संधि : परिभाषा, भेद, उदाहरण व संधि चार्ट | Sandhi in Hindi

इस लेख में हमनें हिंदी व्याकरण का एक महत्वपूर्ण टॉपिक ” संधि ” (Sandhi in Hindi) के बारे में विस्तार सहित जानकारी दी है। इसमें हमनें संधि की परिभाषा, भेद, उदाहरण व प्रकार और संधि-विच्छेद के बारे में सरल भाषा में विस्तार पूर्वक समझाया है, तो आप इस अध्याय को पूरा जरूर पढ़ें और संधि के नियमों के बारे में संपूर्ण जानकारी प्राप्त करें।

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संधि की परिभाषा (Sandhi ki Paribhasha)

संधि का शाब्दिक अर्थ है – ‘मेल’ अथवा ‘मिलना’। अर्थात् दो निकटवर्ती वर्णों के मेल से उनमें जो विकार (परिवर्तन) होता है, उसे ‘संधि (sandhi in hindi) कहते हैं।
इस प्रकार की संधि के लिए दोनों वर्णों का निकट होना आवश्यक है क्योंकि दूरवर्ती वर्णों या शब्दों में संधि नहीं होती है। वर्णों की इस निकट स्थिति को ही संधि कहा जाता है।

संक्षेप में कहें कि- “दो वर्णों के पास-पास आने से जो परिवर्तन (विकार) उत्पन्न होता है, उसे ‘संधि’ कहते हैं।

संधि के उदाहरण

हिम + आलयः = हिमालयः (अ + आ = आ)
विद्या + अर्थी = विद्यार्थी (आ + अ = आ)
सूर्य + उदयः = सूर्योदयः (अ + उ = ओ)
कवि + इन्द्रः = कवीइन्द्रः (इ+ इ = ई)
रमा + ईश = रमेश (आ + ई = ए)
विद्या + आलयः = विद्यालयः (आ + आ = आ)

इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि ‘हिम’ में म के ‘अ’ और ‘आलयः’ के ‘आ’ को मिलाने से ‘आ’ होकर ‘हिमालयः’ बनता है। इसी प्रकार, ‘सूर्य’ के ‘अ’ और ‘उदयः’ के ‘उ’ आपस में मिलने से ‘ओ’ होकर ‘सूर्योदयः’ बनता है।

संधि-विच्छेद (Sandhi Viched ki Paribhasha)

संधि का अर्थ है- ‘मेल’ या मिलना तथा विच्छेद का अर्थ है- ‘अलग होना’। अर्थात् दो वर्णों के मेल से बने नए शब्द को पुनः पहले की स्थिति में लाने की प्रक्रिया को ‘संधि-विच्छेद’ कहते हैं।

दूसरे शब्दों में, ‘संधि के अलग करने की प्रक्रिया को संधि-विच्छेद कहते हैं।’ संधि-विच्छेद के उदाहरण

  • देवालयः = देव + आलयः (अ + आ = आ)
  • वधूत्सवः = वधू + उत्सवः (ऊ + उ = ऊ)

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संधि के भेद

संधि के मुख्य रूप से तीन भेद होते हैं जो इस प्रकार है –

  1. स्वर संधि
  2. व्यंजन संधि
  3. विसर्ग संधि ।
Sandhi in Hindi
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1. स्वर संधि (Swar Sandhi ki Paribhasha)

दो स्वरों के मेल से जो परिवर्तन (विकार) होता है, उसे ‘स्वर संधि’ कहते हैं। हिंदी में कुल 11 स्वर होते हैं और 41 व्यंजन होते हैं। अर्थात् जहां दो स्वर वर्ण मिलकर एक नए रूप में बदल जाते हैं, तो वहां स्वर संधि होती है।

स्वर संधि के उदाहरण

सु + आगतम् = स्वागतम् (उ + आ = वा)
पुस्तक + आलयः = पुस्तकालयः (अ + आ = आ)
देव + इन्द्र = देवेन्द्र (अ + इ = ए)
सदा + एव = सदैव (आ + ए = ऐ)
पो + अन = पवन (ओ + अ = अव)

स्वर संधि के भेद

स्वर संधि के मुख्य रूप से पांच भेद होते हैं जो इस प्रकार है –
(1). दीर्घ संधि
(2). गुण संधि
(3). वृद्धि संधि
(4). यण संधि
(5). अयादि संधि ।

(1). दीर्घ संधि की परिभाषा

(सूत्र – अकः सवर्णे दीर्घः) अर्थात् यदि पहले वर्ण के अंत में ह्रस्व/दीर्घ अ, इ, उ, ऋ आए और दूसरे वर्ण के प्रारंभ में भी ह्रस्व/दीर्घ अ, इ, उ, ऋ एक समान स्वर आए, तो ये दोनों मिलकर क्रमशः आ, ई, ऊ, ऋ हो जाते हैं। अतः इसे ही ‘दीर्घ संधि’ अथवा ‘ह्रस्व संधि’ कहते हैं।

दीर्घ संधि के नियम

क्र.पहला वर्ण + दूसरा वर्णबनने वाला वर्ण
1.अ + अ
2.अ + आ
3.आ + आ
4.आ + अ
5.इ + इ
6.ई + ई
7.ई + इ
8.इ + ई
9.उ + उ
10.उ + ऊ
11.ऊ + उ
12.ऊ + ऊ
13.ऋ + ऋ

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दीर्घ संधि के उदाहरण

  • अ + अ = आ
  • धर्म + अन्ध = धर्मान्ध
  • दैत्य + अरि = दैत्यारि
  • राम + अवतार = रामावतार
  • शरण + अर्थी = शरणार्थी
  • अधिक + अधिक = अधिकाधिक
  • सूर्य + अस्त = सूर्यास्त
    ⇒ अ + आ = आ
  • तव + आकार = तवाकार
  • स्वर + आर्थी = स्वार्थी
  • पुस्तक + आलय = पुस्तकालय
  • भ्रष्ट + आचार = भ्रष्टाचार
  • हिम + आलय = हिमालय
  • देव + आलय = देवालय
    ⇒ आ + आ = आ
  • विद्या + आलय = विद्यालय
  • चिकित्सा + आलय = चिकित्सालय
  • महा + आत्मा = महात्मा
  • भाषा + आबद्ध = भाषाबद्ध
  • दया + आनन्द = दयानन्द
  • महा + आशय = महाशय
    ⇒ आ + अ = आ
  • परीक्षा + अर्थी = परीक्षार्थी
  • विद्या + अर्थी = विद्यार्थी
  • दीक्षा + अन्त = दीक्षान्त
  • कदा + अपि = कदापि
  • युवा + अवस्था = युवावस्था
  • तथा + अपि = तथापि
    ⇒ इ + इ = ई
  • कवि + इन्द्र = कवीन्द्र
  • गिरि + इन्द्र = गिरीन्द्र
  • अभि + इष्ट = अभीष्ट
  • हरि + इच्छा = हरीच्छा
  • रवि + इन्द्र = रवीन्द्र
  • अति + इव = अतीव
    ⇒ ई + ई = ई
  • सती + ईश = सतीश
  • नारी + ईश्वर = नारीश्वर
  • रजनी + ईश = रजनीश
  • हरी + ईश = हरीश
  • मुनी + ईश्वर = मुनीश्वर
  • योगी + ईश्वर = योगीश्वर
    ⇒ ई + इ = ई
  • सुधी+ इन्द्र = सुधीन्द्र
  • शची + इन्द्र = शचीन्द्र
  • महती + इच्छा = महतीच्छा
  • मही + इन्द्र = महीन्द्र
  • पृथ्वी + इच्छा = पृथ्वीच्छा
  • पत्नी + इच्छा = पत्नीच्छा
    ⇒ इ + ई = ई
  • कपि + ईश = कपीश
  • परि + ईक्षा = परीक्षा
  • गिरि + ईश = गिरीश
  • प्रति + ईक्षा = प्रतीक्षा
  • क्षिति + ईश = क्षितीश
  • अभि + ईप्सा = अभीप्सा
    ⇒ उ + उ = ऊ
  • भानु + उदय = भानूदय
  • साधु + उपदेश = साधूपदेश
  • लघु + उत्तम = लघूत्तम
  • गुरु + उपदेश = गुरूपदेश
  • लघु + उत्तर = लघूत्तर
  • भानु + उदर = भानूदर
    ⇒ उ + ऊ = ऊ
  • लघु + ऊर्मि = लघूर्मि
  • साधु + ऊर्जा = साधूर्जा
  • धातु + ऊष्मा = धातूष्मा
  • वधु + ऊर्जा = वधूर्जा
  • सिन्धु + ऊर्मि = सिन्धूर्मि
  • मंजु + ऊषा = मंजूषा
    ⇒ ऊ + उ = ऊ
  • वधू + उत्सव = वधूत्सव
  • भू + उत्तम = भूत्तम
  • स्वयंभू + उदय = स्वयंभूदय
  • वधू + उक्ति = वधूक्ति
  • भू + उपरि = भूपरि
  • वधू + उपकार = वधूपकार
    ⇒ ऊ + ऊ = ऊ
  • वधू + ऊह = वधूह
  • भ्रू + ऊर्ध्व = भ्रूर्ध्व
  • सरयू + ऊर्मि = सरयूर्मि
  • भू + ऊष्मा = भूष्मा
  • वधू + ऊर्मि = वधूर्मि
  • भू + ऊर्जा = भूर्जा
    ⇒ ऋ + ऋ = ॠ
  • मातृ + ऋणम = मातॄणम
  • पितृ + ऋणम = पितॄणम
  • होतृ + ऋकार = होतॄकार
  • कृ + ऋकार = कॄकार
  • मातृ + ऋण = मातॄण

(2). गुण संधि की परिभाषा

(सूत्र – आद् गुणः) अर्थात् यदि पहले वर्ण के अन्त में ह्रस्व/दीर्घ ‘अ’ और ‘आ’ आए, और दूसरे वर्ण के प्रारंभ में ह्रस्व/दीर्घ इ या ई, उ या ऊ और ऋ, लृ स्वर आए, तो ये दोनों मिलकर क्रमशः ए, ओ और अर्, अल् हो जाते हैं। अतः इसे ही ‘गुण संधि’ कहते हैं।

गुण संधि के नियम

क्र.पहला वर्ण + दूसरा वर्णबनने वाला वर्ण
1.अ + इ
2.अ + ई
3.आ + इ
4.आ + ई
5.इ + उ
6.अ + ऊ
7.आ + उ
8.आ + ऊ
9.अ + ऋअर्
10.आ + ऋअर्
11.अ + लृअल्
12.आ + लृअल्

गुण संधि के उदाहरण

  • ⇒ अ + इ = ए
  • देव + इन्द्र = देवेन्द्र
  • नर + इन्द्र = नरेन्द्र
  • स्व + इच्छा = स्वेच्छा
  • गज + इन्द्र = गजेन्द्र
  • सुर + इन्द्र = सुरेन्द्र
    ⇒ अ + ई = ए
  • गण + ईश = गणेश
  • नर + ईश = नरेश
  • परम + ईश्वर = परमेश्वर
  • राम + ईश्वर = रामेश्वर
  • सुर + ईश = सुरेश
    ⇒ आ + इ = ए
  • महा + इन्द्र = महेन्द्र
  • यधा + इष्ट = यधेष्ट
  • यथा + इष्ठ = यथेष्ठ
  • यथा + इच्छा = यथेच्छा
  • राजा + इन्द्र = राजेन्द्र
    ⇒ आ + ई = ए
  • रमा + ईश = रमेश
  • राका + ईश = राकेश
  • धरा + ईश = धरेश
  • लंका + ईश = लंकेश
  • महा + ईश्वर = महेश्वर
    ⇒ अ + उ = ओ
  • सूर्य + उदय = सूर्योदय
  • पर + उपकार = परोपकार
  • हित + उपदेश = हितोपदेश
  • ज्ञान + उदय = ज्ञानोदय
  • पुरुष + उत्तम = पुरुषोत्तम
    ⇒ अ + ऊ = ओ
  • नव + ऊढ़ = नवोढा
  • जल + ऊर्मि = जलोर्मि
  • समुद्र + ऊर्मि = समुद्रोर्मि
  • जल + ऊष्मा = जलोष्मा
  • उच्च + ऊर्ध्व = उच्चोर्ध्व
    ⇒ आ + उ = ओ
  • महा + उदय = महोदय
  • महा + उत्सव = महोत्सव
  • महा + उपदेश = महोपदेश
  • गंगा + उदक = गंगोदक
  • महा + उपकार = महोपकार
    ⇒ आ + ऊ = ओ
  • महा + ऊर्मि = महोर्मि
  • महा + ऊर्जा = महोर्जा
  • गंगा + ऊर्मि = गंगोर्मि
  • दया + ऊर्मि = दयोर्मि
  • दया + ऊर्जा = दयोर्जा
    ⇒ अ + ऋ = अर्
  • ब्रह्म + ऋषि = ब्रह्मर्षि
  • देव + ऋषि = देवर्षि
  • सप्त + ऋषि = सप्तर्षि
  • वसन्त + ऋतु = वसन्तर्तु
  • शीत + ऋतु = शीतर्तु
    ⇒ आ + ऋ = अर्
  • महा + ऋषि = महर्षि
  • वर्षा + ऋतु = वर्षार्तु
  • राजा + ऋषि = राजर्षि
  • महा + ऋण = महर्ण
  • वर्षा + ऋण = वर्षार्ण
    ⇒ अ + लृ = अल्
  • तव + लृकार = तवल्कार
  • मम + लृकार = ममल्कार
  • पर + लृकार = परल्कार
  • गण + लृकार = गणल्कार
  • नव + लृकार = नवल्कार
    ⇒ आ + लृ = अल्
  • महा + लृकार = महल्कार
  • यथा + लृकार = यथल्कार
  • रामा + लृकार = रामल्कार
  • गंगा + लृकार = गंगल्कार
  • दया + लृकार = दयल्कार

(3). वृद्धि संधि की परिभाषा

(सूत्र – वृद्धिरेचि) अर्थात् यदि अ या आ के बाद ए या ऐ आए, तो दोनों के मेल से ‘ऐ’ हो जाता है। तथा अ और आ के पश्चात् ओ या औ आए, तो दोनों के मेल से ‘औ’ हो जाता है। अतः इसे ही ‘वृद्धि संधि’ कहते हैं।

वृद्धि संधि के नियम

क्र.पहला वर्ण + दूसरा वर्णबनने वाला वर्ण
1.अ + ए
2.आ + ए
3.अ + ऐ
4.आ + ऐ
5.अ + ओ
6.आ + ओ
7.अ + औ
8.आ + औ

वृद्धि संधि के उदाहरण

  • ⇒ अ + ए = ऐ
  • एक + एक = एकैक
  • अस्य + एव = अस्यैव
  • तव + एव = तवैव
  • तस्य + एव = तस्यैव
  • लोक + एषणा = लोकैषणा
    ⇒ आ + ए = ऐ
  • सदा + एव = सदैव
  • तदा + एव = तदैव
  • तथा + एव = तथैव
  • वधा + एव = वधैव
  • वसुधा + एव = वसुधैव
    ⇒ अ + ऐ = ऐ
  • देव + ऐश्वर्यम = = देवैश्वर्यम
  • मत + ऐक्यम = मतैक्यम
  • धन + ऐश्वर्य = धनैश्वर्य
  • मत + ऐक्य = मतैक्य
  • नव + ऐश्वर्य = नवैश्वर्य
    ⇒ आ + ऐ = ऐ
  • महा + ऐश्वर्यम = महैश्वर्यम
  • महा + ऐन्द्रजालिक = महैन्द्रजालिक
  • महा + ऐश्वर्य = महैश्वर्य
  • रमा + ऐश्वर्य = रमैश्वर्य
  • राजा + ऐश्वर्य = राजैश्वर्य
    ⇒ अ + ओ = औ
  • समय + ओचित्यम = समयौचित्यम
  • जल + ओध = जलौध
  • जल + ओक = जलौक
  • दंत + ओष्ठ = दंतौष्ठ
  • जल + ओज = जलौज
    ⇒ आ + ओ = औ
  • महा + ओज = महौज
  • महा + ओजस्वी = महौजस्वी
  • गंगा + ओक = गंगौक
  • यमुना + ओक = यमुनौक
  • महा + ओघ = महौघ
    ⇒ अ + औ = औ
  • वन + औषधि = वनौषधि
  • वन + औषध = वनौषध
  • परम + औदार्य = परमौदार्य
  • परम + औषध = परमौषध
  • ज्ञान + औषधि = ज्ञानौषधि
    ⇒ आ + औ = औ
  • महा + औषधि = महौषधि
  • महा + औषधालय = महौषधालय
  • महा + औषध = महौषध
  • महा + औत्सुक्य = महौत्सुक्य
  • महा + औदार्य = महौदार्य

(4). यण संधि की परिभाषा

(सूत्र – इकोयणचि) अर्थात् यदि इ, ई, उ, ऊ, ऋ और लृ के बाद कोई असमान स्वर आए, तो इ और ई का य, उ और ऊ का व, ऋ का र् तथा लृ का ल् हो जाता है। अतः इसे ही ‘यण संधि’ कहते हैं।

यण संधि के नियम

क्र.पहला वर्ण+ दूसरा वर्णबनने वाला वर्ण
1.इ + अ
2.इ + आया
3.इ + एये
4.इ + उयु
5.उ + अ
6.उ + आवा
7.उ + इवि
8.ऋ + आरा
9.लृ + आला

यण संधि के उदाहरण

संधि-विच्छेदशब्दसंधि-नियम
यदि + अपियद्यपिइ + अ = य
प्रति + अक्षप्रत्यक्षइ + अ = य
अति + अधिकअत्यधिकइ + अ = य
अधि + अक्षअध्यक्षइ + अ = य
अभि + अर्थीअभ्यर्थीइ + अ = य
अति + अल्पअत्यल्पइ + अ = य
इति + आदिइत्यादिइ + आ = या
अति + आवश्यकअत्यावश्यकइ + आ = या
प्रति + आरोपणप्रत्यारोपणइ + आ = या
अति + आचारअत्याचारइ + आ = या
दधि + आनयदध्यानयइ + आ = या
प्रति + एकप्रत्येकइ + ए = ये
इति + एवइत्येवइ + ए = ये
प्रभृति + एवप्रभृत्येवइ + ए = ये
प्रति + एकम्प्रत्येकम्इ + ए = ये
प्रति + उपकारप्रत्युपकारइ + उ = यु
प्रति + उत्तरमप्रत्युत्तरमइ + उ = यु
अति + उत्तमअत्युत्तमइ + उ = यु
उपरि + उक्तउपर्युक्तइ + उ = यु
इति + उक्तवाइत्युक्त्वाइ + उ = यु
अति + ऊष्माअत्यूष्माइ + ऊ = यू
देवी + अर्पण्देव्यर्पण्ई + अ = यू
देवी + आदेशदेव्यादेशई + आ = या
देवी + आज्ञादेव्याज्ञाई + आ = या
नारी + उपदेशनार्युपदेशई + उ = यु
सुधी + उपास्यसुध्युपास्यई + उ = यु
नदी + ऊर्मिनद्यूर्मिई + ऊ = यू
देवी + ऐश्वर्यदेव्यैश्वर्यई + ऐ = यै
देवी + ओजदेव्योजई + ओ = यो
मधु + अरिमध्वरिउ + अ = व
अनु + आयअन्वयउ + अ = व
मनु + अन्तरमन्वन्तरउ + अ = व
सु + आगतमस्वागतमउ + आ = वा
गुरु + आदेशगुर्वादेशउ + आ = वा
लघु + आकृतिलघ्वाकृतिउ + आ = वा
सु + आगतस्वागतउ + आ = वा
मधु + आलयमध्वालयउ + आ = वा
अनु + एषणअन्वेषणउ + ए = वे
अनु + एषणम्अन्वेषणम्उ + ए = वे
गुरु + औदार्यगुरुवौदार्यउ + औ = वौ
वधू + आगमनगुरुवौदार्यऊ + आ = वा
पितृ + अशपित्रंशऋ + अ = र
मातृ + आज्ञामात्राज्ञाऋ + आ = रा
पितृ + आदेशपित्रादेशऋ + आ = रा
पितृ + आकृतिपित्राकृतिऋ + आ = रा
पितृ + आज्ञापित्राज्ञाऋ + आ = रा
भ्रातृ + आदेशभ्रात्रादेशऋ + आ = रा
लृ + आकृतिलाकृतिलृ + आ = ला

(5). अयादि संधि की परिभाषा

(सूत्र – एचोऽयवायावः) अर्थात् यदि ए, ऐ, ओ और औ के बाद कोई भिन्न स्वर आए, तो उनके स्थान में क्रमशः ए का अय्, ऐ का आय्, ओ का अव् और औ का आव् हो जाता है। अतः इसे ही ‘अयादि संधि’ कहते हैं।

अयादि संधि के नियम

क्र.पहला वर्ण+ दूसरा वर्णबनने वाला वर्ण
1.ए + अअय
2.ऐ + अआय
3.ओ + अअव
4.औ + अआव
5.ए + इअयि
6.ऐ + इआयि
7.ओ + ईअवी
8.औ + इआवि
9.औ + उआवु
10.ओ + इअवि

अयादि संधि के उदाहरण

संधि-विच्छेदशब्दसंधि-नियम
ने + अनम्नयनम् ए + अ = अय
नै + अकनायकऐ + अ = आय
पो + अनपवनओ + अ = अव
पौ + अकपावकऔ + अ = आव
शे + अनम्शयनम्ए + अ = अय
भो + अनम्भवनम्ओ + अ = अव
नौ + इकनाविकऔ + इ = आवि
गै + अकगायकऐ + अ = आय
नै + इकानायिकाऐ + इ = आयि
भौ + उकभावुकऔ + उ = आवु
पो + इत्रपवित्रओ + इ = अवि
ने + अननयनए + अ = अय
भो + अनभवनओ + अ = अव
श्रो + अनश्रवणओ + अ = अव
पौ + अनपावनऔ + अ = आव
विनै + अकविनायकऐ + अ = आय
विजे + इनिविजयिनीए + इ = अयि
दै + इकादायिकाऐ + इ = आयि
भौ + अकभावकऔ + अ = आव
भो + इष्यभविष्यओ + इ = अवि
सौ + इकसाविकऔ + इ = आवि
चे + अनचयनए + अ = अय
शे + अनशयनए + अ = अय
गै + अनगायनऐ + अ = आय
विजे + ईविजयीए + ई = अयी
हो + अनहवनओ + अ = अव
रौ + अनरावणऔ + अ = आव
गो + ईशगवीशओ + ई = अवी
गो + एषणगवेषणओ + ए = वे

इसे भी पढ़ें… छंद : परिभाषा, भेद, प्रकार व उदाहरण, छंद हिंदी व्याकरण (Chhand in Hindi)

2. व्यंजन संधि (Vyanjan Sandhi ki Paribhasha)

किसी व्यंजन के साथ स्वर अथवा व्यंजन के मिलन को ‘व्यंजन संधि’ कहते हैं।
दूसरे शब्दों में, यदि व्यंजन के बाद किसी स्वर अथवा व्यंजन के आ जाने से उस व्यंजन में जो विकार (परिवर्तन) उत्पन्न होता है, तो वह ‘व्यंजन संधि’ कहलाता है।

व्यंजन संधि के उदाहरण

जगत् + नाथ = जगन्नाथ
उत् + ज्वल = उज्ज्वल
वाक् + ईश = वागीश
सत्यम् + वद = सत्यंवद
तत् + टीका = तट्टीका

नोट – व्यंजन संधि के उदाहरण (1) में “जगन्नाथ = जगत् + नाथ” । इसमें त् के न् में परिवर्तन के कारण यहां व्यंजन संधि है। अब व्यंजन संधि के नियमों के बारे में विस्तार से समझते हैं।

व्यंजन संधि के नियम

व्यंजन संधि के नियम निम्नलिखित हैं –
1. प्रथम वर्ण का तृतीय वर्ण में बदलना – यदि किसी वर्ग के प्रथम वर्ण (क् च् ट् त् प्) का मेल स्वर अथवा व्यंजन के किसी वर्ग के तृतीय वर्ण (ग, ज, ड, द, ब) या चतुर्थ वर्ण (घ, झ, ढ़, ध, भ) अथवा व्यंजन (य, र, ल, व) के किसी वर्ण से होने पर वर्ग का प्रथम वर्ण अपने ही वर्ग के तृतीय वर्ण (ग् ज् ड् द् ब्) में बदल जाता है। उदाहरण –

क् का ग् में बदलना

  • दिक् + गज = दिग्गज
  • दिक् + अंबर = दिगंबर
  • दिक् + अंत = दिगंत
  • वाक्+ ईश= वागीश
  • ऋक् + वेद = ऋग्वेद

च् का ज् में बदलना

  • अच् + अंत = अजंत
  • अच् + आदि = अजादि

ट् का ड् में बदलना

  • षट् + आनन = षडानन
  • षट् + रिपु = षड्रिपु
  • षट् + यंत्र = षड्यंत्र
  • षट् + अंग = षड्ंग
  • षट् + दर्शन = षड्दर्शन

प् का ब् में बदलना

  • अप् + धि = अब्धि
  • सुप् + अंत = सुबंत
  • अप् + ज = अब्ज
  • अप् + द = अब्द
  • अप् + जम् = अब्जम्

त् का द् में बदलना

  • सत् + भावना = सद्भावना
  • सत् + गुण = सद्गुण
  • उत् + योग = उद्योग
  • उत् + घाटन = उद्घाटन
  • तत् + उपरान्त = तदुपरान्त

2. प्रथम वर्ण का पांचवें वर्ण में बदलना – यदि किसी वर्ग के प्रथम वर्ण (क् च् ट् त् प्) का मेल अनुनासिक वर्ण (केवल न, म) से हो, तो उसके स्थान पर उसी वर्ग का पांचवां वर्ण (ड़् , ञ् , ण् , न् , म्) में बदल जाता है। उदाहरण –

क् का ड़् में बदलना

  • वाक् + मय = वाड़्मर
  • दिक् + मण्डल = दिड़्मण्डल
  • प्राक् + मुख = प्राड़्मुख
  • दिक् + नाग = दिड़्नाग

ट् का ण् में बदलना

  • षट् + मुख = षण्मुख
  • षट् + मूर्ति = षण्मूर्ति
  • षट् + मास = षण्मास

त् का न् में बदलना

  • उत् + मत्त = उन्मत्त
  • चित् + मय = चिन्मय
  • जगत् + नाथ = जगन्नाथ
  • उत् + नति = उन्नति

प् का म् में बदलना

  • अप् + मय = अम्मय

3. ‘छ’ का नियम – यदि छ से पहले ह्रस्व स्वर हो तो ‘छ’ से पहले ‘च’ आ जाता है। जैसे- कोई स्वर + छ = कोई स्वर + च् + छ
उदाहरण के लिए –

  • स्व + छंद = स्वच्छंद
  • अनु + छेद = अनुच्छेद
  • वि + छेद = विच्छेद
  • प्रति + छेद = प्रतिच्छेद
  • लक्ष्मी + छाया = लक्ष्मीच्छाया

4. ‘त्’ का नियम – यदि त् के बाद च/छ का→ च्, ज/झ का→ ज्, ट/ठ का→ ट्, ड/ढ का→ ड्, ल का→ ल् हो जाता है।

(क). यदि त् के बाद च/छ हो, तो त् के स्थान पर ‘च’ हो जाता है। उदाहरण –

  • उत् + चारण = उच्चारण
  • सत् + चरित्र = सच्चरित्र
  • जगत् + छाया = जगच्छाया

(ख). यदि त् के बाद ज/झ हो, तो त् के स्थान पर ‘ज’ हो जाता है। उदाहरण –

  • जगत् + जननी = जगज्जननी
  • उत् + ज्वल = उज्ज्वल
  • उत् + झटिका = उज्झटिका
  • महत् + झंकार = महज्झंकार

(ग). यदि त् के बाद ट/ठ और ड/ढ हो, तो त् के स्थान पर क्रमशः ‘ट्’ और ‘ड्’ हो जाता है। उदाहरण –

  • तत् + टीका = तट्टीका
  • बृहत् + टीका = बृहट्टीका
  • उत् + डयन = उड्डयन
  • उत् + डीन = उड्डीन

(घ). यदि त् के बाद ल हो, तो त् के स्थान पर ‘ल्’ हो जाता है। उदाहरण –

  • उत् + लास = उल्लास
  • तत् + लीन = तल्लीन
  • उत् + लेख = उल्लेख
  • उत् + लंघन = उल्लंघन

(ड़). यदि त् के बाद श हो, तो त् के स्थान पर ‘च्’ और श के स्थान पर ‘छ्’ हो जाता है। उदाहरण –

  • उत् + श्वास = उच्छ्वास
  • सत् + शास्त्र = सच्छास्त्र
  • उत् + शिष्ट = उच्छिष्ट

(च). यदि त् के बाद ह हो, तो त् के स्थान पर ‘द्’ और ह के स्थान पर ‘ध्’ हो जाता है। उदाहरण –

  • तत् + हित = तद्धित
  • उत् + हार = उद्धार
  • उत् + हत = उद्धत
  • उत् + हृत = उद्धृत

5. ‘म्’ का नियम – यदि म् के बाद जिस वर्ग का व्यंजन आता है। अर्थात् म् का मेल ‘क’ से ‘म’ तक के व्यंजन वर्ग से होने पर म उसी वर्ग के नासिक्य (ड़् ञ् ण् न् म्) अथवा अनुस्वार में बदल जाता है। उदाहरण –

  • सम् + गति = संगति
  • सम् + पूर्ण = सम्पूर्ण
  • परम् + तु = परन्तु
  • सम् + कलन = संकलन

∗ यदि म् के बाद य, र, ल, व, श, ष, स, ह हो, तो ‘म’ हमेशा अनुस्वार ही होता है। उदाहरण –

  • सम् + रक्षक = संरक्षक
  • सम् + योग = संयोग
  • सम् + हार = संहार
  • सम् + विधान = संविधान

∗ यदि म् के बाद ‘म’ आ जाने पर कोई परिवर्तन नहीं होता है। उदाहरण –

  • सम् + मति = सम्मति
  • सम् + मान = सम्मान

6. ‘न्’ का नियम – यदि ऋ, र, ष के बाद न व्यंजन आता है, तो उस ‘न्’ का ‘ण्’ हो जाता है। चाहे बीच में क वर्ग, प वर्ग या अनुस्वार य, व, ह आदि में से कोई वर्ण क्यों न आ जाए। उदाहरण –

  • परि + नाम = परिणाम
  • प्र + मान = प्रमाण
  • कृष् + न = कृष्ण
  • परि + मान = परिमाण
  • शोष् + अन = शोषण
  • हर + न = हरण

7. ‘स्’ का नियम – यदि ‘स्’ व्यंजन से पहले अ, आ से भिन्न कोई भी स्वर आता है, तो ‘स’ का ‘ष’ हो जाता है। उदाहरण –
अभि + सेक = अभिषेक

  • नि + सेध = निषेध
  • सु + सुप्ति = सुषुप्ति
  • वि + सम = विषम
  • सु + समा = सुषमा

3. विसर्ग संधि (Visarg Sandhi ki Paribhasha)

जब स्वर या व्यंजन के साथ मिलते समय विसर्ग [:] में कोई परिवर्तन होता है, तो उसे ‘विसर्ग संधि’ कहते हैं।
दूसरे शब्दों में, विसर्ग के बाद किसी स्वर अथवा व्यंजन के आ जाने से विसर्ग में जो विकार (परिवर्तन) उत्पन्न होता है, तो वह विसर्ग संधि कहलाता हैं।

विसर्ग संधि के उदाहरण

हरिः + चन्द्र = हरिशचन्द्र
निः + छल = निश्छल
निः + आहार = निराहार
मनः +योग = मनोयोग
दुः + चरित्र = दुश्चरित्र
दुः + प्रकृति = दुष्प्रकृति
दुः + प्रभाव = दुष्प्रभाव

विसर्ग संधि के नियम

(1). यदि विसर्ग के पहले अ स्वर हो और बाद में अ अथवा किसी वर्ग का तीसरा, चौथा, पांचवां वर्ण अथवा य, र, ल, व, ह में से कोई वर्ण हो, तो ‘अ’ और विसर्ग (अः) के बदले ‘ओ’ हो जाता है। उदाहरण –

  • मनः + विज्ञान = मनोविज्ञान
  • मनः + रंजन = मनोरंजन
  • मनः + अनुकूल = मनोनुकूल
  • वयः + वृद्ध = वयोवृद्ध
  • यशः + दा = यशोदा
  • अधः + भाग = अधोभाग

(2). यदि विसर्ग से पहले अ, आ से अलग कोई स्वर आए और विसर्ग के बाद में आ, उ, ऊ या किसी वर्ग का तीसरा, चौथा, पांचवां वर्ण या य, र, ल, व, ह में से कोई वर्ण हो, तो विसर्ग का ‘र्’ में परिवर्तन हो जाता है। उदाहरण –

  • निः + आशा = निराशा
  • निः + धन = निर्धन
  • दुः + उपयोग = दुरूपयोग
  • आशीः + वाद = आशीर्वाद
  • पुनः + जन्म = पुनर्जन्म
  • निः + आहार = निराहार

(3). यदि विसर्ग से पहले कोई स्वर आए और बाद में च, छ व्यंजन हो, तो विसर्ग का ‘श्’ हो जाता है। उदाहरण –

  • निः + चल = निश्चल
  • निः + चिन्त = निश्चित
  • निः + चय = निश्चय
  • दुः + शासन = दुश्शासन
  • दुः + चरित्र = दुश्चरित्र
  • निः + छल = निश्छल

(4). यदि विसर्ग से पहले कोई स्वर इ, उ आए और बाद में क ख, ट ठ या प फ में से कोई वर्ण भी हो, तो विसर्ग का ‘ष्’ हो जाता है। उदाहरण –

  • निः + फल = निष्फल
  • निः + प्राण = निष्प्राण
  • निः + ठुर = निष्ठुर
  • धनुः + टंकार = धनुष्टंकार
  • निः + कंटक = निष्कंटक
  • निः + कपट = निष्कपट

अपवाद – दुः + ख = दुःख ।

(5). यदि विसर्ग के बाद त, थ हो, तो विसर्ग का ‘स्’ हो जाता है। उदाहरण –

  • निः + तार = निस्तार
  • निः + तेज = निस्तेज
  • दुः + तर = दुस्तर
  • दुः + साहस = दुस्साहस
  • निः + संताप = निस्संताप
  • मनः + ताप = मनस्ताप

(6). विसर्ग का लोप – (क). यदि विसर्ग के बाद ‘र’ हो, तो विसर्ग का लोप (लुप्त) हो जाता है। और उसके पहले का ह्रस्व स्वर दीर्घ हो जाता है। उदाहरण –

  • निः + रज = नीरज
  • निः + रस = नीरस
  • निः + रोग = नीरोग
  • निः + रव = नीरव

(ख). यदि विसर्ग के पहले अ या आ स्वर हो और विसर्ग के बाद कोई भिन्न स्वर हो, तो विसर्ग का लोप (लुप्त) हो जाता है। उदाहरण –

  • अतः + एव = अतएव

(ग). यदि विसर्ग के बाद छ हो, तो विसर्ग का लोप हो जाता है और च का आगमन हो जाता है। उदाहरण –

  • अनुः + छेद = अनुच्छेद
  • छत्रः + छाया = छत्रच्छाया

अपवाद – कुछ शब्दों में विसर्ग का ‘स्’ हो जाता है। उदाहरण –

  • नमः + कार = नमस्कार
  • पुरः + कार = पुरस्कार
  • भाः + कर = भास्कर

(7). यदि विसर्ग के पहले अ हो और बाद में क, ख अथवा प, फ व्यंजन हो, तो विसर्ग में कोई परिवर्तन नहीं होता है। उदाहरण –

  • पयः + दान = पयःदान
  • अन्तः + करण = अन्तःकरण
  • रजः + कण = रजःकण
  • पयः + पान = पयःपान
  • मनः + कामनः = मनःकामना
  • प्रातः + काल = प्रातःकाल
  • पुनः + फलित = पुनःफलित
  • अधः + पतन = अधःपतन
  • मनः + प्रसाद = मनःप्रसाद

संधि के FAQs

1. संधि किसे कहते हैं कितने प्रकार की होती हैं?

संधि का शाब्दिक अर्थ है – मेल अथवा मिलना। अर्थात् दो वर्णों के परस्पर मिलने से उनमें जो विकार (परिवर्तन) होता है, उसे ‘संधि’ कहते हैं।
संधि के तीन 3 प्रकार होते हैं –
1. स्वर संधि
2. व्यंजन संधि
3. विसर्ग संधि

2. संधि की पहचान कैसे होती है?

संधि की पहचान करना नियम के अनुसार –
(1). दीर्घ संधि का नियम – अ, आ, इ, ई, उ, ऊ + अ, आ, इ, ई, उ, ऊ = आ, ई, ऊ हो जाता है।
(2). गुण संधि का नियम – अ/आ + इ/ई, उ/ऊ, ऋ = ए, ओ, अर् हो जाता है।
(3). वृद्धि संधि का नियम – अ/आ + ए/ऐ, ओ/औ = ऐ, औ हो जाता है।
(4). यण संधि का नियम – इ/ई, उ/ऊ, ऋ + अ/आ/उ/ऊ/ए/ऐ = य, व, र हो जाता है।
(5). अयादि संधि का नियम – ए/ऐ, ओ/औ + अ, इ, ई, उ = अय, अव, अवी हो जाता है।

3. संधि का अर्थ क्या हैं?

संधि एक संस्कृत शब्द है जो दो शब्दों के मिलने से बनता है। इसका अर्थ होता है – मेल या मिलना। संधि हिंदी व्याकरण में उन नियमों को कहते हैं जो दो शब्दों के मेल से उनके अक्षरों में बदलाव लाते हैं जिससे एक नया शब्द बनता हैं।
उदाहरण के लिए – सूर्य + उदयः = सूर्योदयः

4. संधि कितने प्रकार के होते हैं PDF?

मुख्य रूप से संधि के तीन 3 भेद होते हैं।
(1). स्वर संधि, (2). व्यंजन संधि, (3). विसर्ग संधि ।

5. संधि का उदाहरण क्या है?

संधि के उदाहरण निम्न है –
हिम + आलयः = हिमालयः
विद्या + आलयः = विद्यालयः
स्वर + आर्थी = स्वार्थी
कवि + इन्द्र = कवीन्द्र
सूर्य + अस्त = सूर्यास्त

6. विद्यालय में संधि कौन सी है?

“दीर्घ संधि” अर्थात् विद्यालय का संधि-विच्छेद है – विद्या + आलय = विद्यालय, नियम – आ + आ = आ
अतः इस प्रकार यह स्वर संधि के ‘दीर्घ संधि’ का उदाहरण है।

7. स्वर संधि के पांच भेद होते हैं कौन कौन?

स्वर संधि के मुख्य पांच 5 भेद है –
(1). दीर्घ संधि
(2). गुण संधि
(3). वृद्धि संधि
(4). यण संधि
(5). अयादि संधि ।

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