रैले जीन्स का नियम क्या है, पराबैंगनी स्पेक्ट्रम को लिखिए | Rayleigh Jean’s Law in Hindi

रैले जीन्स का नियम

सन् 1900 में वैज्ञानिक रैले एवं जीन्स ने कृष्णिका स्पेक्ट्रम में ऊर्जा वितरण को समझाने के लिए एक सूत्र की स्थापना की जिसे ” रैले-जीन्स का नियम (Rayleigh-Jean’s Law in Hindi)” कहते हैं। अर्थात् इस नियम के अनुसार, “कृष्णिका विकिरण स्पेक्ट्रम में तरंगदैर्ध्य परास λ व λ + dλ में प्रति एकांक आयतन ऊर्जा अर्थात् ऊर्जा घनत्व में स्पेक्ट्रमी उत्सर्जन क्षमता को प्राप्त किया जा सकता है।” अतः
uλdλ = \frac{8πkT}{λ^4}
यहां k एक बोल्ट्जमैन नियतांक तथा T परम ताप है।
यदि तरंगदैर्ध्य परास λ व λ + dλ में स्पेक्ट्रमी उत्सर्जन क्षमता
Eλdλ = \frac{c}{4} uλ
अतः uλdλ का मान रखने पर,
Eλdλ = \frac{c}{4} × \frac{8πkT}{λ^4}
अर्थात्
Eλdλ = \frac{2πckT}{λ^4}

और पढ़े… वीन का विस्थापन नियम क्या है? ऊष्मागतिकी के द्वारा निगमन कीजिए। (Wien’s Displacement Law in Hindi)

रैले जीन्स के नियम का निगमन

रैले एवं जीन्स ने यह माना कि किसी कृष्णिका कोष्ठ में विकिरण O से ∞ तक सभी सम्भव तरंगदैर्ध्यों की विद्युत-चुम्बकीय तरंगों के रूप में होते हैं। यह तरंगे कृष्णिका की दीवारों से बार-बार परावर्तित होती है। तथा परावर्तित तरंगों एवं संगत आपतित तरंगों के अध्यारोपण के फलस्वरूप अप्रगामी तरंगें बनती रहती हैं। तथा तरंगदैर्ध्य परास λ व λ + dλ ….. की संख्या की गणना की तथा ऊर्जा के समविभाजन के नियम द्वारा प्रत्येक कम्पन्न विधा के संगत ऊर्जा प्राप्त की। इस प्रकार, कृष्णिका विकिरण के स्पेक्ट्रम में ऊर्जा वितरण के लिए एक सूत्र प्राप्त किया।
यदि तरंगदैर्ध्य परास λ व λ + dλ में प्रति एकांक आयतन कम्पनों के विधाओं की संख्या
Nλdλ = \frac{8π}{λ^4} dλ ….(1)
प्रत्येक कम्पन्न विधा के संगत औसत ऊर्जा
\overline{ε} = kT ….(2)
अतः तरंगदैर्ध्य परास λ व λ + dλ में ऊर्जा घनत्व
uλdλ = Nλdλ × \overline{ε} ….(3)
समीकरण (1) व (2) के मान समीकरण (3) में रखने पर,
uλdλ = \frac{8π}{λ^4} dλ × kT
अर्थात्
\footnotesize \boxed{ u_λdλ = \frac{8πkT}{λ^4} dλ }
यही व्यंजक ” रैले जीन्स ” के ” विकिरण सूत्र ” को व्यक्त करता है।

वीन एवं रैले जीन्स के नियमों की विफलता

वीन का नियम कृष्णिका स्पेक्ट्रम के केवल लघु तरंगदैर्ध्य वाले भाग में ऊर्जा वितरण करने में सफल रहता है, जबकि दीर्घ तरंगदैर्ध्य वाले भाग में ऊर्जा वितरण की व्याख्या करने में असफल रहता है।
रैले-जीन्स का नियम कृष्णिका स्पेक्ट्रम के केवल दीर्घ तरंगदैर्ध्य वाले भाग में ऊर्जा वितरण की व्याख्या करने में सफल रहता है, जबकि लघु तरंगदैर्ध्य वाले भाग में ऊर्जा वितरण की व्याख्या करने में असफल रहता है। इस प्रकार, वीन के नियम एवं रैले-जीन्स के नियम में से कोई भी नियम सम्पूर्ण स्पेक्ट्रम में ऊर्जा-वितरण की व्याख्या करने में असफल रहता है।

प्लांक ने क्वाण्टम सिद्धान्त के आधार पर एक सूत्र का प्रतिपादन किया। जिससे कृष्णिका स्पेक्ट्रम के सम्पूर्ण भाग में ऊर्जा वितरण की व्याख्या की जा सकती है।

पराबैगनी संकट (vltraviolet catastrophe in Hindi)

कृष्णिका विकिरण स्पेक्ट्रम में लघु तरंगदैर्ध्यों की और जाने पर प्रायोगिक वक्रों में Eλ का मान पहले बढ़कर शिखर मान प्राप्त करता है। तथा फिर Eλ का मान कम होता जाता है। जैसा कि चित्र में दिखाया गया है।

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पराबैंगनी स्पेक्ट्रम
पराबैंगनी स्पेक्ट्रम

लेकिन रैले-जीन्स के सूत्र से λ का मान कम होने पर Eλ का मान लगातार बढ़ता है। अतः रैले-जीन्स सूत्र के अनुसार, स्पेक्ट्रम के पराबैंगनी क्षेत्र (लघु तरंगदैर्ध्य) की ओर जाने पर उत्सर्जित ऊर्जा बहुत तेजी से बढ़नी चाहिए, जो कि प्रायोगिक निष्कर्षों के एकदम विपरीत है। अर्थात् रैले-जीन्स सूत्र से प्राप्त यह निष्कर्ष “पराबैंगनी संकट” कहलाता है।

Note – रैले-जीन्स के नियम से सम्बन्धित प्रशन –
Q. 1 रैले जीन्स का नियम लिखिए तथा इसका निगमन कीजिए ?
Q. 2 वीन एवं रैले जीन्स के नियमों की विफलता की विवेचना कीजिए ?
Q. 3 वीन तथा रैले-जीन्स के नियमों की विफलता क्या है ? इसकी व्याख्या कीजिए तथा पराबैंगनी संकट को समझाइए ।
Q. 4 पराबैंगनी संकट से आप क्या समझते हैं ? इसका रैले-जीन्स के प्रयोग में क्या प्रभाव पड़ता है सिद्ध कीजिए ।

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