पुनर्योजी शीतलन का सिद्धांत क्या है, लिण्डे का वायु द्रवित्र क्या है | Regenerative Cooling in Hindi

पुनर्योजी शीतलन का सिद्धांत

जूल-थॉमसन प्रभाव से स्पष्ट है कि जब किसी गैस को उसके व्युत्क्रमण ताप से कम ताप पर तथा उच्च दाब से निम्न दाब की ओर सरन्ध्र डाॅट में से होकर गुजारा जाता है, तो गैस में शीतलन प्रभाव उत्पन्न हो जाता है। तथा साधारणतः जूल-थॉमसन प्रभाव द्वारा गैस में उत्पन्न शीतलन का मान अधिक नहीं होता है। परंतु यदि उसी ताप पर जूल-थॉमसन प्रभाव की क्रिया अनेक बार दोहराई जाए, तो एक स्थिति ऐसी आ जाती है जब गैस इतनी अधिक शीतल हो जाती है कि साधारण दाब पर ही वह द्रवित हो जाती है। इस सिद्धांत को “पुनर्योजी शीतलन का सिद्धांत” (principal of regenerative cooling in Hindi) कहते हैं।

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लिण्डे का वायु द्रवित्र

सर्वप्रथम सन् 1895 ई. में जर्मनी के वैज्ञानिक ‘लिण्डे’ ने और इंग्लैंड के वैज्ञानिक ‘हैम्पसन’ ने पुनर्योजी शीतलन के सिद्धांत का उपयोग करके वायु को द्रवित किया था। इस प्रयोग को “लिण्डे का वायु द्रवित्र (Linde’s air liquefier in Hindi)” कहते हैं।

लिण्डे की कार्यविधि

इस विधि में पुनर्योजी शीतलन के सिद्धांत को उपर्युक्त चित्र में दिखाया गया है। अतः यह विधि पुनर्योजी शीतलन के सिद्धांत पर आधारित है।

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पुनर्योजी शीतलन
पुनर्योजी शीतलन

इसमें एक पम्प P लगा होता है जो गैस को संपीडित करके सर्पिल नली M में भेजते हैं जो शीतलन चैम्बर में रखी होती है। तथा सर्पिल नली M में से गुजरने पर दाब के कारण उत्पन ऊष्मा गैस में से निकल जाती है। तब यदि गैस को दोहरी दीवार वाले पाइप N की बीच वाली नली से प्रवाहित करते हैं। जिसके नीचे एक घनत्व वाल्व O (अथवा सरन्ध्र डाॅट या चंचु) लगा होता है। यदि जब गैस इस वाल्व से गुजरती है, तो जूल-थॉमसन प्रभाव से ठंडी हो जाती है यह ठंडी गैस पाइप N में होकर बीच वाली नली से आने वाली गैस को ठंडा करते हुए पुनः पम्प P में पहुंच जाती है। और पुनः यह चक्र आरंभ हो जाता है। तथा प्रत्येक चक्र में गैस के ताप में क्षति होती जाती है। अतः जब गैस अपने क्वथनांक से निम्न ताप तक शीतल हो जाती है, तो यह द्रवित हो जाती है। जिसे डेवार फ्लेक्स Q में एकत्रित कर लेते हैं।

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Note – सोपानी शीतलन विधि के सिद्धांत को समझाइए?

सोपानी शीतलन का सिद्धांत क्या है

सोपानी शीतलन विधि के द्वारा आवश्यक शीतलन को कई चरणों में प्राप्त किया जाता है। इस विधि में कुछ गैसों को क्रमिक रूप से संपीडन मशीनों के द्वारा संपीडित कराकर द्रवों में बदला जाता है। इन द्रवों के क्वथनांक घटते हुए क्रम में होते हैं। अन्त में प्रायोगिक गैस को अन्तिम द्रव में से गुजार कर उसका ताप उसके क्रांतिक ताप से कम कर दिया जाता है। फिर प्रायोगिक गैस पर दाब बढ़ाकर (या उसका रुद्धोष्म प्रसार करके) उसे ठण्डा करके द्रवित कर लिया जाता है। तो इस सिद्धांत को “सोपानी शीतलन का सिद्धांत” (principle of cascade cooling in Hindi) कहते है।

सोपानी शीतलन के लाभ

सोपानी शीतलन विधि का मुख्य लाभ यह है कि यह विधि अन्य विधियों की अपेक्षा कम खर्चीली होती है। तथा इसका उपयोग मुख्यतः वायु, नाइट्रोजन तथा ऑक्सीजन के द्रवण के लिए किया जाता है।

सीमाएं

चूंकि यह ऑक्सीजन के निम्न दाब पर वाष्पन से -218°C से कम ताप तक उत्पन्न नहीं किया जा सकता है। अतः इस विधि द्वारा Ne, H2 तथा He गैसों का द्रवण करना सम्भव नहीं होता है।

Note – सम्बन्धित प्रश्न –
Q.1 पुनर्योजी शीतलन का सिद्धांत क्या है ? लिण्डे के वायु द्रवित्र का सचित्र वर्णन कीजिए?
Q.2 पुनर्योजी शीतलन की विधि द्वारा लिण्डे के वायु द्रवित्र को स्पष्ट कीजिए?
Q.3 सोपानी शीतलन विधि का क्या सिद्धांत है ? इस विधि के लाभ तथा सीमाएं लिखिए?

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