रस : परिभाषा, अंग एवं रस के प्रकार उदाहरण सहित | Ras in Hindi

Ras Kiya hai – इस अध्याय में आपको हिंदी व्याकरण का एक बहुत ही महत्वपूर्ण टॉपिक ” रस ” (Ras in Hindi), रस की परिभाषा (Ras ki Paribhasha), रस के प्रकार उदाहरण सहित की जानकारी दी जा रही है। यह जानकारी इसलिए आवश्यक है, क्योंकि यह विषय लगभग सभी प्रतियोगी परीक्षाओं एवं बोर्ड परीक्षाओं में पूछा जाता है, तो दोस्तों हमनें आपके लिए रस की परिभाषा एवं रस के प्रकारों का उदाहरण सहित सरल भाषा में विस्तार से अध्ययन किया है। तो आप इसे पूरा जरूर पढ़ें तो चलिए शुरू करते हैं।

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रस की परिभाषा (Ras ki Paribhasha)

रस का शाब्दिक अर्थ “आनंद” होता है। कविता को पढ़ने अथवा नाटक को देखने में जो आनंद की अनुभूति होती है, उसे ही ‘ रस (Ras in Hindi)’ कहते हैं। पाठक या दर्शक के हृदय में स्थायी भाव ही विभावादि रूप से संयुक्त होकर रस रूप में परिणत हो जाता है। आचार्यों ने रस को काव्य की आत्मा कहा है।

आचार्य विश्वनाथ ने ‘साहित्य दर्पण’ में काव्य की व्याख्या करते हुए लिखा है – ‘वाक्यं रसात्मकं काव्यं’ अर्थात् रसात्मक वाक्य ही काव्य होता है।
रस की अनुभूति कैसे होती है? इस संबंध में भरतमुनि ने नाट्कशास्त्र में व्याख्या की है – ‘विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगाद्रसनिष्पत्तिः’ अर्थात् विभाव, अनुभाव एवं संचारी अथवा व्यभिचारी भाव के सहयोग से रस की निष्पत्ति होती है।

रस के अंग (Ras ke Ang)

मुख्य रूप से रस के प्रमुख 4 चार अंग (या अवयव) माने जाते हैं जो इस प्रकार हैं।

  1. स्थायी भाव
  2. विभाव
  3. अनुभाव
  4. संचारी भाव अथवा व्यभिचारी भाव ।
रस की परिभाषा
रस की परिभाषा

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स्थायी भाव की परिभाषा

रस रूप में परिणत होने वाला तथा मनुष्य के हृदय में जो भाव स्थायी रूप से विधमान रहते हैं, उन्हें ‘स्थायी भाव’ कहते हैं। स्थायी भाव अर्थात् प्रधान भाव। यहां प्रधान भाव वही होता है जो रस की अवस्था तक पहुंचता है। अतः यही भाव रसत्व को प्राप्त होते हैं।

स्थायी भाव की संख्या प्राचीन आचार्यों ने नौ (9) मानी है, उसी के आधार पर नौ रस माने जाते हैं। परन्तु बाद के आचार्यों ने दो और भावों “वत्सल्य” व “भगवत् विषयक रति” को स्थायी भाव की मान्यता दी। अतः इस प्रकार स्थायी भावों की संख्या बढ़कर ग्यारह (11) हो जाती है। वात्सल्य रस का स्थायी भाव भी रति होता है जब रति बालक के प्रति होती है, तो वात्सल्य रस होता है। और जब रति भगवान के प्रति होती है तो भक्ति रस निष्पन्न होता है।

क्रम संख्यास्थायी भावरस
1. रतिश्रृंगार
2.शोककरुण
3.क्रोधरौद्र
4.विस्मयअद्भुत
5.निर्वेदशांत
6.हासहास्य
7.उत्साहवीर
8.भयभयानक
9.जुगुप्सावीभत्स
10.वत्सल्य रतिवात्सल्य
11.भगवत् विषयक रतिभक्ति

विभाव की परिभाषा

जिन परिस्थितियों के कारण स्थायी भाव जागृत तथा तीव्र होता है, उन्हें ‘विभाव’ कहते हैं। विभाव ही स्थायी भावों का कारण होता है। विभाव के निम्न दो भेद होते हैं –
(1). आलम्बन विभाव व (2). उद्दीपन विभाव ।

(1). आलम्बन विभाव – जिन व्यक्तियों या वस्तुओं के कारण कोई स्थायी भाव जागृत होता हैं, तो उसे ‘आलम्बन विभाव’ कहते हैं। जैसे- नायक और नायिका।
आलम्बन विभाव के भी दो भेद होते हैं –
(क). आश्रय और (ख). विषय ।

(क). आश्रय या आश्रयालम्बन – जिस व्यक्ति के मन में रति नामक स्थायी भाव जागृत होता है, उसे ‘आश्रय’ कहते हैं। जैसे- राम के मन में सीता के प्रति रति का भाव जगता है तो राम आश्रय होंगे।
(ख). विषय या विषयालम्बन – जिस व्यक्ति या वस्तु के प्रति अथवा कारण आश्रय के मन में रति नामक स्थायी भाव जागृत होते हैं, उसे ‘विषय’ कहते हैं। जैसे- राम के मन में सीता के प्रति रति भाव जगते हैं, तो सीता विषय है।

(2). उद्दीपन विभाव – जिन वस्तुओं या परिस्थितियों को देखकर स्थायी भाव को जागृत अथवा तीव्र करने वाली चेष्टाओं को ही ‘उद्दीपन विभाव’ कहते हैं। जैसे- चांदनी, कोकिल, एकांक स्थल की शारीरिक चेष्टाएं।
उद्दीपन विभाव के भी चार भेद माने जाते हैं –
(क). आलम्बन की चेष्टाएं, (ख). आलम्बन के गुण, (ग). आलम्बन का अलंकार व (घ). तटस्थ।

अनुभाव की परिभाषा

आलम्बन की उन चेष्टाओं को जो आश्रय के मन में स्थायी भाव का अनुभव कराती है, उसे ‘अनुभाव’ कहते हैं। यहां भाव कारण और अनुभाव कार्य कहलाता है।
अनुभाव के निम्न चार 4 प्रकार माने जाते हैं –
(1). सात्विक अनुभाव, (2). कायिक अनुभाव, (3). मानसिक (या वाचिक) अनुभाव व (4). आहार्य अनुभाव ।

(1). सात्विक अनुभाव – जो अनुभाव बिना किसी आश्रय के प्रयास किए बगैर ही खुद व खुद होते हैं, उन्हें ‘सात्विक अनुभाव’ कहते हैं।
सात्विक अनुभाव के भी आठ 8 अंग होते हैं –
(क). स्तम्भ – लज्जा, प्रसन्नता आदि के कारण शरीर की गति रुक जाना।
(ख). कम्प – डर, हर्षा, भय आदि के कारण शरीर काप जाना।
(ग). स्वर-भंग – हर्षा, भय, शोक, डर आदि के कारण मुहं से स्वाभाविक वचनों का न निकालना।
(घ). वैवर्ण्य (रंग हीनता) – शोक, शंका, भय आदि के कारण शरीर का रंग उड़ जाना।
(च). अश्रु – तिरेक, शोक आदि कारणों से आंखों में पानी भर आना।
(छ). प्रलय (संज्ञा हीनता) – दुःख, भय, विरहजन्य, शोक आदि के कारण इंद्रियों का चेतना कम हो जाना।
(ज). स्वेद – लज्जा, भय, प्रेम आदि के कारण शरीर से पसीना आ जाना।
(झ). रोमांच – हर्ष, भय, काम आदि के कारण रोंगटे खड़े हो जाना।

(2). कायिक अनुभाव – शरीर के अंगों द्वारा जो चेष्टाएं आश्रय की इच्छानुसार की जाती हैं, उन्हें ‘कायिक अनुभाव’ कहते हैं। जैसे- क्रोध में बुरा-भला कहना, भय में भागना आदि।

(3). मानसिक अथवा वाचिक अनुभाव – मानसिक चेष्टाओं को ‘मानसिक या वाचिक अनुभाव’ कहा जाता है।

(4). आहार्य अनुभाव – वेश-भूषा से जो स्थायी भाव प्रदर्शित किए जाते हैं, उन्हें ‘आहार्य अनुभाव’ कहते हैं।

संचारी भाव की परिभाषा

वह भाव जो आश्रय के मन में स्थायी भाव उत्पन्न होने वाले अस्थिर मनोविकारों को ही ‘संचारी अथवा व्यभिचारी भाव’ कहते हैं। संचारी भावों की संख्या 33 मानी गई है –

1. निर्वेद12. विषाद23. अवहित्था
2. आवेग13. व्याधि24. निद्रा
3. दैन्य14. आलस्य25. स्वप्न
4. ग्लानि15. अमर्ष26. विबोध
5.श्रम16. हर्ष27. उन्माद
6. जड़ता17. असूया28. अपस्मार
7. उग्रता18. गर्व29. स्मृति
8. मद19. धृति30. औत्सुक्य
9. मोह20. मति31. त्रास
10. चिन्ता21. चापल्य32. वितर्क
11. शंका22. व्रीड़ा33. मरण

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रस के प्रकार (Ras ke Prakar)

रस के मुख्य रूप से नौ 9 प्रकार होते हैं, लेकिन बाद के आचार्यों ने दो और रस ‘वात्सल्य रस’ व ‘भक्ति रस’ को भी स्वीकार कर लिया गया है। अतः वर्तमान समय में कुल ग्यारह (11) रस माने जाते हैं जो इस प्रकार है –

क्रम संख्यारस के प्रकारस्थायी भाव
1.श्रृंगार रसरति
2.करुण रसशोक
3.हास्य रसहास
4.वीर रसउत्साह
5.रौद्र रसक्रोध
6.भयानक रसभय
7.अद्भुत रसविस्मय (आश्चर्य)
8.शांत रसनिर्वेद
9.वीभत्स रसजुगुप्सा
10.वात्सल्य रसवत्सल्य रति
11.भक्ति रसअनुराग (भगवत् विषयक रति)

1. श्रृंगार रस की परिभाषा (Shringar Ras ki Paribhasha)

सहृदय के मन में जब रति नामक स्थायी भाव का विभाव, अनुभाव और संचारी (या व्यभिचारी) भाव के साथ सहयोग होता है, तो वहां ‘श्रृंगार रस’ रूप में परिणत हो जाता है।
श्रृंगार रस के दो अंग होते हैं –
(1). संयोग श्रृंगार रस एवं (2). वियोग श्रृंगार (या विप्रलंभ श्रृंगार) रस।

(1). संयोग श्रृंगार रस – जहां नायक और नायिका के मिलन की दशा में प्रेम के चित्र का वर्णन हो, तो वहां ‘संयोग श्रृंगार रस’ होता हैं। उदाहरण –
कर मुंदरी की ओरसीं, प्रतिबिम्बित् प्यौ पाई।
पीठ दिए निधरक लखैं, इकटक दीठिं लगाई।।

स्पष्टीकरण – इस उदाहरण में संयोग श्रृंगार रस है।
स्थायी भाव – रति
आश्रय – नवोढा वधू (नायिका)
आलम्बन विभाव – प्रियतम (नायक)
उद्दीपन विभाव – प्रियतम का प्रतिबिम्ब
अनुभाव – एक ध्यान से प्रतिबिम्ब को देखना।
संचारी भाव – हर्ष, औत्सुक्य आदि।

(2). वियोग श्रृंगार रस – जहां नायक और नायिका के वियोग की दशा में प्रेम के चित्रण में विरह का वर्णन हो, तो वहां ‘विप्रलंम्भ वियोग श्रृंगार रस’ होता हैं। उदाहरण –
हौं ही बोरी विरह बस, कैबोरों सब गाऊॅं।
कहां जानिए कहत हैं, ससिहिं सीतकर नाऊॅं।।

स्पष्टीकरण – इस उदाहरण में वियोग श्रृंगार रस है।
स्थायी भाव – रति
आश्रय – विरहिणी (नायिका)
आलम्बन विभाव – प्रियतम (नायक)
उद्दीपन विभाव – चंद्रमा, चांदनी आदि
अनुभाव – अश्रु, स्वेद आदि
संचारी (व्यभिचारी) भाव – विषाद, आवेग आदि।

2. करुण रस की परिभाषा (Karun Ras ki Paribhasha)

जब कोई प्रिय वस्तु या व्यक्ति के अनिष्ट का भय अथवा उसके नाश से उत्पन्न क्षोभ या दुःख की स्थिति को ‘शोक’ कहा जाता है। अर्थात् ‘शोक’ नामक स्थायी भाव जब विभाव, अनुभाव एवं संचारी भाव के मिलन से प्राप्त शोक नामक स्थायी भाव से ‘करुण रस’ की उत्पत्ति होती है। उदाहरण –
अर्ध राति गई कपि नहिं आवा।
राम उठाई अनुजा उर लावा।।
सकई न दुखित् दैखिं मोहिं काऊॅं।
बन्धु सदा तव मृदुल स्वभाऊॅं।।

स्पष्टीकरण – इस उदाहरण में करुण रस प्रकट होता है।
स्थायी भाव – शोक
आश्रय – राम
आलम्बन विभाव – लक्ष्मण
उद्दीपन विभाव – रात का सुनसान समय ।
अनुभाव – अश्रु, स्वर-भंग आदि।
संचारी अथवा व्यभिचारी भाव – चिन्ता, विषाद आदि।

3. हास्य रस की परिभाषा (Hasya Ras ki Paribhasha)

किसी व्यक्ति के विकृत रूप आकार, वेश-भूषा, वाणी और चेष्टाओं से हृदय में जो भाव जागृत होते हैं, उसे ‘हास’ कहते हैं। यही ‘हास’ नामक स्थायी भाव जब विभाव, अनुभाव और संचारी भाव से सहयोग करता है, तो ‘हास्य रस’ की उत्पत्ति होती है। उदाहरण –
मातहिं पितहिं उरिन भैयें नीकें।
गुरु ऋण रहां सोच वण जीकें।।

स्पष्टीकरण – इस उदाहरण में परशुराम और लक्ष्मण के संवाद में लक्ष्मण की यह हास्यमय उक्ति है।
स्थायी भाव – हास
आलम्बन विभाव – परशुराम
उद्दीपन विभाव – उनकी झुॅंझलाहट।
संचारी भाव – चपलता, हर्ष आदि।
इन सबसे पुष्ट हास नामक स्थायी भाव हास्य रस की दशा को प्राप्त हुआ है।

4. वीर रस की परिभाषा (Veer Ras ki Paribhasha)

किसी व्यक्ति के हृदय में जब ‘उत्साह’ का भाव जागृत या पुष्ट होता है, तब ‘वीर रस’ की उत्पत्ति होती है, अर्थात् ‘उत्साह’ नामक स्थायी भाव, विभाव, अनुभाव एवं संचारी भाव के सहयोग से ‘वीर रस’ की दशा को प्राप्त होता है। उदाहरण –
सौमित्रि से घननाद का रव, शीर्ण भी नहीं सहा गयां
निज शत्रु को देखें बिना, उनसे तनिक नहीं रहा गयां।।

स्पष्टीकरण – इस उदाहरण में वीर रस को प्रकट किया गया है।
स्थायी भाव – उत्साह
आश्रय – सौमित्रि
आलम्बन विभाव – मेघनाद
उद्दीपन विभाव – घननाद का रव।
अनुभाव – युद्धार्थ सजन ।
संचारी भाव – उग्रता एवं औत्सुक्य आदि।

5. रौद्र रस की परिभाषा (Raodra Ras ki Paribhasha)

किसी व्यक्ति या शत्रु द्वारा किए गए अत्याचारों को देखकर या गुरुजनों की निंदा सुनकर ह्रदय में जो क्षोभ (क्रोध) उत्पन्न होता है। यही ‘क्रोध’ नामक स्थायी भाव जब विभाव, अनुभाव एवं संचारी भावों के सहयोग से ‘रौद्र रस’ की दशा को प्राप्त होता है। उदाहरण –
उस काल मारे क्रोध के, तनु उसका काॅंपने लगां।
मानों हवा के वेग से, सोता हुवा सागर जगां।।

स्पष्टीकरण – यहां रौद्र रस को दिखाया गया है।
स्थायी भाव – क्रोध
आश्रय – युद्ध में उपस्थित वीर ।
आलम्बन विभाव – शत्रु
उद्दीपन विभाव – शत्रु की ललकार ।
अनुभाव – काॅंपना, कम्प आदि।
संचारी भाव – उग्रता, आवेग व चापल्य आदि।

6. भयानक रस की परिभाषा (Bhayanak Ras ki Paribhasha)

किसी भयप्रद वस्तु, व्यक्ति या स्थिति को देखकर ह्रदय में जो ‘भय’ का भाव उत्पन्न होता है। अतः जब ‘भय’ नामक स्थायी भाव, विभाव, अनुभाव और संचार भाव के सहयोग से ‘भयानक रस’ की उत्पत्ति होती है। उदाहरण –
लंका की सेना तो कपिं के गर्जन् रव से काॅंप गईं।
हनूमान् के भीषण दर्शन् से विनाश ही भाॅंप गईं।।

स्पष्टीकरण – यहां भयानक रस को दिखाया गया है।
स्थायी भाव – भय
आश्रय – लंका की सेना ।
आलम्बन विभाव – हनुमान
उद्दीपन विभाव – गर्जन रव और भीषण दर्शन ।
अनुभाव – काॅंपना, जोर-जोर से पुकारना आदि।
संचारी भाव – चिंता, शंका व संत्रास आदि।
इन सबसे पुष्ट भय नामक स्थायी भाव भयानक रस को प्राप्त हुआ है।

7. अद्भुत रस की परिभाषा (Adbhut Ras ki Paribhasha)

किसी अपूर्व वस्तु या दृश्य को देखकर ह्रदय में जो विशेष तथा आश्चर्य का भाव उत्पन्न होता है, उसे ‘विस्मय’ कहते हैं। यही विस्मय नामक स्थायी भाव जब विभाव, अनुभाव एवं संचारी भावों के मिलन से रस रूप में परिणत होता है, तब ‘अद्भुत रस’ कहलाता है। उदाहरण –
इहाॅं-उहाॅं दुई बालक देखां।
मति भ्रम मोरि कि आन् बिसेखां।।
तन पुलकित् मुख वचन् न आवां।
नयन मूॅंदि चर्नन् सिर नावां।।

स्पष्टीकरण – यहां अद्भुत रस की उत्पत्ति हुई है।
स्थायी भाव – विस्मय
आश्रय – माता कौशल्या
आलम्बन विभाव – यहां-वहां दो बालक दिखाई देना ।
उद्दीपन विभाव – विचित्र दृश्य ।
अनुभाव – ‘तन पुलकित् मुख वचन न’ में रोमांच और स्वर-भंग आदि।
संचारी भाव – जड़ता, वितर्क आदि।
इस प्रकार ‘विस्मय’ नामक स्थायी भाव ‘अद्भुत रस’ रूप में परिणत होता है।

8. शांत रस की परिभाषा (Shaant Ras ki Paribhasha)

दुनिया की वस्तुएं तथा इसकी नश्वारता का अनुभव करने से हृदय में जो वैराग्य ‘निर्वेद’ भाव उत्पन्न होता है। यही ‘निर्वेद’ नामक स्थायी भाव जब विभाव, अनुभाव और संचार भाव के सहयोग से ‘शांत रस’ की निष्पत्ति होती है। उदाहरण –
अब लौं नसानी अब न नशें हौं।
राम कृपा भवनिशा सिरानीं जागैं फिर न डसें हौं।।

स्पष्टीकरण – इस उदाहरण में कवि को अध्ययन हो गया है। वह इस माया के बंधन से मुक्त होना चाहता है।
स्थायी भाव – निर्वेद
आश्रय – कवि तुलसीदास।
आलम्बन विभाव – दुनिया की नश्वारता का ज्ञान।
उद्दीपन विभाव – शास्त्रों का ज्ञान, साधु संगीत आदि।
अनुभाव – रोमांच आदि।
संचारी भाव – धैर्य, हर्ष, विबोध एवं मति आदि।

9. वीभत्स रस की परिभाषा (Vibhats Ras ki Paribhasha)

किसी व्यक्ति या वस्तु को देखकर ह्रदय में जो एक प्रकार की ग्लानि उत्पन्न होती है, उसे ‘जुगुप्सा’ (घृणा) कहते हैं। अतः ‘जुगुप्सा’ नामक स्थायी भाव जब विभाव, अनुभाव और संचारी भाव के सहयोग से रस रूप में परिणत होता है, तो ‘वीभत्स रस’ कहलाता है। उदाहरण –
कौऊ अंतड़िनि की पहिरिं माल इतरात् दिखावत।
कौऊ चर्बी लैं चोप सहित निज् अंगनि लावत।।

स्पष्टीकरण – इस उदाहरण में वीभत्स रस है।
स्थायी भाव – जुगुप्सा
आलम्बन विभाव – श्मशान का दृश्य
उद्दीपन विभाव – अंतड़ी की माला पहनकर इतराना।
संचारी भाव – दैन्य, ग्लानि व निर्वेद आदि।
अतः इन सबसे पुष्ट होकर जुगुप्सा स्थायी भाव वीभत्स रस की दशा को प्राप्त हुआ है।

10. वात्सल्य रस की परिभाषा (Vatsalya Ras ki Paribhasha)

माता-पिता का अपनी संतान के प्रति जो प्रेम व स्नेह का भाव जागृत होता है, उसे ‘वत्सल्य’ (वात्सल्य) कहते हैं। यही ‘वत्सल्य’ नामक स्थायी भाव जब विभाव, अनुभाव एवं संचारी भाव के सहयोग से रस रूप में परिणत होता है, तो उसे ‘वात्सल्य रस’ कहते हैं। उदाहरण –
श्याम गौर सुंदर दौऊ जोरीं।
निरखति छविं जननी तृन् तोरीं।।

स्पष्टीकरण – इस उदाहरण में बन्धु सहित श्रीराम के बचपन का वर्णन है।
स्थायी भाव – वत्सल्य (अथवा वात्सल्य)
आश्रय – माताएं
आलम्बन विभाव – श्रीराम तथा बन्धु आदि।
उद्दीपन विभाव – श्याम-सुन्दर रूप, किलकना आदि।
अनुभाव – पुत्र-पुत्रियों को बार-बार देखना, दुलारना आदि।
संचारी भाव – हर्ष, गर्व तथा औत्सुक्य आदि।

11. भक्ति रस की परिभाषा (Bhakti Ras ki Paribhasha)

जब भक्तों के हृदय में ईश्वर के प्रति भक्ति प्रेम या ‘अनुराग’ (भगवत् विषयक रति) भाव उत्पन्न होता है। अतः यही ‘अनुराग’ नामक स्थायी भाव का जब विभाव, अनुभाव और संचारी भावों से सहयोग होता है, तो वहां ‘भक्ति रस’ की उत्पत्ति होती है। उदाहरण –
ईश्वर मेरे अवगुण चित् न धरो।
समदर्शी ईश्वर नाम तिहारों सोई पार करो।।

स्पष्टीकरण – इस उदाहरण में भक्ति रस की निष्पत्ति होती है।
स्थायी भाव – अनुराग (भगवत् रति)
आश्रय – भक्ति
आलम्बन विभाव – कृष्ण भक्ति
उद्दीपन विभाव – ईश्वर, प्रभु का चित्रण आदि ।
संचारी भाव – हर्ष, निर्वेद आदि।

FAQs

1. रस क्या है परिभाषा लिखिए?

काव्य के पढ़ने या नाटक को देखने से पाठक या दर्शक को जो आनंद आता है, उसे ही ‘ रस ‘ कहते हैं। रस को काव्य की आत्मा माना जाता है।

2. रस क्या है रस के प्रकार?

प्राचीन भारतीय आचार्यों ने नौ 9 रस माने हैं उसी के आधार पर नौ 9 स्थायी भाव माने जाते हैं। परन्तु बाद के आचार्यों ने दो और रसों की चर्चा की है – वात्सल्य रस व भक्ति रस । अर्थात् वर्तमान समय में रसों की संख्या ग्यारह 11 हो गई है।

3. रस कितने होते हैं?

रसों की संख्या 11 मानी जाती है।

4. रस का उदाहरण क्या है?

रस के उदाहरण के संबंध में भरतमुनि के अनुसार, विभाव, अनुभाव एवं संचारी भावों के संयोग से रस की निष्पत्ति होती है।

5. हिंदी में रस के कितने अंग होते हैं?

रस के चार 4 अंग होते हैं –
1. स्थायी भाव
2. विभाव
3. अनुभाव
4. संचारी अथवा व्यभिचारी भाव ।

निष्कर्ष – हमें उम्मीद है कि रस की परिभाषा एवं रस के प्रकार उदाहरण सहित। यह आर्टिकल आपको पसन्द आया होगा तो इसे अपने दोस्तों में भेजें और यदि कोई सवाल या क्योरी हो, तो आप हमें कमेंट्स कर के बताएं हम जल्द ही उसका हल प्राप्त कर देंगे।

रस के प्रकार, रस के अंग, भरतमुनि के अनुसार रस की परिभाषा, वीर रस, करुण रस, हास्य रस, श्रृंगार रस, शांत रस, रौद्र रस, वीभत्स रस, भयानक रस, वात्सल्य रस, भक्ति रस, अद्भुत रस, रस की परिभाषा

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