हाइड्रोजन की द्रवण विधि क्या है, सिद्धांत, सावधानियाॅं | Principal of Liquefying Hydrogen in Hindi

हाइड्रोजन के द्रवण का सिद्धांत

हाइड्रोजन गैस को द्रवित करने की समस्या बहुत समय तक बनी रही थी। इस गैस का क्रांतिक ताप -240°C होता है। अर्थात् कोई भी शीतलक गैसें इसे इस ताप से नीचे तक ठंडा नहीं कर सकती हैं अतः हाइड्रोजन गैस के द्रवण के लिए कैस्केड विधि का प्रयोग भी नहीं किया जा सकता है।
जूल-थॉमसन प्रसार के आविष्कार के कारण गैसों के द्रवण के लिए एक नया क्षेत्र खोल दिया है। अर्थात् कोई भी संपीडित गैस, जिसका प्रारंभिक ताप व्युत्क्रमण ताप से कम होता है, तो उसके द्वारा जब एक संकीर्ण नोक में से गुजार कर प्रसारित की जाती है। तो वह ठंडी हो जाती है अतः गैस का प्रारंभिक ताप जितना कम होता है, शीतलन प्रभावित उतना ही अधिक होता है‌। अर्थात् किसी गैस का व्युत्क्रमण ताप उसके क्रांतिक ताप से ऊंचा होता है। तथा हाइड्रोजन गैस का व्युत्क्रमण ताप -80°C है, तो हाइड्रोजन को पहले -80°C से नीचे तब तक द्रव-ऑक्सीजन और द्रव-नाइट्रोजन के वाष्पीकरण द्वारा ठंडा करते हैं। तथा फिर इसका जूल-थॉमसन प्रसार करते हैं।
परंतु इस प्रकार उत्पन्न शीतलन द्रवण के लिए काफी नहीं होती है। अतः द्रवण के लिए जूल-थॉमसन प्रसार पुनर्योजी शीतलन की विधि प्रयुक्त करते हैं।

हाइड्रोजन का द्रवीकरण

डेवार ने सन् 1898 में निम्न दाब पर उबलती द्रव-वायु को शीतलक की तरह प्रयुक्त करके हाइड्रोजन को द्रवित किया। तथा सन् 1900 में ट्रैवर्स ने द्रव-हाइड्रोजन को अधिक मात्रा में उत्पन्न करने के लिए एक अधिक दक्षता वाला द्रावित्र निर्मित किया। जैसा की चित्र में दिखाया गया है।

हाइड्रोजन की कार्यविधि

सबसे पहले हाइड्रोजन को धूल, कार्बन डाइ-ऑक्साइड तथा जल-वाष्प से मुक्त करते हैं। फिर इसको एक संपीडक के द्वारा 150 वायुमंडल दाब तक संपीडित करते हैं, तो संपीडन में उत्पन ऊष्मा को शीतल जल की धारा द्वारा हटा देते हैं जैसा के चित्र में दर्शाया गया है।

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हाइड्रोजन गैस
हाइड्रोजन गैस

इस प्रकार शीतल तथा संपीडित हाइड्रोजन को द्रव-वायु में डूबी सर्पिलाकार नली M में प्रवाहित करते हैं, जहां यह -170°C तक ठंडी हो जाती है। फिर इसे निम्न दाब पर वाष्पित करके द्रव-वायु में डूबी एक दूसरी सर्पिलाकार नली N में प्रवाहित करते हैं। तथा यह N से निकलने पर हाइड्रोजन का ताप -208°C तक गिरा गिर जाता है। अब यह गैस सर्पिलाकार नली O में से गुजरती हुई एक संकीर्ण नोक P में से 1 वायुमंडलीय दाब पर निकलती है। इसमें जूल-थॉमसन शीतलन होता है तथा यह ठंडी गैस सर्पिलाकार नली O के द्वारा बाहर आने के बाद वापस ऊपर की ओर प्रवाहित हो जाती है। और नली के अंदर नीचे की ओर आती हुई गैस को और अधिक ठंडा कर देती है। जैसे-जैसे यह प्रक्रम चलता जाता है। वैसे ही संकीर्ण नोक N में से निकलने वाली हाइड्रोजन गैस अधिकाधिक ठंडी होती जाती है। तथा अंत में -253°C ताप व 1 वायुमंडलीय दाब पर द्रवित हो जाती है।
अर्थात् द्रव-हाइड्रोजन को डेवार फ्लास्क Q में एकत्रित कर लेते हैं। तथा इस प्रकार हाइड्रोजन गैस प्राप्त हो जाती है।

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सावधानियाॅं

हाइड्रोजन गैस अन्य गैसों जैसे ऑक्सीजन, नाइट्रोजन, इत्यादि से पूर्णतः मुक्त होनी चाहिए वरना यह गैसें हाइड्रोजन के द्रवण से पहले ही जल जाएंगी और द्रावित्र को अंदर से अवरुद्ध यानी ब्लॉक कर देंगी।

Note – सम्बन्धित प्रश्न –
Q.1 हाइड्रोजन गैस को द्रवित करने की विधि का वर्णन कीजिए तथा उल्लेख कीजिए कि इस विधि में क्या सावधानियाॅं आवश्यक होती हैं?
Q.2 हाइड्रोजन गैस को बनाने की कार्यविधि को समझाइए तथा हाइड्रोजन के सिद्धांतों को भी स्पष्ट कीजिए ? इस विधि में क्या सावधानियाॅं बरतनी चाहिए ज्ञात कीजिए?

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