महाकाव्य काल – सैन्य व्यवस्था एवं युद्ध कला की समीक्षा | Epic Period in Hindi

महाकाव्य काल की सैन्य व्यवस्था

महाकाव्यकाल में वैदिक युग द्वारा निर्मित सैन्य व्यवस्था अधिक विकसित हो गयी थी। राष्ट्र के शासन में क्षत्रियों का पूर्ण आधिपत्य हो गया था। जैसे – प्राणियों की रक्षा करना, युद्ध के लिए तैयार रहना, युद्ध में मृत्युपर्यन्त डटे रहना आदि क्षत्रियों के प्रमुख कर्तव्य समझे जाते थे । क्षत्रियों के साथ-साथ ब्राह्मण वर्ग के लोग भी सैनिक क्रियाओं में भाग लेने लगे थे। महाभारत, के उदाहरणों से यह विदित होता है कि ब्राह्मणों की तप मन्त्र की शक्ति युद्ध विषय में उतनी ही महत्त्वपूर्ण समझी जाती थी जितनी कि क्षत्रियों के शस्त्रास्त्रों की शक्ति ।

सैन्य संगठन

महाकाव्यकाल में राज्य की सुरक्षा हेतु स्थायी सेना के निर्माण पर विशेष बल दिया गया था। मुख्य रूप से क्षत्रिय और ब्राह्मण वर्ग के व्यक्ति ही सैनिक कार्य किया करते थे। सेना को अनेक छोटी-बड़ी टुकड़ियों में संगठित किया जाता था, जो निम्नलिखित प्रकार होता था-

क्रम संख्याटुकड़ी का नामरथहाथीघोड़ेपैदलयोग
1.पति113510
2.सेना मुख3391530
3.गुल्म99274590
4.गण272781135270
5.बाहिनी8181243405810
6.पृतना24324372912152430
7.चमू729729218736457290
8.अनीकनी2187218765611093521870
9.अक्षौहिणी218702187065610109350218700

महाभारत के युद्ध में पाण्डवों की 7 तथा कौरवों की 11 अक्षौहिणी सेना थी। अतः युद्धों में विशाल सैन्य संख्या होती थी ।

सेना के अंग

महाकाव्यकाल में चार प्रकार की सेनाओं (रथ, गज, पैदल तथा अश्व) का उल्लेख मिलता है। इस सेना को ‘चतुरंग बल’ कहा जाता था। इस युग में रथ सेना को ही विजय प्राप्ति के लिए योग्य समझा जाता था। मनुस्मृति के अनुसार, छः प्रकार (षष्टांग बल) और महाभारत में कहीं आठ प्रकार की (अष्टांग बल) सेना का उल्लेख मिलता है।

इन आठ प्रकार की सेनाओं को दो भागों में विभाजित किया गया था— पहला सांग्रामिक बल, दूसरा सहायक बल । सांग्रामिक बल में रथ, गज, पैदल, अश्व सेनाएँ होती थीं, जो मुख्यतः लड़ाई का कार्य करती थीं। सहायक बल में सामग्री ढोने वाला वर्ग, नौका वर्ग, गुप्तचर व मार्गदर्शक होते थे, जो सांग्रामिक बल की आवश्यकतानुसार सहायता करते थे ।

सैन्य प्रशिक्षण

महाकाव्यकाल में स्थायी सेना होने के कारण तथा क्षत्रिय वर्ग के कर्त्तव्यों की सीमा दृढ़े रूप से निश्चित हो जाने के कारण सैनिक शिक्षा का महत्व बढ़ गया था। सेना में भर्ती किए गए सैनिकों को युद्ध शिक्षा विधिवत् दी जाती थी। राजकुमारों और उच्च कुल के पुत्रों के लिए राज्य की ओर से सैनिक पाठशालाएँ होती थीं।

अस्त्र-शस्त्र

महाकाव्यकाल में वैदिक युग की अपेक्षा शस्त्रों में काफी विकास हुआ था। आक्रमणात्मक शस्त्रों में धनुष-बाण, प्रहरण, कृन्त, गदा, बल्लम, यन्त्र कुठार, चक्र, शतघ्नी आदि उल्लेखनीय थे। मार्कण्डेय पुराण में 86 प्रकार के शस्त्रों तथा 84 प्रकार की गदाओं का वर्णन मिलता है। सैनिकों के बचाव के लिए अच्छे कवचों का निर्माण इस काल में किया गया। भिन्न-भिन्न अंगों के बचाव के लिए अलग-अलग कवच (शिरस्त्राण, कण्ठस्त्राण, वक्षस्त्राण, पदस्त्राण, हंस्तपवा आदि) तथा पूरे शरीर को ढँकने के लिए एक ही कवच, दोनों प्रकार के कवचों का प्रयोग किया जाता था। शतघ्नी नामक अस्त्र को विद्वानों ने आग्नेयशस्त्र की श्रेणी में रखते हुए इसे अत्यधिक विनाशक शस्त्र कहा है ।

दुर्ग-रचना

महाकाव्यकाल में सुरक्षा हेतु ऊँची-ऊँची दीवारों से युक्त दुर्गों का निर्माण का वर्णन प्राप्त होता है। इन दुर्गों की दीवारों के चारों ओर सुरक्षार्थ खाइयों का निर्माण किया जाता था। रामायण में चार प्रकार के दुर्गों का वर्णन किया गया है— नादेय, पर्वत, वन और कृत्रिम । युद्धकला की दृष्टि से मनु ने छः प्रकार के दुर्गों का वर्णन किया है, जो धन्व, मही दुर्ग, जल दुर्ग, वीर्य दुर्ग, गिरि और नृदुर्ग होते थे। इनमें से गिरि दुर्ग को मनु ने सबसे उत्तम बताया है।

व्यूह-रचना

महाकाव्यकाल में, विशेषकर महाभारत में अनेक प्रकार के व्यूहों का उल्लेख है। ये व्यूह सैन्य प्रस्थान के समय या युद्ध क्षेत्र में सेना को व्यवस्थित ढंग से लड़ने के लिए प्रयोग में लाए जाते थे । व्यूह-आक्रमणात्मक तथा सुरक्षात्मक, दोनों ही प्रकार के होते थे, अर्जुन ने वज्र व्यूह, कोचारुण व्यहू, अर्द्धचन्द्र व्यूह, श्रंगटक व्यूह आदि की रचना की थी जबकि कौरवों में भीष्म, द्रोण आदि ने गरुण व्यूह, सर्वतोभद्र व्यूह, चक्रव्यूह तथा कर्ण ने मकर व्यूह की रचना की थी।

युद्ध कला

महाकाव्यकाल में युद्ध के लिए सेना की यात्रा का मुहूर्त ज्योतिषी निश्चित करते थे। साधारणतया लम्बी यात्रा का मुहूर्त सर्दी के दिनों में तथा समीप की यात्रा का गर्मी के दिनों में निश्चित किया जाता था। सेना के आगे कुछ महारथी चलते थे। उनके पीछे (मध्य से) राजा और आवश्यक सामग्री से पूर्ण वाहन चलते थे । उनके पीछे प्रमुख सेनाध्यक्षों के अधीन मुख्य सेना चलती थी। सैन्य यात्रा के समय अनेक व्यूहों का प्रयोग किया जाता था। चारों ओर शत्रु का भय हो तो दण्ड व्यूह, पार्श्व से भय हो तो वराह व्यूह या गरुण व्यूह, आगे या पीछे से भय हो तो मकर व्यूह या सूची मुख व्यूह के आकार में सेना को सजाकर यात्रा करनी पड़ती थी।

युद्ध-विधि

महाकाव्यकाल में युद्ध दो प्रकार के माने जाने लगे-
धर्मयुद्ध और युद्ध – धर्म युद्ध में कुछ निर्धारित नियमों का पालन किया जाता था और शत्रु को हार स्वीकार कराना ही मुख्य लक्ष्य होता था न कि शत्रु सेना का अमानुषिक रूप से संहार करना। वैसे तो अधिकतर धर्म युद्धों पर ही जोर दिया जाता था, किन्तु रामायण और महाभारत दोनों से ही ऐसे उदाहरण मिलते हैं, जिनमें नियमों का उल्लंघन किया गया था। जहाँ इन नियमों का उल्लंघन करके युद्ध लड़ा जाता था उसे कूट युद्ध का नाम दिया गया। कूट युद्ध में छल-कपट आदि विभिन्न उपायों से शत्रु को मारने का उद्देश्य होता था।

युद्ध-संगीत

महाकाव्यकाल में भी कई प्रकार के वाद्य-यन्त्रों का उल्लेख मिलता है, जो युद्ध के समय बजाये जाते थे। महाभारत के कर्ण पर्व में मृदंग, भेरी, प्रणव, शंख आदि अनेक वाद्य-यन्त्रों का उल्लेख मिलता है, जो युद्ध संगीत के प्रयोग में लाए जाते थे । शंखों का प्रयोग अधिक होता था। पंचजन्य तथा पाण्डू नामक शंखों का वर्णन भगवद्गीता में भी किया गया है।

जलयान एवं वायुयान

महाकाव्य एवं पुराणकालीन सैन्य पद्धति के विकास का एक प्रमाण इस काल में प्रयुक्त होने वाले जलयान और वायुयान भी हैं। विद्वानों का अनुमान है कि यातायात के साधन के रूप में इनका प्रयोग होता था। महाभारत के शान्ति पर्व में जल सेना को एक आवश्यक अंग बताया गया है। इसी प्रकार इस काल में वायुयानों के प्रयोग के भी कई उल्लेख हैं। अनेक स्थानों पर श्रीकृष्ण के प्रमुख वाहन गरुण का भी उल्लेख है। रामायणकाल में रावण द्वारा वायुमार्ग से सीता का हरण इस बात के स्पष्ट संकेत हैं।

उपर्युक्त विवरण के आधार पर हम यह कह सकते हैं कि महाकाव्यकाल सैन्य संगठन व युद्धकला, वैदिककालीन आर्यों के सैन्य संगठन व युद्धकला से अत्यधिक विकसित, संगठित व व्यवस्थित था।

नोट – परीक्षाओं में पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1. महाकाव्य कालीन के सैन्य संगठन एवं युद्धकला की समीक्षा कीजिए।
प्रश्न 2. महाकाव्य काल में सेना कितनी सैन्य इकाइयों में विभक्त थी तथा उनकी कुल सैनिक संख्या क्या होती थी?
प्रश्न 3. सैन्य संगठन तथा युद्ध कला के क्षेत्र में वैदिक काल तथा महाकाव्य काल की तुलनात्मक व्याख्या कीजिए।

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