नैज अर्धचालक क्या है, अर्धचालक में विद्युत् चालन क्या होता है? | Intrinsic Semiconductors in Hindi

नैज अर्धचालक क्या है

वे शुद्ध अर्द्धचालक जिसमें कोई अर्धचालक परमाणुओं के अलावा किसी अन्य पदार्थ का अपद्रव्य (या अशुद्धि) न मिला हो, “नैज अर्धचालक” कहलाता है। इस प्रकार, शुद्ध जर्मेनियम (Ge) तथा शुद्ध सिलिकॉन (Si) अपनी प्राकृतिक अवस्था में नैज अर्धचालक हैं।

जर्मेनियम और सिलिकॉन चतु:संयोजी हैं और दोनों सबसे अधिक सामान्य रूप से ज्ञात अर्धचालक हैं। जर्मेनियम परमाणु में कुल 32 इलेक्ट्रॉन होते हैं। इसके K कोश में 2, L कोश में 8, M कोश में 18 तथा शेष 4 इलेक्ट्रॉन सबसे बाहरी अपूर्ण N कोश में होते हैं, इस प्रकार जर्मेनियम में संयोजक इलेक्ट्रॉनों की संख्या 4 होती है।

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नैज अर्धचालकों में विद्युत् चालन

Ge और Si क्रिस्टल में प्रत्येक परमाणु के चारों संयोजी इलेक्ट्रॉन अपने सबसे अधिक निकट वाले चार परमाणुओं के एक-एक संयोजी इलेक्ट्रॉन के साथ बन्ध (युग्म) बनाते हैं, ये बन्ध “सह-संयोजक बन्ध” कहलाते हैं।

परम शून्य ताप पर सभी परमाणुओं के सभी इलेक्ट्रॉन सह-संयोजी बन्धों द्वारा दृढ़तापूर्वक परमाणुओं से बंधे रहते हैं, कोई भी इलेक्ट्रॉन विद्युत् चालन के लिए स्वतन्त्र नहीं रहता। अतः परम शून्य ताप पर अर्धचालक, कुचालक की भांति व्यवहार करते हैं।

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नैज अर्धचालक

स्पष्ट है कि जर्मेनियम परमाणु के चारों संयोजक इलेक्ट्रॉन बंधन में प्रयुक्त हो जाते हैं और निम्न ताप पर ऐसा कोई मुक्त इलेक्ट्रॉन नहीं बचता जो शुद्ध जर्मेनियम के टुकड़े के सिरों के बीच विभवान्तर लगाने पर विद्युत धारा प्रवाहित कर सकें। इस प्रकार “निम्न ताप पर शुद्ध जर्मेनियम (या सिलिकॉन) विद्युत् का अचालक हैं।”

ताप बढ़ाने पर इलेक्ट्रॉनों की गतिज ऊर्जा बढ़ती है जिसके फलस्वरूप ऊष्मीय प्रक्षोभों द्वारा कुछ सह-संयोजक बन्ध टूट जाते हैं। तथा कुछ मुक्त इलेक्ट्रॉन प्राप्त हो जाते हैं। अतः गर्म जर्मेनियम क्रिस्टल के सिरों के बीच विद्युत् विभवान्तर लगाने पर ये मुक्त इलेक्ट्रॉन आरोपित विद्युत् क्षेत्र की विपरीत दिशा में चलते हैं। इस प्रकार, जब कोई इलेक्ट्रॉन सह-संयोजक बन्ध से अलग होता है तो इसमें इलेक्ट्रॉन की खाली जगह हो जाती है जिसे “धन कोटर (होल या विवर) कहते हैं।

नैज अर्धचालक
नैज अर्धचालक

विद्युत् चालन में इलेक्ट्रॉन तथा होल (या कोटर) दोनों भाग लेते हैं। इलेक्ट्रॉन ऋणात्मक आवेश वाहक का तथा होल धनात्मक आवेश वाहक का कार्य करता है। बाह्य विद्युत् क्षेत्र लगाने पर यह खाली जगह के पास के सहसंयोजी बन्ध से बंधे इलेक्ट्रॉन से भर जाती है तथा इसके फलस्वरूप उस स्थान पर जहां से इलेक्ट्रॉन आता है इलेक्ट्रॉन की खाली जगह (अर्थात् होल) उत्पन्न हो जाती है। इस प्रकार, होल की गति इलेक्ट्रॉन की गति की दिशा के विपरीत होती है।

स्पष्ट है कि ” नैज या शुद्ध अर्धचालक में विद्युत् चालन सम्भव कराने के लिए उष्मीय उत्तेजनों द्वारा इलेक्ट्रॉन होल जोड़े उत्पन्न किए जाते हैं लेकिन विद्युत् चालन में पदार्थ विद्युत उदासीन रहता है, क्योंकि इलेक्ट्रॉन व होल सदैव समान संख्या में होते हैं।”

ऊर्जा बैण्ड आरेख द्वारा इलेक्ट्रॉन होल उत्पन्न होने की व्याख्या

चित्र-3 में ऊर्जा बैण्ड द्वारा इलेक्ट्रॉन व होल का उत्पन्न होना समझाया गया है। चित्र-3(a) में परम शून्य ताप पर शुद्ध अर्धचालक का संयोजी बैण्ड पूर्णतः भरा है तथा चालन बैण्ड पूर्णतः खाली है। इस स्थिति में अर्धचालक कुचालक की भांति व्यवहार करता है जब तक बढ़ता है तो संयोजी बैण्ड से कुछ इलेक्ट्रॉन उत्तेजित होकर चालन बैण्ड में पहुंच जाते हैं तथा इनके स्थान पर संयोजी बैण्ड में होल उत्पन्न हो जाते हैं।

नैज अर्धचालक

स्पष्टतः इस प्रकार उत्पन्न इलेक्ट्रॉन व होलों की संख्या समान होती है। इलेक्ट्रॉनों को • क्षरा या इलेक्ट्रॉन आयन (-) तथा होल या दाता आयन को ⊕ द्वारा प्रदर्शित किया गया है, जैसे-जैसे ताप बढ़ता है संयोजी बैण्ड में होलों की संख्या तथा चालन बैण्ड में इलेक्ट्रॉनों की संख्या बढ़ती जाती है।
बाह्य विद्युत् क्षेत्र लगाने पर चालन बैण्ड में इलेक्ट्रॉन की गति विद्युत् क्षेत्र की दिशा के विपरीत तथा संयोजी बैण्ड में होलों की गति विद्युत् क्षेत्र की दिशा में होती है।

Note – नैज अर्धचालक से संबंधित प्रशन पूछें जाते हैं।
Q.1 नैज अर्धचालक क्या है? नैज अर्धचालकों में विद्युत् चालन समझाइए।
Q.2 नैज अर्धचालक क्या है? उदाहरण सहित व्याख्या कीजिए। ये कब कुचालक की भांति व्यवहार करते हैं? ताप बढ़ाने पर इनकी चालकता क्यों बढ़ जाती है तथा इनमें इलेक्ट्रॉन व होल का अभिगमन किस प्रकार होता हैं?

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