मैक्सवेल सेतु (Maxwell Bridge in Hindi), सिद्धांत कार्यविधि लाभ-हानि तथा इसके द्वारा स्वप्रेरकत्व का मापन

मैक्सवेल सेतु का सिद्धांत

मैक्सवेल सेतु, व्हीटस्टोन सेतु का ही एक व्यापक रूप है। अर्थात् मैक्सवेल सेतु की सहायता से किसी कुण्डली का प्रेरकत्व (L), संधारित्र की धारिता (C) तथा दो प्रतिरोधों (R) के पदों में ज्ञात कर सकते हैं।
या दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि, मैक्सवेल सेतु के LC परिपथ का उपयोग किसी कुण्डली के स्वप्रेरकत्व का मान धारिता (C) एवं प्रतिरोध (R) के पदों में ज्ञात करने के लिए किया जाता है। मैक्सवेल सेतु को “( मैक्सवेल-ओवेन-सेतु )” के नाम से भी जाना जाता है। तथा इसका परिपथ आरेख चित्र में प्रदर्शित है।

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मैक्सवेल सेतु की कार्यविधि

माना R1, R2, R3 व R4 चार शुद्ध प्रतिरोध है, जो व्हीटस्टोन सेतु की चार भुजाओं में निम्नांकित चित्र अनुसार जुड़े हैं। तथा जिस कुण्डली का प्रेरकत्व (L) ज्ञात करना है उसे भुजा MN में R1 के साथ श्रेणीक्रम में जोड़ते हैं। R4 के समांतर एक मानक परिवर्ती संधारित्र जुड़ा होता है, जिसकी धारिता C4 (माना) है। यदि भुजा MO में एक प्रत्यावर्ती धारा जनित्र तथा एक दाब कुंजी (K1) लगी है, जबकि भुजा NP में एक “हैडफोन या संसूचक (D)” तथा एक दाब कुंजी (K2) जोड़ देते हैं। जैसा कि चित्र-1 में दिखाया गया है।

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मैक्सवेल सेतु
मैक्सवेल सेतु

प्रत्यावर्ती धारा सेतु के सन्तुलन के व्यापक प्रतिबन्ध से,
\frac{Z_1}{Z_2} = \frac{Z_3}{Z_4} …(1)
अब चित्र के अनुसार,
Z1 = R1 + jωL, Z2 = R2, Z3 = R3 व Z4 = \frac{1}{(1/R_4 + jωC_4)}
या Z4 = \frac{R_4}{(1 + jωC_4R_4)}

इन सभी मानों को समीकरण (1) में रखने पर,
\frac{(R_1 + jωL)}{R_2} = \frac{R_3}{R_4/(1 + jωC_4R_4)}
या \frac{(R_1 + jωL)}{R_2} = \frac{R_3(1 + jωC_4R_4)}{R_4}
या R1R4 + jωLR4 = R2R3 + jωC4R2R3R4 …(2)
दोनों और के वास्तविक एवं अधिकल्पित पदों को पृथक-पृथक बराबर रखने पर,
R1R4 = R2R3
या \footnotesize \boxed{ \frac{R_1}{R_2} = \frac{R_3}{R_4} } …(3)

इसी प्रकार, LR4 = C4R2R4R4
अथवा \footnotesize \boxed{ L = C_4R_2R_3 } …(4)

अर्थात् समीकरण (3) व (4) सन्तुलन के दो प्रतिबन्ध हैं। चूंकि C4 को परिवर्तित कर सकते हैं; अतः प्रतिबन्ध (4) सरलता से सन्तुष्ट हो जाता है। प्रतिबन्ध (3) को सन्तुष्ट करने के लिए R1 को परिवर्तित किया जाता है। इस प्रकार प्रतिबन्ध (3) व (4) को सन्तुष्ट करने के लिए दोनों समायोजन पूर्णतया स्वतन्त्र हैं।

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मैक्सवेल सेतु द्वारा स्वप्रेरकत्व का मापन

मैक्सवेल सेतु से स्वप्रेरकत्व के मापन के लिए व्यवहार में हम R3/R4 को एक सरल निष्पत्ति में रखते हैं, जबकि R1 को परिवर्तित करके प्रतिबन्ध (3) को पूर्ण करते हैं। अतः सूक्ष्म समायोजन हेतु R1 के साथ एक दशक उपविभाजित प्रतिरोध जुड़ा होना चाहिए ।

इसके बाद C4 को परिवर्तित करके और अच्छा सन्तुलन प्राप्त किया जाता है। R1 तथा C4 को एक-एक कर समायोजित करके ऐसा सन्तुलन प्राप्त करते हैं, जिससे हैडफोन या संसूचक ‘D’ में शून्य रीडिंग प्राप्त होती है। अतः “मैक्सवेल सेतु के सन्तुलन की दशा में समीकरण (4) से स्वप्रेरकत्व (L) की गणना करते हैं।”

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नोट :- विद्यार्थी ध्यान दें कि, “इस सेतु में अवांछित धारिताओं तथा प्रत्यावर्ती धारा स्त्रोत में संनादियों की उपस्थिति के कारण पूर्ण सन्तुलन प्राप्त करना असम्भव है।”

मैक्सवेल सेतु के लाभ व हानि

लाभ (Advantages)हानि (Disadvantages)
1.परिपथ सरल व सस्ता होता है।सेतु में अवांछित धारितायें तथा प्रत्यावर्ती धारा स्त्रोत में संनादी उपस्थित होते हैं।
2.प्रतिरोध के परिवर्तन के द्वारा सेतु को सरलता से सन्तुलित किया जा सकता है।उपर्युक्त घटकों के कारण पूर्ण सन्तुलन प्राप्त करना असम्भव होता है।

Note – मैक्सवेल सेतु से संबंधित प्रशन पूछें जाते हैं।
Q.1 मैक्सवेल सेतु की विधि द्वारा स्व-प्रेरकत्व का मान ज्ञात कीजिए? तथा इसके लाभ व हानि भी बताइए।
Q.2 किसी कुण्डली के स्वप्रेरकत्व को ज्ञात धारिता तथा प्रतिरोध के पदों में मापने के लिए मैक्सवेल सेतु का पूर्ण सिद्धांत सहित वर्णन कीजिए?

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