दृढ़ पिण्डों का सन्तुलन क्या है, स्थानान्तरीय व घूर्णन सन्तुलन के प्रतिबन्ध | Equilibrium of Rigid Bodies in Hindi

इस अध्याय के पिछले कुछ आर्टिकल में हमने दृढ़ पिण्डों की गतिकी पर विचार किया है। इस अध्याय में हम किसी दृढ़ पिण्ड से संबंधित उन तथ्यों पर विचार करेंगे जिनके अन्तर्गत कोई दृढ़ पिण्ड सन्तुलन की अवस्था में रहता है।

दृढ़ पिण्डों का सन्तुलन

यहां सन्तुलन से यह अभिप्राय है कि पिण्ड या तो विराम अवस्था में है। अथवा पिण्ड का द्रव्यमान केन्द्र एक नियत वेग से गतिशील है। न्यूटन के गति विषयक नियम के अनुसार, “यदि एक-बिन्दुगामी बलों के प्रभाव में किसी कण के सन्तुलन पर विचार करते हैं तो यदि कण पर लग रहे समस्त बलों का परिणामी शून्य हो, तो वह कण सन्तुलन की अवस्था में होता है।”
अर्थात् यदि कण विराम अवस्था में है तो वह उसी स्थिति को बनाए रखेगा और यदि कण गतिशील है तो वह उसी नियत वेग से गतिशील रहेगा।
लेकिन यह स्थिति तब जटिल हो जाती है जब वास्तव में इन वस्तुओं पर पड़ रहे बाह्य बल के प्रभाव का अध्ययन करते हैं तो यह देखा जा सकता है कि बाह्य बल का प्रभाव दृढ़ पिंड के भिन्न-भिन्न कणों पर भिन्न-भिन्न होता है। अतः किसी दृढ़ पिंड पर लग रहे समस्त बलों का परिणामी शून्य हो परन्तु दृढ़ पिंड पूर्ण सन्तुलन की अवस्था में न हो। यह तब सम्भव है जब पिंड पर लग रहे बलों का परिणामी तो शून्य हो किन्तु बल एक-बिन्दुगामी न हो । ऐसी स्थिति में ये बल दृढ़ पिंड को किसी अक्ष के सापेक्ष घुमाने की प्रवृत्ति रख सकते हैं। जिससे पिंड का घूर्णन अक्ष कोणीय वेग व कोणीय त्वरण के सापेक्ष परिवर्ती हो सकता है।
इस प्रकार किसी दृढ़ पिंड के स्थैतिक सन्तुलन के लिए यह आवश्यक हो जाता है।

  • उस कण पर लग रहे समस्त बलों का परिणामी शून्य हो तथा
  • पिण्ड पर लग रहे समस्त बलों का किसी भी मूल बिन्दु के सापेक्ष आघूर्णों का बीजगणितीय योग शून्य हो।

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दृढ़ पिंडों के संतुलन के प्रतिबंध

बाह्य बल के प्रभाव में कोई पिंड स्थानांतरीय व घूर्णन दोनों प्रकार की गतियां कर सकता है। अतः पिंड को संतुलन की अवस्था में रहने के लिए उसे स्थानांतरीय व घूर्णन दोनों प्रकार की गतियों से संबंधित संतुलन प्रतिबंधों का अनुपालन करना आवश्यक होता है।

1.स्थानांतरीय संतुलन के प्रतिबंध

यदि किसी दृढ़ पिंड पर कार्य कर रहे समस्त बालों का बीजगणितीय योग या सदिश योग शून्य हो, तो पिंड पर लग रहे बल एक-बिन्दुगामी हों अथवा न हो, तो पिंड को स्थानांतरीय संतुलन की अवस्था में कहा जाता है। अर्थात् जैसे कि चित्र-1 में दिखाया गया है।

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स्थानांतरीय संतुलन के प्रतिबंध
स्थानांतरीय संतुलन के प्रतिबंध

माना यदि पिंड के विभिन्न कणों पर लग रहे बल क्रमशः \overrightarrow{F_1} , \overrightarrow{F_2} , \overrightarrow{F_3} ,…. \overrightarrow{F_n} हो, तो स्थानांतरीय संतुलन के लिए,
\overrightarrow{F_1} + \overrightarrow{F_2} + …. + \overrightarrow{F_n} = 0
या Σ \overrightarrow{F} = 0 ….(1)

परन्तु न्यूटन के द्वितीय नियम से,
Σ \overrightarrow{F} = Σm \overrightarrow{a_{cm}}
यहां Σm = M दृढ़ पिंड का संपूर्ण द्रव्यमान, acm उसके द्रव्यमान केन्द्र का त्वरण है। अब यदि कण पर आरोपित बाह्य बलों का परिणामी शून्य Σ \overrightarrow{F} = 0 हो, तब
Σm \overrightarrow{a_{cm}} = 0 या M \overrightarrow{a_{cm}} = 0
किन्तु M \neq 0 अतः
\overrightarrow{a_{cm}} = \frac{ ∆\overrightarrow{v_{cm}} }{∆t} = 0 या ∆ \overrightarrow{v_{cm}} = 0
या \footnotesize \boxed{ \overrightarrow{v_{cm}} = नियतांक }

अर्थात् “स्थानांतरीय संतुलन की अवस्था में दृढ़ पिंड या तो विराम अवस्था में होगा। और यदि गति की अवस्था में है तो पिंड के द्रव्यमान केंद्र का रेखीय वेग \overrightarrow{v_{cm}} व रेखीय संवेग Σm \overrightarrow{v_{cm}} नियत रहेगा ।”

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2.घूर्णन संतुलन के प्रतिबंध

इस प्रतिबंध के अनुसार, यदि किसी दृढ़ पिंड पर कार्य कर रहे समस्त बलों के किसी भी मूल बिंदु के सापेक्ष आघूर्णों का सदिश योग या बीजीय योग शून्य हो तो वह पिंड घूर्णन संतुलन की स्थिति में कहा जाता है। जैसे कि चित्र-2 में दिखाया गया है।

घूर्णन संतुलन के प्रतिबंध
घूर्णन संतुलन के प्रतिबंध

गणितीय रूप में घूर्णन संतुलन के लिए,
Σ \overrightarrow{ι} = I \overrightarrow{α}
चूंकि Σ \overrightarrow{ι} = 0, इसलिए, \overrightarrow{α} = 0
अतः स्पष्ट है कि यदि किसी दृढ़ पिंड का कोणीय त्वरण α शून्य अथवा कोणीय वेग ω या कोणीय संवेग Iω नियत हो, तो वह दृढ़ पिंड घूर्णी संतुलन की अवस्था में कहा जा सकता है। अतः दृढ़ पिंड पर कार्य कर रहे बलों का परिणामी
Fnet = F + (-F) = 0
चूंकि पिंड पर कार्य कर रहे बलों का परिणामी शून्य है अतः पिंड स्थानांतरीय संतुलन की अवस्था में है। पुनः पिंड के द्रव्यमान केंद्र O के सापेक्ष इन बलों का परिणामी आघूर्ण,
ι = Fd+ Fd = 2Fd
अतः चित्र-2 के अनुसार, दृढ़ पिंड पर कार्य कर रहे बलों का बीजीय योग,
F – F = 0
अर्थात् पिंड स्थानांतरीय संतुलन की अवस्था में है। पुनः पिंड पर लगने वाले दोनों बल एक ही सरल रेखा के अनुदिश विपरीत दिशाओं में कार्यरत हैं। अतः इन बलों का किसी भी मूल बिंदु के सापेक्ष आघूर्णों का बीजीय योग शून्य होगा।
इस प्रकार, दृढ़ पिंड घूर्णन संतुलन के प्रतिबंधों का भी पालन करता है। अतः निर्णायक रूप में पिंड स्थैतिक-संतुलन की स्थिति में है।

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दृढ़ पिंडों के संतुलन के उदाहरण

दो लम्बों पर टिकी दृढ़ छड़ का संतुलन – माना MN एक समांतर छड़ है जिसका भार W छड़ के गुरुत्व केन्द्र G जो की छड़ के मध्य बिन्दु पर कार्य कर रहा है। अब चूंकि छड़ क्षैतिज तल में O व P पर टिकी है। जैसे कि चित्र-3 में दिखाया गया है।

दृढ़ पिण्डों का सन्तुलन
दृढ़ पिण्डों का सन्तुलन

अतः सहारों के स्पर्श बिंदुओं पर प्रतिक्रियाएं RO व RP ऊर्ध्वाधर ऊपर की और होंगी।
अब छड़ के स्थानांतरीय संतुलन हेतु ΣF = 0
या RO + RP = W ….(1)
तथा छड़ के घूर्णन संतुलन हेतु ΣM = 0 या Σι = 0 बिन्दु M के सापेक्ष आघूर्ण लेने पर,
RO × MO + RP × MP – W × MG = 0 ….(2)
अतः इस प्रकार, संतुलन के प्रतिबंधों का उपयोग करके इन दोनों समीकरणों से अज्ञात राशियों RO, RP इत्यादि की गणना की जा सकती है।

Note – दृढ़ पिण्ड सन्तुलन से सम्बन्धित प्रशन –
Q. 1 किसी दृढ़ पिण्ड के सन्तुलन के लिए आवश्यक प्रतिबन्धों का उल्लेख कीजिए तथा यह बताइए कि जब कोई वस्तु स्थानान्तरीय सन्तुलन की अवस्था में होती है तब उसके द्रव्यमान केन्द्र का संवेग स्थिर रहता है। या परिवर्ती ?
Q. 2 दृढ़ पिण्डों के सन्तुलन से आप क्या समझते हैं ? इसके प्रतिबन्धों को समझाइए तथा स्थानान्तरीय व घूर्णन सन्तुलन के प्रतिबन्धों को सिद्ध कीजिए?

  1. यान्त्रिकी एवं तरंग गति नोट्स (Mechanics and Wave Motion)
  2. अणुगति एवं ऊष्मागतिकी नोट्स (Kinetic Theory and Thermodynamics)
  3. मौलिक परिपथ एवं आधारभूत इलेक्ट्रॉनिक्स नोट्स (Circuit Fundamental and Basic Electronics)
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