द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान भारतीय सेना | Indian Army during the Second World War in Hindi

द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान भारतीय सेना

प्रथम महायुद्ध के बाद और द्वितीय महायुद्ध से पूर्व तक यद्यपि भारतीय सेना के अन्तर्गत सुधार किये गये और उसके भारतीयकरण की क्रिया को भी पर्याप्त प्रोत्साहित किया गया तथापि युद्ध से पूर्व अंग्रेजों द्वारा भारतीय सेना को आधुनिक स्तर पर संगठित नहीं किया जा सका । सन् 1935 में कुछ फील्ड बैट्रियों के संगठन के बावजूद उनमें अतिरिक्त तोपखाने की और कोई भारतीय यूनिटें नहीं थीं। पैदल सेना लगभग यन्त्र-विहीन थी। समस्त भारत में केवल 8 विमानों में ही तोपें थीं और रॉयल इण्डियन आर्मी सर्विस कोर की कुछ मोटर परिवहन कम्पनियों को छोड़कर टैंक भेदी सेना का अभाव था।

भारत में शस्त्रास्त्र एवं गोला बारूद बनाने वाले कारखानों की संख्या भी पर्याप्त कम थी और इनमें प्रयुक्त होने वाला महत्वपूर्ण माल भी बाहर से मँगाना पड़ता था । अन्य शब्दों में सांग्रामिक आवश्यकता की अधिकांश वस्तुएँ सैनिकों के लिए उपलब्ध नहीं थीं। भारतीयकरण की प्रक्रिया के बल पकड़ने के बावजूद सेना का विकास एवं पुनर्गठन अंग्रेज अफसरों की स्वेच्छा पर ही निर्भर था, क्योंकि अब भी समस्त सैन्य साधन तथा सैन्य नियन्त्रण उन्हीं के हाथों में केन्द्रित था।

द्वितीय महायुद्ध और उसके बाद भारतीय सैन्य व्यवस्था

द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान भारतीय सेना विभिन्न मोर्चों-फ्रान्स, इटली यूनान, उत्तरी अफ्रीका, बर्मा, मलाया तथा इण्डोचाइना आदि पर अपने अद्भुत शौर्य एवं पराक्रम के प्रदर्शन से सर्वोत्तम वीरों की सेना के रूप में प्रशंसित हुई। एटकिन्सन के अनुसार, “वीरता इनकी (भारतीयों की) जन्मजात परम्परा है। जापानी मशीनगनों के सामने घास की तरह कटते हुए भारतीय वीरों को मैंने स्वयं देखा है कि वे आत्मघातक बाधाओं के आगे प्रसन्नतापूर्वक मौत के मुँह में जा रहे थे।”

इस प्रकार लगभग तीस वर्षों के काल में महायुद्धों में अपनी सक्रिय भूमिका के कारण भारतीय सेना का प्रचुर विकास स्वाभाविक ही था। (यद्यपि स्थल सेना की भाँति नौसेना और नभ-सेना का विकास सम्भव नहीं हो सका।) अन्य शब्दों में द्वितीय महायुद्ध की समाप्ति तक भारतीय सेना एक कुशल लड़ाकू सेना बन गयी थी जिसमें प्रबल बल भावना तथा एकता का समावेश हो चुका था।

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