प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान भारतीय सेना | Indian Army during the First World War in Hindi

प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान भारतीय सेना

सन् 1914 में प्रारम्भ हुए प्रथम विश्वयुद्ध के समय भारतीय सेना न तो इस महायुद्ध के लिए तैयार ही थी और न ही उसकी साज-सज्जा ही तदनुकूल थी तथापि अपनी गौरवमयी परम्परा के अनुसार उसने फ्रान्स, रोम, यूनान, मिस्र, टर्की, ईरान तथा इराक आदि देशों में महत्वपूर्ण सफलताएँ अर्जित कर 16 विक्टोरिया क्रास तथा 99 मिलिट्री क्रॉस जीते। ब्रिगेडियर राजेन्द्र सिंह के शब्दों में- “The immortal story of endurance and valour of the sons of India is legacy above all the wealth that the world can offer.”

प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान भारतीय सेना संख्या की वृद्धि तो स्वाभाविक रूप से हुई ही, युद्ध के लिए तकनीकी व्यक्तियों तथा यौद्धिक उपकरणों की पूर्ति हेतु सन् 1915 में कलकत्ता तथा रंगून में इंजीनियरिंग कॉलेज खोले गये तथा कलकत्ता में रेलवे फैक्ट्री स्थापित की गयी। इतना ही नहीं सन् 1917 में भारतीय एम्यूनिशन बोर्ड का गठन किया गया तथा सैनिक गाड़ियों की मरम्मत हेतु रावलपिण्डी में एक कारखाना खोला गया।

प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान भारतीय सेना व्यवस्था

प्रथम महायुद्ध में भारतीय सेना में व्यवस्था एवं संगठन सम्बन्धी कई दोष दृष्टिगत रखते हुए विश्वयुद्ध की समाप्ति के बाद सन् 1919 में लॉर्ड ईशर की अध्यक्षता में ‘भारतीय सेना समिति’ गठित की गयी जिसने महत्वपूर्ण अनुशंसाओं के साथ सन् 1920 में अपना प्रतिवेदन प्रस्तुत किया। सन् 1921-1922 में सेनाध्यक्ष जनरल लॉर्ड रॉलिन्सन ईशर ने समिति की अनुशंसाओं को ध्यान में रखकर भारतीय सेना में निम्नलिखित सुधार किये—

  1. भारतीय सेना को पुनः चार कमाण्डों- उत्तरी, पूर्वी, पश्चिमी तथा दक्षिणी कमाण्ड में विभक्त किया गया। जिनके मुख्यालय क्रमशः रावलपिण्डी, नैनीताल, क्वेटा तथा पूना में स्थापित किये गये।
  2. घुड़सवार सेना में सिल्हदार पद्धति को समाप्त कर 36 अश्वारोही रेजीमेण्टों को 21 रेजीमेण्टों में पुनर्गठित कर उन्हें तीन-तीन रेजीमेण्टों के 7 वर्गों में विभक्त कर दिया।
  3. सेना के मुख्य उद्देश्यों को दृष्टि में रखकर उन्हें तीन प्रमुख वर्गों में संगठित किया गया— लड़ाकू सेना, सहायक सेना तथा आन्तरिक सुरक्षा दल। इन तीनों ही वर्गों की सेनाओं का संगठन एकसमान होने के कारण इन्हें आवश्यकता के अनुसार आपस में स्थानान्तरित भी किया जा सकता था।
  4. भारतीय सेना में यान्त्रिक परिवहन तथा सैन्य सेवाएँ स्थापित की गयीं।
  5. भारतीय सेना को तोपखाने, अन्य शस्त्रास्त्रों तथा साज-सामान से सुसज्जित कर उसका आधुनिकीकरण किया गया। इस कार्यवाही के अन्तर्गत रॉयल एअर फोर्स (R.A.F.) तथा रायल टैंक कोर (R.T.C.) की कुछ टुकड़ियाँ भारत आयीं।
  6. स्टाफ तथा कमाण्ड प्रणाली का पुनर्गठन किया गया।
  7. पैदल सेना को रेजीमेण्ट प्रणाली के अन्तर्गत संगठित कर उन्हें रेजीमेण्टल केन्द्रों से सम्बद्ध कर दिया गया। सन् 1923 ई. में 107 बटालियनों को 20 रेजीमेण्टों में विभक्त किया गया, 12 पायोनियर बटालियनों के तीन रेजीमेण्टों तथा 20 गोरखा बटालियनों के 10 रेजीमेण्ट बनाये गये ।
  8. नियमित सेना की सहायतार्थ उत्साही सम्मानित युवकों की ‘इण्डियन बालण्टरी फोर्स’ की स्थापना की गयी, जिसके अन्तर्गत यूनिवर्सिटी ट्रेनिंग कोर तथा प्रादेशिक दल संगठित किये गये।
  9. युद्ध सामग्री के उत्पादन तथा निर्माण हेतु प्रोडक्शन तथा प्रोविजन का एक विभाग अलग खोला गया।
  10. इंग्लैण्ड की सैनिक अकादमी में जाने के पूर्व प्रशिक्षण हेतु सन् 1922 में देहरादून में प्रिन्स ऑफ वेल्स रॉयल मिलिट्री कॉलेज की स्थापना की गयी।
  11. भारतीय सेना का नियन्त्रण इंग्लैण्ड के वार ऑफिस से हटाकर भारत के सेनाध्यक्ष (C. in. C.) के अन्तर्गत आ गया जिसकी नियुक्ति ब्रिटिश संसद भारत सरकार के परामर्श के आधार पर करती थी।
  12. जनरल रॉलिन्सन ने डोमीनियन फोर्स के स्थान पर भारतीयकरण हेतु अपनी यूनिटों (3 अश्वारोही यूनिट तथा 6 पैदल सेना की यूनिट) योजना लागू की। इन यूनिटों के कमाण्डिंग अफसर भारतीय नियुक्त किये गये।
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