सर्वनिष्ठ आधार p-n-p ट्रांजिस्टर प्रवर्धक | सर्वनिष्ठ उत्सर्जक p-n-p ट्रांजिस्टर प्रवर्धक दोनों में अंतर समझाइए?

प्रशन 1. सर्वनिष्ठ आधार p-n-p ट्रांजिस्टर प्रवर्धक की क्रियाविधि समझाइए। धारा, वोल्टता और शक्ति प्रवर्धन के लिए व्यंजक प्राप्त कीजिए। निवेशी तथा निर्गत वोल्टताओं के बीच क्या संबंध है? समझाइए।

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सर्वनिष्ठ आधार p-n-p ट्रांजिस्टर प्रवर्धक

ट्रांजिस्टर जब सर्वनिष्ठ आधार B परिपथ में जोड़ा जाता है, तो उत्सर्जक वोल्टता में थोड़ा-सा परिवर्तन व उत्सर्जक धारा में बहुत अधिक परिवर्तन उत्पन्न करता है और इसके संगत संग्राहक धारा में भी परिवर्तन होता है। इस प्रकार यदि एक प्रत्यावर्ती सिग्नल को उत्सर्जक E पर लगा दिया जाए तो संग्राहक C से जुड़े लोड प्रतिरोध RL पर उच्च प्रत्यावर्ती वोल्टता उत्पन्न हो जाती है और ट्रांजिस्टर को प्रवर्धक की तरह प्रयोग कर सकते हैं।

सर्वनिष्ठ आधार p-n-p ट्रांजिस्टर प्रवर्धक का परिपथ आरेख

जैसा कि चित्र-1 में p-n-p ट्रांजिस्टर प्रवर्धक का सर्वनिष्ठ आधार परिपथ दिखाया गया है। इसमें उत्सर्जक को अग्र अभिनति और संग्राहक को उत्क्रम अभिनति में रखा जाता है। निविष्ट सिग्नल को उत्सर्जक पर लगाया जाता है और निर्गत सिग्नल को संग्राहक पर प्राप्त किया जाता है। चित्र-1 में देखें।

सर्वनिष्ठ आधार p-n-p ट्रांजिस्टर प्रवर्धक
सर्वनिष्ठ आधार p-n-p ट्रांजिस्टर प्रवर्धक

अब निवेशी परिपथ का प्रतिरोध कम (लगभग ≈ 10Ω) और अल्प अभिनति बायस वोल्टता होती है। निर्गत परिपथ का प्रतिरोध अधिक (लगभग ≈ 10000Ω) और उच्च अभिनति बायस वोल्टता होती है। फिर भी उत्सर्जक धारा IE और संग्राहक धारा IC लगभग बराबर होती है।

धारा प्रवर्धन – संग्राहक धारा IC में परिवर्तन और उत्सर्जक धारा IE में परिवर्तन का अनुपात प्रत्यावर्ती धारा प्रवर्धन α कहलाता है। इस प्रकार,
α = \frac{∆I_C}{∆I_E}
α का मान 1 से कुछ कम होता है।

वोल्टता प्रवर्धन – उत्सर्जक निविष्ट वोल्टता में थोड़े से परिवर्तन ∆Vin के कारण उत्सर्जक धारा IE में काफी परिवर्तन ∆IE हो जाता है,
∆IE = \frac{∆V_m}{∆R_E}
जहां RE निविष्ट प्रतिरोध है, तो संग्राहक धारा IC में परिवर्तन होगा।
∆IC = ∆IE = \frac{α}{R_E} ∆Vin
अतः निर्गत वोल्टता में RL पर होने वाला परिवर्तन होगा।
∆Vout = ∆IC ×RL
या ∆Vout = \frac{αR_L}{R_E} ∆Vin
जहां RL निर्गत प्रतिरोध है, तो प्रवर्धक का वोल्टता प्रवर्धन है।
a = \frac{∆V_{out}}{V_{in}} या α \frac{R_L}{R_E}
चूंकि RL >> RE अतः α का मान 1 से कम होते हुए भी a का मान काफी अधिक होता है।

शक्ति प्रवर्धन – शक्ति प्रवर्धन = वोल्टता प्रवर्धन × धारा प्रवर्धन
शक्ति प्रवर्धन = α2 \frac{R_L}{R_E}

कला प्रवर्धन – सर्वनिष्ठ आधार प्रवर्धक में निर्गत सिग्नल और निविष्ट सिग्नल एक ही कला में होते हैं।

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प्रशन 2. सर्वनिष्ठ उत्सर्जक p-n-p ट्रांजिस्टर प्रवर्धक या भू-सम्पर्कित उत्सर्जक प्रवर्धक की क्रियाविधि समझाइए। भू-सम्पर्कित आधार प्रवर्धक की तुलना में यह परिपथ किस प्रकार अधिक उपयोगी है? निवेशी व निर्गत प्रतिरोध, शक्ति लाभ और निवेशी व निर्गत सिग्नलों में कला संबंध ज्ञात कीजिए।

सर्वनिष्ठ उत्सर्जक p-n-p ट्रांजिस्टर प्रवर्धक

ट्रांजिस्टर का सबसे अधिक प्रयुक्त किए जाने वाला परिपथ सर्वनिष्ठ उत्सर्जक p-n-p ट्रांजिस्टर प्रवर्धक परिपथ है। क्योंकि इसका प्रवर्धक गुणांक सबसे अधिक होता है। p-n-p ट्रांजिस्टर के लिए प्रवर्धन परिपथ चित्र-2 में दिखाया गया है उत्सर्जक के सापेक्ष आधार ऋणात्मक हैं आधार और उत्सर्जक दोनों के सापेक्ष संग्राहक ऋणात्मक है। अतः उत्सर्जक टर्मिनल उभयनिष्ठ है और भू-सम्पर्कित है।

सर्वनिष्ठ उत्सर्जक p-n-p ट्रांजिस्टर प्रवर्धक का परिपथ आरेख

जैसे कि चित्र-2 में सर्वनिष्ठ उत्सर्जक p-n-p ट्रांजिस्टर प्रवर्धक को दिखाया गया है ।

सर्वनिष्ठ उत्सर्जक p-n-p ट्रांजिस्टर प्रवर्धक
सर्वनिष्ठ उत्सर्जक p-n-p ट्रांजिस्टर प्रवर्धक

इसमें सर्वनिष्ठ उत्सर्जक परिपथ का मुख्य लक्षण यह है कि निविष्ट सिग्नल को आधार पर लगाया जाता है और निर्गत सिग्नल को संग्राहक पर प्राप्त किया जाता है। हम जानते हैं कि ट्रांजिस्टर में अधिक संग्राहक धारा के संगत बहुत कम आधार होता है। अतः आधार पर निवेशी सिग्नल लगाकर आधार धारा में बहुत कम परिवर्तन के संगत संग्राहक धारा में बहुत कम परिवर्तन होता है। इस प्रकार काफी धारा प्रवर्धन प्राप्त होता है जबकि सर्वनिष्ठ आधार परिपथ में धारा हानि होती है।

धारा प्रवर्धन – प्रवर्धन के कारण संग्राहक धारा IC में परिवर्तन और आधार धारा IB में परिवर्तन के अनुपात को प्रत्यावर्ती धारा प्रवर्धन β कहते हैं। इस प्रकार,
β = \frac{∆I_C}{∆I_B}
β का सामान्य मान 50 होता है परंतु इसका मान 200 तक हो सकता है।

वोल्टता प्रवर्धन – Av = β \frac{R_L}{R_E}

शक्ति लाभ – Ap = βAv = β_2 \frac{R_L}{R_E}

कला संबंध – सर्वनिष्ठ उत्सर्जक ट्रांजिस्टर प्रवर्धक में निर्गत सिग्नल और निविष्ट सिग्नल कला में एक-दूसरे के विपरीत होते हैं।

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