एक फूंक माबेरी उड़िगे, के डारिनि बैरी का नाश।।

(12). तोमर छंद की परिभाषा

तोमर एक सम मात्रिक छंद है इसमें चार चरण होते हैं। इसके प्रत्येक चरण में 12 मात्राएं होती हैं। यति अंत में होती है। तथा चरण के अंत में गुरु-लघु (SI) होने आवश्यक है। उदाहरण-

S I S S I I S I S I I I I I I I S I
तो चले वान कराल। फुंकरत जनु बहु ब्याल।।
कोपउ समर श्रीराम। चल बिशिख निसित निकाम।।

(13). अहीर छंद की परिभाषा

अहीर एक सम मात्रिक छंद है इसमें चार चरण होते हैं। इसके प्रत्येक चरण में 11 मात्राएं होती है। चरण के अंत में यति होती है। तथा चरण के अंत में गुरु-लघु (SI) का प्रयोग होता है। उदाहरण-

S I I S I I S I S I S I S S I
सुंदर छंद अहीर। प्रेम युक्त ये तीर।।
खिल उठते मन मीत। रचते मोहक गीत।।

(14). रूपमाला छंद की परिभाषा

रूपमाला एक सम मात्रिक छंद है इसमें चार चरण होते हैं। इसके प्रत्येक चरण में 24 मात्राएं होती हैं। तथा 14 और 10 मात्राओं पर यति होती है। चरण के अंत में गुरु-लघु (SI) होते है। उदाहरण-

S I I I I I S I S S I I I S I I S I
बोझ अब उठता नहीं है, बढ़ गया व्यभिचार।
हर गली कहने लगी है, आपसी ही प्यार।।
घर सिकुड़ता जा रहा है, क्रोध की बौछार।
जल रही है धूप आंगन, तुलसी है बीमार।।

(15). तांटक छंद की परिभाषा

तांटक एक सम मात्रिक छंद है इसमें चार चरण होते हैं। इसके प्रत्येक चरण में 30 मात्राएं होती हैं। तथा 16 और 14 मात्राओं पर यति होती है। चरण के अंत में लघु-गुरु (IS) होना आवश्यक है। उदाहरण-

S S S I I S I S I S I I S I I I S S I S
आए हैं लड़ने चुनाव जो, सब्जबाग दिखलाए क्यों।
झूठे बादे करते नेता, किचित नहीं निभाए क्यों।।

(16). दिगपाल छंद की परिभाषा

दिगपाल एक सम मात्रिक छंद है इसमें चार चरण होते हैं। इसके प्रत्येक चरण में 24 मात्राएं होती हैं। यति 12-12 मात्राओं के बाद होती है। तथा दो चरणों के अंत में तुक होती है। चरण के अंत में दो गुरु (SS) होते है। उदाहरण-

S I I I I I I S I I S I I I I I I S S
मीन मकट जल व्यालनि, कीचल चिलक सुहाई।
सो जानू चपला चमच, माति चंचल छवि छाई।।

(17). लावनी छंद की परिभाषा

लावनी एक सम मात्रिक छंद है इसमें चार चरण होते हैं। इसके प्रत्येक चरण में 22 मात्राएं होती हैं। चरण के अंत में यति होती है। तथा चरण के अंत में गुरु का प्रयोग होता है। उदाहरण-

S I I S I I S I I S I I I I S S
स्वाति घटा घहराति मुक्ति पनिप सपूरी।
कथो आवति झुकित शुभ आभा रचि रुरी।।

(18). सार छंद की परिभाषा

सार एक सम मात्रिक छंद है इसमें चार चरण होते हैं। इसके प्रत्येक चरण में 28 मात्राएं होती हैं। तथा 16 और 12 मात्राओं पर यति होती है। चरण के अंत में दो गुरु या दो लघु होते हैं। इसे ललित पद या छन्न पकैया छंद भी कहते हैं। उदाहरण-

SS S I I S I I S S I I I I I I S S S
नारी जीवन की फुलवारी, अद्भुत इसकी माया।
पत्नी बनकर संतति देकर, अपना मान बढ़ाया।।

2. वर्णिक छंद (Varnik Chhand ki Paribhasha)

जिन छंदों की रचना वर्णों की गणना के आधार पर होती है, उसे ‘वर्णिक छंद’ या ‘वर्ण-वृत’ कहते हैं। इसके प्रत्येक चरण का निर्माण वर्णों की एक निश्चित संख्या एवं लघु-गुरु के क्रम के अनुसार होता है।

वर्णिक छंद के भेद

वर्णिक छंद के निम्न दो भेद होते हैं-
(क). साधारण और (ख). दण्डक ।

(क). साधारण – वह वर्णिक छंद जिसमें 26 वर्ण के चरण होते हैं, उसे साधारण छंद कहते हैं।
(ख). दण्डक – वह वर्णिक छंद जिसमें 26 वर्ण से अधिक वर्ण होते हैं, उसे दण्डक छंद कहते हैं।

प्रमुख वर्णिक छंदों का परिचय

1. इन्द्रवज्रा छंद11.शार्दूल विक्रीडित छंद
2. उपेन्द्रवज्रा छंद12. शिखरिणी छंद
3. बसन्ततिलका छंद13. मनहर अथवा कवित्त छंद
4. द्रुतविलम्बित छंद14. सवैया छंद
5. मन्दाक्रान्ता छंद15. मत्तगयन्द सवैया छंद
6. मालिनी छंद16. सुन्दरी सवैया छंद
7. शालिनी छंद17. सुमुखी सवैया छंद
8. भुजंगी छंद18. दुर्मिल सवैया छंद
9. वंशस्थ छंद19. मदिरा सवैया छंद
10. तोटक छंद_

(1). इन्द्रवज्रा छंद की परिभाषा

इन्द्रवज्रा एक वर्णिक समवर्ण वृत छंद है इसमें चार चरण होते हैं। इसके प्रत्येक चरण में वर्णों की संख्या 11 होती है। तथा इसके प्रत्येक चरण में दो तगण (SSI), एक जगण (ISI) और दो गुरु (SS) वर्ण होते हैं। चरण के अंत में यति होती है। उदाहरण-

S S I S S I I S I S S
जागो उठो भारत देश वासी।
आलस्य छोड़ो न बनो बिलासी।।
ऊंचे उठो दिव्यकला दिखाओ।
संसार में पूज्य पुनः कहलाओं।।

(2). उपेन्द्रवज्रा छंद की परिभाषा

उपेन्द्रवज्रा एक वर्णिक समवर्ण वृत छंद है इसमें चार चरण होते हैं। इसके प्रत्येक चरण में वर्णों की संख्या 11 होती है। तथा इसके प्रत्येक चरण में गणों का क्रम है, एक जगण (ISI), एक तगण (SSI), एक जगण (ISI) और अन्त में दो गुरु (SS) वर्ण होते हैं। चरण के अंत में यति होती है। उदाहरण-

I S I S S I I S I S S
कहीं वहीं भूल न जाइएगा।
पधारिए शत्वर आइएगा।।
बनें स्वयं शत्पथ सौख्यकारी।
सुकर्म हो विघ्न विपत्ति हारी।।

(3). बसन्ततिलका छंद की परिभाषा

बसंत तिलका एक वर्णिक समवर्ण वृत छंद है इसमें चार चरण होते हैं। इसके प्रत्येक चरण में 14 वर्ण होते हैं। यति चरण के अंत में होती है। तथा गणों का क्रम है, एक तगण (SSI), एक भगण (SII), दो जगण (ISI) और अंत में दो गुरु (SS) वर्ण होते हैं। इसे ‘सिद्धोन्नता’ भी कहते हैं। उदाहरण-

S S I S I I I S I I S I S S
जो राजपंथ वन भूतल में बना था।
धीरे उसी पर सधा रथ जा रहा था।।
हों-हों विमुग्ध रुचि से अवलोकते थे।
ऊधों छटा विपिन की अति ही अनूठी।।

(4). द्रुतविलम्बित छंद की परिभाषा

द्रुत विलंबित एक वर्णिक समवर्ण वृत छंद है इसमें चार चरण होते हैं। इसके प्रत्येक चरण में 12 वर्ण होते हैं। तथा इसमें एक नगण (III), दो भगण (SII) और अंत में एक रगण (SIS) होता है। उदाहरण-

I I I S I I S I I S I S
दिवस का अवसान समीप था,
गगन था कुछ लोहित हो चला।
तरु शिखा पर थी अब राजती,
कमलिनी कुल बल्लभ की प्रभा।।

(5). मन्दाक्रान्ता छंद की परिभाषा

मंदाक्रांता एक वर्णिक समवर्ण वृत छंद है। इसके प्रत्येक चरण में 17 वर्ण होते हैं। तथा प्रत्येक चरण में 10 और 7 वर्णों पर यति होती है। इसके प्रत्येक चरण में गणों का क्रम है, दो भगण (SII), एक नगण (III), दो तगण (SSI) और अन्त में दो गुरु (SS) होते हैं। उदाहरण-

S I I S I I I I I S S I S S I S S
कोई पत्ता नवल तरु का, पीत जो हो रहा हो।
तो प्यारे के दृग युगल के सामने ला उसे ही।।
धीरे-धीरे सम्भल रखना और उन्हें यों बताना।
पीला होना प्रबल दुःख से प्रेषिता सा हमारा।।

(6). मालिनी छंद की परिभाषा

मालिनी एक वर्णिक समवर्ण वृत छंद है। इसके प्रत्येक चरण में 15 वर्ण होते हैं। तथा 7 और 8 वर्णों पर यति होती है। तथा प्रत्येक चरण में गणों का क्रम है, दो नगण (III), एक भगण (SII) और अंत में दो यगण (ISS) होते हैं। उदाहरण-

I I I I I I S I I I S S I S S
पल-पल जिसके मैं पंथ को देखती थी।
निशिदिन जिसके ही ध्यान में थी बिताती।।

(7). शालिनी छंद की परिभाषा

शालिनी छंद के प्रत्येक चरण में 11 वर्ण होते हैं। तथा प्रत्येक चरण में 4 और 7 वर्णों पर यति होती है। इसमें गणों का क्रम है, एक मगण (SSS), दो तगण (SSI) और अंत में दो गुरु (SS) होते हैं। उदाहरण-

S S S S S I S S I S S
कैसी-कैसी ठोकरा खा रहे हो।
कैसी-कैसी यातना पा रहे हो।।

(8). भुजंगी छंद की परिभाषा

भुजंगी एक वर्णिक समवर्ण वृत छंद है इसमें चार चरण होते हैं। इसके प्रत्येक चरण में 11 वर्ण होते हैं, यति चरण के अंत में होती है। तथा इसमें गणों का क्रम है, तीन यगण (ISS), एक लघु (I) और एक गुरु (S) होता है। उदाहरण-

I S S I S S I S S I S
यही वाटिका थी यही थी मही।
यही चंद्र था चांदनी थी यही।।
यही बल्लकी थी लिए गोद में।
उसे छेड़ती थी महामोद में।।

(9). वंशस्थ छंद की परिभाषा

वंशस्थ एक वर्णिक समवर्ण वृत छंद है इसमें चार चरण होते हैं। इसके प्रत्येक चरण में 12 वर्ण होते हैं तथा प्रत्येक चरण में गणों का क्रम है, एक जगण (ISI), एक तगण (SSI), एक जगण (ISI) और अंत में एक रगण (SIS) होता है। उदाहरण-

I S I S S I I S I S I S
पुकार मेरी प्रभु से यही कहूं।
सुधार लू मैं मन को सही कहूं।।
सुनीत सेवा मनु की अदा करूं।
नवीन धारा गुन की हिया भरूं।।

(10). तोटक छंद की परिभाषा

तोटक एक वर्णिक समवर्ण वृत छंद है। इसके प्रत्येक चरण में 12 वर्ण होते हैं। तथा इसके प्रत्येक चरण में चार सगण (IIS) होते हैं। उदाहरण-

I I S I I S I I S I I S
मम जीवन मीन मिमं पतितं।
मरु घोर भुवीह सुवीह महो।।

(11). शार्दूल विक्रीडित छंद की परिभाषा

ये एक वर्णिक छंद है इसमें चार चरण होते हैं। इसके प्रत्येक चरण में 19 वर्ण होते हैं। तथा 12 और 7 वर्णों पर यति होती है। इसके गणों का क्रम है, एक मगण (SSS), एक सगण (IIS), एक जगण (ISI), एक सगण (IIS), दो तगण (SSI) और अंत में एक गुरु (S) होता है। उदाहरण-

S S S I I S I S I I I S S S I S S I S
आ बैठी उर मोहजन्य जड़ता, विधा विदा हो गई।
पाई कायरता मलीन मन को, हा वीरता खो गई।।

(12). शिखरिणी छंद की परिभाषा

शिखरिणी एक वर्णिक समवर्ण वृत छंद है। इसके प्रत्येक चरण में 17 वर्ण होते हैं। तथा इसके गणों का क्रम है, एक यगण (ISS), एक मगण (SSS), एक नगण (III), एक सगण (IIS), एक भगण (SII) और अंत में लघु-गुरु (IS) होते हैं। उदाहरण-

I S S S S S I I I I I S S I I I S
घटा कैसी प्यारी प्रकृति तिय के चंद्रमुख की।
नया नीला औढ़े बसन चटकीला गगन की।।

(13). मनहर अथवा कवित्त छंद की परिभाषा

मनहर अथवा कवित्त छंद एक वर्णिक दण्डक वृत छंद है इसमें चार चरण होते हैं। इसके प्रत्येक चरण में 31 वर्ण होते हैं। तथा 16 और 15 वर्णों पर यति होती है। चरण के अंत में एक गुरु वर्ण का होना आवश्यक है।
इस छंद को निम्न नामों से भी जाना जाता है-
(क). देवधनाक्षरी छंद, (ख). घनाक्षरी छंद, (ग). मनहरण छंद, (घ). दण्डक छंद, (ड़). रूपघनाक्षरी छंद ।

उदाहरण –
मंजुल मृदुल मुरली के स्वर के समान, उसका सरस गान गुंजता है कान में।
उसका अनूप रूप भूलता कभी नहीं, चाहे कुछ सोचूं किंतु आता वही ध्यान में।।
सुखकर उसके शरीर की सुगंध जैसी, है मुझे उसी की सुध आती आन-आन में।
प्राण में उसी की मूर्ति मंजु है समायी हुई, मानो उड़त है वही सांसो की विमान में।।

(14). सवैया छंद की परिभाषा

सवैया एक वर्णिक समवर्ण वृत छंद है। इसके प्रत्येक चरण में 22 से 26 वर्ण होते हैं‌। इस छंद में कोई एक गण ही अनेक बार आता है। सवैया के अनेक प्रकार होते हैं।
दूसरे शब्दों में – 22 से 26 वर्णों तक के वर्ण वृत्तों को ‘सवैया छंद’ कहते हैं। उदाहरण-

बिना विचारे जब काम होगा। कभी न अच्छा परिणाम होगा।।
पूछत दीनदयाल को धाम। बतावत आपन नाम सुदामा।।

सवैया छंद के भेद

सवैया छंद के कुछ प्रमुख भेद इस प्रकार हैं –
(1). मत्तगयन्द सवैया छंद
(2). सुन्दरी सवैया छंद
(3). सुमुखी सवैया छंद
(4). दुर्मिल सवैया छंद
(5). मदिरा सवैया छंद ।

(1). मत्तगयन्द सवैया छंद की परिभाषा

मत्तगयन्द एक वर्णिक समवर्ण वृत छंद है इसमें चार चरण होते हैं। इसके प्रत्येक चरण में 23 वर्ण होते हैं। तथा 12 और 11 वर्णों पर यति होती है। इसके प्रत्येक चरण में सात भगण (SII) और दो गुरु (SS) होते हैं। अतः इसे ‘इन्दव’ अथवा ‘मालती’ छंद भी कहते हैं। उदाहरण-

S I I S I I S I I S I I S I I S I I S I I S S
या लकुटी अरु कामरिया पर, राज तिहूॅंपुर को तजि डारौं।
आठहुॅं सिद्धि नवों निधि को सुख, नन्द की धेनु चराय बिसारौं।।
रसखान कबौं इन आंखिन तें, बज्र के वन बाग तड़ाग निहारौं।
कोटिक हूॅं कलधौत के धाम,करील की कुंजन ऊपर वारौं।।

(2). सुन्दरी सवैया छंद की परिभाषा

सुन्दरी एक वर्णिक समवर्ण वृत छंद है इसमें चार चरण होते हैं। इसके प्रत्येक चरण में 25 वर्ण होते हैं। तथा 12 और 13 वर्णों पर यति होती है। इसके प्रत्येक चरण में आठ सगण (IIS) और अंत में एक गुरु (S) होता है‌। उदाहरण-

I I S I I S I I S I I S I I S I I S I I S I I S S
सुख शांति रहे सब और सदा, अविवेक तथा अघ पास न आवै।
गुणशील तथा बल बुद्धि बड़े, हठ वैर विरोध घटै मिटि जावै।।
कहे मंगल दारिद दूर भगे, जग में अति मोद सदा सर सावै।
कवि पंडित सूरन बीरन से, विलसे यह देश सदा सुख पावै।।

(3). सुमुखी सवैया छंद की परिभाषा

सुमुखी एक वर्णिक समवर्ण वृत छंद है इसमें चार चरण होते हैं। इसके प्रत्येक चरण में 23 वर्ण होते हैं। इसके प्रत्येक चरण में सात जगण (ISI) तथा चरण के अन्त में एक लघु (I) तथा एक गुरु (S) होता है। अतः इसे ‘मल्लिका छंद’ भी कहते हैं। उदाहरण-

I S I I S I I S I I S I I S I I S I I S I I S
जु लोग लगैं सिय रामहि साथ चलैं वन माहि फिरैं न चहैं।
हमें प्रभु आयसु देहु चलैं रउरे यो करि जोरि कहैं।।
चलें कछु दूरि नमै पगधूरि भले फल जन्म अनेक लहैं।
सिया सुमुखी हरि फेरि जिन्हें बहु भाॅंतिनि ते समुझाइ रहैं।।

(4). दुर्मिल सवैया छंद की परिभाषा

दुर्मिल एक वर्णिक छंद है इसमें चार चरण होते हैं। इसके प्रत्येक चरण में 24 वर्ण होते हैं। तथा 12 और 12 वर्णों पर यति होती है। इसके प्रत्येक चरण में आठ सगण (IIS) होते हैं। इसे ‘चन्द्रकला’ भी कहते हैं। उदाहरण-

I I S I I S I I S I I S I I S I I S I I S I I S
पुरते निकसी रघुबीर वधु, छरि धीर दएमग में डग द्वैं।
झलकी भरि भाल कनी जलकी, पुट सूख गए मधुरा धर व्हैं।।
फिरि बुझति है चलनो अब कैतिक पने कुटी कटि है कित व्हैं।
तियकी लखि आतुरता पियकी, आंखिया अति चारु चली जल व्हैं।।

(5). मदिरा सवैया छंद की परिभाषा

ये एक वर्णिक समवर्ण वृत छंद है। इसके प्रत्येक चरण में 22 वर्ण होते हैं। तथा 10 और 12 वर्णों पर यति होती है इसमें सात भगण (SII) और चरण के अंत में लघु-गुरु (IS) आता है। उदाहरण-

S I I S I I S I I S I I S I I S I I S I I S
सिंधु तयो उनको बनरा, तुम पै धनु रेख गयी न तरी।
वानर बांधत सोन बॅंध्यों उन वारिधि बाॅंधिक वाट करी।।
श्रीरघुनाथ प्रताप कि बात तुम्हें दस कठ न जानि परी।
तेलहु तूलहु पूंछ जरी न जरी-जरी लंक जराइ जरी।।

3. मुक्तक छंद (Muktak Chhand ki Paribhasha)

जिन छंदों में वर्ण और मात्राओं की गणना न हो और न हीं प्रत्येक चरण में वर्णों की मात्रा या क्रम समान हो और न हीं मात्राओं की कोई निश्चित व्यवस्था हो, उसे ‘मुक्तक छंद’ कहते हैं।

दूसरे शब्दों में – जिन छंदों में वर्ण और मात्रा का कोई बंधन नहीं होता, उसे मुक्तक छंद कहते हैं। उदाहरण-

रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून।
पानी गए न ऊबरै, मोती मानुष चून।।

हिंदी में स्वतंत्र रूप से आज जो छंद लिखे जा रहे हैं वे मुक्तक छंद है। इसके ‘प्रेणता सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला’ माने जाते हैं।

मुक्तक छंद की विशेषताएं

  1. इसका प्रत्येक चरण अपने आप में स्वतंत्र होता है।
  2. इसमें एक चरण का दूसरे चरण से कोई संबंध नहीं होता है।
  3. यह छंद नियमवध्द नहीं होते है।
  4. मुक्तक छंद की विशेषता ही स्वच्छ गति और भावपूर्ण यति विधान होती है।
  5. इस छंद में लय (राग) सदा एक सा नहीं रहता है। इसके चरणों में लय (राग) बदलते रहते हैं।

छंद के FAQs

1. छंद की परिभाषा क्या है?

छंद का शाब्दिक अर्थ है ‘खुश करना’ अथवा ‘बंधन’ । अर्थात् वर्ण, गति, विराम,‌ मात्रा, तुक आदि नियमों पर आधारित शब्द गणना को ही ‘छंद’ कहते हैं।

2. छंद क्या है छंद के प्रकार?

छंद के मुख्य तीन प्रकार (भेद) होते हैं –
(1). मात्रिक छंद, (2). वर्णिक छंद, (3). मुक्तक छंद।
(1). मात्रिक छंद – मात्रिक छंद वे हैं जिनकी रचना में चरण की मात्राओं की गणना होती है। जैसे – दोहा, सोरठा, रोला, चौपाई आदि मात्रिक छंद है।
(2). वर्णिक छंद – वर्णिक छंद वे है जिसके प्रत्येक चरण का निर्माण वर्णों की एक निश्चित संख्या एवं लघु-गुरु के क्रम के अनुसार होता है। जैसे – द्रुतविलम्बित, मालिनी, इन्द्रवज्रा, शिखरिणी आदि वर्णिक छंद है।
(3). मुक्तक छंद – मुक्तक छंद वे है जिनमें वर्ण मात्रा का कोई सम्बन्ध नहीं होता है अतः हिंदी में स्वतंत्र रूप से आज लिखे जा रहे छंद मुक्तक छंद हैं।

3. छंद कितने प्रकार के होते हैं?

छंद के तीन प्रकार होते हैं –
(1). मात्रिक छंद
(2). वर्णिक छंद
(3). मुक्तक छंद ।
मात्रिक छंद के भी तीन प्रकार है –
(1). सम मात्रिक छंद
(2). अर्द्धसम मात्रिक छंद
(3). विषम मात्रिक छंद ।
वर्णिक छंद के दो प्रकार हैं –
(1). साधारण छंद
(2). दण्डक छंद ।

4. छंद का दूसरा नाम क्या है?

छंद का दूसरा नाम ‘पिंगल’ है।

5. छंद में कितने चरण हैं?

छंदों में प्रायः चार चरण होते हैं, जो चार पंक्तियों में लिखे जाते हैं। परन्तु किन्हीं छंदों में छह चरण भी होते हैं। जैसे – छप्पय, कुण्डलिया आदि।

6. छंद के मुख्य अंग कितने हैं?

छंद के मुख्य रूप से सात 7 अंग माने जाते हैं –
(1). चरण/पद, (2). वर्ण और मात्रा, (3). संख्या/क्रम, (4). गण, (5). गति, (6). यति/विराम, (7). तुक ।

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