n-p-n ट्रांजिस्टर उभयनिष्ठ उत्सर्जक प्रवर्धक का परिपथ आरेख खींचकर कार्यविधि समझाइए?

n-p-n ट्रांजिस्टर उभयनिष्ठ उत्सर्जक प्रवर्धक की भांति

चित्र-1 में n-p-n ट्रांजिस्टर प्रवर्धक का उभयनिष्ठ उत्सर्जक परिपथ को प्रदर्शित किया गया है। इसमें आधार B, उत्सर्जक E के सापेक्ष धनात्मक है तथा संग्राहक C, उत्सर्जक E व आधार B के सापेक्ष धनात्मक है इसमें एक निम्न वोल्टता की एक बैटरी VBE के द्वारा आधार-उत्सर्जक (BE) निवेशी परिपथ को अग्र अभिनत पर रखा जाता है

जिससे कि निवेशी परिपथ का प्रतिरोध कम हो जाए तथा एक उच्च वोल्टता की बैटरी VCC के द्वारा संग्राहक उत्सर्जक (CE) के निर्गत परिपथों को पश्च अभिनत पर रखा जाता है, जिससे कि निर्गत परिपथ का प्रतिरोध अधिक हो जाए। तथा लोड प्रतिरोध RL को चित्र-1 के अनुसार जोड़ देते हैं ।

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इसमें निर्बल निवेशी सिग्नल को आधार उत्सर्जक (BE) पर प्रवर्धित तथा निर्गत सिग्नल को संग्राहक उत्सर्जक (CE) पर प्राप्त किया जाता है। अर्थात् ट्रांजिस्टर में क्षीण आधार धारा IB के सापेक्ष प्रबल संग्राहक धारा IC प्राप्त हो जाती है।

इस प्रकार, निवेशी वोल्टेज सिग्नल को आधार B पर लगाने से आधार धारा IB में अल्प परिवर्तन और संग्राहक धारा IC में बहुत बड़ा परिवर्तन हो जाता हैं। अतः इस परिपथ में कुल पर्याप्त ‘धारा प्रवर्धन’ प्राप्त हो जाती हैं।

n-p-n ट्रांजिस्टर उभयनिष्ठ उत्सर्जक प्रवर्धक का परिपथ आरेख

ट्रांजिस्टर प्रवर्धक का परिपथ आरेख चित्र-1 में दिखाया गया है। इसमें उत्सर्जक आधार (EB) परिपथ को अग्र अभिनत व उत्सर्जक संग्राहक (EC) परिपथ को उत्क्रम अभिनत करने के लिए दोनों बैटरियों VBE व VCC की ध्रुवतायें वही होती है जो p-n-p ट्रांजिस्टर उभयनिष्ठ उत्सर्जक प्रवर्धक परिपथ के सापेक्ष विपरीत दिशा में होती हैं।

p-n-p ट्रांजिस्टर उभयनिष्ठ उत्सर्जक (CE) प्रवर्धक की भांति किस प्रकार कार्य करता है

n-p-n ट्रांजिस्टर उभयनिष्ठ उत्सर्जक प्रवर्धक
n-p-n ट्रांजिस्टर उभयनिष्ठ उत्सर्जक प्रवर्धक

अतः परिपथ में n-p-n ट्रांजिस्टर का मूल सिद्धांत प्रतिरोध तथा अनेक लाभ वही होते हैं, जो p-n-p ट्रांजिस्टर के हैं।

निवेशी व निर्गत सिग्नलों में कलान्तर

माना यदि निवेशी सिग्नल का प्रथम अर्द्ध-चक्र धनात्मक है तथा आधार उत्सर्जक (BE) के सापेक्ष धनात्मक है। अतः प्रथम अर्द्ध-चक्र के लिए आधार उत्सर्जक (BE) परिपथ का अग्र अभिनत वोल्टेज बढ़ता जाता है। इससे उत्सर्जक धारा IE और संग्राहक धारा IC भी बढ़ती जाती है। यदि संग्राहक धारा IC के बढ़ने से संग्राहक उत्सर्जक वोल्टेज VCE घटता है क्योंकि
VCE = VCC – ICRL
अतः यहां संग्राहक C बैटरी VCC के धन से जुड़ा होता है। इस प्रकार, निवेशी सिग्नल के धनात्मक अर्द्ध-चक्र के दौरान संग्राहक C पर प्राप्त निर्गत सिग्नल का अर्द्ध-चक्र ऋणात्मक होता है।

माना यदि निवेशी सिग्नल के ऋणात्मक अर्द्ध-चक्र के द्वारा आधार उत्सर्जक (BE) परिपथ का अग्र अभिनत वोल्टेज घटता है इससे उत्सर्जक धारा IE और संग्राहक धारा IC भी घटती है। अतः संग्राहक धारा IC के घटने से संग्राहक उत्सर्जक वोल्टेज VCE बढ़ता है। अर्थात् संग्राहक C अधिक धनात्मक हो जाता है।

इस प्रकार, निवेशी सिग्नल के ऋणात्मक अर्द्ध-चक्र के द्वारा संग्राहक C पर प्राप्त निर्गत सिग्नल का अर्द्ध-चक्र धनात्मक होता है। अर्थात् स्पष्ट है कि उभयनिष्ठ उत्सर्जक प्रवर्धक में निवेशी व निर्गत सिग्नलों में 180° का कलान्तर होता है।

Note – सम्बन्धित प्रशन –
Q.1 n-p-n ट्रांजिस्टर उभयनिष्ठ उत्सर्जक प्रवर्धक की क्रियाविधि परिपथ आरेख बनाकर समझाइए। निर्गत तथा निवेशी वोल्टेज सिग्नल विपरीत कला में क्यों होते हैं? समझाइए।
Q.2 उभयनिष्ठ उत्सर्जक प्रवर्धक का परिपथ आरेख खींचकर। n-p-n ट्रांजिस्टर उभयनिष्ठ उत्सर्जक प्रवर्धक की कार्यविधि समझाइए।

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