जूल का नियम क्या है, परिभाषा, सूत्र, प्रयोग तथा निष्कर्ष को समझाइए | Joule’s Law in Hindi

जूल का नियम क्या है

आदर्श गैस के अणुओं के मध्य अन्तरा-अणुक बल अनुपस्थित होते हैं अर्थात् जूल के अनुसार, “आदर्श गैस वह होती है जिसकी आन्तरिक ऊर्जा केवल ताप पर निर्भर करती है, आयतन पर नहीं।” तो यह “जूल का नियम” कहलाता है। और इसे गणितीय रूप में निम्न प्रकार व्यक्त किया जा सकता है। जैसे
(1). U = f(T) (2). ( \frac{∂U}{∂V} )T = 0 (3). ( \frac{∂U}{∂P} )T = 0 (4). ( \frac{∂U}{∂T} )V = ( \frac{∂U}{∂T} )P

जूल के प्रयोग का उद्देश्य

गैस अणुओं के मध्य अन्तराअणुक बलों की उपस्थिति व प्रकृति का विश्लेषण करने के लिए जूल ने एक प्रयोग किया, जिसे ‘जूल का प्रयोग’ कहते हैं।

जूल के प्रयोग का सिद्धांत

यदि आदर्श गैस का स्वतंत्र प्रसार करने पर ताप अपरिवर्तित रहता है, अर्थात् बढ़ता है या घटता है। तो अन्तराअणुक बल क्रमशः अनुपस्थित होंगे, अर्थात् प्रतिकर्षण के होंगे या आकर्षण के होंगे।

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जूल का प्रयोग

अणुगति सिद्धांत द्वारा गैस नियम स्थापित करने में यह माना गया था। कि गैसों के अणुओं के बीच आकर्षण बल नहीं होता। परंतु वास्तविक गैसों का गैस नियमों से विचलन देखते हुए, वाण्डर वाल्स ने यह प्रतिपादित किया कि गैस के अणुओं के बीच आकर्षण बल होता है।
जूल ने गैसों के अंतराअणुक बलों का पता लगाने के लिए सन् 1845 में एक प्रयोग किया।
जूल के प्रयोग में उपकरण – जूल ने ताॅंबे के दो एक समान सिलेण्डर M ब N लिए, जिन्हें एक नली द्वारा जोड़ा गया और स्टॉप कोर्क S से संबंधित किया गया है। सिलेंडर N पूर्णतः खाली है, जबकि M मैं गैस भरी हुई है। यह व्यवस्था जल से भरे हुए बर्तन में रखी हुई है। और इसमें एक संवेदनशील तापमापी T लगा हुआ है। जैसा कि चित्र में दिखाया गया है।

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जूल का प्रयोग
जूल का प्रयोग

जूल ने सर्वप्रथम जल का ताप नोट किया। जूल ने स्टाॅप काॅर्क S को खोलकर, M की वायु को N के निर्वात में शीघ्रता से प्रसारित किया। इसमें ना तो कोई ‘बाह्य’ कार्य हुआ (क्योंकि वायु ‘निर्वात’ में प्रसारित हुई) और ना ही बाहर से ऊष्मा का आदान-प्रदान हुआ (क्योंकि प्रसार बहुत ‘शीघ्रता’ से हुआ) अतः गैस मुक्त प्रसार करती है और सिलेण्डर N तक फैलती है।

प्रेक्षण

जूल के प्रयोग में जल के ताप में कोई परिवर्तन प्रेक्षित नहीं होता है। तथा प्रयोग को बार-बार दोहराने पर भी जल के ताप में कोई परिवर्तन प्रेक्षित नहीं हुआ।

निष्कर्ष

जूल के प्रयोग से यह निष्कर्ष निकलता है कि गैस अणुओं के मध्य अंतराअणुक बल अनुपस्थित है, इसलिए मुक्त प्रसार में कार्य नहीं किया जाता है। तथा आन्तरिक ऊर्जा नियत रहती है और ताप नियत रहता है। अर्थात् आदर्श गैस की आन्तरिक ऊर्जा उसके ताप पर निर्भर करती है। तथा दाब व आयतन से स्वतंत्र होती है।
जूल ने इस निष्कर्ष को अंतिम नहीं माना। क्योंकि उनका विचार था। कि उनके उपकरण की ऊष्माधारिता इतनी अधिक थी कि उसमें आन्तरिक ऊर्जा के कारण होने वाले अल्प ताप-परिवर्तन का संसूचन नहीं हो सका। अतः सन् 1852 में जूल ने “विलियन टॉमसन” (लॉर्ड केल्विन) के साथ प्रसिद्ध “सरंध्र डाट प्रयोग” किया। जिससे यह स्थापित हुआ। कि वास्तविक गैसों में अन्तराअणुक आकर्षण बल होता हैं।

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वाण्डर वाल्स गैस में जूल का नियम

जूल नियतांक क्या है – अब हम जूल के प्रयोग में एक वास्तविक गैस के स्वतंत्र प्रसार की व्याख्या करते हैं। वास्तविक गैस में अन्तराआण्विक बल होते हैं। और इसलिए जब गैस को प्रसारित किया जाता है, तो अंतरा आण्विक बलों के विरुद्ध गैस के अणुओं को एक-दूसरे से दूर करने के लिए कार्य करना पड़ता है। अर्थात् इस प्रकार हम कह सकते हैं। कि यदि अन्तरा-आण्विक बल प्रतिकर्षण के हैं, तो प्रसार के परिणामस्वरूप गैस में ताप वृद्धि होगी। लेकिन प्रायोगिक यह देखा जाता है। कि वास्तविक गैस के जूल प्रसार में सदैव शीतलन होता है। और इसलिए गैस में अन्तरा-आण्विक बल आकर्षण की प्रवृत्ति के होते हैं। गैस के मुक्त प्रसार में ताप के इस परिवर्तन को “जूल प्रभाव” कहते हैं।

जूल गुणांक का व्यंजक

किसी गैस के मुक्त प्रसार में ताप परिवर्तन को “जूल गुणांक (Joule’s Coefficient in Hindi)” कहते हैं। इसे η के पदों में व्यक्त किया जाता है। यदि मुक्त प्रसार में गैस के आयतन में परिवर्तन dV तथा ताप में परिवर्तन dT हो, तो
जूल गुणांक \footnotesize \boxed{ η = ( \frac{∂T}{∂V} )_U }

वाॅण्डरवाल गैस के लिए “जूल गुणांक”

अन्तरा-आण्विक आकर्षण बलों के कारण वाॅडरवाल गैस में आन्तरिक दाब p = \frac{a}{V^2} उत्पन्न हो जाता है। तो जूल प्रसार में इस आन्तरिक दाब के विरूद्ध किया गया कार्य –
δW = p.dV = \frac{a}{V^2} dV
यहां a वाण्डरवॉल नियतांक तथा V प्रारंभिक आयतन है।
अतः मुक्त प्रसार में आन्तरिक गतिज ऊर्जा में कमी व आन्तरिक स्थितिज ऊर्जा में वृद्धि होती है।
अतः आन्तरिक गतिज ऊर्जा में कमी = आन्तरिक स्थितिज उर्जा में वृद्धि
= δW = – \frac{a}{V^2} dV ….(1)
आन्तरिक गतिज ऊर्जा में कमी होने के कारण मुक्त प्रसार में गैस के ताप में कमी हो जाती है। यदि यह ताप में कमी dT हो, तो CV नियत आयतन पर मोलर विशिष्ट ऊष्मा हो, तो 1 मोल के लिए –
आन्तरिक गतिज ऊर्जा में कमी
= CV . dT ….(2)
तो CV dT = – \frac{a}{V^2} dV
या \frac{dT}{dV} = – \frac{1}{C_V} . \frac{a}{V^2}
अतः जूल गुणांक
\footnotesize \boxed{ η = ( \frac{∂T}{∂V} )_U = - \frac{1}{C_V} . \frac{a}{V^2}}

“यही जूल गुणांक का व्यंजक कहलाता है।”

Note – सम्बन्धित प्रश्न पूछे जाते हैं।
Q. 1 जूल का नियम क्या है? किसी गैस में अन्तरा-अणुक आकर्षण बलों के संसूचन के लिए जूल के प्रयोग का वर्णन कीजिए। इससे जूल ने क्या निष्कर्ष निकाला ?
Q. 2 जूल के प्रयोग का सिद्धांत तथा उद्देश्य को समझाइए? तथा जूल का नियम व्यक्त कीजिए ?
Q. 3 आदर्श गैस के लिए जूल का नियम क्या है? प्रयोग की सहायता से व्याख्या कीजिए ?
Q. 4 आदर्श गैस के लिए जूल का नियम क्या है? जूल के प्रयोग का वर्णन कीजिए? तथा प्रयोग का सिद्धांत समझाइए। इस प्रयोग से क्या निष्कर्ष प्राप्त हुए ?

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