आरसी युग्मित ट्रांजिस्टर एम्पलीफायर: परिभाषा, कार्यविधि, आवृत्ति परिसर लाभ व प्रवर्धन।

इसे भी पढ़ें… ट्रांजिस्टर की परिभाषा, प्रकार, कार्यविधि, चित्र, उपयोग व अन्तर समझाइए।

हेलों दोस्तों, इस आर्टिकल में हमने ‘आरसी युग्मित ट्रांजिस्टर एम्पलीफायर’ (RC Coupled Transistor Amplifier in Hindi) के बारे में समझाया है, इसमें हमने आरसी युग्मित ट्रांजिस्टर एम्पलीफायर की परिभाषा, कार्यविधि, आवृत्ति परिसर, आवृत्ति अनुक्रिया वक्र, लाभ व प्रवर्धन प्रक्रिया को विस्तार से सरल भाषा में समझाया है। और इसकी अवधारणा का भी उल्लेख किया गया है, तो आप इस अध्याय को पूरा जरूर पढ़ें।

आरसी युग्मित ट्रांजिस्टर एम्पलीफायर क्या है

एक आरसी युग्मित ट्रांजिस्टर एम्पलीफायर एक प्रकार का मल्टी-स्टेज एम्पलीफायर सर्किट है जो इलेक्ट्रॉनिक सर्किट में रेजिस्टेंस (R) और कैपेसिटर (C) का उपयोग या प्रवर्धन के विभिन्न चरणों को एक साथ जोड़ने के लिए करता है। यह इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों, जैसे- रेडियों, एम्पलीफायरों और ऑडियों आदि। सिस्टम में ऑडियों संकेतों को बढ़ाने के लिए आमतौर पर इस्तेमाल किया जाने वाला कॉन्फ़िगरेशन है। इसमें द्वि-स्टेजें होती हैं –

  • ट्रांजिस्टर एम्पलीफायर स्टेज तथा
  • Rc युग्मन एम्पलीफायर स्टेज।

जैसा कि चित्र-1 में द्वि-स्टेजी RC युग्मित ट्रांजिस्टर एम्पलीफायर दिखाया गया है।

और पढ़ें… दो-स्टेजी RC युग्मित प्रवर्धक खींचकर मध्य आवृत्ति परिसर के वोल्टेज प्रवर्धन का व्यंजक ज्ञात कीजिए।

आरसी युग्मित ट्रांजिस्टर एम्पलीफायर
चित्र-1 आरसी युग्मित ट्रांजिस्टर एम्पलीफायर

इसके एक स्टेज में प्रतिरोध R पर उत्पन्न वोल्टता, आगामी स्टेज में एक संधारित्र C के द्वारा युग्मित की जाती है। अतः इस प्रकार के प्रवर्धकों को प्रतिरोध-संधारित्र (R-C) अथवा ‘आरसी युग्मित ट्रांजिस्टर एम्पलीफायर’ कहते हैं। चित्र में लोड प्रतिरोध Rc का उपयोग अच्छी प्रतिबाधा की भांति और युग्मन संधारित्र Cc का उपयोग प्रवर्धक के दोनों स्टेजों के मध्य युग्मन की भांति होता है।

आरसी युग्मित ट्रांजिस्टर एम्पलीफायर की कार्यविधि

जब पहले ट्रांजिस्टर के आधार पर AC सिग्नल लगाया जाता है तो यह प्रवर्धित होकर लोड प्रतिरोध Rc पर उत्पन्न होता है। यह प्रवर्धित वोल्टता अपनी स्टेज के आधार पर युग्मन संधारित्र Cc द्वारा लगाई जाती है। जहां ये पुनः प्रवर्धित होकर द्वितीय स्टेज के लोड प्रतिरोध Rc पर उत्पन्न होता है। इस प्रकार, सिग्नल स्टेजों से निरन्तर प्रवर्धित होता है और कुछ लाभ इच्छित स्तर तक बढ़ा लिया जाता है।

और पढ़ें… हाइब्रिड समतुल्य परिपथ का ट्रांजिस्टर माॅडल क्या है?

नोट – अब हम निम्न, मध्य और उच्च आवृत्ति परिसरों में h-प्राचल तुल्य परिपथ की सहायता से इन तीनों आवृत्ति परिसरों को विस्तार से सरल भाषा में समझते हैं।

h-प्राचल समतुल्य परिपथ

परिपथ में R-C आरसी युग्मित ट्रांजिस्टर एम्पलीफायर का एक-स्टेज के लिए तुल्य परिपथ दर्शाया गया है। अतः इस हाइब्रिड h-प्राचल तुल्य परिपथ को सरल करने के लिए हम यह मान लेते हैं कि –

  • चूंकि hre कम है अतः वोल्टेज स्रोत hreVce नगण्य लिया जा सकता है।
  • चूंकि 1/hoe बड़ा है अतः इसे खुला परिपथ मान सकते हैं।
  • यदि किसी दी गई निवेशी आवृत्ति के लिए युग्मन संधारित्र Cc का प्रतिघात इतना काम होता है कि Rc और Cc का समान्तर संयोग लघुपथित मान लिया जाता है। चित्र में देखें।
आरसी युग्मित ट्रांजिस्टर एम्पलीफायर

उपरोक्त की सहायता से चित्र में प्रदर्शित सरलीकरण तुल्य परिपथ प्राप्त होता है।

और पढ़ें… ट्रांजिस्टर लोड लाइन विश्लेषण क्या है?, DC लोड रेखा खींचकर Q-बिंदु समझाइए।

1. निम्न आवृत्ति परिसर का व्यंजक

निम्न आवृत्तियों पर युग्मन संधारित्र Cc की प्रतिबाधा लोड प्रतिरोध Rc के क्रम में होती है जिससे इसे तुल्य परिपथ में शामिल किया गया है, जबकि शण्ट संधारित्र की प्रतिबाधा इतनी अधिक होती है कि इसे खुला परिपथ मान लिया गया है। चित्र-3(a) में निम्न आवृत्ति परिसर में धारा स्त्रोत के साथ तुल्य परिपथ दिखाया गया है।

निम्न आवृत्ति परिसर

अथवा चित्र-3(b) में वोल्टता स्त्रोत के साथ तुल्य परिपथ दिखाया गया है। यहां I2 का मान है।
I2 = \frac{- h_{fe}I_1.R_c}{R_c + \frac{R_bh_{ie}}{R_b + h_{ie}} - \frac{1}{ωC_c}}

या I2 = \frac{- h_{fe}I_1.R_c}{R_c + \frac{R_bh_{ie}}{R_b + h_{ie}} - \frac{1}{ωC_c}} × ( \frac{R_b}{R_b × h_{ie}} )

इस प्रकार, (Ai)low = \frac{I_2}{I_1} तब
(Ai)low = \frac{- h_{fe}.R_cR_b}{R_cR_b + R_ch_{ie} + R_bh_{ie} - j(ωC_ch_{ie}.R_b)}
अर्थात् हम देखते हैं कि – (Ai)low = \frac{(A_i)_{mid}}{1 - j(\frac{f_1}{f})}

यहां f1 = \frac{R_b + h_{ie}}{2πC_c[R_cR_b + h_{ie}(R_c + R_b)] }

अतः f1 को निम्न संस्तब्ध आवृत्ति कहते हैं। यदि f = f1 हो, तो
(Ai)low = \frac{(A_i)_{mid}}{\sqrt{2}} = 0.70(Ai)mid

और पढ़ें… ट्रांजिस्टर बायसिंग: परिभाषा, प्रकार, विधियां, चित्र एवं लाभ व हानियां लिखिए?

2. मध्य आवृत्ति परिसर का व्यंजक

मध्य आवृत्तियों पर युग्मन संधारित्र Cc की प्रतिबाधा इतनी कम होती है कि इसे लघुपथित ले सकते हैं जबकि शण्ट संधारित्र का प्रतिघात इतना अधिक होता है कि इसे खुला परिपथ मान सकते हैं। जैसा कि चित्र-4 में मध्य आवृत्ति परिसर में तुल्य परिपथ दिखाया गया है।

मध्य आवृत्ति परिसर

अब I2 = \frac{- h_{fe}I_1.\frac{R_cR_b}{R_c + R_b}}{h_{ie} + \frac{R_c + R_b}{R_c + R_b}}
या I2 = \frac{- h_{fe}I_1.(R_cR_b)}{h_{ie}(R_c + R_b) + R_cR_b}
अतः (Ai)mid = \frac{I_2}{I_1} = \frac{- h_{fe}.R_cR_b}{h_{ie}(R_cR_b) + R_cR_b}

तथा (Av)mid = \frac{V_{out}}{V_{in}} = \frac{- h_{fe}I_1.R_cR_b × h_{ie}}{ {h_{ie}(R_c + R_b) + R_cR_b} × h_{ie}I_1 }
या (Av)mid = \frac{- h_{fe}.R_cR_b}{h_{ie}(R_c + R_b) + R_cR_b}
इस प्रकार, (Ai)mid = (Av)mid

3. उच्च आवृत्ति परिसर का व्यंजक

उच्च आवृत्तियों पर युग्मन संधारित्र Cc की प्रतिबाधा इतनी कम होती है कि इसे लघुपथित ले सकते हैं, जबकि C0 की इतनी अधिक नहीं होती है कि इसे खुला परिपथ ले सकें। जैसा कि चित्र-5(a) में उच्च आवृत्ति परिसर में तुल्य परिपथ धारा स्त्रोत के साथ दिखाया गया है।

उच्च आवृत्ति परिसर

अथवा चित्र-5(b) में वोल्टता स्त्रोत के साथ तुल्य परिपथ दर्शाया गया है। यदि I2 का मान है।
I2 = \frac{- h_{fe}I_1.\frac{R_cR_b}{R_c + R_b}}{[\frac{R_cR_b}{R_c + R_b} + \frac{h_{ie}(\frac{1}{jωC_c})}{h_{ie}} + (\frac{1}{jωC_c})]}

या I2 = \frac{- h_{fe}I_1.\frac{R_cR_b}{R_c + R_b}}{[\frac{R_cR_b}{R_c + R_b} + \frac{h_{ie}(\frac{1}{jωC_c})}{h_{ie}} + (\frac{1}{jωC_c})]} × \frac{( \frac{1}{jωC_c})}{h_{ie} + ( \frac{1}{jωC_c})}

या I2 = \frac{- h_{ie}I_1.R_cR_b}{R_cR_b + h_{ie}(R_c + R_b) + jωC_ch_{ie}.R_cR_b}

इस प्रकार, (Ai)high = \frac{I_2}{I_1} तब
(Ai)high = \frac{- h_{ie}.R_cR_b}{R_cR_b + h_{ie}(R_c + R_b) + jωC_ch_{ie}.R_cR_b}

अर्थात् हम देखते हैं कि – (Ai)high = \frac{(A_i)_{mid}}{1 + j(\frac{f}{f_2})}

यहां f2 = \frac{R_cR_b + h_{ie}(R_c + R_b)}{2πC_ch_{ie}R_cR_b)}

अतः f2 को उच्च संस्तब्ध आवृत्ति कहते हैं। यदि f = f2 हो, तो
(Ai)high = \frac{(A_i)_{mid}}{\sqrt{2}} = 0.707(Ai)mid

आरसी युग्मित ट्रांजिस्टर एम्पलीफायर आवृत्ति अनुक्रिया वक्र की व्याख्या

किसी एम्पलीफायर के लाभ की आवृत्ति के साथ परिवर्तन को RC युग्मित ट्रांजिस्टर एम्पलीफायर का ‘आवृत्ति अनुक्रिया वक्र’ कहलाता है जिसे चित्र-6 में दिखाया गया है।

आरसी युग्मित ट्रांजिस्टर एम्पलीफायर आवृत्ति अनुक्रिया वक्र

चित्र के अनुसार, इसे तीन क्षेत्रों में बांट सकते हैं। इसमें वोल्टता लाभ का मान काफी बड़े आवृत्ति परिसर (मध्य आवृत्ति परिसर) के लिए लगभग नियत है और निम्न आवृत्तियों (< 50 हर्ट्ज) उच्च आवृत्तियों (> 20 kHz) पर घटता है इसकी व्याख्या हम इस प्रकार कर सकते हैं।

(i). निम्न आवृत्तियों परिसरों पर – निम्न आवृत्तियों पर (< 50 हर्ट्ज) आवृत्ति घटने के साथ वोल्टता लाभ युग्मन संधारित्र Cc के कारण घटता है, जैसे-जैसे आवृत्ति घटती है। युग्मन संधारित्र का प्रतिघात ( \frac{1}{ωC_c} ) बढ़ता है इसके फलस्वरूप Cc पर वोल्टता लाभ का भाग बढ़ता जाता है। इस प्रकार, एक-स्टेज से दूसरे-स्टेज में पहुंचने वाली वोल्टता का मान घटता है और इसलिए वोल्टता लाभ कम होता जाता है।

(ii). मध्य आवृत्तियों परिसरों पर – मध्य आवृत्ति परिसर में (50 हर्ट्ज से 200 kHz तक) प्रवर्धक का वोल्टता लाभ का मान समान है क्योंकि प्रतिरोधों के मान आवृत्ति परिवर्तनों पर आश्रित नहीं हैं। इस प्रकार, परिसर में आवृत्ति बढ़ने के साथ ही युग्मन संधारित्र का प्रतिघात घटता है जिससे लाभ तो बढ़ता है। परंतु साथ ही पहली-स्टेज पर लोड प्रतिरोध का मान बढ़ जाता है जिससे लाभ घट जाता है। यह दोनों कारण एक-दूसरे के प्रभाव को लगभग समाप्त कर देते हैं, जिससे मध्य आवृत्तियों पर लाभ नियत रहता है।

(iii). उच्च आवृत्तियों परिसरों पर – उच्च आवृत्ति परिसर में (> 20 kHz) वोल्टता लाभ उन संधारित्रों के कारण कम होता है जो निर्गत पर शण्ट प्रतिघात में प्रकट होते हैं। इसमें प्रतिरोध-संधारित्र और अन्य भी शामिल है। अतः आवृत्ति बढ़ने के साथ इन संधारित्रों का प्रतिघात घटता है और निर्गत का बढ़ा हुआ अंश पृथ्वी में उपमार्गी हो जाता है। इसके फलस्वरूप प्रवर्धक की निर्गत वोल्टता घटती है और इसलिए उच्च आवृत्तियों पर वोल्टता लाभ घटता है।

आरसी युग्मित ट्रांजिस्टर एम्पलीफायर की मूल अवधारणा

आरसी-युग्मित ट्रांजिस्टर एम्पलीफायर की अवधारणा में एक प्रवर्धन चरण के आउटपुट को अगले चरण के इनपुट में जोड़ने के लिए कैपेसिटर और प्रतिरोधकों के संयोजन का उपयोग करना शामिल है। कैपेसिटर DC घटक को ब्लॉक करते समय सिग्नल के AC घटक को गुजरने की अनुमति देते हैं, यह सुनिश्चित करते हुए कि निम्नलिखित चरणों की बायसिंग स्थिति बनी रहती है।

आरसी युग्मित ट्रांजिस्टर एम्पलीफायर के लाभ

इसकी आवृत्ति अनुक्रिया सर्वोत्तम होती है। इसका परिपथ अत्यंत सूक्ष्म है क्योंकि प्रतिरोध R और संधारित्र C बहुत छोटे और हल्के होते हैं। इसमें कम लागत और उच्च वोल्टेज लाभ प्रदान करने की क्षमता होती है, हालांकि आमतौर पर युग्मन नेटवर्क में उपयोग किए जाने वाले कैपेसिटर की अंत निर्हित सीमाओं के कारण आवृत्ति प्रतिक्रिया के संदर्भ में सीमित होते हैं। इन सीमाओं को दूर करने के लिए अतिरिक्त युग्मन तकनीक जैसे ट्रांसफार्मर कपलिंग या डायरेक्ट कपलिंग को कुछ एम्पलीफायर डिजाइनों में नियोजित किया जा सकता है।

आरसी युग्मित ट्रांजिस्टर एम्पलीफायर में प्रवर्धन प्रक्रिया

आरसी-युग्मित ट्रांजिस्टर एम्पलीफायर प्रवर्धन प्रक्रिया में इनपुट सिग्नल को बढ़ाने के लिए एक या अधिक ट्रांजिस्टर का उपयोग करना शामिल है। इनपुट चरण कमजोर इनपुट सिग्नल को बढ़ाता है, और बाद के चरण वांछित आउटपुट स्तर को प्राप्त करने के लिए सिग्नल को और बढ़ाते हैं। RC कपलिंग नेटवर्क का उपयोग प्रत्येक चरण के आउटपुट को अगले चरण के इनपुट से जोड़ने के लिए किया जाता है।

आरसी-युग्मित नेटवर्क में प्रतिरोधकों का उपयोग उचित पूर्वाग्रह की स्थिति प्रदान करने और ट्रांजिस्टर के DC ऑपरेटिंग पॉइंट्स को स्थिर करने के लिए किया जाता है। दूसरी ओर, कैपेसिटर, मौजूद किसी भी DC घटक को अवरुद्ध करते हुए प्रवर्धित AC सिग्नल को गुजरने की अनुमति देते हैं।

टिप्पणी – कुल मिलाकर, आरसी युग्मित ट्रांजिस्टर एम्पलीफायरों का व्यापक रूप से विभिन्न ऑडियो अनुप्रयोगों में व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है क्योंकि प्रवर्धन के विभिन्न चरणों के बीच उचित पूर्वाग्रह की स्थिति को बनाए रखते हुए संकेतों को प्रवर्धित करने में उनकी सादगी और प्रभावशीलता होती है।

Note – सम्बन्धित प्रशन परीक्षाओं में पूछें जाते हैं –
Q.1 द्वि-स्टेजी RC युग्मित ट्रांजिस्टर प्रवर्धक का परिपथ खींचिए। निम्न, मध्य और उच्च आवृत्ति परिसरों में h-प्राचल तुल्य परिपथ बनाइए इसकी आवृत्ति अनुक्रिया वक्र की व्याख्या कीजिए।
Q.2 आरसी युग्मित ट्रांजिस्टर एम्पलीफायर क्या है? इसकी कार्यविधि देते हुए परिपथ आरेख खींचिए। निम्न, मध्यम और उच्च आवृत्ति परिसरों में क्या संबंध है तथा इसका आवृत्ति अनुक्रिया वक्र, लाभ और प्रवर्धन प्रक्रिया को समझाइए।
Q.3 आरसी युग्मित ट्रांजिस्टर एम्पलीफायर का कौन-सा घटक कम आवृत्ति रेंज में लाभ के पतन के लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार हैं?

  1. यान्त्रिकी एवं तरंग गति नोट्स (Mechanics and Wave Motion)
  2. अणुगति एवं ऊष्मागतिकी नोट्स (Kinetic Theory and Thermodynamics)
  3. मौलिक परिपथ एवं आधारभूत इलेक्ट्रॉनिक्स नोट्स (Circuit Fundamental and Basic Electronics)
Share This Post

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *