पानीपत का प्रथम युद्ध, कब और किसके बीच हुआ | First Battle of Panipat in Hindi

पानीपत का प्रथम युद्ध

पानीपत के प्रथम संग्राम (सन् 1526 ई.) में दिल्ली सल्तनत के अन्तिम सुल्तान इब्राहीम लोदी को मुगल सम्राट बाबर द्वारा पराजय के साथ ही दिल्ली सल्तनत का अन्त तथा मुगल साम्राज्य की स्थापना प्रारम्भ हुई, जो बाद में हुमायूँ, अकबर, जहाँगीर और शाहजहाँ के प्रयत्नों से विकासोन्मुख होती रही, किन्तु बाद में मुगल उत्तराधिकारियों की अदूरदर्शिता एवं अकुशलता के कारण मुगल साम्राज्य की जड़ें हिलने लगीं। इसका लाभ अंग्रेजों ने उठाया और प्लासी के युद्ध के बाद भारत में अंग्रेजी साम्राज्य की स्थापना हुई।

मुगलों का तत्कालीन सैन्य संगठन एवं कार्य प्रणाली श्रेष्ठ थी, जिसके बलबूते पर मुगलों ने भारत में एक विशाल साम्राज्य स्थापित किया। इस काल की सैन्य पद्धति को निम्न प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है—

उच्चस्तरीय सेना संगठन

मुगल सम्राट अपनी सेना का सर्वोच्च सेनापति हुआ करता था। सम्राट के अधीन एक सैन्य विभाग होता था जिसका अध्यक्ष ‘बख्शी-उल-मुमालिक’ अथवा ‘मीर बख्शी’ कहलाता था। औरंगजेब के काल में साम्राज्य का विस्तार बहुत बढ़ गया था। इसलिए मीर बख्शी की सहायता के लिए तीन बख्शी और होते थे।
बख्शी के निम्न मुख्य कार्य हुआ करते थे—
(i) सैनिकों की भर्ती करना ।
(ii) घोड़ों तथा उपस्थिति का विवरण रखना ।
(iii) घोड़े को दागने, पहचानने तथा उनकी गणना का निरीक्षण करना।
(iv) युद्ध के समय सेनानायकों की स्थिति को निश्चित करना।
(v) सम्राट के समक्ष संग्राम के दिन प्रातः लड़ाकू दल के सेनानायकों तथा सैनिकों की ठीक-ठाक संख्या के साथ एक नामावली प्रस्तुत करना।

मीर बख्शी के अतिरिक्त चार अन्य अधिकारी भी होते थे—
(a) मीर-आतिश अथवा दरोगा-ए-तोपखाना ।
(b) दरोगा-ए-डाक चौकी।
(c) नजीर-ए-वायुयात (शाही कारखानों की देख-रेख का कार्य)।
(d) मीर-बहादुरी (नौसेना अध्यक्ष) ।

पानीपत का प्रथम युद्ध में सैन्य व्यवस्था

मुगलों के पास अपनी विशाल स्थायी सेना नहीं होती थी। मुगलों की सेना निम्नलिखित चार प्रकार के अधिकारियों तथा सैनिकों से निर्मित होती थी—
(1) सामन्तों तथा सूबेदारों की ओर से नियुक्त सेनाएँ — इन्हें नियमित रूप से वेतन तथा भत्ते दिये जाते थे। इन सेनाओं का नेतृत्व युद्ध में उनके सामन्तों द्वारा ही होता था।
(2) मनसबदारों द्वारा नियुक्त सेनाएँ — मनसबदार बादशाह द्वारा नियुक्त अधिकारी थे, जबकि सामन्त पैतृक अधिकारों के रूप में ही जागीरदारी और सैनिक पद प्राप्त कर लेते थे।
(3) दखली अथवा पूरक सेनाएँ — ये राज्य की ओर से वेतनभोगी सैनिक होते थे और युद्ध के समय मनसबदार अधीन भी युद्ध भी करते थे।
(4) अहदी सेनाएँ — इस वर्ग के अन्तर्गत उच्च परिवारों के लोग होते थे, जिन्हें मनसबदारी नहीं मिल पाती थी।

पानीपत का प्रथम युद्ध के कारण एवं परिणाम

जिस समय मराठे दक्षिण भारत में अपने साम्राज्य का विस्तार कर रहे थे, उस समय उत्तर भारत की दशा अत्यन्त शोचनीय हो गयी थी। अहमदशाह अब्दाली ने भारत पर आक्रमण करने शुरू कर दिये थे। इधर मराठे भी चम्बल नदी तक धावा बोल रहे थे । सन् 1752 ई. में मुगलों तथा मराठों के बीच एक सन्धि हुई। इस सन्धि के अनुसार, मुगलों ने मराठों को 50 लाख रुपया देने का वायदा किया था। इसके बदले में मराठों ने उनकी सुरक्षा का उत्तरदायित्व अपने ऊपर ले लिया था। किन्तु मुगलों ने इस सन्धि का पालन नहीं किया। इस पर रघुनाथ राव ने सन् 1754-56 ई. में उत्तरी भारत पर आक्रमण कर दिया। इसके उपरान्त उसने 1757-58 ई. में दिल्ली पर आक्रमण किया और नजीबुद्दौला को परास्त कर सन्धि, के लिए विवश किया। रघुनाथ राव अपने मित्र इमाद-उल-मुल्क को दिल्ली का बजीर बनाकर वापस लौट गया।

इसके पश्चात् उसने मल्हार राव होल्कर के साथ पंजाब पर आक्रमण कर दिया। अहमदशाह अब्दाली पंजाब की अपना सूबा समझता था, जहाँ उसका पुत्र तैमूरशाह शासन करता था। मार्च 1758 में मराठों ने सरहिन्द पर और अप्रैल 1758 में लाहौर पर अपना अधिकार जमा लिया। उन्होंने तैमूरशाह को पंजाब से मार भगाया और उसकी जगह अपने मित्र अदीनाबेग को पंजाब का गवर्नर बना दिया। बदले में अदीनाबेग ने मराठों को 75 लाख रुपये वार्षिक कर देना मंजूर किया।

सन् 1759 ई. में अदीनाबेग की मृत्यु हो गई। उसकी मृत्यु के उपरान्त पेशवा ने दत्ताजी सिन्धिया को पंजाब भेजा। इधर अहमदशाह अब्दाली भी चुप बैठने वाला नहीं था । उसने नवम्बर, 1759 ई. में पंजाब पर चढ़ाई कर दी और पंजाब को फिर जीत लिया और दिल्ली के समीप बरारीघाट में दत्ताजी सिन्धिया को पराजित कर मार डाला। उसने 1760 ई. में दिल्ली में प्रवेश किया और मल्हार राव होल्कर कों परास्त किया। अब यह मराठों से अन्तिम निर्णय करने के लिए अलीगढ़ में डेरा डालकर बैठ गया।

जब मराठों के पीछे हटने के समाचार पेशवा के पास पहुँचे तो उसने शीघ्र ही अपने चचेरे भाई सदाशिव राव भाऊ की अध्यक्षता में एक बड़ी सेना जिसमें लगभग दो लाख आदमी थे, अब्दाली को दिल्ली से खदेड़ देने के लिए भेजा। उसकी सहायता के लिए इब्राहीम खाँ को भी तोपखाना देकर भेजा गया। इस सेना में आगरे के पास मल्हार राव होल्कर और जनाकोजी भाऊ भी सम्मिलित हुए। भरतपुर के जाट सूरजमल की फौजें भी इस आश्वासन के बाद कि उससे चौथ नहीं माँगी जायेगी, इनके साथ हो गई। परन्तु भाऊ अन्य राजपूत राजाओं को मिलाने में असफल रहा। इधर भाऊ से मतभेद होने पर सूरजमल अपनी सेना के साथ भरतपुर वापस लौट गया। इससे मराठों की शक्ति को गहरा आघात पहुँचा।

सदाशिव राव भाऊ ने 1760 ई. में दिल्ली को अफगानों से छीन लिया । इसके बाद वे पानीपत पहुँचे। तब तक अब्दाली ने अवध के नवाब शुजाउद्दौला को अपनी ओर मिला लिया और इस प्रकार अपनी शक्ति में वृद्धि करके वह भी पानीपत के मैदान में जा डटा। बीच-बीच में एकाध मुठभेड़ हुई, किन्तु कोई महत्त्वपूर्ण परिणाम नहीं निकला ।

नोट – परीक्षाओं में पूछे जाने वाले प्रश्न —
प्रश्न 1. पानीपत का प्रथम युद्ध (सन् 1526 A.D.) का रेखाचित्र बनाइए तथा इसका संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
प्रश्न 2. पानीपत के प्रथम संग्राम का सचित्र वर्णन कीजिए और इसमें मराठों की पराजय के मुख्य कारणों की विवेचना कीजिए।
प्रश्न 3. पानीपत का प्रथम युद्ध के कारण एवं परिणामों की विवेचना कीजिए।

Share This Post

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *