आंग्ल-सिख युद्ध, सोब्राउन का युद्ध 1846 ई. के कारण और परिणाम | First Anglo-Sikh War in Hindi

आंग्ल-सिख युद्ध क्यों हुआ

महाराजा रणजीत सिंह की मृत्यु के पश्चात् उनके अकुशल उत्तराधिकार ने अंग्रेजों को राज्य विस्तार का सुअवसर प्रदान किया। आपसी फूट, अदूरदर्शिता तथा कुशल नेतृत्व के अभाव के कारण ही सिक्ख सेनानायक अंग्रेजों के विरुद्ध अपने पहले ही युद्ध में पराजित हो गये। सोब्राउन से पूर्व छोटी-छोटी लड़ाइयाँ लड़ी गयीं जैसे— मुदकी, फिरोजशहर तथा अलीवाल। अन्त में सोब्राउन में निर्णायक संग्राम लड़ा गया।

सोब्राउन संग्राम (1846 ई.) सिक्खों की मोर्चाबन्दी

ब्रिज हैड (Bridge head) की सहायता से सतलज नदी को पार कर नदी के बायें किनारे पर स्थित सोबराव गाँव के निकट मजबूत मोर्चाबन्दी प्रारम्भ कर दी। यहाँ पर सिक्खों ने पहले की तुलना में अधिक मजबूत प्रतिरक्षात्मक स्थिति तैयार कर ली थी फिर भी अदूरदर्शिता के अभाव में इसमें कुछ कमियाँ थीं। स्थायी बटालियनों को नियुक्त कर जहाँ बाएँ तथा मध्य भाग को टीलों व खाइयों द्वारा मजबूत कर दिया गया था, वहीं दाहिने भाग की प्रतिरक्षात्मक स्थिति के निर्माण में लापरवाही बरती थी। इस प्रतिरक्षात्मक स्थिति को नावों के पुल के द्वारा नदी के किनारे पर स्थित एक शिविर से जोड़ा गया था।

तुलनात्मक सैन्य शक्ति

सिक्ख सेना – इतिहासकार कनिंघम के अनुसार सतलज नदी के बायें किनारे पर स्थित प्रतिरक्षात्मक स्थिति में सिक्ख सैनिकों की संख्या 20,000 के लगभग थी, इनका नेतृत्व तेजसिंह कर रहा था। नदी के ऊपर की ओर लालसिंह की कमाण्ड में 10,000 अश्वारोही सैनिक थे।

अंग्रेजी सेना – ले. जनरल लार्ड गफ के नेतृत्व में अंग्रेजी सैनिकों की कुल संख्या 15,000 थी, जिसमें लगभग 5,000 यूरोपियन सैनिक थे। अंग्रेजी अश्वारोही सेना का कमाण्ड कुरेटिन कर रहे थे।

यद्यपि दोनों ही पक्ष तोपखाने से भली-भाँति सुसज्जित थे, किन्तु अंग्रेजों की ल अश्वारोही सेना तथा तोष खाता दोनों ही “सिक्खों की तुलना में श्रेष्ठ था। अंग्रेजी कमाण्डर की नजर सिक्ख सेना के सुरक्षात्मक ठिकानों पर तो थी ही, किन्तु वे दिल्ली से आने वाली सैनिक सामग्री की प्रतीक्षा कर रहे थे, जिनमें 100 मैदानी तोपें शामिल थीं। इनकी पहली खेप 8 फरवरी, 1846 को अंग्रेजी हैडक्वार्टर पहुँच गयी। लुधियाना के समीप सैनिक कार्यवाही करने वाला बल भी पहुँच चुका था। अतः अंग्रेज अब आक्रमण करने के लिए पूर्णतया तैयार थे।

सामरिक फैलाव – सिक्ख सेना का पृष्ठ सतलज नदी के द्वारा घिरा हुआ था। इस सेना की मोर्चाबन्दी लगभग 4000 गज की परिधि में फैली हुई थी। सिक्ख सेना के बायें पार्श्व तथा मध्य भाग में तोपखाने तथा पैदल सेना को लगाया गया था। दाहिने पार्श्व में अश्वारोही सेना तैनात की गई थी। पृष्ठ भाग में आरक्षित सेना (Reserve Force) को भी लगाया गया था। इस सेना द्वारा शत्रु के आक्रमण को विफल करने की योजना बनायी थी। अंग्रेजों ने अपनी सेना को तीन भागों में विभाजित करके मोर्चों पर लगाया था – मध्य भाग, बाँया भाग तथा दाहिना भाग।

आक्रमण की योजना

आंग्ल-सिख युद्ध अंग्रेजों ने आक्रमण की योजना तैयार की थी। उसका नेतृत्व तीन जनरल राबर्ट डिक, गिलबर्ड तथा सर हैरी स्मिथ कर रहे थे । इन तीनों को अपने-अपने डिवीजन द्वारा तीन स्थानों पर आक्रमण करना था। सिक्खों का दाहिना पार्श्व सुरक्षा की दृष्टि से कमजोर था । अंग्रेजों को उसी भाग की ओर से आक्रमण करना था । सिक्खों पर प्रातः होते ही तोपखाने की बमबारी होनी थी तथा उसी ओर से राबर्ट डिक के अधीन सेना को सिक्खों के दाहिने बाजू पर आक्रमण का कार्य सौंपा गया था। डिक के दाहिनी ओर मध्य में गिलबर्ट तथा उसके दाहिने ओर स्मिथ को अपनी सेना द्वारा आक्रमण कर सिक्खों को उलझाये रखने का उत्तरदायित्व सौंपा गया था। कुरेटिन के अधीन अश्वारोही सेना द्वारा सिक्ख सरदार लालसिंह का ध्यान बँटाने की योजना बनायी गयी थी। सम्पूर्ण तोपखाने को अर्द्धवृत्ताकार (Semicircular) स्थिति में फैलाने का निर्णय लिया गया था, ताकि शत्रु की समस्त प्रतिरक्षात्मक स्थिति पर प्रभावशाली फायर डाला जा सके।

अंग्रेजों द्वारा आक्रमण

आंग्ल-सिख युद्ध में 10 फरवरी, 1846 को प्रातः 3 बजे ही सिक्ख सेना पर हमला करने के लिए कूच किया। अंग्रेजी सेना लार्ड गफ के सेनापतित्व में आक्रमण के लिए अपने शिविरों से चल दी। अग्रिम दस्ते (Advance guard) ने शीघ्र ही सिक्खों की एक चौकी पर अधिकार कर लिया जिसे उन्होंने आरक्षित छोड़ दिया था। प्रात:काल घना कोहरा होने के कारण अंग्रेजों ने छिपकर अपनी भारी तोपों के साथ अनुकूल स्थिति ग्रहण कर लो। प्रातःकाल सात बजे कोहरा समाप्त होते ही सिक्खों पर फायर डालकर उन्हें चकित कर दिया। सर हरबर्ट एडवर्ड के शब्दों में, “The surprised Khalsa at once heard and saw that avenger had come upon them.”

फिर भी वीर सिक्ख अंग्रेजों से युद्ध करने के लिए अपनी चौकियों की ओर झपटे तथा अंग्रेजों के फायर का जवाब देना शुरू कर दिया। दोनों ओर से दो घण्टे तक तोपखाने का युद्ध होता रहा। तभी ब्रिगेडियर Stacy के नेतृत्व में अंग्रेजी सेना ने तोपखाने की सहायता से सिक्खों के दाहिने बाजू पर आक्रमण कर दिया। वीर सिक्खों ने इस आक्रमण को विफल कर दिया।

आंग्ल-सिख युद्ध के कारण और परिणाम

जब अंग्रेजी कमाण्डर लार्ड गफ ने यह देखा कि उनकी सेना के आक्रमण को सिक्खों ने विफल कर दिया है तब उन्होंने दाहिना तथा मध्य भाग पर वास्तविक आक्रमण करने की आज्ञा दी। स्मिथ तथा गिलबर्ट अपनी सेना सहित तत्काल आगे बढ़े। इधर सिक्ख सैनिक भी अंग्रेज गतिविधियों के जवाब में अपनी प्रतिरक्षात्मक स्थितियों की ओर तेजी से दुश्मन से भिड़ गये परिणामस्वरूप दोनों पक्षों में आमने-सामने का युद्ध हुआ। सिक्खों ने गिलबर्ट की डिवीजन के 685 तथा स्मिथ की डिवीजन के 489 सैनिकों को मार डाला। इस क्षति के बाद अंग्रेजों ने बड़े धैर्य के साथ सिक्खों के दायें तथा बायें बाजू को नष्ट करने की योजना बनायी।

सिक्ख सैनिक अंग्रेजों का मुकाबला करने के लिए दाहिने पार्श्व को छोड़ चुके थे। अतः अंग्रेजों को दाहिने पार्श्व में घुसने का मौका मिल गया तथा सोब्राउन की लड़ाई का रुख सिक्खों के विरुद्ध होता गया। सिक्खों का विश्वासघाती सरदार तेजसिंह अपने सैनिकों के साथ नाव के पुल से होकर युद्ध स्थल से भाग खड़ा हुआ, जबकि वह आसानी से दाहिनी बाजू की कमी की पूर्ति कर सकता था। उसने पुल की नावों को भी नष्ट कर दिया। अतः सिक्ख सेना का एकमात्र संचरण मार्ग तेजसिंह के कारण छिन्न-भिन्न हो गया। अब अंग्रेज अपना दबाव निरन्तर बढ़ाये जा रहे थे। सिक्खों की प्रतिरोधक क्षमता कम होती जा रही थी तथा अंग्रेज एक के बाद एक चौकी पर अधिकार करते जा रहे थे।

अंग्रेजों ने दोपहर से पहले ही सिक्खों की अधिकांश सेना का सफाया कर दिया। अतः सिक्ख अपने को असहाय समझ मैदान छोड़कर भाग गये। अंग्रेजों ने भागते सैनिकों का पीछा कर उन्हें नष्ट कर दिया। अतः अंग्रेजों की यह निर्णायक विजय बन गयी।

निष्कर्ष

सिक्खों की पराजय उनकी वीरता, साहस तथा शौर्य की कमी के कारण नहीं हुई बल्कि उन्होंने नदी के पृष्ठ में रहकर बड़ी भूल की। उनके सेनानायक अदूरदर्शी तथा विश्वासघाती सिद्ध हुए जबकि अंग्रेजी सेना को कुशल नेतृत्व मिला। उनकी अश्वारोही सेना तथा तोपखाना सिक्खों की अपेक्षा श्रेष्ठ था।

नोट – परीक्षाओं में पूछे जाने वाले प्रश्न —
प्रश्न 1. सोब्राउन के संग्राम (1846 ई.) का वर्णन कीजिए तथा युद्ध में सक्ख सेना की पराजय के कारणों व प्राप्त शिक्षाओं का वर्णन करो।
प्रश्न 2. प्रथम आंग्ल-सिख युद्ध कब और क्यों हुआ था? इसके कारण और परिणामों का विस्तार पूर्वक वर्णन कीजिए।

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