आवेश वाहकों की गतिशीलता को परिभाषित करो | Mobility of Charge Carriers in Hindi

आवेश वाहकों की गतिशीलता

जब किसी क्रिस्टल में बाह्य विद्युत् क्षेत्र के प्रभाव में आवेशित कण गति करते हैं तथा उनका वेग आरोपित विद्युत् क्षेत्र की तीव्रता के अनुक्रमानुपाती होता है। अर्थात्
Vd ∝ E
या Vd = µE …(1)

यहां Vd आवेशित कणों का अनुगमन वेग है। तथा E विद्युत् क्षेत्र की तीव्रता है। और µ आवेशित कणों की गतिशीलता है तथा इसकी माप मीटर2 वोल्ट-1 सेकण्ड-1 में करते हैं।

अतः समीकरण (1) में ऐसा प्रतीत होता है कि विद्युत् क्षेत्र में इलेक्ट्रॉन नियत वेग से गति करते हैं, लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं होता है। प्रत्येक इलेक्ट्रॉन विद्युत् क्षेत्र में त्वरित होने लगता हैं। इस प्रकार वह क्रिया चलती रहती है। अतः समीकरण (1) सभी इलेक्ट्रॉन की गति पर विचार करने पर इलेक्ट्रॉनों का औसत वेग या अनुगमन वेग व्यक्त करता है।

शुद्ध अर्धचालक में आवेश वाहकों की गतिशीलता

शुद्ध अर्धचालक में आवेश वाहकों की गतिशीलता उसके ताप, पदार्थ की शुद्धता तथा आवेशित कण की प्रकृति पर निर्भर करती है। यदि चालन बैंड में इलेक्ट्रॉनों की गतिशीलता µn तथा संयोजी बैंड में होलों की गतिशीलता µp है, तो अर्धचालक (जैसे – सिलिकॉन व जर्मेनियम) में इलेक्ट्रॉनों की गतिशीलता µn होलों की गतिशीलता µp की अपेक्षा अधिक होती है। इसका कारण यह है कि चालन बैंड में इलेक्ट्रॉन पर नाभिक के कारण लगने वाला आकर्षण बल अपेक्षाकृत नगण्य होता है।

अनुगमन वेग की परिभाषा

जब किसी अर्धचालक या चालक क्रिस्टल पर बाह्य विद्युत् क्षेत्र आरोपित किया जाता है, तो उसके अंदर उपस्थित आवेश वाहकों पर वैधुत बल लगने लगता है जिसके कारण आवेश वाहक किसी निश्चित दिशा में त्वरित होने लगते हैं। इस त्वरित गति के दौरान आवेश वाहक आपस में तथा परमाणुओं से टकराते हैं तब टक्कर से उनका वेग घट जाता है लेकिन वैधुत क्षेत्र उपस्थित होने के कारण उनकी गति पुनः त्वरित होने लगती है। आवेश वाहक कणों के औसत वेग को ही उनका अनुगमन वेग कहते हैं। तथा इसे Vd से प्रदर्शित करते हैं।

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