गैसों का द्रवीकरण क्या है, इसकी विधियों को समझाइए | Liquefaction of gases in Hindi

गैसों का द्रवण क्या है

गैसों का द्रवण एक अत्यंत महत्व का विषय है क्योंकि द्रवित गैसों के द्वारा बहुत नीचे ताप प्राप्त किए जा सकते हैं। सबसे पहले सन् 1823 ई. में फैराडे ने क्लोरीन गैस को कमरे के ताप से नीचे ताप तक ठंडा करके दाब द्वारा द्रवित किया। तथा V के आकार की एक काॅंच की नली में एक सिरे पर क्लोरीन हाइड्रेट के टुकड़े रखकर नली को दोनों सिरों पर सील कर दिया जाता है। तथा दूसरे सिरे को हिमकारी मिश्रण में डुबा देते हैं। तथा क्लोरीन हाइड्रेट को गर्म करने पर उसमें से क्लोरीन गैस निकलकर दूसरे ठंडे सिर पर एकत्रित होने लगती है। थोड़ी ही देर में इस सिरे पर गैस की मात्रा बढ़ने पर गैस अपने ही दाब से द्रवित हो जाती है। सन् 1835 ई. में थिलोरियर ने कमरे के ताप पर 50 वायुमंडलीय दाब पर कार्बन डाइ-ऑक्साइड को द्रवित किया तथा इसे ठोस अवस्था में भी प्राप्त किया जा सकता है। सन् 1845 ई. में फैराडे ने ठोस कार्बन डाइ-ऑक्साइड तथा ईथर के हिमकारी मिश्रण द्वारा एथिलीन, फाॅस्फीन इत्यादि गैसों को द्रवित किया था। परंतु ऑक्सीजन, नाइट्रोजन, हाइड्रोजन तथा हीलियम इत्यादि गैसें अत्यंत उच्च दाब लगाने पर भी द्रवित नहीं होती हैं। अतः फैराडे ने कहा कि ये चिरस्थायी गैसें होती हैं। तथा इन्हें द्रवित नहीं किया जा सकता है।
सन् 1863 ई. में एण्डूज ने यह ज्ञात किया कि किसी भी गैस को दाब द्वारा द्रवित करने के लिए पहले गैस को उसके क्रांतिक ताप से नीचे तक ठंडा करना आवश्यक होता है। अर्थात् फैराडे की विधि द्वारा O2, N2, H2, व He गैसें द्रवित क्यों नहीं होती हैं। तथा इन गैसों के क्रांतिक ताप बहुत नीचे (क्रमशः -118°C, -147°C, -240°C व‌ -268°C) होने के कारण इन्हें क्रांतिक ताप तक ठंडा नहीं किया। अतः तब वैज्ञानिकों ने गैसों को उनके क्रांतिक ताप से नीचे तक ठंडा करके उन पर उच्च दाब लगाया और उनके गैसों को द्रवित करने में सफल हुए।
वर्तमान में गैसों के द्रवण की अनेक विधियां उपलब्ध है जिनके द्वारा सभी गैसें द्रवित की जा सकती हैं।

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1.कैस्केड विधि क्या है

इस विधि के अनुसार, किसी निम्न क्वथनांकों के कई प्रकार के द्रव लेते हैं। तथा इन्हें संपीडन मशीनों के द्वारा संपीडित करके, इच्छित गैस का ताप उसके क्रांतिक ताप से नीचे तक गिराते हैं। तथा पिक्टे ने सन् 1878 ई. में इसी विधि द्वारा ऑक्सीजन को द्रवित किया। और इसके लिए उसने सल्फर डाइ-ऑक्साइड गैस को हिमकारी मिश्रण से द्रवित करके निम्न दाब पर वाष्पित किया। अर्थात् इससे ताप लगभग -70°C तक गिर जाता है। इस तरह द्रव सल्फर डाइ-ऑक्साइड को कार्बन डाइ-ऑक्साइड से भरी नली के चारों कोनों को प्रभाहित किया। जिससे CO2 भी -70°C तक शीतल होकर द्रवित हो जाती है। अर्थात् (जोकि CO2 का क्रांतिक ताप -40°C है) फिर द्रव कार्बन डाइ-ऑक्साइड को निम्न दाब पर वाष्पित करके ऑक्सीजन के क्रांतिक ताप (-118°C) से भी नीचे तक प्राप्त किया जा सकता है। अन्त में ऑक्सीजन को इस ताप तक ठंडा करके दाब द्वारा द्रवित कर लिया जाता है।
बाद में कैमरलिंग ओनेस में सल्फर डाइ-ऑक्साइड के स्थान पर मिथाइल क्लोराइड तथा कार्बन डाइ-ऑक्साइड के स्थान पर एथिलीन का प्रयोग करके वायु को द्रवित किया।
इस विधि से नाइट्रोजन (क्रांतिक ताप -147°C) को भी द्रवित किया जा सकता है। परंतु निओन, हाइड्रोजन और हीलियम इत्यादि गैसों को द्रवित किया जा सकता है। क्योंकि द्रव नाइट्रोजन को निम्न दाब पर वाष्पित करने से इन गैसों के क्रांतिक तापों से कोई नीचे ताप उपलब्ध नहीं किए जा सकते हैं।

और पढ़ें.. पुनर्योजी शीतलन का सिद्धांत

2.पुनर्योजी शीतलन विधि क्या है

यह विधि जूल-थॉमसन प्रसार के नियम पर आधारित है। माना यदि किसी गैस का प्रारंभिक ताप उसके व्युत्क्रमण ताप से नीचा होता है। तो जूल-थॉमसन प्रसार के द्वारा गैस को शीतल किया जाता है यदि गैस का प्रारंभिक ताप जितना कम होगा, जूल-थॉमसन प्रसार में से गैस उतनी ही अधिक शीतल होगी। अतः यदि उसी गैस पर जूल-थॉमसन प्रसार की यह क्रिया बार-बार दोहराई जाती है, तो गैस बहुत तेजी से शीतल होकर साधारण दाब पर ही द्रवित हो जाती है। इस विधि को “पुनर्योजी शीतलन की विधि” (Method of Regenerative Cooling in Hindi) कहते हैं। अतः इसे “पुनर्योजी शीतलन का सिद्धांत” भी कहा जाता है। अर्थात् इस विधि के द्वारा सन् 1895 ई. में जर्मनी के वैज्ञानिक लिंडे ने तथा इंग्लैंड के वैज्ञानिक हैम्पसन ने वायु को द्रवित करके दिखाया था।
वैज्ञानिक डीवार ने तथा बाद में कैमरलिंग ओनेस ने द्रव वायु को निम्न दाब पर अधिक गर्म करके इसके द्वारा हाइड्रोजन को उसके वव्युत्क्रमण ताप (-80°C) से नीचे तक शीतल किया। तथा फिर हाइड्रोजन गैस को पुनर्योजी शीतलन के द्वारा उसके सामान्य क्वथनांक -253°C तक शीतल किया। अर्थात् जिसके द्वारा यह 1 वायुमंडलीय दाब पर द्रवित हो जाती है।
सन् 1908 में कैमरलिंग ओनेस ने निम्न दाब पर अधिक गर्म द्रव हाइड्रोजन के द्वारा हिलियम गैस को उसके व्युत्क्रमण ताप(-240°C) से नीचे ताप तक शीतल किया। तथा फिर उसको पुनर्योजी शीतलन के द्वारा सामान्य क्वथनांक (-268.8°C) ताप तक शीतल करके फिर द्रवित किया था।

पढ़ें.. जूल प्रसार, रुद्धोष्म प्रसार व जूल-थॉमसन प्रसार में अंतर

3.रुद्धोष्म प्रसार विधि क्या है

इस विधि को सन् 1877 ई. में कैलिटेट ने 300 वायुमंडलीय दाब पर संपीडित शीतल ऑक्सीजन गैस का रुद्धोष्म प्रसार करके उसको धुंध के रूप में प्राप्त किया। तथा पिक्ट ने ऑक्सीजन को 320 वायुमंडलीय दाब पर संपीडित करके निम्न दाब पर उबलती द्रव कार्बन डाइ-ऑक्साइड के द्वारा -140°C ताप तक ठण्डा किया। अर्थात् यह ऑक्सीजन प्रसारित होने पर द्रवित हो जाती है। अतः सन् 1893 ई. में ओल्सज्यूस्की ने संपीडित हाइड्रोजन को निम्न दाब पर उबलती द्रव ऑक्सीजन के द्वारा -21°C ताप तक ठंडा करके, दाब छोड़ने पर द्रव हाइड्रोजन गैस को प्राप्त करती है। तथा बाद में साइमन ने रुद्धोष्म प्रसार के द्वारा हिलियम गैस को द्रवित किया।

4.जूल-थॉमसन प्रसार तथा रुद्धोष्म प्रसार की संयुक्त विधि क्या है

इस विधि को क्लाउडे ने सन् 1902 ई. में एक वायु द्रावित्र बनाया जिसमें रुद्धोष्म प्रसार तथा जूल-थॉमसन प्रसार दोनों के प्रभावों को मिलाकर शीतलन को उत्पन्न किया गया था। तथा इस द्रावित्र में संपीडित वायु के एक भाग को बाह्य कार्य करने वाले इंजन में रुद्धोष्म प्रसार के द्वारा -80°C ताप तक शीतल किया। अतः शीतलन भाग वायु के शेष भाग को शीतल करने में प्रयुक्त किया गया था। जिससे कि फिर पुनर्योजी जूल-थॉमसन प्रसार के द्वारा -188°C ताप तक शीतल की गई तथा 1 वायुमंडल दाब पर द्रवित हो गई। अतः कैपित्ज ने सन् 1934 ई.में हिलियम को द्रवित करने के लिए एक विशेष रूप से बनाए गए प्रसार इंजन का उपयोग किया। तथा इस इंजन की विशेषता यह थी कि इसमें कोई भी स्नेहक प्रयुक्त नहीं किया गया था।

5.रुध्दोष्म विश्लेषण विधि क्या है

इस विधि को साइमन ने लकड़ी के कोयले के रुद्धोष्म विशेषण के द्वारा हिलियम को ठंडा करके द्रवित किया था।

Note – संबंधित प्रश्न
Q. 1 गैसों के द्रवण पर निबंध लिखिए?
Q. 2 जूल-थॉमसन प्रसार में पुनर्योजी शीतलन की विधि को समझाइए?
Q. 3 गैसों के द्रवीकरण पर टिप्पणी कीजिए?

  1. यान्त्रिकी एवं तरंग गति नोट्स (Mechanics and Wave Motion)
  2. अणुगति एवं ऊष्मागतिकी नोट्स (Kinetic Theory and Thermodynamics)
  3. मौलिक परिपथ एवं आधारभूत इलेक्ट्रॉनिक्स नोट्स (Circuit Fundamental and Basic Electronics)
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