कौटिल्य का अर्थशास्त्र – लघु उत्तरीय प्रश्न | Kautilya’s Arthashastra in Hindi

प्रश्न 1. कौटिल्य का अर्थशास्त्र में दूत एवं चर का वर्गीकरण किस प्रकार किया गया है?

उत्तर— दूत एवं चर – अपने अर्थशास्त्र में कौटिल्य ने निम्नलिखित तीन प्रकार के दूतों का उल्लेख किया है-
(1) निःसृष्तार्थ – सुयोग्य एवं सम्पत्तिशाली वे दूत जिन्हें राजा की ओर से कोई निश्चय एवं निर्णय लेने का अधिकार प्राप्त हो।
(2) परिमितार्थ – सीमित उत्तरदायित्व का निर्वाह करने वाले दूत जो राजा की स्वीकृति के बिना कोई निर्णय नहीं ले सकते हैं।
(3) शासन हर – मात्र सन्देशवाहक का कार्य करने वाले दूत जो अपनी ओर से कोई बात नहीं कह सकते थे। कौटिल्य ने दूतों के अलावा निम्नलिखित 5 प्रकार के गुप्तचरों का उल्लेख किया है—
(i) कापटिक (कपट वेशधारी),
(ii) उदाध्यित (मचामी वेशधारी),
(iii) गृह-पतिक (गृहस्थ वेशधारी),
(iv) तापक (सिर मुंड़ाकर अथवा जटावेशधारी),
(v) वैदेल्क (बनिया वेशधारी) ।

इसके अतिरिक्त उच्च कर्मचारियों की शुद्धता का पता करने के लिए चार अन्य प्रकार के गुप्तचरों का उल्लेख भी अर्थशास्त्र में मिलता है।
(1) सत्री (हस्तरेखा, वशीकरण एवं शकुन विद्या में पटु),
(2) तीक्ष्ण (शूरवीर),
(3) रसद (क्रूर और आलसी),
(4) भिक्षुकी (विधवा ब्राह्मणों के रूप में घर में घुसकर भेद लेने वाली)।

कार्य क्षेत्र के आधार पर भी उसने गुप्तचरों के अन्य दो प्रकारों का उल्लेख भी किया है-
(i) संस्था (अपने राज्य की घटनाओं के विषय में राजा को जानकारी देने वाला),
(ii) संचार (दूसरे राज्यों में जाकर सूचनायें एकत्र करने वाले तथा शत्रु राज्य जनता में उसके विरुद्ध भड़काने एवं तोड़-फोड़ कराने वाले)।
इस प्रकार मौर्यकाल में दूत गुप्तचरों को सैन्य पद्धति में एक विशेष स्थान प्राप्त था।

प्रश्न 2. कौटिल्य के अनुसार सेना को कितने वर्गों में विभक्त किया गया है?

उत्तर— कौटिल्य ने सेना को 6 भागों में बाँटा गया है-
(1) मौल बल – राजधारी की रक्षा करने वाली सुप्रशिक्षित क्षत्रिय सैनिकों द्वारा निर्मित सर्वाधिक विश्वसनीय सेना।
(2) भूतक बल – मौल बल की सैन्य संख्या में कमी को दूर करने के लिये रखी गयी वेतनभोगी सेना।
(3) मित्र बल – मित्र राजाओं की सेना।
(4) श्रेणी बल – विभिन्न श्रेणियों व संघों द्वारा निर्मित गिरोह बनाकर लड़ने वाली सेना जो शत्रु द्वारा धोखे की लड़ाई के लिए प्रयुक्त होती है।
(5) अमित्र बल – शत्रु राजा के पराजित होने पर अपने अधिकार में लायी गयी सेना।
(6) अटवी बल – शत्रु प्रदेश में लूटपाट करने के लिये मार्गदर्शन में सहायक समीपवर्ती असभ्य एवं जंगली जातियों द्वारा निर्मित सेना।

उपर्युक्त सेनांगों की समुचित व्यवस्था एवं कुशलता हेतु कौटिल्य ने इनके लिये अश्वाध्यक्ष, हस्ताध्यक्ष, स्थाध्यक्ष, पत्याध्यक्ष की नियुक्ति का निर्देश दिया है। अश्वों एवं गजों के प्रशिक्षण के बारे में भी कौटिल्य ने स्पष्ट निर्देश दिये हैं। चतुरंग की सहायता के लिये सहायक अंगों, रसद एवं शस्त्रादि के प्रबन्ध के लिये विष्ट विभाग, शत्रु नौकाओं एवं समुद्री डाकुओं को नष्ट करने वाली नौकाओं की देखभाल के लिये नावाध्यक्ष की नियुक्ति का निर्देश भी दिया है। यौद्धिक कार्यवाहियों में सफलता के लिये दूत एवं चरों की नियुक्ति (चल बल) तो दूसरी ओर विशेष स्थलों पर देशिक बल की उपादेयता पर भी प्रकाश डाला है। इसके अतिरिक्त इस काल में चिकित्सक वर्ग के साथ महिला सेविकाओं का उल्लेख भी प्राप्त होता है।

प्रश्न 3. आचार्य कौटिल्य ने कितने प्रकार के व्यूहों का उल्लेख किया है?

उत्तर— कौटिल्य ने संग्राम में व्यूहों की महत्ता को स्वीकार कर चार प्रकार के व्यूहों का उल्लेख किया है-
(1) दण्ड व्यूह – सैनिक पंक्तिबद्ध खड़े होते हैं।
(2) योग व्यूह – जिसमें एक कतार में सर्पाकार अथवा गौमूत्र द्वारा भूमि पर बनी आकृति की भाँति खड़े हों।
(3) मण्डल व्यूह – जिसमें सैनिक मण्डल बनाकर गोलाई में खड़े होते हैं।
(4) असंहृत व्यूह – जिसमें सैनिक अलग-अलग टुकड़ियों में बँटकर खड़े होते हैं।

उपर्युक्त व्यूहों में कौटिल्य ने समतल भूमि पर दण्ड एवं मण्डल व्यूह तथा ऊबड़-खाबड़ भूमि पर भोग तथा असंहृत व्यूह की रचना को उपयोगी बताया है। इतना ही नहीं, उसने चतुरंग बल के सैनिकों की संख्या के बराबर होने पर समव्यूह और असमान संख्या होने पर असंहृत व्यूह अपनाने का निर्देश दिया है। इसी प्रकार उसने एक ही प्रकार की सेना द्वारा निर्मित व्यूह को शुद्ध व्यूह तथा कई प्रकार की सेनाओं द्वारा निर्मित व्यूह को मिश्रित व्यूह की संज्ञा दी है।

प्रश्न 4. कौटिल्य ने कितने प्रकार के दुर्गों का वर्णन किया है?

उत्तर— नगर सुरक्षा तथा किले – नगर सुरक्षा को दृष्टिगत रखते हुए इस काल में किलों के विकास पर विशेष बल दिया गया है। कौटिल्य के अनुसार, “राजा देश के चारों ओर सीमाओं पर युद्धोचित प्राकृतिक दुर्गों का निर्माण कराये और देश के बीच में धन वृद्धि के केन्द्र नगरों और राजधानी की स्थापना करे।” नगरों की सुरक्षा के लिए खाई खोदने की भी व्यवस्था थी। दुर्गों को मनु की भाँति कौटिल्य ने भी निम्नलिखित 4 भागों में बाँटा है-

(1) औदिक दुर्ग – चारों ओर स्वाभाविक जल (नदी, तालाब) से घिरा हुआ द्वीप की भाँति प्रतीत होने वाला दुर्ग।
(2) पर्वत दुर्ग – पर्वत की कन्दराओं अथवा बड़े-बड़े पत्थरों की दीवारों द्वारा निर्मित दुर्ग।
(3) धान्वन दुर्ग – चल और घासरहित भूमि ।
(4) वन दुर्ग – चारों ओर दल-दल अथवा काँटेदार झाड़ियों से घिरे दुर्ग।
कौटिल्य ने दुर्गों की सुरक्षा के लिये चारों तरफ से खाइयाँ खोदने का सुझाव भी दिया है जिससे आपत्ति काल में अपनी पूर्ण सुरक्षा हो सके।

प्रश्न 5. मौर्यकालीन शस्त्रास्त्रों का वर्णन कीजिए।
अथवा
आचार्य कौटिल्य द्वारा वर्णित शस्त्रास्त्र क्या हैं ?

उत्तर— मौर्यकाल में महाकाव्यकालीन हथियारों में आवश्यक सुधार करने के साथ ही अनेक प्रकार के आक्रमणात्मक एवं सुरक्षात्मक हथियारों का विकास एवं निर्माण किया गया। बाण एवं तलवारों की भेदन-छेदन शक्ति अपेक्षाकृत तेज हो गयी थी। कौटिल्य के आयुधागाराध्यक्ष के कर्त्तव्यों में दोनों प्रकार के (आक्रमणात्मक एवं सुरक्षात्मक) शस्त्रों के निर्माण करने व उनकी देख-रेख करने की व्यवस्था का उल्लेख तो किया ही है, अपने अर्थशास्त्र में उसने 10 प्रकार के स्थिर-यन्त्रों और 17 प्रकार के चल-यन्त्रों का उल्लेख कर अपने पांडित्य का परिचय दिया है। स्थिर यन्त्रों में सर्वतोभ्रद, जाम, दगन्य, घाती, संघाती, पर्जन्यक आदि प्रमुख थे। इसी प्रकार, चल-यन्त्रों में ताल वृन्त, स्पृक्लता, आस्फोटिक, मुगदर, शतघ्नी और चक्र आदि प्रमुख थे।
इसके अतिरिक्त कौटिल्य ने 11 प्रकार के भालों (हलमुख), 5 प्रकार के बाणों, 3 प्रकार की तलवारों (खड्ग), 4 प्रकार के धनुषों, 7 प्रकार के छुरों तथा 5 प्रकार के आयुधों का भी वर्णन किया है। इसके साथ ही सुरक्षात्मक शस्त्रों लौहजाल पटट, लौह कवच, शिरस्त्राण, कण्ठस्त्राण व नागोदारिक आदि का भी उल्लेख किया है।

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