पूर्ण तरंग दिष्टकारी की कार्यविधि, दक्षता व ऊर्मिका गुणांक की गणना कीजिए | Full Wave Rectifier in Hindi

पूर्ण तरंग दिष्टकारी क्या है⇒ इस अध्याय में हमनें पूर्ण तरंग दिष्टकारी का सरल भाषा में विस्तार से अध्ययन किया है। इसमें हमनें पूर्ण तरंग दिष्टकारी की कार्यविधि, चित्र तथा गणितीय विश्लेषण की भी पूर्ण रूप से गणना की गई है।
नोट – विद्यार्थी ध्यान दें कि इससे पिछले अध्याय में हमनें दिष्टकारी क्या है व अर्ध तरंग दिष्टकारी का भी विस्तार सहित अध्ययन किया है।

पूर्ण तरंग दिष्टकारी किसे कहते हैं

पूर्ण तरंग दिष्टकारी एक ऐसी युक्ति है जो निवेशी प्रत्यावर्ती वोल्टेज के दोनों अर्ध-चक्रों के समय कार्यरत रहती है। तथा इससे निर्गत धारा एक ही दिशा (अथवा एकदिशीय) प्राप्त होती है। पूर्ण तरंग दिष्टकारी में दो p-n संधि डायोड का उपयोग होता है जो इस प्रकार जोड़े जाते हैं कि एक डायोड निवेशी वोल्टेज के धनात्मक अर्धचक्र के लिए लोड प्रतिरोध में धारा प्रवाहित करता है, जबकि दूसरा डायोड निवेशी वोल्टेज के ऋणात्मक अर्धचक्र के लिए लोड प्रतिरोध में समान दिशा में धारा प्रवाह करता है।
इस प्रकार, एक पूर्ण तरंग दिष्टकारी निवेशी प्रत्यावर्ती वोल्टेज के दोनों अर्ध-चक्रों का प्रयोग कर लोड प्रतिरोध के समान दिशा में धारा प्रवाहित करता है।

इसे भी पढ़ें… दिष्टकारी क्या है? अर्ध तरंग दिष्टकारी की कार्यविधि, दक्षता व ऊर्मिका गुणांक की गणना कीजिए।

पूर्ण तरंग दिष्टकारी
चित्र-1. पूर्ण तरंग दिष्टकारी

चित्र-1 में पूर्ण तरंग दिष्टकारी का परिपथ आरेख दर्शाया गया है। इसमें दो संधि डायोड D1 व D2 के p-क्षेत्रों को ट्रांसफार्मर की द्वितीयक कुण्डली के a व b सिरों से जोड़ा जाता है एवं इसका मध्य बिन्दु c पर निकासित किया जाता है तथा n-क्षेत्रों को संधि डायोड के स्थान पर लोड प्रतिरोध R से होकर जोड़ा जाता है।

और पढ़ें.. ट्रांजिस्टर की परिभाषा, प्रकार, कार्यविधि, चित्र, उपयोग व अन्तर समझाइए।

पूर्ण तरंग दिष्टकारी की कार्यविधि

निवेशी प्रत्यावर्ती वोल्टेज के प्रथम अर्धचक्र के दौरान द्वितीयक कुण्डली का a सिरा धनात्मक होता है जबकि सिरा b ऋणात्मक होता है जिसके कारण संधि डायोड D1 अग्र अभिनति होता है, जबकि संधि डायोड D2 उत्क्रम अभिनति होता है। अतः परिपथ में धारा I1, aD1 व eRca दिशा में प्रवाहित होती है, तो जो ठोस तीरों द्वारा प्रदर्शित की गई है। इस स्थिति में डायोड D2 के उत्क्रम अभिनति होने के कारण इससे कोई धारा प्रवाहित नहीं होती है।

निवेशी प्रत्यावर्ती वोल्टेज के दूसरे अर्धचक्र के दौरान द्वितीयक कुण्डली का a सिरा ऋणात्मक ब सिरा b धनात्मक होता है जिससे डायोड D2 अग्र अभिनति होता है तथा डायोड D2 से होकर bD2eRcb के रास्ते I2 धारा प्रवाहित होती है। इस प्रकार सन्धि डायोड D1 उत्क्रम अभिनति होता है जिससे कोई धारा प्रवाहित नहीं होती है।

स्पष्टतः लोड प्रतिरोध R में दूसरे अर्धचक्र में धारा का प्रवाह उसी दिशा में होता है जिस दिशा में पहले अर्धचक्र का होता है। इस प्रकार परिणामी निर्गत धारा एकदैशिक स्पन्दों की सतत् श्रेणी है, जिसकी आवृति निर्गत वोल्टता की आवृत्ति से दोगुनी होती है। इस निर्गत धारा को समकारी फिल्टर की सहायता से दिष्ट धारा में बदला जा सकता है।

अतः सन्धि डायोड D1 व D2 के बारी-बारी से चालन करते हैं। तथा निवेशी वोल्टेज के दोनों अर्ध-चक्रों के लिए लोड प्रतिरोध R से प्रवाहित धारा समान दिशा में होती है।
इस प्रकार, पूर्ण तरंग दिष्टकारी में निर्गत धारा एकदिशीय स्पंदों की अविरत श्रेणी होती है एवं इसका रूप अपृथक अर्ध-ज्यावक्रीय होती है। जैसा कि चित्र-2(a), (b) व (c) में दोनों डायोड के निवेशी तरंग रूप को प्रदर्शित करते हैं।

पूर्ण तरंग दिष्टकारी
चित्र-2. पूर्ण तरंग दिष्टकारी

गणितीय विवेचन (Mathematical Analysis)

यदि दोनों सन्धि डायोड समान हो और यदि प्रथम डायोड के लिए निवेशी वोल्टेज e1 = E0Sinωt तथा द्वितीय डायोड के लिए निर्गत वोल्टेज e = – E0Sinωt हो, तो पूर्ण चक्र के लिए निम्नांकित संबंध लागू होते हैं।
(a). प्रथम अर्धचक्र के लिए – अर्थात् (जब 0 ≤ ωt ≤ π के लिए)
I1 = ( \frac{E_0}{R_f + R} )Sinωt = I0Sinωt या I2 = 0 …(1)
यहां Rf अर्धचालक डायोड का गतिक अग्र प्रतिरोध है।
(b). द्वितीय अर्धचक्र के लिए – अर्थात् (जब π ≤ ωt ≤ 2π के लिए)
I1 = 0 एवं I2 = – ( \frac{E_0}{R_f + R} )Sinωt = – I0Sinωt …(2)

(1). पूर्ण तरंग दिष्टकारी में निर्गत दिष्ट धारा का औसत मान – चूंकि धाराएं I1 व I2 समान रूप की होती हैं अतः धारा का औसत अथवा दिष्ट मान धारा व्यंजक को 0 से π के बीच समाकलन करके व π आवर्त से भाग करके प्राप्त किया जाता है। अर्थात्
Idc = \frac{1}{π} \int^{π}_0 I dωt

या Idc = \frac{1}{π} [ \int^π_0 I0 Sinωt dωt

या Idc = \frac{I_0}{π} [- Cosωt]π0

या Idc = – \frac{I_0}{π} [Cosπ – Cos0] = – \frac{I_0}{π} (- 1 – 1)

या \footnotesize \boxed{ I_{dc} = \frac{2I_0}{π} } …(1)
अर्थात् लोड प्रतिरोध R पर निर्गत वोल्टेज का दिष्ट अथवा औसत मान-
Edc = Idc × R = \frac{2I_0}{π} × R = \frac{2}{π} \frac{E_0 R}{(R_f + R)}
या Edc = \frac{2R}{π} \frac{E_0}{(R_f + R)} …(2)

(2). पूर्ण तरंग दिष्टकारी में निर्गत दिष्ट धारा का वर्ग-माध्य-मूल मान – सम्पूर्ण निर्गत धारा का वर्ग माध्य मूल मान-

Irms = [ \frac{1}{π} \int^{2π}_0 I20 Sin2ωt dωt]1/2

या Irms = [ \frac{I^2_0}{2π} \int^π_0 (1 – Cos2ωt) dωt]1/2

या Irms = [ \frac{I^2_0}{2π} {ωt – \frac{Sin2ωt}{2} }π0]1/2 = [ \frac{I^2_0}{2} ]1/2

या \footnotesize \boxed{ I_{rms} = \frac{I_0}{ \sqrt{2}} } …(3)

(3). परिपथ की सम्भारित शक्ति – प्रत्यावर्ती धारा स्त्रोत दिष्टकारी को सम्भारित निवेशी शक्ति-
Pac = I2rms(Rf + R)
या Pac = \frac{I^2_0}{2} (Rf + R) …(4)

(4). लोड प्रतिरोध R को सम्भारित औसत शक्ति – लोड प्रतिरोध R पर निर्गत दिष्ट धारा शक्ति निम्न होगी-
Pdc = I2dc R = ( \frac{2I_0}{π} )2R
या Pdc = \frac{4I^2_0}{π^2} R …(5)

(5). दिष्टकारी की दक्षता – पूर्ण तरंग दिष्टकारी में उपयोगी निर्गत शक्ति व दिष्ट शक्ति लोड प्रतिरोध R पर उत्पन्न होती है। अतः दिष्टकारी की दक्षता
η = लोड को सम्भारित दिष्ट शक्ति (Pdc)/कुल निवेशी प्रत्यावर्ती शक्ति (Pac) × 100%
या η = \frac{4I^2_0R/π^2}{I^2_0(R_f + R)/2} × 100%
या η = \frac{800}{π^2} . \frac{1}{(1 + R_f/R)} %
या \footnotesize \boxed{ η = \frac{81.2}{(1 + R_f/R)}} % …(6)
यदि जब Rf/R = 0 होगा तो दक्षता अधिकतम 81.2% होगी। यह अर्ध तरंग दिष्टकारी की दोगनी होगी।

(6). ऊर्मिका गुणांक – पूर्ण तरंग दिष्टकारी का ऊर्मिका गुणांक-
ऊर्मिका गुणांक, r = \frac{Irms}{Idc}
या r = \sqrt{ \frac{I^2_{rms}}{I^2_{dc}} - 1}
अब समीकरण (1) व (3) का प्रयोग करने पर,
\frac{I_{rms}}{I_{dc}} = \frac{I_0/\sqrt{2}}{2I_0/π} = \frac{π}{2\sqrt{2}}
इसलिए, ऊर्मिका गुणांक r = \sqrt{ \frac{π^2}{8} - 1}
या r = \sqrt{ \frac{(3.14)^2}{8} - 1} = \sqrt{0.23245}
या \footnotesize \boxed{ r = 0.48 } …(7)
अतः इस समीकरण से स्पष्ट है कि पूर्ण तरंग दिष्टकारी का ऊर्मिका गुणांक, अर्ध तरंग दिष्टकारी से बहुत कम है अतः पूर्ण तरंग दिष्टकारी अर्ध तरंग दिष्टकारी की अपेक्षा अधिक श्रेष्ठ है।

(7). शिखर उत्क्रम वोल्टेज – यह वह अधिकतम उत्क्रम वोल्टेज है जो के दिष्टकारी पर इसकी अचालकीय दशा में लगाया जाता है। पूर्ण तरंग दिष्टकारी परिपथ पर उस क्षण जबकि द्वितीयक कुण्डली पर वोल्टेज अपने अधिकतम मान E0 पर है। इस क्षण डायोड D1 धारा को प्रवाहित होने देता है तथा D2 से धारा प्रवाहित नहीं होती है। अतः D1 के सिरों पर अल्प वोल्टेज को नगण्य लेने पर सम्पूर्ण द्वितीय वोल्टेज अचालकीय डायोड D2 के सिरों के बीच होता है।
स्पष्ट है कि D2 के सिरों के बीच शिखर उत्क्रम वोल्टेज अर्ध द्वितीयक के अधिकतम वोल्टेज का दोगुना होगा । अर्थात्
PIV = 2E0
इस प्रकार, पूर्ण तरंग दिष्टकारी के प्रत्येक डायोड के सिरों के बीच शिखर उत्क्रम वोल्टेज अर्ध द्वितीयक के अधिकतम वोल्टेज का दोगुना होता है।

(8). वोल्टेज नियन्त्रण – श्रेष्ठ वोल्टेज नियंत्रण का अर्थ है कि निर्गत वोल्टेज नियत रहे। यह प्रतिशत के रूप में व्यक्त किया जाता है।
वोल्टेज नियन्त्रण = \frac{(E_0 - E_L) × 100}{E_L} %
यहां E0 = लोड प्रतिरोध के बिना निर्गत वोल्टेज तथा
EL = सम्पूर्ण लोड प्रतिरोध पर निर्गत वोल्टेज

पढ़ें… P-N संधि डायोड में अग्र एवं पश्च अभिनति को समझाकर धारा प्रवाह हेतु अभिलक्षणिक वक्र खींचिए?

पूर्ण तरंग व अर्ध तरंग दिष्टकारियों की तुलना

  • पूर्ण तरंग दिष्टकारी में अर्धतरंग दिष्टकारी की तुलना में ऊर्मिकाएं बहुत कम होती हैं। इससे पूर्ण तरंग दिष्टकारी में ऊर्मिकाओं को फिल्टर करना आसान हो जाता है।
  • पूर्ण तरंग दिष्टकारी की दिष्टीकरण दक्षता अर्ध तरंग दिष्टकारी की तुलना में दुगनी होती है।
  • पूर्ण तरंग दिष्टकारी परिपथों में अर्ध तरंग दिष्टकारी की तुलना में अधिक अच्छा वोल्टेज नियन्त्रण होती है।
  • समान दिष्ट निर्गत वोल्टेज के लिए पूर्ण तरंग दिष्टकारी में आवश्यक ट्रांसफार्मर द्वितीयक वोल्टेज अर्ध तरंग दिष्टकारी की आवश्यकताओं से दुगनी होती है।
  • अर्ध तरंग दिष्टकारियों की तुलना में पूर्ण तरंग दिष्टकारी अधिक लोड धारा सम्भारित कर सकते हैं।
  • पूर्ण तरंग दिष्टकारी की तुलना में अर्ध तरंग दिष्टकारी अधिक सरल व कम व्ययशील होता हैं।

Note – पूर्ण तरंग दिष्टकारी से संबंधित प्रशन
Q.1 दिष्टकरण से क्या अभिप्राय है? सन्धि डायोड को दिष्टकारी के रूप में किस प्रकार प्रयुक्त कर सकते हैं? p-n संधि डायोड को प्रयुक्त करके पूर्ण तरंग दिष्टकारी का परिपथ बनाकर इसकी कार्यविधि समझाइए तथा दक्षता व ऊर्मिका गुणांक की गणना कीजिए।
Q.2 p-n संधि डायोड को पूर्ण तरंग दिष्टकारी के रूप में कैसे प्रयुक्त किया जाता है? सरल परिपथ बनाकर इसकी कार्यविधि समझाइए। निवेशी तथा निर्गत वोल्टताओं का तरंग रूप भी प्रदर्शित कीजिए।
Q.3 पूर्ण तरंग दिष्टकारी क्या है? समझाइए। तथा पूर्ण तरंग व अर्ध तरंग दिष्टकारियों की तुलना भी कीजिए।

Read More –

  1. यान्त्रिकी एवं तरंग गति नोट्स (Mechanics and Wave Motion)
  2. अणुगति एवं ऊष्मागतिकी नोट्स (Kinetic Theory and Thermodynamics)
  3. मौलिक परिपथ एवं आधारभूत इलेक्ट्रॉनिक्स नोट्स (Circuit Fundamental and Basic Electronics)
Share This Post

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *