क्लाॅसियस-क्लैपराॅन समीकरण क्या है, परिभाषा, सूत्र, उपयोग | Clausius-Clapeyron Equation in Hindi

क्लाॅसियस-क्लैपराॅन समीकरण

इसके अनुसार, ऊष्मागतिकी के द्वितीय नियम के आधार पर ठोस पदार्थों के द्रवणांक तथा द्रवों के क्वथनांक पर दाब के साथ परिवर्तन को क्लाॅसियस-क्लैपेराॅन समीकरण या प्रथम गुप्त ऊष्मा समीकरण भी कहते हैं।

प्रथम गुप्त ऊष्मा समीकरण

माना एक वक्र में mnop तथा qrst दो समतापी वक्र हैं। जिनके ताप क्रमशः T तथा T + dT हैं। वक्र के भाग mn तथा qr द्रव अवस्था को प्रदर्शित करते हैं, no तथा rs के अनुदिश द्रव-वाष्प अवस्था में परिवर्तित होता है। तथा यह दोनों संयुक्त रूप में पाए जाते हैं। op तथा st भाग वाष्प अवस्था को प्रदर्शित करते हैं। जैसे की चित्र में दिखाया गया है।

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क्लाॅसियस-क्लैपराॅन समीकरण
क्लाॅसियस-क्लैपराॅन समीकरण

माना कि ताप T तथा T + dT के संगत वाष्प दाब क्रमशः P तथा P + dP है। r तथा s से दो रुध्दोष्म वक्र ru तथा sv खींचते हैं। अतः इस प्रकार rsvur एक वक्र प्राप्त होता है। जिसे कार्नो चक्र कहा जाता है।
अब माना कि rs के अनुदिश Q1 ऊष्मा का अवशोषण होता है जो कि ताप T + dT के संगत वाष्पन की गुप्त ऊष्मा L + dL है। यदि वक्र vu के अनुदिश निष्कासित ऊष्मा Q2 है, जो L के बराबर है अर्थात्
कार्नो उत्क्रमणीय वक्र के लिए
\frac{Q_1}{T_1} = \frac{Q_2}{T_2}
या \frac{Q_1}{Q_2} = \frac{T_1}{T_2}
अथवा
\frac{Q_1 - Q_2}{Q_2} = \frac{T_1 - T_2}{T_2}
अतः यहां Q1 = L + dL, Q2 = L, T1 = T + dT तथा T2 = T रखने पर,
इसलिए
\frac{L + dL - L}{L} = \frac{T + dT - T}{T}
अर्थात्
\frac{dL}{L} = \frac{dT}{T}
अथवा
dL = \frac{L}{T} dT ….(1)
यदि चक्र rsvur में ऊष्मा की मात्रा जो कार्य में रूपांतरित होती है, तब
Q1 – Q2 = L + dL – L = dL
परन्तु किया गया कार्य चक्र rsvur के क्षेत्रफल के तुल्य होगा। अर्थात्
dL = क्षेत्रफल (rsvur)
या dL = (V2 – V1)dP ….(2)
अतः समीकरण (2) से dL का मान समीकरण (1) में रखने पर,
dP(V2 – V1) = \frac{L}{T} dT
अर्थात्
\footnotesize \boxed{ \frac{dP}{dT} = \frac{L}{T(V_2 - V_1)} } ….(3)
यही क्लाॅसियस-क्लैपराॅन का समीकरण है। अथवा इसे प्रथम गुप्त ऊष्मा समीकरण भी कहा जाता है।

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क्लाॅसियस क्लैपराॅन समीकरण के उपयोग

क्लाॅसियस-क्लैपराॅन समीकरण के मुख्य रूप से दो उपयोग पाए जाते हैं जो इस प्रकार प्रदर्शित किए जा सकते हैं।

1.द्रवों के क्वथनांक पर दाब का प्रभाव

यदि जब किसी द्रव को वाष्प अवस्था में रूपांतरित किया जाता है। तो इसके आयतन में वृद्धि हो जाती है जिसके कारण V2 < V1 अर्थात् (V2 – V1) एक धनात्मक राशि होगी। परिणाम स्वरूप \frac{dP}{dT} भी धनात्मक राशि होगी। अर्थात् दाब में वृद्धि होने पर द्रव का क्वथनांक बढ़ जाएगा। यही कारण है कि जल निम्न दाब पर भी उबलता है।

2.ठोस पदार्थों के द्रवणांक पर दाब का प्रभाव

जब भी कोई ठोस पदार्थ द्रव में परिवर्तित होता है, तो कुछ पदार्थ जैसे मोम या सल्फर के आयतन में वृद्धि होती है जबकि अन्य पदार्थ जैसे बर्फ, बिस्मथ आदि के आयतन में कमी होती है।
अर्थात् जिन पदार्थों के लिए V2 < V1 जैसे मोम, तब \frac{dP}{dT} धनात्मक होगा। जिसका अर्थ है कि पदार्थों का द्रवणांक दाब बढ़ाने से बढ़ जाता है। अतः जिन पदार्थों के लिए V2 < V1 जैसे बर्फ आदि, के लिए \frac{dP}{dT} ऋणात्मक होगा। जिसका अर्थ यह है कि इसका द्रवणांक, दाब बढ़ाने पर कम हो जाता है।

Note – क्लाॅसियस-क्लैपराॅन समीकरण से संबंधित प्रश्न पूछे जाते हैं।
Q. 1 क्लाॅसियस-क्लैपराॅन गुप्त ऊष्मा समीकरण
\frac{dP}{dT} = \frac{L}{t} (V2 – V1)
को स्थापित कीजिए तथा इसके द्वारा क्वथनांक तथा गलनांक पर दाब के प्रभाव की व्याख्या कीजिए ? यहां संकेतों का सामान्य अर्थ क्या है ?
Q. 2 क्लाॅसियस-क्लैपराॅन समीकरण क्या है ? इसे सिद्ध कीजिए तथा दिखाइए कि इसे प्रथम गुप्त ऊष्मा समीकरण क्यों कहते हैं। एवं इसके उपयोग भी लिखिए ?
Q. 3 प्रथम गुप्त ऊष्मा समीकरण क्या है ? इसे किस प्रकार ज्ञात किया जा सकता है ? तथा क्लाॅसियस क्लैपराॅन समीकरण के द्वारा इसके गलनांक तथा क्वथनांक पर दाब का क्या प्रभाव पड़ता है। समझाइए ?

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