1857 की क्रांति

1857 की क्रांति के राजनीतिक, सैनिक एवं असफलता के कारण | Indian Rebellion of 1857 in Hindi

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1857 की क्रांति (Revolution of 1857 in Hindi)

इस विद्रोह का आरम्भ 10 मई, 1857 ई. को मेरठ की 34वीं रेजीमेंट के सिपाहियों द्वारा किया गया था। दूसरे दिन ये सिपाही दिल्ली पहुँचे, जहाँ दिल्ली के सिपाही भी इनसे मिल गए। इन सिपाहियों ने दिल्ली पर अधिकार कर लिया तथा 80 वर्षीय मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर को भारत का सम्राट तथा अपना नेता घोषित कर दिया।

1857 ई. का विद्रोह ब्रिटिश शासन के विरुद्ध सबसे बड़ा विद्रोह था। अनेक दृष्टियों से भारतीय इतिहास में यह एक अभूतपूर्व विद्रोह था। ब्रिटिश शासन को उखाड़ फेंकने के उद्देश्य से देश के विभिन्न प्रदेशों के सैनिक और विभिन्न राज्यों के शासक व सरदार लड़ाई के लिए एकजुट हुए। समाज के कई अन्य समुदाय- जमींदार, किसान, दस्तकार, विद्वान भी इस विद्रोह में शामिल हुए।

“अतः सर्वप्रथम क्रान्ति का विस्फोट बैरकपुर छावनी में हुआ। वहाँ सैनिकों ने ऐसे कारतूसों का प्रयोग करना अस्वीकार कर दिया ओर मंगल पाण्डेय नामक वीर सैनिक ने दो अंग्रेज सैनिक अधिकारियों की हत्या कर दी। यद्यपि देशप्रेमी को 8 अप्रैल, 1857 को फाँसी के तख्ते पर लटका दिया गया, तथापि क्रान्तिकारी हताश नहीं हुए और अगले ही माह (10 मई, 1857) मेरठ छावनी में क्रान्ति की आग भड़क उठी, जिसने अपनी चपेट में दिल्ली, कानपुर, बनारस, इलाहाबाद, अवध, ग्वालियर को भी ले लिया जिससे नरसंहार का निर्मम दृश्य उत्पन्न हो गया।”

1857 का विद्रोहः एक परिचय

क्र.सं.विद्रोह केन्द्रविद्रोही नेताफाँसी / मृत्यु / निर्वासन
1.दिल्लीबहादुरशाह-॥ (प्रमुख नेतृत्वकर्ता) बख्त खाँ (सैन्य नेतृत्व) हकीम अहसानुल्ला (प्रमुख सलाहकार)निर्वासित कर रंगून भेजा गया, 1862 ई. में यहीं पर इनका निधन हुआ।
2.लखनऊबेगम हजरत महल
नवाब वाजिद अली शाह
1859 ई. में नेपाल चली गईं। 1874 ई. में काठमाण्डू में निधन।
1856 ई में जमखन्द (कोलकाता) चले गये, वहीं 1887 ई. में निधन।
3.इलाहाबादलियाकत अली
4.झाँसी
ग्वालियर
रानी लक्ष्मीबाई
रानी लक्ष्मीबाई, तात्या टोपे
जून, 1858 को युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुई।
18 अप्रैल, 1859 में तात्या टोपे को बन्दी बनाकर ग्वालियर में फाँसी दे दी गई।
5.बरेली (रूहेलखण्ड)खान बहादुर खाँफाँसी की सजा दी गई।
6.बिठूर (कानपुर)नाना साहब
अजीजन बेगम (नर्तकी) रावसाहब, तात्या टोपे, अजीमुल्ला, खाँ, टीका सिंह
1859 ई. के आरंभ में नेपाल में जाकर छिपे और वहीं निधन हुआ।
अंग्रेजों द्वारा गोली मारकर हत्या।
7.जगदीशपुर, दानापुर,
आरा, आजमगढ़
आरा (बिहार)
पटना (बिहार)
कुंवर सिंह, अमर सिंह

बंदे अली
पीरअली
कुंवर सिंह का 26 अप्रैल, 1858 में निधन हो गया।

1858 ई. में फाँसी दी गई।
07 जुलाई, 1857 को फाँसी दी गई।
8.फैजाबाद/शाहजहाँपुरमौलवी अहमदुल्लाअंग्रेजों द्वारा 50 हजार रूपये का इनाम रखा गया। पुवाॅया के राजा की सूचना पर 1858 ई. में एक हमले में मारे गाए।
9.फतेहपुरअजीमुल्लाफाँसी की सजा दी गई।
10.गोरखपुरगजाधर सिंह
11.मुरादाबादअब्दुल अलीखान
12.सुल्तानपुरशहीद हसन
13.सैदपुर (मुजफ्फरनगर) (उत्तर प्रदेश)भगवान सिंह जाट
14.रेवाड़ी (हरियाणा)
कासन गाँव (हरियाणा)
झज्जर (हरियाणा)
राव तुलाराम
अलबेल सिंह, जियाराम
नवाब अब्दुल रहमान खान
बीमार होने से काबुल में 8 सितंबर, 1862 को निधन।
1858 ई. में दोनों को फाँसी हुई।
1857 ई. में दिल्ली कोतवाली में फाँसी।
15.बैरकपुर (प. बंगाल)मंगल पाण्डे8 अप्रैल, 1857 ई को बैरकपुर के लाट बागान में फाँसी दी गई।
16.असमदीवान मनीराम दत्त, केदवेश्वर सिंहकलकत्ता में फाँसी दी गई।
17.सागरशेख रमजान
18.सम्भलपुर (ओडिशा)सुरेन्द्रशाही उज्ज्वल शाही1862 ई. को आत्म समर्पण व देश से निष्कासन।
19.मेरठकदम सिंह
20.मथुरादेवी सिंह
21.बिजनौरमुहम्मद खान
22.गढ़‌मांडलाशंकर शाह-राजा ठाकुर प्रसाद
23.रायपुरनारायण सिंह
24.मंदसौर (उ.प्र.)शहजादा हुमायूँ (फिरोजशाह)रंगून में निर्वासित वहीं पर 1862 ई. में निधन।
25.कुल्लूराणा प्रताप सिंह, वीर सिंहदोनों को फाँसी दी गई।
26.कोटा (राजस्थान)जय दयाल, हरदयालतोप के मुँह पर बाँधकर उड़ा दिया गया।
27.अमझेरा (म.प्र.)राजा बरनावर सिंह10 फरवरी, 1858 ई. को फाँसी दी गई।
28.सतारा (महाराष्ट्र)
गंजम्
अजनाला
रंगोजी बापू जी गुप्ते
राधा कृष्णा दाण्डसेन
वजीर खाँ
29.सिंधशाहजादा पी. मुहम्मद इमाम बख्श
अलिफर खाँ
30.महाराष्ट्रवासुदेव बलवन्त फड़केआजीवन कारावास की सजा दी गई।
31.गोवा
गोलकुण्डा क्षेत्र
दी पूजी राणा
चिंताभूपति
32.पंजाबगुरू राम सिंहरंगून जेल में बंद किया गया।
1857 की क्रांति
1857 की क्रांति (Indian Rebellion of 1857 in Hindi)

1857 की क्रान्ति के राजनीतिक कारण

मुक्ति हेतु की गई सन् 1857 ई. की क्रान्ति के अनेक राजनीतिक कारण थे। जो कि निम्नलिखित हैं-

(i) लार्ड डलहौजी का ‘व्यपगत का सिद्धान्त’ (Doctrine of Lapse) या ‘हड़प नीति’ के अनुसार, जब किसी राजा-महाराजा का अपना पुत्र (उत्तराधिकारी) नहीं होता था, तो उसे किसी अन्य सम्बन्धी (गोद-पुत्र) को अपना उत्तराधिकारी बनाने की अनुमति नहीं दी जाती थी, अपितु उसके राज्य पर कम्पनी का सीधा शासन स्थापित कर दिया जाने लगा था। साथ ही अनेक राज्यों (सतारा, नागपुर, झाँसी) को बड़े अन्यायपूर्ण ढंग से छीनकर ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लिया गया। इससे भारतीय राजाओं में बड़ा असन्तोष उत्पन्न हो गया और वे अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह करने के लिए तत्पर हो गए।

(ii) अंग्रेजों द्वारा मुगल सम्राट बहादुरशाह जफर की उपेक्षा कर सिक्कों पर उनका नाम हटा देना, उन्हें नजर भेंट देना बन्द करना, सम्राट की पेंशन एक लाख से घटाकर मात्र 17 हजार रुपये वार्षिक कर देना और लाल किला खाली कराने का कुचक्र चलाना आदि ऐसे कारण थे जिनसे मुगल सम्राट की वेदना एवं जन आक्रोश को बढ़ावा मिला।

(iii) अंग्रेज अधिकारी भारतीयों का सम्मान नहीं करते थे तथा उनके साथ अमानवीय व्यवहार करते थे और उन पर अनेक अत्याचार करते थे। सरकारी नौकरियों में भी भारतीयों की उपेक्षा की जाती थी। उच्च पदों पर केवल अंग्रेजों की ही नियुक्तियाँ होती रहीं और बुद्धिजीवी भारतीय निरन्तर यह सहन करते रहे।
इन अत्याचारों के विरुद्ध ऊपर से लेकर नीचे तक समस्त वर्गों और क्षेत्रों के विरुद्ध आक्रोशपूर्ण विद्रोह की भावना पनप रही थी।

1857 की क्रान्ति के सैनिक कारण

(i) अंग्रेजों की भेदभावपूर्ण नीति, जिसके अन्तर्गत समान पदों पर कार्य करते हुए भी भारतीय सैनिकों को अंग्रेज सैनिकों की तुलना में वेतन, भत्ते आदि नहीं मिलते थे।

(ii) भारतीय सैनिकों को उच्च पदों के लिए अयोग्य समझा जाता था और उन्हें हेय दृष्टि से देखा जाता था। इस भेद-भाव की नीति से सैनिकों में क्षोभ एवं असन्तोष का बीजारोपण हो गया।

(iii) भारतीय अनुभवी अफसरों को असैनिक विभागों (महत्वहीन विभागों में भेजने तथा उनके स्थान पर अनुभवहीन युवा अंग्रेज अफसरों को नियुक्त किया जाने लगा। उनके द्वारा जारी किए गए अनेक आदेश भारतीय सैनिकों की भावनाओं को बहुत ठेस पहुँचाते थे ।

(iv) रूस के विरुद्ध लड़े जाने वाले क्रीमिया के युद्ध में अंग्रेजी सेना की अजेयता की भावना का पूर्ण रूप से अन्त होना भी एक कारण बना।

(v) सेना में गाय तथा सूअर की चर्बी लगे हुए कारतूसों के प्रयोग, जिन्हें चलाने से पहले इनकी टोपी को दाँतों से काटना पड़ता था, ने भारतीय धर्म भावना पर ऐसा कुठाराघात किया कि उसने अन्ततोगत्वा विद्रोह की ज्वाला प्रज्वलित कर दी।

1857 की क्रान्ति की असफलता के कारण

निम्नलिखित कारणों से 1857 ई. की क्रान्ति असफल रही-

(1) क्रान्ति का सीमित क्षेत्र – क्रान्ति का क्षेत्र सीमित था। देश के अनेक भागों में क्रान्ति का प्रभाव नहीं पहुँच सका। यह क्रान्ति दिल्ली से लेकर कलकत्ते तक सीमित रही और शेष भारत में लोग क्रान्ति से अप्रभावित रहे, जिसके कारण उन्होंने क्रान्ति में भाग नहीं लिया। पंजाब, सिन्ध, राजस्थान, दक्षिण भारत, पूर्वी, बंगाल ने अंग्रेजी सत्ता का अन्त करने का तनिक भी प्रयत्न नहीं किया। गोरखों और सिखों ने क्रान्ति के दमन में अंग्रेजों का साथ दिया।

(2) विद्रोह का सामन्तवादी चरित्र – 1857 ई. के विद्रोह का स्वरूप मुख्यतः सामन्तवादी था, जिसमें कुछ राष्ट्रवाद के तथ्य विद्यमान थे। अवध और रुहेलखण्ड के तथा अन्य उत्तरी भारत के सामन्तवादी तत्वों ने विद्रोह का नेतृत्व किया और दूसरी ओर अन्य सामन्तवादी तत्वों ने जैसे कि पटियाला, जीन्द, ग्वालियर और हैदराबाद के राजाओं ने इसे विद्रोह के दमन में सहायता की। लॉर्ड कैनिंग ने कहा था, “यदि सिन्धिया भी विद्रोह में सम्मिलित हो जाये तो मुझे कल ही बिस्तर गोल करना होगा।” यह विद्रोह जनक्रान्ति का रूप न लें सका।

(3) केन्द्रीय योजना का अभाव – क्रान्तिकारियों में केन्द्रीय योजना का अभाव था तथा उनकी नीति स्पष्ट नहीं थी। नीति के अस्पष्ट तथा केन्द्रीय न होने के कारण क्रान्तिकारी नेताओं में एकता का सर्वथा अभाव था । प्रत्येक की नीति अलग थी और प्रत्येक के समर्थक अपने ही नेता के अन्तर्गत कार्य करना चाहते थे। सब नेताओं के अपने-अपने स्वार्थ थे जिनकी पूर्ति के लिए वे प्रयत्नशील थे। इसके विपरीत अंग्रेजों की योजना बिल्कुल स्पष्ट थी और उसके पास कर्मठ नेता थे जिन्होंने क्रान्ति को असफल करने में किसी भी बात की कसर नहीं छोड़ी और उन्होंने हर सम्भव साधन का प्रयोग किया।

(4) साधनों व हथियारों का अभाव – क्रान्तिकारियों के पास धन, अस्त्र-शस्त्र आधुनिक साधन जैसे- रेल, डाक-तार व योग्य कर्मठ सेनापतियों का पूर्ण अभाव था। इसके विपरीत अंग्रेजों को सभी साधन उपलब्ध थे।

(5) योग्य नेता का अभाव – यद्यपि क्रान्ति में कई नेता थे जिन्होंने क्रान्ति को संगठित करने तथा उसको सफल बनाने के लिए अकथनीय प्रयत्न किये किन्तु इनमें कोई भी ऐसा योग्य नेता नहीं था जो समस्त देश के लिए सर्वमान्य होता है।

(6) अंग्रेजों की सन्तोषजनक अन्तर्राष्ट्रीय स्थिति – इस समय अंग्रेजों की अन्तर्राष्ट्रीय स्थिति सन्तोषजनक थी, जिसके कारण वे क्रान्ति को कठोरतापूर्वक तथा अपने समस्त साधनों का प्रयोग कर दमन करने के कार्य में एकाग्रचित्त होकर संलग्न हो गये। दोस्त मुहम्मद ने सन्धियों का पूर्ण रूप से पालन करते हुए अफगानिस्तान से भारत पर आक्रमण नहीं किया।

(7) अराजकता का उत्पन्न होना – क्रान्तिकारियों ने धन के अभाव में साधारण जनता को लूटना आरम्भ कर दिया, जिसके कारण क्रान्ति के क्षेत्र में अराजकता उत्पन्न हो गई जिसने जनता को क्रान्ति से शीघ्र ही उदासीन कर दिया। जेलों आदि तोड़ने से गुण्डे तथा बदमाश व्यक्ति आजाद हो गये जिनको अपने निन्दनीय कार्य करने का खुला अवसर प्राप्त हुआ। इस अराजकता के उत्पन्न होने से अंग्रेजों को जनता का सहयोग प्राप्त हुआ, क्योंकि जनता अराजकता से ऊब गई थी और शान्ति चाहती थी। अंग्रेजी सेनाओं ने क्रान्तिकारियों का दमन अत्यन्त क्रूरता, नृशंसता तथा पशुता से किया कि जनता में आतंक छा गया और वह भयभीत गई।

(8) क्रान्ति का समय से पूर्व प्रारम्भ होना – क्रान्ति के लिए 31 मई, 1857 का दिन निश्चित था, परन्तु यह बैरकपुर व मेरठ की घटनाओं के कारण पहले ही 23 जनवरी को प्रारम्भ हो गई। अंग्रेज इस छुट-मुट क्रान्ति को दबाने में सफल हो गये ।

(9) अंग्रेजों की कुटिल कूटनीति – क्रान्ति का दमन करने के लिए अंग्रेजों ने सफल कूटनीतिज्ञ उपाय भी किये। हिन्दू-मुसलमान और सिखों के बीच मतभेद भड़काने के लिए बहादुरशाह के नाम से झूठे फरमान जारी किये गये जिनमें कहा गया था कि युद्ध में विजय प्राप्त करने के बाद सिखों का वध कर दिया जायेगा।
उपर्युक्त सभी कारणों से 1857 की क्रान्ति असफल रही।

🔰 Note – प्रश्न. सन् 1857 के भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के पश्चात् क्राउन के अधीन भारतीय सेना एवं सैन्य सुधारों की समीक्षा करें।

ब्रिटिश क्राउन के अन्तर्गत प्रेसीडेन्सी सेनाएँ तथा सैन्य सुधार

सन् 1857 की सैनिक क्रान्ति के असफल होने के बावजूद 5 सितम्बर, 1858 ई. को भारत में ईस्ट इण्डिया कम्पनी के प्रशासन को समाप्त कर ब्रिटिश साम्राज्ञी महारानी विक्टोरिया को अपनी वाइसराय के माध्यम से भारत में अंग्रेज राज्य की प्रत्यक्ष स्थापना करने के लिए विवश कर दिया। सैनिक विद्रोह की पुनरावृत्ति से बचने के लिए अंग्रेज हितों को ध्यान में रखकर 1 नवम्बर, 1858 को ब्रिटिश क्राउन के अन्तर्गत आने वाले इन प्रेसीडेन्सी सेनाओं में निम्नलिखित परिवर्तन एवं सुधार किये गये-

🔻बंगाल प्रेसीडेन्सी की 18 स्वामिभक्त बटालियनों को छोड़कर शेष सम्पूर्ण सेना भंग कर दी गयी।
🔻कम्पनी की यूरोपियन सेना को समाप्त कर अंग्रेज अफसर एवं सैनिकों को इम्पीरियल ट्रप्स के अन्तर्गत पुनर्संगठित किया गया।
🔻लगभग सम्पूर्ण भारतीय तोपखाने को भंग कर उसके स्थान पर ब्रिटिश तोपखाने का एक ब्रिगेड भारत भेजा गया।
🔻प्रेसीडेन्सी सेनाओं में भारतीय सेनाओं की संख्या कम कर ब्रिटिश सैनिकों की संख्या बढ़ा दी गयी, जिससे बंगाल प्रेसीडेन्सी सेना में अंग्रेज भारतीय सैनिक अनुपात 1 : 2 तथा मद्रास और बम्बई प्रेसीडेन्सी सेना में यह अनुपात 1 : 3 हो गया।
🔻मद्रास प्रेसीडेन्सी सेना की तीन अश्वारोही रेजीमेण्टों को छोड़कर सम्पूर्ण अश्व सेना को पुरानी सिल्हदार पद्धति पर संगठित किया गया।
🔻देशी सैनिकों की पैदल तथा अश्व टुकड़ियाँ कम कर दी गयीं और कुछ को आपस में मिला दिया गया।
🔻किलों तथा स्त्रातिजिक महत्व के स्थानों को अंग्रेज सैनिकों के ही नियन्त्रण में रखा गया।
🔻विभिन्न लड़ाकू जाति के सैनिकों की भर्ती कर पैदल सेना की 14 नयी बटालियनें संगठित की गयीं तथा तीनों प्रेसीडेन्सी सेनाओं के अलावा पंजाब अनियमित सेना को पंजाब फ्रण्टियर फोर्स के नाम से पुनर्गठित किया गया।
🔻सभी भारतीय सेनाओं को खाकी वर्दी प्रदान कर उन्हें अंग्रेजी साम्राज्य की सेनाओं की संज्ञा दी गयी।

1857 की क्रांति के बाद भारत

विद्रोह को पूर्ण रूप से समाप्त करने के बाद सन् 1861 में भारत में क्राउन की प्रेसीडेन्सी सेनाओं के पुनर्गठन की प्रक्रिया प्रारम्भ हुई, जो आगामी 4 वर्षों में पूर्ण हुई। इस गठन में नियमित अश्वारोही और पैदल यूनिटों में अंग्रेज अफसरों की संख्या घटाकर प्रति यूनिट 6 कर दी गयी। साथ ही कुछ भारतीय अश्वारोही तथा पैदल यूनिटों को भी तोड़ दिया गया। सन् 1865 तक क्राउन सेना में कुल 42 अश्वारोही रेजीमेण्ट 9 तोपखाना बैटरियाँ और तीन सैपर्स और माइनर्स यूनिटें थीं। सैनिकों तथा अफसरों की पूर्ति, वेतन तथा पेंशन आदि के लिए सैन्य विभाग तथा विभागीय कोर (Staff cors) की भी स्थापना की गयी। सन् 1870 में आर्मी रिमाउण्ट विभाग (सैनिक पशु विभाग) संगठित किया गया। सैनिक वर्दी, साज-सामान एवं शस्त्रास्त्रों में भी सुधार किये गये तथा सैनिक एकाउण्ट और ऑडिट विभागों को एक एकाउण्टेण्ट जनरल के अधीन कर दिया गया और रिमाउण्ट विभाग के लिए एक अध्यक्ष की नियुक्ति कर दी गयी और सन् 1876 तक सभी अश्व विभागों को आपस में मिला दिया गया।

सन् 1878 में तत्कालीन गवर्नर लिपटन द्वारा ईटन की अध्यक्षता में शिमला सैन्य आयोग संगठित किया गया जिसका प्रमुख उद्देश्य सैनिक व्यय को कम करना तथा सैन्य कार्यकुशलता की वृद्धि के उपायों की सिफारिश करना था। सन् 1884 में तीनों ऑर्डिनेन्स विभागों को मिलाकर एक कर दिया गया और अखिल भारतीय स्तर पर संचार सेवाओं का पुनर्गठन तथा रसद नियमों का संकलन किया गया। इतना ही नहीं प्रशासनिक सेनाओं के अधिनियम बनाकर सैनिक कार्यों के लिए उपयोगी प्रमाणित न हो सकने वाली जाति के लोगों की सेना में भर्ती पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया। सन् 1885 में सैनिक दस्तों के पूर्व लिखा जाने वाला नैटिव (Native) शब्द हटा दिया गया। सन् 1886 में गवर्नर जनरल डफरिन ने ईटन समिति की सिफारिश पर पंजाब प्रण्टियर फोर्स को पंजाब सरकार के नियन्त्रण से मुक्त कर भारत के प्रधान सेनापति के अधीन कर दिया। इसके अतिरिक्त दो-तीन पैदल बढालियनों को मिलाकर रेजीमेण्टों में तथा प्रत्येक रेजीमेण्ट को रेजीमेण्टल केन्द्र से सम्बद्ध कर दिया गया तथा सेना में रिजर्व सैन्य दल की भी व्यवस्था की गयी।

लॉर्ड किचनर के सैन्य सुधार

नवम्बर 1902 में लॉर्ड किचनर को भारत में सेनाध्यक्ष का पद सौंपा गया, जिसने प्रथम विश्वयुद्ध से पूर्व क्राउनकालीन भारतीय सेनाओं को अधिक सक्षम एवं सशक्त बनाने के उद्देश्य से सन् 1903 में तत्कालीन सैन्य व्यवस्था में निम्नांकित सुधार किये-

  • भारतीय स्टाफ कोर को समाप्त कर दिया गया और उसके समस्त अफसरों को भारतीय सेना के अफसर का नाम दिया गया।
  • पहले मद्रास कमाण्ड के अन्तर्गत आने वाले बर्मा को (जनवरी 1903 में) एक अलग स्वतन्त्र कमाण्ड में संगठित किया गया।
  • पंजाब प्रण्टियर तथा हैदराबाद कॉण्टिजेण्ट को भंग कर इनके सैनिकों को विभिन्न सेनाओं में विभक्त कर दिया गया।
  • सैन्य टुकड़ियों को फील्ड फोर्स डिवीजनों तथा भारतीय सुरक्षा बलों के अन्तर्गत संगठित कर नये सिरे से संख्याबद्ध किया गया।
  • कार्यकुशलता की वृद्धि हेतु लड़ाकू कार्यों में रुचि न रखने वाली जातियों की सैन्य टुकड़ियों को समाप्त कर उनके स्थान पर लड़ाई में अभिरुचि रखने वाली (विशेषकर गोरखा) बटालियनों को संगठित किया गया।
  • भारतीय सेना का मुख्य कार्य उत्तर-पश्चिम सीमा की रक्षा करना होने के कारण उसकी डिवीजन प्रणाली में पुनर्गठन किया गया और चारों कमाण्डों के स्थान पर तीन कोरों (उत्तरी, पश्चिमी तथा पूर्वी) की स्थापना की गयी, जिसमें 10 स्वतन्त्र एवं सक्षम डिवीजन किये गये।
  • सैनिकों के वेतन, पदोन्नति, पेंशन, भत्ता आदि की सुविधाओं को पहले से बेहतर बनाने का प्रयत्न किया गया।
  • सन् 1906 में सम्पूर्ण भारतीय सेना को उत्तरी तथा दक्षिणी दो सेनाओं में संगठित किया गया जिनके मुख्यालय क्रमशः रावलपिण्डी तथा पूना में स्थापित किये गये।
  • सन् 1906 में स्वयं सेनाध्यक्ष (C. in. C.) को (मेजर जनरल के स्थान पर) युद्ध सदस्य के नाम से वाइसराय की समिति का सदस्य बनाया गया और लॉर्ड किचनर के अनुरोध को भी स्वीकार करते हुए अलग से सैनिक सदस्य के पद को समाप्त कर उच्च स्तरीय कमाण्ड में संगठन में आमूल परिवर्तन किया गया।

सम्राट एडवर्ड सप्तम ने भारतीय सैनिक अफसरों (जिन्हें कम्पनी स्तर की कमाने का अधिकार दिया गया था) को विशेष भारतीय कमीशन प्रदान किया और उनके प्रशिक्षण हेतु देवलाली में एक स्टाफ कॉलेज की स्थापना की गयी, जिसे कुछ समय बाद क्वेटा में स्थानान्तरित कर दिया गया।

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