हीलियम गैस की द्रवण विधि क्या है, कैपित्जा की विधि को समझाइए | Helium Gas in Hindi

हीलियम की कैपित्जा विधि

इस विधि का निर्माण कैपित्जा ने सन् 1934 में क्लाउडे की विधि पर आधारित एक अन्य हीलियम-द्रावित्र बनाया था। जिसमें रुद्धोष्म प्रसार तथा जूल-थॉमसन प्रसार दोनों को प्रयुक्त किया गया था। इसमें एक विशेष प्रकार के प्रसार-इंजन का उपयोग किया जाता है। जिसमें कोई भी स्नेहक प्रयुक्त नहीं किया जाता है तथा इस इंजन के सिलिण्डर में पिस्टन कुछ ढीला फिट किया गया था। जिसके कारण उनके बीच कुछ रिक्त स्थान रह गया। यद्यपि गैस को प्रसारित करने पर कुछ गैसें इस स्थान में से निकल जाती हैं, परंतु प्रसार इतनी शीघ्रता से होता है कि निकलने वाली गैसों की मात्रा उपेक्षणीय होती है।

हीलियम गैस बनाने की विधि

इस विधि को बनाने में कैपित्जा के द्वारा हीलियम गैस को एक द्रावित्र में द्रवीकरण कर लेते हैं। तथा इस विधि में कैपित्जा के हीलियम-द्रावित्र की रूपरेखा को चित्र में दर्शायी गयी है। इस चित्र में उन नलिकाओं को दिखाया गया हैं, जिसमें हीलियम गैस प्रवाहित होती है। तथा इन रेखाओं के द्वारा तथा हीलियम गैस को तीर के चिन्ह द्वारा दिखाया गया है।

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हीलियम गैस
हीलियम गैस

अर्थात् शुध्द हीलियम गैस को 30 वायुमंडलीय दाब तक संपीडित करके ऊष्मा-विनिमय M में भेजते हैं। फिर इसे निम्न दाब पर वाष्पित द्रव-नाइट्रोजन से भरे वलयाकार बर्तन S1S2 में प्रवाहित करते हैं। तथा वहां इन गैस का ताप -208°C तक गिर जाता है। अतः शीतल गैस अब ऊष्मा-विनिमय N में से गुजरती है। तथा एक स्थान T पर दो भागों में विभक्त हो जाती है, तो गैस का 8% भाग एक प्रसार-वाल्व V1 में से गुजरता है तथा 92% भाग एक प्रसार इंजन Q में जाता है। जहां रुध्दोष्म प्रसार के द्वारा इसका ताप -263°C तक गिर जाता है इस प्रकार शीतल हुई यह गैस वापस उष्मा-विनिमय O, N तथा M में प्रवाहित हो जाती हैं। और आने वाली गैस को ठंडा करती हुई, वापस संपीडक में 1 वायुमंडल दाब पर पहुंच जाती है। अब यदि प्रसार-वाल्व V1 में से गुजरने वाली 8% गैस का जूल-थॉमसन प्रसार होता है, तो इसके पश्चात यह गैस ऊष्मा-विनिमय O व P में से गुजरती है। तथा वाल्व V2 में से गुजरते समय पुनः इसका जूल-थॉमसन प्रसार होता है। तथा इसका ताप -268°C तक गिर जाता है तथा कुछ गैसें द्रवित होकर फ्लास्क R में एकत्रित हो जाती हैं। तथा गैस का वह भाग जो अब तक द्रवित नहीं हो पाया। अर्थात् वापस ऊष्मा-विनिमय P, O ,N व M में से प्रवाहित होता हुआ। संपीडक में चला जाता है। तथा इस प्रकार हीलियम गैस प्राप्त हो जाती है।

हीलियम के द्रवण में कठिनाइयाॅ

इन्हें द्रवित की जाने वाली गैसों में हीलियम सबसे अन्तिम गैस थी। सन् 1908 से पहले इसके द्रवण करने के सभी प्रयत्न असफल रहे। इसका कारण यह था कि इसका क्रांतिक ताप अत्यन्त निम्न दाब -268°C ताप तक होता है। अतः कैस्केड विधि में निम्न दाब पर द्रव-ऑक्सीजन के वाष्पन से न्यूनतम ताप -218°C प्राप्त किया गया। जोकि हीलियम के क्रांतिक ताप से बहुत ऊंचा होता है। अतः इस विधि के द्वारा हीलियम का द्रवण संभव नहीं था। तथा क्लाउडे की विधि के द्वारा जोकि वायु के द्रवण में यह विधि बहुत सफल रही थी। तथा हीलियम के द्रवण में यह विधि असफल रही। क्योंकि प्रसार-इंजन में प्रयुक्त सभी स्नेहक इतने निम्न ताप पर जम जाते हैं।
कैमरलिंग ओनेस में सन् 1908 में इस बात की ओर ध्यान दिलाया था। कि हीलियम गैस का व्युत्क्रमण ताप -240°C तक होता है। अतः हीलियम गैस को निम्न दाब पर द्रव-हाइड्रोजन के वाष्पन द्वारा इसके व्युत्क्रमण ताप से नीचे तक ठंडा किया जा सकता है। तथा फिर जूल-थॉमसन प्रसार के द्वारा इसका पुनर्योजी शीतलन करके इसे द्रवित किया जा सकता है। तथा उन्होंने इस विधि पर आधारित एक हीलियम द्रावित्र निर्मित भी किया गया था।

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निष्कर्ष

यह द्रावित्र बहुत दक्ष तथा कैमरलिंग ओनेस के द्रावित्र से बहुत सस्ता होता है। क्योंकि इसमें शीतलन के लिए द्रव-हाइड्रोजन के स्थान पर द्रव-नाइट्रोजन प्रयुक्त की जाती है। जो कि द्रव-हाइड्रोजन की तुलना में बहुत सस्ती पड़ती है।

Note – सम्बन्धित प्रश्न –
Q.1 संक्षेप में बताइए कि हीलियम को द्रवित करने में पहले क्या कठिनाइयाॅं आई थी? हीलियम को द्रवित करने की किसी एक विधि का वर्णन कीजिए?
Q.2 हीलियम को द्रवित करने की विधि का वर्णन कीजिए तथा इसके द्वारा आने वाली कठिनाइयों को संक्षेप में समझाइए?

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