ईस्ट इण्डिया कम्पनी के अधीन भारतीय सेना का संगठन | Indian Army under East India Company in Hindi

ईस्ट इण्डिया कम्पनी के अधीन भारतीय सेना

अंग्रेज ईस्ट इण्डिया कम्पनी के काल से ही भारतीयों को सेना में उच्च पद प्रदान करने में संकोच का अनुभव करते थे। इधर सन् 1857 ई. में विद्रोह के बाद तो उन्होंने भारतीयों को उच्च पदों से लगभग पूर्णतया हटा ही दिया, किन्तु प्रथम महायुद्ध में भारतीय सैनिकों की कार्यकुशलता एवं शौर्य से प्रभावित होकर अंग्रेजों ने उन्हें उच्च पद देने की योजना पर गम्भीरता से विचार करना प्रारम्भ कर दिया। उधर भारत में राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी के नेतृत्व में सविनय अवज्ञा और असहयोग आन्दोलन बल पकड़ता जा रहा था। भारतीय जनमत उत्तरदायी शासन की माँग के साथ-साथ सेना में भारतीय अफसर बनाने और उन्हें यूरोपियनों के समक्ष स्थान देने की माँग भी कर रहा था।

वस्तुतः भारतीय काँग्रेस ने अपने जन्म (सन् 1885 ई.) से ही सेना के भारतीयकरण की समस्या पर विचार करना प्रारम्भ कर दिया था। सम्भवत: इसीलिए लॉर्ड जनरल किचनर के समय ही इम्पीरियल कैडेट कोर की स्थापना कर दी गयी थी, जिसके प्रशिक्षित भारतीय अफसरों को कम्पनी स्तर तक कमाण्ड करने के लिए विशेष किंग कमीशन दिये जाने की संस्तुति की गयी थी और सन् 1905 में कुछ भारतीय अफसरों को विशेष किंग कमीशन प्राप्त हो गया था, किन्तु इसके बावजूद सेना के भारतीयकरण की प्रक्रिया में प्रथम महायुद्ध तक अपेक्षित प्रगति नहीं हो सकी। प्रथम महायुद्ध की समाप्ति तक केवल 9 भारतीय सैनिक अफसरों को किंग कमीशन प्राप्त था । अतः प्रथम महायुद्ध के पश्चात् राष्ट्रवादी आन्दोलन के बल पकड़ते ही सेना में भारतीय अफसरों की संख्या में वृद्धि की माँग का बलवती होना स्वाभाविक ही था। अतः भारत सचिव तथा वाइसराय ने मिलकर मॉण्टेग्यू-चेम्सफोर्ड एवार्ड में भारतीयों को सेना की प्रत्येक शाखा में ऊँचे पद दिये जाने की घोषणा की तथा इंग्लैण्ड की सैण्डहर्स्ट मिलिट्री अकादमी में 10 स्थान भारतीय अभ्यर्थियों के लिए सुरक्षित कर दिये गये। साथ ही भारत सरकार ने प्रयोग के रूप में भारतीयकरण की माँग भी स्वीकार कर ली।

ईस्ट इंडिया कंपनी के अधीन भारतीय सेना की कमाण्ड-प्रणाली का श्रीगणेश

सन् 1893 में संगठित एक जाँच आयोग की अनुशंसा तथा ब्रिटिश संसद के अधिनियम के अन्तर्गत गवर्नर जनरल एलगिन ने अप्रैल, 1895 को तीनों प्रेसीडेन्सी सेनाओं का अस्तित्व समाप्त कर दिया और उन्हें एक सुसंगठित स्थल सेना के रूप में बदलकर प्रशासनिक सुविधा हेतु भौगोलिक आधार पर निम्नलिखित 4 कमाण्डों में पुनर्संगठित किया—
(1) पंजाब कमाण्ड (उत्तरी पश्चिमी सीमान्त प्रदेश सहित)।
(2) बंगाल कमाण्ड ।
(3) मद्रास कमाण्ड (बर्मा सहित)।
(4) बम्बई कमाण्ड (सिन्ध, क्वेटा तथा अदन सहित)।

प्रत्येक कमाण्ड का कमाण्डर एक ले. जनरल पद के अफसर को नियुक्त किया गया जो सीधा भारत के सेनाध्यक्ष के प्रति उत्तरदायी होता था। प्रत्येक कमाण्ड को आवश्यकतानुसार दो-तीन उपविभागों में भी विभाजित किया गया। सभी प्रेसीडेन्सी के अंग्रेज अफसरों को स्टाफ कोर के अन्तर्गत रखा गया और हैदराबाद कॉण्टिजेण्ट तथा अन्य स्थानीय टुकड़ियों पर अलग से भारत सरकार का प्रत्यक्ष नियन्त्रण बना रहा। सन् 1899 में कर्जन भारत के वाइसराय नियुक्त हुए और सन् 1900 में भारतीय सेना को 303 इंच की राइफलें दी गयीं। इतना ही नहीं भारतीय सेना में पर्वतीय तथा मैदानी दो प्रकार के तोपखाने की यूनिट संगठित की गयी और तोपखाने के प्रशिक्षण हेतु एक प्रशिक्षण केन्द्र खोला गया। सन् 1901 में प्रशासकीय विभाग का नाम पूर्ति तथा परिवहन कोर रखा गया।

नोट – परीक्षाओं में पूछे जाने वाले प्रश्न —
प्रश्न 1. ईस्ट इण्डिया कम्पनी के अधीन भारतीय सेना के संगठन पर प्रकाश डालिए।

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