तराइन का प्रथम युद्ध, कब और किसके बीच हुआ | First Battle of Tarain in Hindi

तराइन का प्रथम युद्ध (सन् 1191 ई.)

पृष्ठभूमि — भारत में मुस्लिम साम्राज्य की स्थापना हेतु दृढ़-प्रतिज्ञ मोहम्मद गोरी ने 1100 ई. में भटिण्डा के किले (जो दिल्ली से 180 मील पश्चिम और लाहौर से 100 मील दक्षिण में था) को अपने अधिकार में कर लिया और इस किले की सुरक्षार्थ काजी जियाउद्दीन के अधीन 1200 अश्वारोहियों को छोड़ उसने दिल्ली की ओर बढ़ना जारी रखा। उधर पृथ्वीराज भटिण्डा के किले को मुक्त कराकर गोरी को भारतीय सीमा से बाहर खदेड़ने की योजना बना रहा था। अतः विभिन्न राजपूत नरेशों की सहायता से निर्मित विशाल सेना लेकर भटिण्डा के किले की ओर चल दिया था। परिणामस्वरूप दोनों पक्षों की सेनाएँ सरस्वती नदी के तट पर स्थित तराइन (जिले तरावड़ी अथवा तेलबारी भी कहा जा सकता है) गाँव के निकट (थानेश्वर से 12 मील दक्षिण में) एक-दूसरे के आमने-सामने आ पहुँचीं ।

तराइन का प्रथम युद्ध की तुलनात्मक सैन्य पद्धति

मोहम्मद गोरी की तुलना में पृथ्वीराज की सैन्य संख्या पर्याप्त थी। उसकी सेना में लगभग 2 लाख घुड़सवार, 3 हजार हाथी और बड़ी संख्या में पैदल सैनिक होने का अनुमान है, जबकि गोरी की सेना में घुड़सवार एवं ऊँटसवार सैनिक होने की ही प्रधानता थी और हाथियों का सर्वथा अभाव था। इसके साथ ही तुर्क अश्वारोही मुख्यतः धनुष-बाण से ही सज्जित थे, जबकि राजपूत अश्वारोहियों के पास तलवार और भाला भी था।

राजपूत सेना द्वारा आक्रमण

मोहम्मद गोरी ने अभी अपनी सेना को 3 भागों में विभाजित कर अग्रवर्ती भाग में अफगान और खोखर सैनिक दस्ते लगाये ही थे। कि राजपूतों ने तुर्क सेना के इस दस्ते पर भालों से हमला कर दिया और इसे यथाशीघ्र खदेड़कर उन्होंने गोरी की सेना के दोनों बाजुओं पर जोरदार धावा बोल दिया । परिणामस्वरूप तुर्क सेना के बाजू अन्दर की ओर मुड़कर (केन्द्रीय) भाग की ओर केन्द्रित रह गये। अब राजपूतों की तुर्क सेना के मध्य भाग पर डेढ़ वर्ष से भी कम अवधि में उसने केवल 12,000 कवचयुक्त घुड़सवार सैनिकों पर हमला करने की बारी आयी। इस भाग की कमान स्वयं मोहम्मद गोरी के हाथ में थी। अतः दोनों सेनाओं के मध्य जमकर टक्कर होना स्वाभाविक हो गया तथापि राजपूत सैनिकों के भालों के अनवरत तीव्र एवं घातक प्रहारों के सामने तुर्क धनुर्धारी अधिक समय तक टिक न सके। सुल्तान मोहम्मद गोरी स्वयं घायल हो गया जिससे तुर्क सेना में भगदड़ मच गई।

उधर पृथ्वीराज चौहान अपनी अश्वारोही सेना की अपेक्षा कम गतिशीलता के कारण भागती हुई सेना का पीछा करने के बावजूद उसे पूर्णतया नष्ट करने में सफल न हो सका। इस प्रकार वह निर्णयात्मक जीत का आलिंगन नहीं कर सका। फिर भी उसने आगे बढ़कर भटिण्डा के किले को घेर लिया। 13 महीने तक उस पर घेरा डाले रखने के पश्चात् अन्ततोगत्वा उसे अपने अधिकार में ले लिया।

नोट – परीक्षाओं में पूछे जाने वाले प्रश्न —
प्रश्न 1. तराइन का प्रथम युद्ध संग्राम (1191 ई.) का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
प्रश्न 2. एक चित्र की सहायता से तराइन के प्रथम युद्ध संग्राम की व्याख्या कीजिए तथा यह भी स्पष्ट कीजिए कि मोहम्मद गोरी ने प्रथम युद्ध संग्राम से प्राप्त शिक्षाओं का किस प्रकार प्रयोग किया?
प्रश्न 3. तराइन का प्रथम युद्ध कब और किसके बीच हुआ? इस युद्ध में किसकी पराजय हुई तथा इस लड़ाई के परिणाम लिखिए।

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