प्रणोदित तथा अनुनादी कम्पन्नों में क्या अंतर है, परिभाषा, सूत्र | Driven Harmonic Oscillator in Hindi

प्रणोदित दोलन क्या है

जब कोई वस्तु जिस पर कोई बाह्य बल या आवर्त बल लगा हो, बाह्य बल की आवृत्ति से दोलन करती है तो वस्तु के दोलनों को “प्रणोदित दोलन (Forced Oscillations in Hindi)” कहते हैं।
अर्थात् वस्तु बाह्य बल के बीच एक प्रकार की स्पर्धा होती है जिसमें कभी तो वस्तु के दोलनों का आयाम बढ़ जाता है। तथा कभी घट जाता है। परन्तु वस्तु के यह अनियमित दोलन शीघ्र ही समाप्त हो जाते हैं तथा वस्तु बाह्य बल की आवृत्ति से ही दोलन करने लगती है। अतः इसी कारण इन दोलनों को ‘प्रणोदित दोलन’ कहा जाता है। तथा इन्हें प्रणोदित इसलिए कहा जाता है क्योंकि वस्तु एक बाह्य बल की आवृत्ति से दोलन कर रही है तो उसकी अपनी स्वाभाविक आवृत्ति चाहे कुछ भी हो।

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चलित अथवा प्रणोदित आवर्ती दोलन

जब किसी कण पर घर्षण अथवा अवमन्दित बल के साथ-साथ बाह्य बल भी कार्य करता है। तो परिणामी कम्पनों को “चलित अथवा प्रणोदित कम्पन्न” कहते हैं। तथा कंपनकारी निकाय को “चलित अथवा प्रणोदित आवर्ती दोलित्र” कहते हैं।

चलित या प्रणोदित दोलक का अवकल समीकरण

माना यदि F(t) = F0 Sinpt बाह्य बल किसी कण या पिण्ड पर कार्य कर रहा है। तो गति का अवकलन समीकरण निम्नलिखित होगा –
m \frac{d^2x}{dt^2} + b \frac{dx}{dt} + kx = F0 Sinpt

या \frac{d^2x}{dt^2} + \frac{b}{m} \frac{dx}{dt} + \frac{k}{m} x = \frac{F_0}{m} Sinpt ….(1)

{चूंकि यदि \frac{b}{m} = 2λ, \frac{k}{m} = ω20 तथा \frac{F_0}{m} = f0 के मान}
उपर्युक्त समीकरण (1) में रखने पर,

\frac{d^2x}{dt^2} + 2λ \frac{dx}{dt} + ω20x = f0 sinpt …..(2)

साम्यावस्था में समीकरण (2) का हल करने पर,

\footnotesize \boxed{x = a sin(pt + φ)} …..(3)

अतः “यही चलित अथवा प्रणोदित सरल आवर्ती दोलित्र का अभीष्ट समीकरण है।” जहां a आयाम तथा φ आरोपित बल तथा दोलित्र के विस्थापन के बीच कालान्तर है।

अब समीकरण (3) का अवकलन करने पर,
\frac{dx}{dt} = ap cos(pt + φ)
तथा
\frac{d^2x}{dt^2} = – ap2 sin(pt + φ)

अतः इन मानों को समीकरण (2) में इस तरह लिखने पर,

– ap2 sin(pt + φ) + 2λ ap cos(pt + φ) + ω20a sin(pt + φ) = f0 sinpt

या (ω20 – p2)a sin(pt + φ) + 2λ ap cos(pt + φ) = f0 sinpt
तथा
20 – p2)a [sinpt cosφ + cospt sinφ] + 2λ ap [cospt cosφ – sinpt sinφ] = f0 sinpt
अथवा
[(ω20 – p2)cosφ – 2λp sinφ] a sinpt + [(ω20 – p2)sinφ + 2λp cosφ] + [(ω20 – p2)sinφ + 2λpcosφ] a cospt = f0 sinpt …(4)

चूंकि यदि समीकरण (4) में sinpt तथा cospt के गुणांक शून्य हो, तो
20 – p2)sinφ + 2λp cosφ = 0
tanφ = – \frac{2λp}{ω^2_0 - p^2} …..(5)

अब समीकरण (4) से,
a[(ω20 – p2)cosφ – 2λp sinφ] = f0
तो a = \frac{f_0}{(ω^2_0 - p^2)cosφ - 2λp sinφ} …(6)

तथा समीकरण (5) से,
sinφ = \frac{- 2λp}{ \sqrt{(ω^2_0 - p^2)^2 + (2λp)^2}}
और
cosφ = \frac{ω^2_0 - p^2}{ \sqrt{(ω^2_0 - p^2)^2 + (2λp)^2}}

अतः इन मानों की सहायता से,

आयाम a = \frac{f_0}{ \sqrt{(ω^2_0 - p^2)^2 + (2λp)^2}}

अब a तथा φ के मानों को समीकरण (3) में रखने पर,

x = \frac{f_0}{ \sqrt{(ω^2_0 - p^2)^2 + (2λp)^2}} sin[pt + tan-1 \frac{2λp}{p^2 - ω^2_0)} ]

अतः “यही चलित अथवा प्रणोदित आवर्ती दोलक का अवकल समीकरण कहलाता है।” अर्थात्

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अनुनाद के समय विस्थापन चालक बल से π/2 पश्चगामी

अनुनाद की स्थिति में p = ω0 अर्थात् बाह्य बल की आवृत्ति कम्पनशील वस्तु की आवृत्ति के बराबर होगी । अतः

इस स्थिति में, समीकरण (5) से,
tanφ = ∞ , तथा φ = \frac{π}{2}
अतः अनुनाद की स्थिति में विस्थापन सदैव चलित बल से \frac{π}{2} पश्चगामी होता है। तथा
अब समीकरण (3) का t के सापेक्ष अवकलन करने पर चलित प्रणोदित दोलित्र का वेग –
\frac{dx}{dt} = ap cos(pt + φ)
अथवा

u = ap sin(pt + φ + \frac{π}{2} )
u = ap sin(pt + φ)
{चूंकि θ = φ + \frac{π}{2} }
तथा a = \frac{f_0}{ \sqrt{(ω^2_0 - p^2)^2 + (2λp)^2}}

क्योंकि θ = φ + \frac{π}{2} है। अतः चलित बल का वेग विस्थापन से \frac{π}{2} अग्रगामी होता है।
अतः “अनुनाद के समय जब विस्थापन चलित अथवा प्रणोदित बल से \frac{π}{2} पश्चिगामी होता है। तथा वेग चलित बल की कला में होता है।”

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अनुनाद क्या है

यदि बाह्य बल की आवृत्ति वस्तु की स्वाभाविक आवृत्ति के ही बराबर हो, तो वस्तु के प्रणोदित कम्पनों का आयाम बहुत बड़ा हो जाता है। तो इस घटना को “अनुनाद (Resonance in Hindi) कहते हैं। इस प्रकार, अनुनाद प्रणोदित कम्पनों अथवा दोलनों की ही एक विशेष अवस्था है।

अनुनादी आवृत्ति दोलन क्या है

यदि जब प्रणोदित बल की आवृत्ति का मान p/2π होता है। तो दोलित्र निकाय का आयाम अधिकतम हो जाता है। तो इस घटना को अनुनादी घटना कहते हैं। तथा इन बड़े आयाम के दोलनों की आवृत्ति को “अनुनादी आवृत्ति दोलन (Resonance Oscillations in Hindi)” कहते हैं।

अनुनाद की तीव्रता

चलित अथवा प्रणोदित आवर्ती दोलित्र के समीकरण से,
x = a sin(pt + φ) ….(1)

आयाम a = \frac{f_0}{ \sqrt{(ω^2_0 - p^2)^2 + (2λp)^2}} …(2)
तथा
tanφ = – \frac{2λp}{ω^2_0 - p^2} ….(3)

समीकरण (1) से स्पष्ट है कि आयाम का मान दोलित्र की आवृत्ति के साथ परिवर्तित होता है। यह परिवर्तन समीकरण (2) को निम्न रूप से लिखने पर,

a = \frac{f_0}{ \sqrt{(ω^2_0 - 2λ^2 - p^2)^2 + 4λ^2ω^2_0 + 4λ^2}} ….(4)

अतः उपर्युक्त समीकरण से स्पष्ट है कि प्रणोदित बल की आवृत्ति बढ़ने से आयाम a का मान बढ़ने लगता है। आयाम का अधिकतम मान ज्ञात करने के लिए समीकरण (2) के हर का p के सापेक्ष अवकलन करने पर तथा उसका मान शून्य रखने पर,

\frac{d}{dp} [ \sqrt{(ω^2_0 - p^2)^2 + (2λ_1)^2} ] = 0
अथवा p2 = ω20 – 2λ2 ….(5)

समीकरण (5) से यह भी स्पष्ट है जब प्रणोदित बल की आवृत्ति का मान p के बराबर होगा। आयाम a का मान अधिकतम होगा। अतः
Pr = \sqrt{ω^2_0 - 2λ^2} ….(6)

अधिकतम आयाम amax = \frac{f_0}{ \sqrt{4λ^2ω^2_0 - 4λ^2}}

अतः amax = \frac{f_0}{2λ \sqrt{ω^2_0 - λ^2}} …(7)

अतः समीकरण से स्पष्ट है कि प्रणोदित बल की आवृत्ति का मान p/2π है। तथा दोलित्र निकाय का आयाम अधिकतम होगा। तथा इसको “अनुनाद की तीव्रता” कहते हैं।

अर्थात् जैसा की चित्र में निकाय की कोणीय आवृत्ति के साथ आयाम के परिवर्तन को दर्शाया गया है।

प्रणोदित आवर्ती दोलन

अतः चित्र से स्पष्ट है कि अनुनाद आवृत्ति की स्थिति में आयाम का मान अधिकतम होता है। जब प्रणोदित दोलित्र की आवृत्ति अनुनाद आवृत्ति से बढ़ायी जाती है या घटायी जाती है तो आयाम का मान अधिकतम से घटने लगता है। अनुनादी की तीक्ष्णता द्वारा अनुनाद आवृत्ति के दोनों और प्रणोदित आवृत्ति के परिवर्तन से आयाम की कम दर को दर्शाया जाता है। अर्थात् चित्र से यह भी स्पष्ट है कि जब अवमन्दन कम होता है तो अनुनाद आवृत्ति के दोनों और आयाम तेजी से घटता जाता है। अर्थात् अनुनाद तीक्ष्ण होता है दूसरी ओर जब अवमन्दन अधिक होता है, तो अनुनाद आवृत्ति के दोनों और आयाम धीरे-धीरे घटता रहता है अर्थात् अनुनाद सपाट होता है।
अतः यह कहा जा सकता है कि अनुनाद की तीक्ष्णता द्वारा किसी दोलित्र निकाय का अवमन्दन ज्ञात किया जा सकता है।

Note – प्रणोदित तथा अनुनादी कम्पनों में क्या अंतर है?

प्रणोदित तथा अनुनादी कम्पनों में अंतर

प्रणोदित कम्पनअनुनादी कम्पन
1.इसमें आरोपित बाह्य आवर्त बल की आवृत्ति, वस्तु की स्वाभाविक आवृत्ति से भिन्न होती है।इसमें आरोपित बाह्य आवर्त बल की आवृत्ति, वस्तु की स्वाभाविक आवृत्ति के बराबर अथवा पूर्ण गुणज होती है।
2.इसमें कम्पन का आयाम छोटा होता है।इसमें कम्पन का आयाम बड़ा होता है।

Note – चलित अथवा प्रणोदित दोलन से सम्बन्धित प्रश्न –
Q. 1 चलित प्रणोदित आवर्ती दोलित्र क्या है? दर्शाइए कि अनुनाद के समय विस्थापन चालक बल से π/2 पश्चिगामी होता है, जबकि वेग सदैव चालक बल की कला में होता है?
Q. 2 अनुनाद की तीव्रता की विवेचना कीजिए?
Q. 3 चलित अथवा प्रणोदित तथा अनुनादी दोलनों में क्या अंतर है? तथा सिद्ध कीजिए कि अनुनाद के समय विस्थापन चालक बल से π/2 पश्चिगामी होगी ?

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