जूल थॉमसन प्रभाव क्या है, सरंध्र डाट प्रयोग एवं परिणाम समझाइए | Joule Thomson Effect in Hindi

जूल थॉमसन प्रभाव क्या है

इसके अनुसार सन् 1852 में जूल तथा थॉमसन ने देखा कि “जब कोई गैस उच्च स्थिर दाब पर एक ऊष्मीय रोधी सरंध्र डाट में से गुजर कर निम्न स्थिर दाब की अवस्था में जाती है, तो उसके ताप में परिवर्तन हो जाता है।” तो इसे “जूल-थॉमसन (अथवा जूल-केल्विन) प्रभाव” या “जूल-टाॅमसन प्रभाव” कहते हैं। तथा वह प्रयोग जिसमें यह प्रभाव उत्पन्न होता है। तो वह “सरंध्र-डाट प्रयोग” कहलाता है।

सरंध्र डाट प्रयोग

इसका प्रायोगिक में जैसा की चित्र में दिखाया गया है। इसका मुख्य भाग एक सरंध्र डाट है जो रूई, रेशम अथवा किसी अन्य सरंध्र पदार्थ की बनी होती है।

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सरंध्र डाट प्रयोग
सरंध्र डाट प्रयोग

यह डाट पीतल की दो छिद्रमय प्लेटों n1, n2 के बीच में एक लकड़ी की नली M में दबाकर रखी है, सरंध्र डाट को ऊष्मीय रोधी बनाने के लिए, नली M को चारों ओर से एस्बेस्टास से भरे टिन के एक बर्तन N से घेर देते हैं। नली का ऊपरी सिरा वायुमंडल में खुलता है। तथा निचला सिरा एक तांबे की सर्पिलाकार नली S से जुड़ा होता है। यह पूरा प्रयोग एक जल-ऊष्मक में रखा रहता है। अतः प्रायोगिक गैस को एक संपीडक के द्वारा उच्च दाब पर सर्पिलाकर नली S में प्रवाहित करते हैं, नली M से होकर सरंध्र डाट तक जाते-जाते गैस का ताप, जल-ऊष्मक के ताप के बराबर हो जाता है। अर्थात् डाट में प्रवेश करने से पहले गैस का ताप थर्मामीटर T1, से पढ़ लेते हैं। तथा डाट से निकलने पर गैस का दाब, वायुमंडलीय दाब के बराबर रह जाता है। इस ताप को थर्मामीटर T2 से पढ़ लेते हैं।

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परिणाम

इस प्रयोग में ऑक्सीजन, नाइट्रोजन, कार्बन डाइ-ऑक्साइड तथा हाइड्रोजन व हीलियम गैसों पर विभिन्न तापों पर किए गए प्रयोगों से निम्न परिणाम प्राप्त हुए –
1.सरंध्र डाट में से प्रवाहित होने पर सभी गैसों के ताप में परिवर्तन होता है।
2.ताप परिवर्तन डाट के दोनों और के दाबान्तर के अनुक्रमानुपाती होता है।
3.साधारण तापों पर हाइड्रोजन तथा हीलियम को छोड़कर, सभी गैसों में डाट से बाहर निकलने पर ‘शीतलन-प्रभाव’ होता है, जबकि हाइड्रोजन तथा हीलियम में हल्का तापन-प्रभाव होता है।
4.गैस का प्रारंभिक ताप बढ़ने पर शीतलन प्रभाव घट जाता है। तथा एक विशेष ताप के ऊपर तापन प्रभाव में बदला जाता है। इस ताप को “व्युत्क्रमण ताप” कहते हैं। व्युत्क्रमण ताप विभिन्न गैसों के लिए भिन्न-भिन्न होता है।

जूल के नियम से विचलन प्रभाव

जूल-थॉमसन प्रयोग में जब गैस डाट में से गुजरकर अधिक दाब से कम दाब की ओर जाती है। तो उसका प्रसार होता है, अतः गैस के अणु दूर-दूर हो जाते हैं। जिसके कारण गैस को अन्तरा-अणुक आकर्षण के विरुद्ध ‘आन्तरिक’ कार्य करना पड़ता है। इस कार्य के लिए आवश्यक ऊर्जा गैस की आन्तरिक ऊर्जा से ही ली जाती है। जिसके फलस्वरूप गैस के ताप में कमी होती है। अर्थात् गैस शीतलन होती है। इस प्रकार जूल के नियम से विचलन के कारण गैस में सदैव शीतलन प्रभाव ही होता है।

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बॉयल के नियम से विचलन का प्रभाव

(p1V1 \neq p2V2) इसमें तीन दशाएं संभव होती हैं।
1.बॉयल तब से नीचे – जब गैस का प्रारंभिक ताप बॉयल ताप से नीचे होता है। तो दाब p के बढ़ने पर pV का मान घटता है, अर्थात् निम्न दाब पर pV का मान साधारण उच्चदाब की अपेक्षा अधिक होता है। यहां p2 < p1 ; अतः p2V2 > p1V1 इसलिए, U2 < U1

अर्थात् डाट में से गुजरने पर गैस की आन्तरिक ऊर्जा का मान घटेगा। अतः गैस का ताप भी घटेगा।

2.बाॅयल ताप से ऊपर – यदि जब गैस का प्रारंभिक ताप बाॅयल ताप से ऊपर होता है, तो दाब के बढ़ने पर pV का मान बढ़ता है, अर्थात् निम्न दाबों पर pV का मान ऊॅंचें दाबों की अपेक्षा कम होता है। अतः p2V2 < p1V1

इसलिए, U2 > U1
अर्थात् डाट में से गुजरने पर गैस की आन्तरिक ऊर्जा का मान बढ़ेगा । अतः गैस का ताप भी बढ़ेगा ।
3.वाॅयल ताप पर – यदि गैस का प्रारंभिक ताप बॉयल ताप का पूरी तरह बॉयल के नियम का पालन करती है। अतः
p2V2 = p1V1
इसलिए, U2 = U1
अर्थात् आन्तरिक ऊर्जा परिवर्तित रहेगी। अतः डाट में से गुजरने पर गैस का ताप उतना ही रहेगा।
अतः इस प्रकार, बॉयल के नियम से विचलन के कारण सरंध्र डाट से निकलने के पश्चात गैसों में शीतलन प्रभावी हो सकता है, तापन प्रभाव भी हो सकता है तथा वह अप्रभावित भी हो सकता है। यह गैस के प्रारंभिक ताप पर निर्भर करता है।

परिणामी प्रभाव

जूल-थॉमसन प्रभाव उक्त दोनों प्रभावों का परिणाम है। अतः बाॅयल ताप से नीचे दोनों प्रभावों के कारण “शीतलन-प्रभाव” होता है। अतः दोनों प्रभाव जुड़कर शीतलन प्रभाव को बढ़ा देते हैं। बॉयल ताप पर जूल नियम से विचलन के कारण शीतलन प्रभाव होता है, परंतु वाॅयल नियम से विचलन के कारण गैस के ताप पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। इस प्रकार दोनों के जुड़ने पर “शीतलन-प्रभावी” ही होता है। अर्थात् “परिणामी जूल-थॉमसन प्रभाव शून्य” हो जाता है। यह ताप ही गैस का “व्युत्क्रमण ताप” होता है। अतः इस ताप से ऊपर तापन प्रभाव, शीतलन प्रभाव से अधिक हो जाता है। जिससे परिणामी प्रभाव ‘तापन-प्रभाव’ ही होता है।
हाइड्रोजन तथा हीलियम के लिए व्युक्रमण ताप क्रमशः – 80°C तथा – 240°C है। अतः इन गैसों में साधारण ताप पर तापन-प्रभाव होता है। तो यदि हाइड्रोजन तथा हीलियम के प्रारम्भिक ताप क्रमशः – 80°C तथा – 240°C से नीचे कर दिए जाए, तो इन गैसों में भी शीतलन प्रभाव होगा।

Note – सम्बन्धित प्रश्न
Q. 1 जूल थॉमसन प्रभाव क्या होता है? सरंध्र डाट प्रयोग का वर्णन कीजिए। तथा इससे विभिन्न गैसों के लिए, विशेषकर हाइड्रोजन के संदर्भ में प्राप्त परिणामों की विवेचना कीजिए?
Q. 2 जूल-टाॅमसन प्रभाव किसे कहते हैं ? चित्र की सहायता से सरंध्र डाट प्रयोग, परिणाम को समझाइए। तथा बॉयल के नियम और जूल के नियम से विचलन के प्रभाव से परिणामी प्रभाव को सिद्ध कीजिए ?

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