गुप्त साम्राज्य – स्थापना, शासक, सैन्य व्यवस्था एवं युद्ध कला | Gupta Empire in Hindi

गुप्त साम्राज्य की स्थापना

मौर्य वंश के पतन के बाद दक्षिण भारत में सातवाहन वंश के राजाओं ने एक शक्तिशाली साम्राज्य की स्थापना करने में सफलता प्राप्त की। लगभग 300 वर्षों तक सातवाहन राजाओं ने अपने प्रबल सैन्य शक्ति से विदेशी आक्रमणकारियों को दक्षिण में प्रवेश का मौका नहीं दिया, किन्तु उसके पश्चात् आन्तरिक विग्रह एवं अनेक नये राज्यों की स्थापना तथा विदेशी आक्रमणकारियों (शकों) ने इस वंश का भी अन्त कर दिया।

गुप्त साम्राज्य के शासकों का अभ्युदय

चौथी शताब्दी तक भारत में छोटे-छोटे स्तरीय देशी एवं विदेशी राज्य बनते एवं बिगड़ते रहे। इस कारण इस अवधि में सैन्य विकास अवरुद्ध-सा हो गया, किन्तु इस शताब्दी से पूर्व ही चन्द्रगुप्त प्रथम ने गुप्त साम्राज्य (द्वितीय मगध साम्राज्य) की ऐसी आधारशिला स्थापित की जिसने आचार्य कौटिल्य के पदचिन्हों पर चलकर मौर्य की भाँति सैन्य शक्ति के चतुर्मुखी विकास को सम्भव बनाया। महाराजाधिराज की पदवी धारण करने वाले चन्द्रगुप्त प्रथम के उत्तराधिकारियों— समुद्रगुप्त एवं चन्द्रगुप्त द्वितीय (विक्रमादित्य) तथा स्कन्दगुप्त ने भी छोटे-छोटे राज्यों को जीतकर अथवा अपने में मिलाकर एक विशाल साम्राज्य की स्थापना की और सैन्य शक्ति के पुनरुत्थान में न केवल महत्वपूर्ण भूमिका ही अदा की अपितु प्राचीन भारतीय सैन्य स्त्रातजी के इतिहास को एक नया मोड़ देने का श्रेय प्राप्त किया।

गुप्त साम्राज्य के राजाओं ने छोटे-छोटे राज्यों को जीतकर विशाल साम्राज्य की स्थापना तो की, किन्तु उनमें अधिकांश को उन्होंने आन्तरिक स्वतन्त्रता की छूट दी थी। इसके बदले उनसे निश्चित कर लेना तथा आपातकालीन स्थिति में सैन्य सहायता लेने की परम्परा शुरू की, जिसने सामन्त प्रथा को प्रोत्साहित किया। गुप्त आलेखों के अनुसार, “इन राज्यों के सामन्त शासकों को महाराज, महासेनापति, महासामन्त आदि उपाधि दी जाती थी।” इस प्रकार गुप्तकाल में युद्ध हेतु पर्याप्त मात्रा में सामन्तीय सेना उपलब्ध हो जाती थी। अतः स्थायी सेना रखने का महत्व धीरे-धीरे कम होने लगा।

गुप्त साम्राज्य की सैन्य व्यवस्था

गुप्तकालीन सैन्य व्यवस्था के अन्तर्गत सामन्तों की सेना के आधिपत्य के बावजूद आन्तरिक शान्ति एवं सुव्यवस्था हेतु स्थायी सेना रहती थी आवश्यकतानुसार अस्थायी सैनिकों की भर्ती की भी व्यवस्था रहती थी ।

गुप्त राजवंश में सैनिक भर्ती एवं वेतन

गुप्तकालीन सेना में सभी वर्गों के योग्य एवं साहसी व्यक्तियों के भर्ती की व्यवस्था थी, किन्तु इसमें क्षत्रियों को प्राथमिकता दी जाती थी, ब्राह्मणों, वैश्य एवं शूद्रों द्वारा भी इस काल में सैन्य कार्यवाही करने के प्रमाण मिलते हैं। इस काल में वित्त विभाग का उल्लेख यह प्रमाणित करता है कि स्थायी सेना के सैनिकों तथा पदाधिकारियों को वेतन एवं भत्ते देने की समुचित व्यवस्था थी । सैनिक वित्त विभाग का अध्यक्ष रणभण्डागार कहलाता था। चीनी यात्री फाह्यान के अपने विवरण में राजा के प्रतिहार तथा सहचरों के वेतनभोगी होने का प्रमाण मिलता है।

गुप्त साम्राज्य में सैन्य प्रशिक्षण

इस काल में सैन्य प्रशिक्षण के स्तर के सम्बन्ध में कोई ठोस प्रमाण उपलब्ध न होने के बावजूद यह माना जा सकता है कि गुप्त सम्राटों की दिग्विजय की लालसा एवं बाह्य आक्रमणकारियों को परास्त कर बड़े साम्राज्य की स्थापना सुप्रशिक्षित सेना के अभाव में शायद ही सम्भव हो पाती। अतः सैन्य प्रशिक्षण की इस काल में कोई न कोई व्यवस्था अवश्य रही होगी।

गुप्तकालीन साम्राज्य की सेनांग

गुप्तकालीन आलेखों में तीन प्रकार के सेनांगों का उल्लेख मिलना है— पैदल सेना, अश्वारोही सेना तथा गज सेना । धरातलीय प्रतिकूलता तथा युद्धों में गति का महत्वपूर्ण स्थान होने के कारण रथ सेना का यौद्धिक उपयोग भले ही सीमित रह गया हो, किन्तु चतुरंग बल किसी-न-किसी रूप में अवश्य था।

(1) अश्वारोही सेना – इस काल में सेनांगों में अश्वारोही सेना को सर्वाधिक महत्व प्राप्त था, क्योंकि विशाल साम्राज्य के नियन्त्रण एवं संरक्षण हेतु अपेक्षित गति सर्वाधिक अश्वारोहियों में ही निहित थी । यह सम्भव है कि भारतीय शासकों ने विदेशी आक्रान्ताओं की कुशल अश्वारोही सेना से प्रेरणा लेकर इस सेना को प्रमुख सेनांग रूप में स्वीकार किया हो और उसे शक्तिशाली बनाने का प्रयत्न किया हो।

(2) गज सेना – गुप्त सम्राट शत्रु सेना को भयभीत करने और अपनी सेना के बचाव हेतु गज सेना को भी महत्वपूर्ण मानते थे। (वेरसन्तर) जातक में संजय की सेना में 14,000 हाथियों का उल्लेख तथा महाकवि कालिदास द्वारा कलिंग देश के राजा के पास विशाल सेना का उल्लेख मिलना इसके प्रमाण हैं।

(3) अश्व एवं गज सेना के साथ ही युद्धभूमि के सभी क्षेत्रों में सफल यौद्धिक कार्यवाही करने में सक्षम पैदल सेना भी विजित क्षेत्रों पर समुचित अधिकार बनाये रखने के लिए आवश्यक एवं महत्वपूर्ण समझी जाती थी।

इस काल में गुप्त साम्राज्य के राजाओं के पास नौसेना होने का भी उल्लेख मिलता है। मौर्यकाल की भाँति इस काल में भी नौकाओं एवं जलयानों के प्रयोग के प्रमाण मिलते हैं। समुद्र गुप्त का साम्राज्य विस्तार सिंहल तथा अन्य समुद्री द्वीपों तक सम्भवतः सशक्त जल सेना के अभाव में सम्भव नहीं था। इसी प्रकार चन्द्रगुप्त द्वितीय द्वारा पराजित सौराष्ट्र तथा मालवा के शकों द्वारा जावा में उपनिवेश बनाया जाना तथा चीनी यात्री फाह्यान द्वारा अन्तिम यात्रा समुद्री मार्ग से करना नौ-शक्ति एवं साधनों के उपयोग के प्रमाण हैं।

गुप्त साम्राज्य के शस्त्रास्त्र

शस्त्रास्त्रों के क्षेत्र में इस काल में कोई नयी प्रगति दृष्टिगत नहीं होती है। अधिकांश आक्रामक एवं सुरक्षात्मक हथियार मौर्यकालीन ही थे। आक्रामक हथियारों में धनुष-बाण, भिण्डिपाल, तलवार, क्षुरे के समान फलों वाला चक्र तथा गदा प्रमुख थे और सुरक्षात्मक उपकरणों में वर्ग (कवच) तथा शिरस्त्राण मुख्य थे। इस काल में रथों एवं घोड़ों को कवचित करने का भी उल्लेख मिलता है। साथ ही नींद लाने वाले अस्त्र तथा शत्रु पर वार करने के बाद वापस आने वाले। सम्मोहन अस्त्र का भी उल्लेख है।

दुर्ग रचना — पूर्ववर्ती कालों की भाँति इस काल में भी शत्रु आक्रमण से नगर की सुरक्षा हेतु सुदृढ़ दुर्ग बनाये जाते थे जिनके चारों ओर जलपूर्ण खाई रहती थी। सम्भवतः सामन्त भी अपने-अपने राज्यों की सुरक्षार्थ दुर्ग रचना अपनाते रहे होंगे।

युद्ध यात्रा — इस काल में युद्ध यात्राएँ सामान्यतया वर्षा समाप्ति के बाद की जाती थीं। अगस्त नक्षत्र के उदय होने पर शरद ऋतु को युद्ध यात्रा हेतु उत्तम माना जाता था। राजवंश में युद्ध यात्रा के दौरान आवश्यकतानुसार चार व्यूहों की रचना कर आगे बढ़ने का उल्लेख है।

इस काल में शत्रु विषयक सूचनाएँ प्राप्त करने के लिए गुप्तचरों की भी व्यवस्था रहती थी तथा युद्ध क्षेत्र में अनेक प्रकार के वाद्य-यन्त्रों एवं पताकाओं के प्रयोग किये जाने का उल्लेख भी रघुवंश में किया गया है।

गुप्त साम्राज्य में युद्ध-कला एवं युद्ध-नीति

गुप्तकालीन सम्राट आचार्य कौटिल्य के पदचिन्हों पर चलने के बावजूद कूट युद्धों की तुलना में धर्म युद्धों को ही प्राथमिकता देते थे। रघुवंश में उल्लिखित वर्णन से यह पता लगता है कि पैदल पैदल से, रथी रथियों से, अश्वारोही अश्वारोहियों से अर्थात् समान सेना से ही युद्ध करती थी जो कि धर्मयुद्धों के नियमों के अनुकूल था।
इस काल में दुर्गों पर आधारित स्थिर युद्धों की तुलना में गतिशील मैदानी युद्ध अधिक हुए। सम्भवतः इसीलिए गुप्त सम्राटों ने कम गतिशील रथों एवं मन्द गति वालों हाथियों की तुलना में युद्ध हेतु अश्वारोही सेना को सर्वाधिक महत्ता प्रदान की थी। युद्ध में जय-पराजय का निर्णय बहुत बड़ी सीमा तक अश्वरोही सेना पर आधारित था, इसीलिए इस काल में भारी प्रकार के सशस्त्र अश्वारोहियों पर अधिक भरोसा किया जाता था । कालिदास के अनुसार, प्रत्येक अश्वारोही घुटनों तक का कवच धारण करता था और एक लम्बे भाले तथा बाणों के तरकश सहित धनुष से सुसज्जित रहता था।

इस प्रकार “गुप्त काल की युद्ध-कला ने प्राचीन भारतीय युद्ध कौशल को बहुत बड़ी सीमा तक परिवर्तित एवं परिमार्जित कर दिया था। इसीलिए गुप्तकाल को सैन्य पद्धति के विकास का काल कहा जाता है।”

नोट – परीक्षाओं में पूछे जाने वाले प्रश्न —
प्रश्न 1. गुप्तकालीन सैन्य संगठन, शस्त्रास्त्र एवं युद्ध-कला की व्याख्या कीजिए।
प्रश्न 2. सम्राट चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य की सैन्य-व्यवस्था एवं युद्ध-कला पर एक निबन्ध लिखिए।
प्रश्न 3. “भारतीय सैनिक पद्धति में गुप्तकाल एक नये मोड़ का दिग्दर्शन कराता है।” इस कथन से आप कहाँ तक सहमत हैं ? समीक्षा कीजिए।
प्रश्न 4. निम्न पर टिप्पणी कीजिए—

  • गुप्त साम्राज्य की स्थापना कब और कैसे हुई?
  • गुप्त वंश में कितने शासक हुए?
  • गुप्त साम्राज्य के सबसे प्रसिद्ध राजा कौन थे?
  • गुप्त वंश का संस्थापक कौन था?
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