द्रव-हीलियम 1 व 2 क्या है, दोनों के बीच अंतर समझाइए | गुणों की विवेचना कीजिए

द्रव हीलियम 1 तथा 2 क्या है

हीलियम गैस 1 वायुमंडल दाब के अंतर्गत ताप 4.2 k पर द्रवित हो जाती है। जब द्रव-हीलियम के तल पर पंप के द्वारा दाब घटाया जाता है, तो इसका क्वथन होने लगता है जिससे इसका ताप गिरने लगता है। तब एक नई घटना देखी जाती है। जैसे ही ताप 4.2 k से 2.19 k तक गिरता है, तथा क्वथन रुक जाता है तथा द्रव शांत हो जाता है। इससे यह पता चलता है कि ताप 2.19 k से नीचे हिलियम की एक नई द्रव-प्रावस्था बन जाती है इसे ‘द्रव-हीलियम 2’ कहते हैं तथा ताप 2.19 k को λ -बिंदु कहते हैं। λ – बिंदु से ऊपर द्रव हिलियम को ‘द्रव-हीलियम 1’ कहते हैं।
द्रव हीलियम 1 से द्रव हीलियम 2 में बदलने पर कुछ गुणों जैसे घनत्व, विशिष्ट ऊष्मा, श्यानता तथा ऊष्मीय चालकता में आकस्मिक परिवर्तन हो जाते हैं।
उदाहरण के लिए – जब द्रव हीलियम का ताप 4.2 k से 2.19 k तक गिरता है तो घनत्व बढ़ता है, परंतु ताप के और नीचे गिरने पर घनत्व एकाएक घटने लगता है। इसी प्रकार, द्रव हीलियम की विशिष्ट ऊष्मा में भी, जबकि द्रव हीलियम अपनी संतृप्त वाष्प के साथ साम्यावस्था में है, λ- बिंदु पर असांतत्य देखा जाता है द्रव हीलियम 2 के कुछ महत्वपूर्ण गुण निम्न है।

1.अपसामान्यतः निम्न श्यानता

द्रव हीलियम 2 का सबसे विशेष गुण यह है कि इसकी श्यानता अपसमान्यता निम्न (कम) होती है। कैपित्जा ने ज्ञात किया कि

द्रव हीलियम 2 का श्यानता गुणांक/द्रव हीलियम 1 का श्यानता गुणांक ≈ 10-3

अतः कोशिका नली में द्रव हीलियम 2 के प्रवाह की दर प्वाॅजले नियम के अनुसार, दर से कहीं अधिक होती है। इस गुण को ‘अतितरलता’ कहते हैं तथा द्रव हीलियम 2 को ‘अति-तरल’ कहते हैं। कोशिका नली में द्रव हीलियम के प्रवाह की दर ताप घटने पर बढ़ती है तथा λ बिंदु (2.19 k) पर अचानक काफी बढ़ जाती है 2.19 k से नीचे प्रवाह-दर अत्यधिक हो जाती है।
द्रव हीलियम 2 के इस अनोखे प्रवाह को समझाने के लिए कई सिद्धांतों को विकसित किया गया। द्वि-तरल सिद्धांत के अनुसार, द्रव हीलियम 2 दो द्रवों का मिश्रण होता है। एक सामान्य श्यानता वाले ‘सामान्य’ परमाणुओं से बना है तथा दूसरा शून्य एण्ट्रॉपी वाले ‘अति-तरल’ परमाणुओं से बना है। अति तरल परमाणु सामान्य परमाणुओं के बीच बना घर्षण अथवा श्यानता के चल फिर सकते हैं, परंतु संवेग अथवा ऊर्जा का अभिगमन नहीं करते। λ-बिंदु से ऊपर सभी परमाणु सामान्य होते हैं जब ताप λ बिंदु से नीचे गिरने लगता है तो सामान्य परमाणु अति तरल परमाणुओं में बदलने लगते हैं। परम शून्य पर संपूर्ण द्रव्यमान अति तरल हो जाता है।
जब द्रव हीलियम 2 कोशिका नली में से गुजरती है तो अति तरल परमाणु बिना किसी घर्षण अथवा श्यानता के आसानी से गुजर जाते हैं तथा सामान्य परमाणु पीछे रुक जाते हैं।

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2.अपसामान्यतः उच्च ऊष्मा-चालकता

द्रव हीलियम 1 की ऊष्मा चालकता उसी कोटि की होती है जो साधारण ताप पर गैसों की होती है परंतु द्रव हिलियम 2 की ऊष्मा चालकता सामान्य ताप पर तांबे की ऊष्मा चालकता की लगभग 800 गुना होती है।
द्रव हिलियम 2 के यह अपसामान्य उच्च चालकता सामान्य परमाणुओं के सापेक्ष अति तरल परमाणुओं की गति के कारण होती है इसमें ऊर्जा के सापेक्ष द्रव्यमान का अभिगमन अधिक होता है।

3.विसर्पी फिल्म

यदि दो संघ संकेंद्रित बर्तनों में जिनमें जिनमें एक-दूसरे के भीतर रखा है द्रव हीलियम 2 भिन्न-भिन्न ऊंचाइयों तक भरी जाए तो कुछ समय पश्चात दोनों बर्तनों में द्रव के तल के बराबर हो जाते हैं। रोलिन ने इस घटना का कारण यह बताया कि जब कोई ठोस पृष्ठ द्रव हीलियम 2 के संपर्क में आता हैं तो उसके पृष्ठ पर हीलियम की एक पतली फिल्म बन जाती है इस फिल्म का ऊंचे तल से नीचे की ओर बिना किसी घर्षण के विसर्पण हो जाता है। जैसा कि चित्र में दिखाया गया है।

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द्रव-हीलियम 1 व 2

चित्र – 1 में जार के भीतर द्रव हीलियम 2 का तल बाहर वाले फ्लाक्स में द्रव हीलियम 2 के तल से नीचा है। इस दशा में जार की दीवारों पर हीलियम 2 का तीरों की दिशा में विसर्पण होता है जब तक कि दोनों बर्तनों में तल बराबर नहीं हो जाते तथा चित्र – 2 में जार के भीतर हीलियम 2 का तल ऊंचा है इस दशा में हीलियम 2 जार की दीवारों पर पहले से विपरीत दिशा में विसर्पित होती है जब तक की पुनः दोनों तल एक नहीं हो जाते। तथा चित्र 3 में जार फ्लाक्स के द्रव के ऊपर उठ जाता है इस दशा में हीलियम 2 विसर्पित होकर जार की बाहरी दीवारों पर बहती है तथा बूंदों के रूप में फ्लाक्स में गिरती है जब तक कि पूरा जार खाली नहीं हो जाता।

4.फुब्बारा प्रभाव

द्रव हीलियम 2 का एक अन्य विलक्षण गुण ‘फुब्बारा प्रभाव’ है जिसका ऐलन तथा जोन्स ने सन् 1938 में पता लगाया था जैसा कि चित्र में दिखाया गया है ।

फुब्बारा प्रभाव

N एक बर्तन है जिसमें एक पतली कौशिक का नली लगी है तथा जिसकी तली में एक छिद्र है। इसमें महीन ऐमरी पाउडर भरा रहता है जिसमें 10-4 सेमी के क्रम का रंध्राकाश होता है। बर्तन N द्रव हिलियम 2 में डूबा रहता है तथा इसकी कोशिका नली ऊपर निकलती रहती है अब यदि पाउडर पर क्षणदीप डाला जाए तो द्रव हीलियम 2 कोशिका नली के सिरे से फुब्बारे के रूप में फूट निकलती है। जिसकी ऊंचाई 30 सेमी तक होती है। फुब्बारे के बनने का कारण यह है कि प्रकाश के पड़ने पर ऐमरी के कणों के बीच द्रव हिलियम 2 गर्म हो जाती है जिससे इसका दाब बढ़ जाता है।

Note – सम्बन्धित प्रश्न –
Q.1 हीलियम 1 का 2 के बीच अंतर समझाइए ? ट्रान्जिशन ताप पर द्रव हीलियम के असामान्य गुणों की विवेचना कीजिए?
Q.2 द्रव हिलियम 1 तथा 2 पर टिप्पणी लिखिए?

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