कैस्केड का सिद्धांत क्या है, कार्यविधि, लाभ-हानि तथा सीमाएं लिखिए | Principal of Cascade in Hindi

कैस्केड का सिद्धांत क्या है

इस विधि का आविष्कार सन् 1878 ई. में पिक्टे ने किया था। इसमें क्रमानुसार निम्नतर क्वथनांकों के कई द्रवों का निम्न दाब पर वाष्पीकरण करके शीतलन उत्पन्न करते हैं। इस प्रकार इच्छित गैस का ताप उसके क्रांतिक ताप से नीचे तक गिराया जाता है। और फिर गैस पर दाब डालकर अथवा रुद्धोष्म प्रसार से उसे द्रवित किया जाता है, तो इस सिद्धांत को “कैस्केड का सिद्धांत (Principal of Cascade in Hindi)” कहते हैं।

कैस्केड की कार्य-विधि

‘कैमरलिंग ओनेस’ ने इस विधि के द्वारा ऑक्सीजन को द्रवित किया। जैसा की चित्र में दिखाया गया है।

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कैस्केड का सिद्धांत
कैस्केड का सिद्धांत

प्रयोगिक उपकरण – इस विधि के अंतर्गत चित्र में तीन भाग प्रदर्शित है प्रत्येक भाग में एक-एक संपीडन पम्प P1, P2, P3 तथा एक-एक संघनित्र M, N, O लगे होते हैं। M की भीतरी नली में मिथाइल क्लोराइड गैस भरी होती है। तथा उसके चारों और जैकेट में शीतल जल प्रवाहित होता है। तथा इस गैस का क्रांतिक ताप 143°C होता है। अतः जब P1 के पिस्टन को दायीं और लाकर गैस पर दाब लगाते हैं, तो यह कमरे के ताप पर ही द्रवित हो जाती है तथा द्रव मिथाइल क्लोराइड को बाल्व V1 के द्वारा N के जैकेट में भेज देता है। इस प्रकार जैकेट का संबंध P1 से होता है। अतः जब P1 का पिस्टन बायीं और जाता है, तो द्रव मिथाइल क्लोराइड निम्न दाब पर वाष्पित होती है। अर्थात् इससे N में ताप -90°C तक गिर जाता है। यदि जब P1 का पिस्टन दायीं और आता है, तो यही वाष्प पुनः M की भीतरी नली में जाकर द्रवित होने लगती है।
अब यदि N की भीतरी नली में एथिलीन गैस भरी है। जिसका क्रांतिक ताप 10°C होता है, परंतु अब यह -90°C तक ठंडी हो चुकी होती है। अब जैसे ही P2 के पिस्टन को दायीं और ले जाकर इस पर दाब लगाते हैं। परंतु यह तुरंत द्रवित हो जाती है। तथा द्रव एथिलीन बाल्व V2 के द्वारा O के जैकेट में भेज दी जाती है। चूंकि इस जैकेट का संबंध P2 से होता है। अतः पिस्टन के बायीं और जाने पर द्रव एथिलीन निम्न दाब पर वाष्पित हो जाती है। इससे O में ताप -169°C तक गिर जाता है।
इसी तरह यदि O की भीतरी नली में ऑक्सीजन गैस भरी होती है। जिसका क्रांतिक ताप -118°C है, परंतु अब यह -169°C तक अर्थात् क्रांतिक ताप से बहुत नीचे तक ठंडी हो चुकी होती है। अतः P3 द्वारा दाब लगाने पर यह द्रवित हो जाती है। तथा डेवार फ्लास्क Q में एकत्र हो जाती है।
अर्थात् स्वयं द्रव ऑक्सीजन को निम्न दाब पर वाष्पित करके ताप -218°C तक गिराया जा सकता है। अतः इस उपकरण में एक और भाग बढ़ाकर नाइट्रोजन गैस जिसका क्रांतिक ताप -147°C होता है। अथवा इस प्रकार वायु को द्रवित किया जा सकता है।

कैस्केड विधि के लाभ व हानि

वायु तथा ऑक्सीजन के द्रवण के लिए कैस्केड विधि अन्य विधियों की तुलना में अधिक किफ़ायती होती है। क्योंकि इसमें प्रति एकांक ऊर्जा-व्यय से द्रव-वायु अथवा द्रव-ऑक्सीजन की अधिक मात्रा मिल जाती है, परंतु यह विधि जटिल होने के कारण बड़े पैमाने पर द्रव-ऑक्सीजन अथवा द्रव-वायु के उत्पादन के लिए उपर्युक्त नहीं होती है।

कैस्केड विधि की सीमाएं

कैस्केड विधि के द्वारा द्रवित होने वाली अंतिम गैसें जैसे नाइट्रोजन (Tc = -147°C) है। इस विधि से नियाॅन (Tc = -229°C), हाइड्रोजन (Tc = -240°C) तथा हीलियम (Tc = -268°C) गैसों को द्रवित नहीं किया जा सकता है। क्योंकि नाइट्रोजन (Tc = -147°C) को निम्न दाब पर वाष्पित करने से इन गैसों के क्रांतिक ताप से नीचा ताप प्राप्त नहीं होता है।

Note – सम्बन्धित प्रश्न –
Q. 1 कैस्केड का सिद्धांत क्या है ? ऑक्सीजन के द्रवण के लिए कैमरलिंग ओनेस की विधि का वर्णन करो। इस विधि से हाइड्रोजन क्यों नहीं द्रवित की जा सकती है?
Q. 2 कैस्केड सिद्धांत से आप क्या समझते हैं ? इसकी कार्यविधि को चित्र की सहायता से समझाइए। तथा कैमरलिंग ओनेस ने इस विधि का किस प्रकार वर्णन किया था। सिद्ध कीजिए ?

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