आन्तरिक ऊर्जा क्या है, इसके कितने प्रकार होते हैं | Internal Energy in Hindi

आन्तरिक ऊर्जा क्या है

कुछ निकाय ऐसे भी होते हैं। जिनमें किसी यान्त्रिक ऊर्जा का आभास नहीं होता है परन्तु फिर भी वे कार्य करने में सक्षम होते हैं। ऐसे निकायों में ‘आन्तरिक ऊर्जा’ होती है। वास्तव में प्रत्येक ऊष्मागतिकी निकाय में स्वयं उसके अंदर ही ऊर्जा की एक निश्चित मात्रा में रहती है।
अर्थात “किसी निकाय में निहित ऐसी ऊर्जा को जिसका कोई प्रत्यक्ष आभास नहीं होता है, आन्तरिक ऊर्जा (Internal Energy in Hindi) कहते हैं।” अतः जब किसी निकाय में बाह्य कार्य के अतिरिक्त किसी अन्य कारण से कार्य करने की क्षमता होती है, तो कहा जाता है कि निकाय में आन्तरिक ऊर्जा है।

और पढ़ें.. ऊष्मागतिकी क्या है? निम्न पर टिप्पणी लिखिए। (Thermodynamics in Hindi)

किसी निकाय में आन्तरिक ऊर्जा दो प्रकार की होती हैं –

1.आन्तरिक गतिज ऊर्जा

अणुगति सिद्धांत के अनुसार, प्रत्येक पदार्थ छोटे-छोटे अणुओं से मिलकर बना है जो सदैव गति करते रहते हैं। अर्थात् इनमें गतिज ऊर्जा होती है, जो ताप पर निर्भर करती है। किसी निकाय का ताप बढ़ने पर उसके अणुओं का वेग अधिक हो जाता है तथा उनकी गतिज ऊर्जा बढ़ जाती है। समस्त अणुओं की गतिज ऊर्जा को पदार्थ की ‘आन्तरिक गतिज ऊर्जा’ कहते हैं।

2.आन्तरिक स्थितिज ऊर्जा

पदार्थ के अणुओं में परस्पर आकर्षण बल लगता है जिसके कारण अणुओं में स्थितिज ऊर्जा भी होती है। यह ऊर्जा अणुओं के मध्य दूरी तथा आकर्षण बल पर निर्भर करती है। समस्त अणुओं की कुल स्थितिज ऊर्जा को पदार्थ की ‘आन्तरिक स्थितिज ऊर्जा’ कहते हैं। अतः जब किसी निकाय को ऊष्मा दी जाती है, तो उसका एक भाग अणुओं के मध्य उपस्थित बल के विरुद्ध कार्य करने में व्यय हो जाता है तथा निकाय की एक आन्तरिक स्थितिज ऊर्जा बढ़ जाती है।
इसी प्रकार किसी निकाय की कुल आन्तरिक ऊर्जा U उसकी आन्तरिक गतिज ऊर्जा UK तथा आन्तरिक स्थितिज ऊर्जा UP के योग के बराबर होती है। अर्थात्
U = UK + UP
अतः निकाय की आन्तरिक ऊर्जा से तात्पर्य ताप पर निकाय में निहित या एकत्रित उर्जा (अणुओं की स्थितिज तथा गतिज ऊर्जा) से होता है।

किसी निकाय के बीच ऊर्जा का विनिमय दो विधियों द्वारा हो सकता है –
प्रथम विधि – निकाय पर या निकाय द्वारा कार्य का होना। इस प्रकार ऊर्जा के विनिमय में निकाय की स्थूल चर राशियों में परिवर्तन होता है जैसे किसी गैस के आयतन व दाब में परिवर्तन होना।
द्वितीय विधि – ऊष्मा का स्थानान्तरण जोकि सूक्ष्म स्तर पर होता है और ताप में परिवर्तन के रूप में दिखाई देता है।
अर्थात “जब ऊर्जा का स्थानान्तरण इन दोनों में से किसी एक विधि द्वारा होता है, तो हम यह कह सकते हैं कि निकाय की आन्तरिक ऊर्जा में परिवर्तन हुआ है।”

पढ़े…ऊष्मागतिकी का शूनयवां नियम

पढ़ें.. ऊष्मागतिकी साम्य क्या है

Note – परम शून्य ताप प्राप्त करना असम्भव क्यों होता है ?

परम शून्य ताप प्राप्त करना

कार्नो इंजन की दक्षता के अनुसार,
η = 1 – \frac{Q_2}{Q_1}
या η = 1 – \frac{T_2}{T_1} …(1)
यदि T2 = 0 K लें तो η = 1 (या 100%), अर्थात् यदि कार्नो इंजन के सिंक का ताप परम शून्य हो, तो उस इंजन की दक्षता शत-प्रतिशत होगी। लेकिन व्यवहार में यह सम्भव नहीं है क्योंकि तब स्त्रोत से ली गई संपूर्ण ऊर्जा (Q1), कार्य W में रूपांतरित हो जाएगी तथा सिंक को कोई भी ऊष्मा निष्कासित नहीं होगी। यहां ऊष्मागतिकी के द्वितीय नियम का उल्लंघन होता है। अतः “सिंक का ताप परम शून्य होना असम्भव होता है।”

Note – सम्बन्धित प्रशन –
Q.1 किसी तन्त्र की आन्तरिक ऊर्जा से आप क्या समझते हैं ? तथा इसे ज्ञात कीजिए ?
Q 2 आन्तरिक ऊर्जा क्या है ? इसके कितने प्रकार होते हैं तथा इसकी विधियों को भी समझाइए ?
Q.3 सिद्ध कीजिए कि परम शून्य ताप को प्राप्त करना असम्भव है ?
Q.4 कार्नो इंजन के नियमानुसार परम शून्य ताप को प्राप्त कीजिए ?
Q.5 आन्तरिक उर्जा को परिभाषित कीजिए ? तथा इसके द्वारा गतिज ऊर्जा व स्थितिज ऊर्जा को सिद्ध कीजिए ?

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