मनसबदारी प्रथा – मुगलों के असफलता के कारण | Mansabdari System in Hindi

मनसबदारी प्रथा क्या है

मुगलों की सेना वस्तुतः मनसबदारों द्वारा निर्मित सेना थी । इतिहासकारों के मतानुसार, “मुगलों की सैन्य पद्धति का इतिहास मुख्य रूप से मनसबदारी प्रथा का इतिहास है।”
(The history of the Mughal army is largely the history of the Mansabdari System.)

मनसबदार मुगल सेना के अन्तर्गत उच्च पद प्राप्त अधिकारी होते थे और ‘मनसब’ शब्द से पद एवं श्रेणी का बोध होता था। मनसबदार एक राजकीय पदाधिकारी होता था जिन्हें राज्य की ओर से वेतन दिया जाता था। इसके बदले में मनसबदार युद्ध के समय युद्धार्थ अपने सैनिकों की सेवाएँ मुगल साम्राज्य के लिए देता था। मनसबदारी का पद 10 सैनिकों की कमाण्ड से लेकर 10,000 सैनिकों की कमाण्ड तक होता था ।

मनसबदार द्वारा रखे जाने वाले घुड़सवारों को ‘जात’ तथा पूरक सेना के सैनिकों (अतिरिक्त घुड़सवार) को ‘सवार’ कहा जाता था। इस प्रकार ‘सवार’ रखना मनसबदार के विशिष्ट सम्मान का द्योतक था। जात और सवार पद नामों के लागू होने से मनसबदार तीन विशिष्ट श्रेणियों में विभक्त होने लगे। ‘जात’ और ‘सवार’ पदों की बराबर-बराबर संख्या वाले मनसबदार श्रेणी के ‘सवार’, ‘जात’ के आधे होने पर द्वितीय श्रेणी और आधे से कम या न रखने पर मनसबदार तृतीय श्रेणी के माने जाते थे ।

मनसबदारी प्रथा की नियुक्ति

मनसबदारों की नियुक्ति एवं पदोन्नति वंश परम्परागत न होकर बादशाह की इच्छा पर निर्भर होती थी। सैनिकों की नियुक्ति मनसबदार करते थे। इस प्रकार मनसबदार का सम्राट के प्रति उत्तरदायी होना तथा सैनिकों का अपने मनसबदार से सीधे सम्बन्धित होना स्वाभाविक था । इस प्रकार मुगलों की सैन्य पद्धति बहुत अधिक सीमा तक अकेले बादशाह पर ही आश्रित थी।

मनसबदारी प्रथा में वेतन तथा भत्ते

मनसबदारों द्वारा नियुक्त सैनिकों का वेतन मनसबदारों द्वारा ही दिया जाता था। मनसबदार अपनी श्रेणी तथा पदानुसार राजकोष से पर्याप्त मात्रा में वेतन की धनराशि प्राप्त करते थे। ‘दखली’ और ‘अहदी’ सैनिकों को राज्य द्वारा वेतन दिया जाता था। मनसबदारों को वेतन दो रूपों में दिया जाता था—
(A) जागीर के रूप में,
(B) नकद वेतन के रूप में ।

इस समय मनसबदारों को वेतन बहुत अधिक दिये जाते थे। पाँच हजारी (5000) मनसबदार को 1800 रुपये प्रति माह, एक हजारी (1000) मनसबदार को 5000 रु. तथा 500 सैनिकों के मनसबदार को 1000 रुपये प्रतिमाह का पारिश्रमिक दिया जाता था ।

मनसबदारी प्रथा की सैन्य व्यवस्था एवं सेनांग

मुगल सेना में लड़ाकू एवं सहायक सेनांग पाँच प्रकार की थी—
(1) घुड़सवार सेना, (2) तोपखाना, (3) पैदल सेना, (4) गज सेना, (5) नौसेना आदि।

(1) अश्वारोही सेना — उस समय यूरोपीय सेनाओं की भाँति मुगल सेना में अश्वारोही सेना ही सबसे अधिक महत्वपूर्ण सेना समझी जाती थी। इसलिए मुगल सम्राट अधिक संख्या में अश्वारोही सेनाएँ रखते थे। इनमें दो प्रकार के सैनिक होते थे-
(i) सिलेदार – जो अपने घोड़े हथियार, सैन्य साज-सज्जा का स्वयं प्रबन्ध करते थे।
(ii) वर्गीर – इन्हें राज्य की ओर से सभी साज-सज्जा उपलब्ध करायी जाती थी ।
अश्वारोही सैनिक चाहे उपर्युक्त किसी भी प्रकार के हों, दो श्रेणियों में विभक्त होते थे-
(A) बल्लम बरदार, (B) अश्वारोही धनुर्धर ।

(2) मुगल तोपखाना — मुगलकाल में आग्नेयशास्त्रों का एक अलग विभाग होता था। तोपखाने के प्रधान को ‘मीर-आतिश’ या ‘दरोगा-ए-तोपखाना’ कहते थे । अकबर तोपखाने को बहुत महत्व देता था, वह तोपखाने को अपने ‘साम्राज्य की ताला और कुंजी’ कहता था।
मुगलकाल में तोपखाने की दो प्रमुख शाखाएँ होती थीं-
(A) जिन्सी तोपखाना – इसमें भारी-भारी तोपें होती थीं। ये तोप दुश्मन के किले को तोड़ने घेराबन्दी करने तथा अपने किलों की सुरक्षा हेतु प्रयुक्त की जाती थीं।
(B) दस्ती तोपखाना—इसमें हल्की तोपें एवं बन्दूकें आदि होती थीं जो मैदानी युद्ध में प्रयुक्त होती थीं।

(3) पैदल सेना — मुगलकाल में इन्हें ‘अहसाम’ कहते थे। मुगलों की पैदल सेना में साधारण नागरिकों की भर्ती की जाती थी। इनको सेना में सबसे कम वेतन दिया जाता था। पैदल सेना युद्ध में कोई महत्वपूर्ण कार्य नहीं करती थी।

(4) गज सेना — संग्राम के समय सेनानायक संग्राम स्थल का भली-भाँति निरीक्षण करने के लिए हाथियों का प्रयोग करते थे। इस सेना के कार्य शत्रु सेना की आग्नेयशास्त्रों को धारण न करने वाली पैदल सेना को अस्त-व्यस्त करना तथा अश्वारोही सेना में भगदड़ मचा देना होता था।

(5) नौसेना — यद्यपि मुगलकाल में कोई लड़ाकू नौसेना नहीं थी तथापि अबुल फजल ने नाविक विभाग का उल्लेख किया है। इस विभाग के निम्न कर्त्तव्य थे-
(i) नदियों में यातायात के लिए सब प्रकार की नावें बनाना ।
(ii) कुशल नाविकों की भर्ती करना ।
(iii) नदियों द्वारा होने वाली यातायात की देख-भाल करना आदि। वास्तविकता यह है कि मुगलों ने कभी लड़ाकू नौसेना तथा सामुद्रिक शक्ति का महत्व नहीं समझा।

मनसबदारी प्रथा में शस्त्रास्त्र एवं साज-सज्जा

मुगल सैनिकों के पास आक्रमणात्मक एवं सुरक्षात्मक दोनों ही प्रकार के शस्त्रास्त्र होते थे। तलवार, भाले, बल्लम, छुरी धनुष-बाण, बन्दूक और तोपें मुगल सैनिकों के प्रमुख हथियार थे। बचाव के लिए सैनिक कवच और ढाल का प्रयोग करते थे तथा लोहे का टोप पहनते थे। घोड़े तथा हाथियों को भी कवचित किया जाता था। हथियारों के साथ-साथ पर्याप्त सैन्य सामग्री की भी व्यवस्था रहती थी जिनमें खाद्य, चिकित्सा एवं शिविर सामग्री प्रमुख थी।

रसद तथा यातायात

शस्त्रास्त्र एवं सैनिक साज-सामान ले जाने के लिए हाथियों, ऊँटों, बैलों तथा बैलगाड़ियों एवं स्थानीय मजदूरों का प्रयोग किया जाता था। नियमित प्रशासकीय व्यवस्था के अभाव में भोजन सामग्री एवं अन्य सैन्य आवश्यकताओं की पूर्ति सेना के साथ-साथ चल रहे बाजारों द्वारा होती थी।

मनसबदारी प्रथा में सैन्य प्रशिक्षण

मुगलकाल में सैन्य प्रशिक्षण की कोई नियमित व्यवस्था नहीं थी। मनसबदार अपनी सेना के नियन्त्रण एवं प्रशिक्षण के प्रति उत्तरदायी थे। व्यक्तिगत रूप से ही सैनिक व्यायाम आदि के द्वारा अपने स्वास्थ्य को सही रखने तथा शस्त्रास्त्रों के प्रयोग का अभ्यास करते थे।

दुर्ग व्यवस्था

मुगल सम्राट् दुर्गों की सहायता से भली-भाँति अवगत थे। उन्होंने बड़े नगरों की सुरक्षा हेतु सुदृढ़ एवं विशालकाय दुर्ग बनवाये। दिल्ली और आगरे के किले इस दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण थे। किले के अन्दर से शत्रु पर प्रहार करने के लिए दीवारों तथा बुर्जों में छिद्र बनाये जाते थे। दुर्गों की सुरक्षा के लिए इनके चारों ओर गहरी खाइयाँ एवं कँटीले जंगल भी होते थे। अधिकांश किलों की लड़ाइयाँ घेरा डालकर रसद के अभाव में दुश्मन को आत्मसमर्पण के लिए विवश कर जीती जाती थीं।

मनसबदारी प्रथा में युद्ध कला की समीक्षा

सैन्य प्रस्थान — सामान्यतः मुगल सेनाओं की युद्ध यात्रा ज्योतिषियों द्वारा बताये गये शुभ मुहूर्त पर अविलम्बित रहती थी। यात्रा (प्रस्थान) में तोपखाना अग्रिम गारद के रूप में सबसे आगे रहता था। उसके पीछे सैनिक साज-सामान का काफिला, इसके पीछे शहरी सामान ‘हरदम’ रहता था जिसके पीछे मुख्य अश्वारोही सेना, इसके पीछे सम्राट और उसके पीछे पैदल सेना चलती थी।

व्यूह-रचना तथा युद्ध कौशल — शत्रु के सामने आते ही योजनानुसार अनुकूल व्यूह-रचना अपना कर अपनी सेना को विभिन्न भागों में विभाजित कर खड़ा करते थे जिनमें अग्रगामी गारद के साथ-साथ सबसे आगे ‘करावल’ को रखा जाता था। इसमें भिड़न्त योद्धा होते थे। ‘करावल’ के पीछे तोपखाना होता था। इसके पीछे अश्वारोहियों का अग्रदल होता था जिसको ‘हरवल’ कहा जाता था। इनके कुछ पीछे दोनों ओर बायें तथा दायें क्रमशः ‘जरन्धर-ए-हरावल’ तथा ‘वरधर-ए-हरावल’ अश्वारोही दल होते थे। हरावल से कुछ दूर पीछे सारी सेना के केन्द्र में उनका मुख्य दल जिसे ‘कुल’ या ‘घोल’ कहते थे, होता था। मध्य भाग के दोनों बाजुओं पर और उससे कुछ आगे बादशाह की निजी रक्षक दलें ‘इल्तमिश’ होती थीं। केन्द्र के पीछे पृष्ठ रक्षक या ‘चन्दावल’ होता था। चन्दावल से काफी पीछे मुगल सेना का शिविर होता था। मुख्य सेना के दोनों पाश्र्वों पर ‘तुलगमा’ नामक टुकड़ियों का भी प्रयोग किया जाता था।

युद्ध कला की समीक्षा — लड़ाई प्रारम्भ होते ही सर्वप्रथम तोपों के फायर द्वारा मुगल सैनिक शत्रु मनोबल को ध्वस्त करने का प्रयत्न करते हुए और फिर गतिशील अश्वारोही सेना शत्रु पर टूट पड़ती थी। अश्वारोही दलों के साथ-साथ पैदल भी आगे बढ़ते थे। शत्रु सेना के प्रधान सेनापति या सम्राट को मारना मुख्य लक्ष्य होने के कारण गुत्थमगुत्था की लड़ाई बहुधा प्रधान सेनापति के चारों ओर केन्द्रित हो जाती । शत्रु पक्ष के प्रधान सेनापति के मरने या दिखाई न देने पर शत्रु सेना भाग खड़ी होती या आत्मसमर्पण कर देती थी।

मनसबदारी प्रथा में मुगलों के असफलता के कारण

दीर्घकाल तक मुगल सेना अपने युद्ध कौशल की श्रेष्ठता द्वारा अपना राज्य विस्तार करती रही, किन्तु बाद में अपने शासकों की अदूरदर्शिता एवं अकुशलता तथा मनसबदारों की विलासिता के कारण मुगल साम्राज्य पतन की ओर अग्रसित होने लगा। इस पतन के निम्न कारण थे—

  • मनसबदारों में आपसी विरोध, ईर्ष्या, द्वेष के कारण सम्राट एवं सेना के हित भी कुण्ठाग्रस्त होते गये क्योंकि मनसबदारों द्वारा भर्ती सैनिक अपने मनसबदार के प्रति वफादार होते थे न कि सम्राट के प्रति।
  • मनसबदारों की पदलोलुपता एवं आर्थिक प्रलोभन ने उन्हें सम्राट के प्रति वफादारी त्यागने एवं अपने हित साधन हेतु उन्हें धोखा देना शुरू कर दिया जिसके कारण शाही खजाने पर आर्थिक संकट बढ़ता गया।
  • मनसबदारों की नियुक्तियों में योग्यता का आधार न था, जिसके प्रतिकूल परिणाम स्वाभाविक थे।
  • बाद में चलकर मुगल सैनिकों व अधिकारियों का जीवन सुख-सुविधाओं युक्त तथा विलासितामय बनता गया जिसके घातक परिणाम निकले।
  • समुचित अनुशासन एवं नियन्त्रण के अभाव में मुगल सेना के विशाल आकार ने सैन्य गतिशीलता को प्रभावित किया।
  • विशाल मुगल सेना की सैन्य आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु किसी राजकीय व्यवस्था का अभाव तो था ही, साथ ही पूर्ति हेतु सेना के साथ चल रहे बाजारों ने यथासम्भव सैन्य गतिशीलता तथा अनुशासन पर ही कुठाराघात किया।
  • खुले मैदानी युद्ध की अभ्यस्त मुगल सेना ऊबड़-खाबड़ एवं पहाड़ी क्षेत्र में सामरिक कार्यवाही करने में सर्वथा असमर्थ थी। इसलिए वह मराठों के छापामार युद्ध का सफलता के साथ मुकाबला नहीं कर सकी।
  • एक ही कमाण्डर के अधीन सैनिकों की बहुलतम संख्या युद्ध स्थल में अपने कमाण्डर के मरते ही नेतृत्वहीन अनुभव करने लगती थी और उच्च मनोबल के अभाव में उसका पतन स्वाभाविक हो जाता था।

नोट – परीक्षाओं में पूछे जाने वाले प्रश्न —
प्रश्न 1. “मनसबदारी प्रथा और तोपखाने के कारण मुगल सैन्य पद्धति का भारतीय सैन्य इतिहास में अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान है।” इस कथन के औचित्य की विवेचना कीजिए।
प्रश्न 2. मुगल सैन्य संगठन, शस्त्रास्त्र एवं युद्धकला का वर्णन कीजिए एवं उसकी प्रमुख विशेषताएँ बतलाइए।
प्रश्न 3. “मुगलों ने भारत पर अपना प्रभुत्व मुख्यतया दो सैन्य विशिष्टताओं-तोपों और अश्वारोही सेना द्वारा स्थापित किया।” उक्त कथन की व्याख्या कीजिए।
प्रश्न 4. “मुगलों की सैन्य पद्धति का इतिहास मुख्य रूप से मनसबदारी प्रथा का इतिहास है।” मुगल सैन्य संगठन एवं युद्धकला के परिप्रेक्ष्य में उक्त कथन की समीक्षा कीजिए।

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