तराइन का द्वितीय युद्ध, कब हुआ इसके परिणाम व शिक्षाएं | Second Battle of Tarain in Hindi

तराइन का द्वितीय युद्ध (सन् 1192 ई.)

भूमिका — तराइन की पहली लड़ाई में पराजित मोहम्मद गोरी ने पृथ्वीराज चौहान से अपनी पराजय का बदला लेने के लिए कृत संकल्प था। अतः उसने स्वदेश पहुँचते ही इस लड़ाई के अकुशल सैनिक सरदारों को तो अपमानित एवं पदच्युत किया ही, अगली लड़ाई के लिए बड़े पैमाने पर अपनी सैन्य तैयारियाँ भी प्रारम्भ कर दीं। उसने न केवल सैनिकों की भर्ती ही की अपितु अन्य आवश्यक सैन्य तैयारियाँ भी पूर्ण कर लीं और विशाल सेना के साथ अपनी हार का बदला लेने के लिए पुनः दिल्ली की ओर प्रस्थान किया। पेशावर पहुँचकर उसने पदच्युत सैनिक सरदारों की सेनाएँ बहाल कर दीं, जिससे सैन्य संख्या में वृद्धि के साथ ही उसे उनका सहयोग एवं समर्थन प्राप्त करने का सुअवसर मिल गया। फिर क्या था, मोहम्मद गोरी तेजी से अपने पूर्व परिचित रणस्थल की ओर चल दिया।

उधर पृथ्वीराज सैन्य दृष्टि से अब पहले जैसी सुदृढ़ स्थिति में नहीं रह गया था, क्योंकि उसके सहयोगी राजपूत नरेश पुनः आपसी झगड़ों के शिकार बन गये । अतः उसे प्रथम संग्राम की भाँति राजपूत नरेशों से अपेक्षित सहायता न मिलना स्वाभाविक ही था। कन्नौज का राजा जयचन्द तो उसका दुश्मन बन गया था, परिणामस्वरूप पृथ्वीराज अपने प्रयासों द्वारा एकत्रित सेना को लेकर ही पूर्व-परिचित तराइन के संग्राम स्थल की ओर बढ़ा और वहीं रुककर तुर्क सेना की प्रतीक्षा करने लगा, जिसे वस्तुतः उसकी भयंकर भूल कहा जा सकता है, क्योंकि ऐसा कर उसने गोरी को तराइन तक निर्विघ्न रूप से बढ़ने और सुविधाजनक सेना को व्यूहबद्ध करने का सुअवसर प्रदान कर दिया। पेशावर की ओर तेजी से बढ़ने वाला मोहम्मद गोरी पृथ्वीराज चौहान के पड़ाव से 10 मील दूर रुककर अपनी सेना को आक्रमण हेतु योजनाबद्ध करने लगा।

तराइन का द्वितीय युद्ध की तुलनात्मक सैन्य शक्ति

तराइन के दूसरे युद्ध में दोनों पक्षों की सैन्य शक्ति के सम्बन्ध में विद्वान एकमत नहीं हैं, तथापि इतना तो सभी जानते हैं कि मोहम्मद गोरी की सेना में कवचयुक्त अश्वारोहियों का प्राधान्य था जिनकी संख्या डेढ़ लाख (पेशावर के सैनिक सरदारों की सेना को लेकर) से अधिक ही थी, जबकि एक मुसलमान इतिहासकार के अनुसार पृथ्वीराज की सेना में तीन हजार हाथी, तीन लाख अश्वारोही तथा बड़ी संख्या में पैदल सैनिक थे। (राजपूत राजाओं के सहयोग के कारण यह संख्या अधिक तर्कसंगत प्रतीत नहीं होती)। अतः यदि पृथ्वीराज की सैन्य संख्या को मोहम्मद गोरी से अधिक मान भी लिया जाय तो भी इस वास्तविकता से इन्कार नहीं किया जा सकता कि राजपूत अश्वारोहियों की तुलना में तुर्क अश्वारोही अधिक कुशल एवं गतिशील थे और उनके निशाने भी अचूक थे । अतः गोरी पृथ्वीराज की तुलना में यदि संख्या में नहीं तो कम-से-कम गुण में अवश्य श्रेष्ठतर स्थिति में था।

मोहम्मद गोरी के कूटनीतिक दाँव-पेच

मोहम्मद गोरी ने अपना पड़ाव डाला ही था कि उसे पृथ्वीराज चौहान द्वारा प्रेषित एक सन्देश प्राप्त हुआ जिससे उसे बिना लड़े वापस लौट जाने में ही उनका कल्याण बतलाया गया था, साथ ही यह आश्वासन भी दिया गया कि उसकी सेना के वापस लौटने की स्थिति में उसे राजपूत सेना का पूरा संरक्षण प्राप्त होगा। मोहम्मद गोरी ने पृथ्वीराज की इस चेतावनी को धोखा देने वाली एक चाल समझकर उसे (पृथ्वीराज को) भुलावे में रखने एवं दाँव देने का निर्णय किया। कूटनीतिक दाँव-पेचों का आश्रय लेते हुए उसने (गोरी ने) पृथ्वीराज के सन्देश के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन का नाटक रचते हुए यह उत्तर प्रेषित किया कि यद्यपि वह (गोरी) उसके (पृथ्वीराज) मैत्रीपूर्ण सन्धि प्रस्ताव से सहमत है तथा वह अपने सुल्तान भाई से इसके आवश्यक अनुमोदन हेतु प्रयत्नरत है। अतः अनुमोदन प्राप्त होने की अवधि तक संग्राम को रोके रहने की कृपा की जाय।

वस्तुतः पृथ्वीराज चौहान के सन्धि प्रस्ताव से ऐसा आभास मिलता है कि राजपूत नरेशों के असहयोग से वह अभी गोरी से लड़ने का इच्छुक नहीं था और सम्भवतः इसीलिए उसने गोरी की कूटनीतिक चाल पर भरोसा कर न केवल अपनी सांग्रामिक कार्यवाही रोक दी अपितु शत्रु गतिविधियों पर भी विशेष ध्यान देना बन्द कर दिया। उधर अपनी चाल में सफल गोरी ने उस पर तुरन्त हमला करने की योजना बनाई, क्योंकि आक्रमण की कार्यवाही में अनावश्यक विलम्ब से शत्रु के सतर्क होने एवं सैन्य शक्ति संचय करने का अवसर मिल सकता था।

मोहम्मद गोरी का योजनाबद्ध आक्रमण

यथाशीघ्र आक्रमण का निर्णय लेकर मोहम्मद गोरी भारी साज-सामान को पड़ाव स्थल पर ही छोड़कर लड़ाकू सैनिकों के साथ ब्रह्म मुहूर्त से पूर्व अँधेरे में ही सरस्वती नदी पर पृथ्वीराज के पड़ाव के सामने आ पहुँचा। शौच, स्नान आदि के अपने दैनिक कार्यों में व्यस्त, गोरी के आक्रमण की आशंका से निश्चिन्त राजपूत सैनिकों का तुर्क सेना की एकाएक उपस्थिति से आश्चर्यचकित हो जाना स्वाभाविक ही था। फिर भी येन-केन-प्रकारेण राजपूत सैनिक इन असम्भावित आक्रमण का सामना करने के लिए कटिबद्ध हो गये, किन्तु न तो वे किसी युद्ध योजना का निर्माण ही कर सके और न ही अपनी उदरपूर्ति की समुचित व्यवस्था ही कर सके। इसके विपरीत गोरी ने इस संग्राम हेतु शत्रु से मुठभेड़ की लड़ाई से यथास्थान बचने की योजना पहले से ही सुनिश्चित कर ली थी। राजपूत अश्वारोही सैनिकों को उनके भालों के समुचित प्रयोग से वंचित करने के लिए उन्हें अपनी सेना (तुर्क सेना) के पास तक जाने का अवसर न देने की योजना बनाकर उसने अपने धनुर्धर सैनिकों को क्रमशः चार भागों— अग्र गारद, दायाँ पक्ष, बायाँ पक्ष तथा पृष्ठ गारद में विभाजित कर प्रत्येक भाग में दस हजार धनुर्धर सैनिक नियुक्त किये। इसके अतिरिक्त उसने भालों एवं तलवारों से लैस 12,000 कवचयुक्त सुप्रशिक्षित अश्वारोही योद्धाओं को आरक्षित सेना के रूप में अपनी कमान के पृष्ठ भाग में नियुक्त किया।

योजनानुसार तुर्क अश्वारोही धुनर्धारियों ने राजपूत सेना की गुत्थमगुत्था की लड़ाई से बचते हुए उन पर बाण वर्षा प्रारम्भ कर दी। गोरी की आशा के अनुकूल, जैसे ही राजपूत सैनिक उनके सैनिकों के निकट आने को होते थे, वे तुरन्त पीछे हट जाते थे और अपने घोड़ों को थोड़ा दायें-बायें कर राजपूत सैनिक को अपने आगे-पीछे दौड़ने के लिए विवश करते रहते। इसके साथ ही, यदि उन्हें अपनी सेना का कोई भाग शत्रु की सेना से कमजोर पड़ता था तो पृष्ठ गारद के जवान तुरन्त पहुँच जाते थे।

तराइन का द्वितीय युद्ध के परिणाम

इस लड़ाई में उपर्युक्त प्रकार की रणनीति अपनाकर मोहम्मद गोरी ने राजपूतों के द्वारा भालों से वार करने पर तो रोक लगायी, उनकी नियन्त्रित पंक्ति रचना को तोड़ने एवं उन्हें परेशान करने में कोई कसर उठा नहीं रखी। अपरान्ह तीन बजे तक धार्मिक कट्टरता में बँधे भूखे-प्यासे राजपूत सैनिकों में लड़ने की शक्ति शनैः-शनैः कम होती जा रही थी वे तुर्क अश्वारोहियों के पीछे इधर-उधर भागते-भागते पर्याप्त थक चुके थे। ऐसा लगता है कि दूरदर्शी एवं कुशल कमाण्डर मोहम्मद गोरी राजपूत सेना पर वास्तविक आक्रमण हेतु ऐसे ही अवसर की तलाश में था, तभी तो उसने उचित अवसर पाते ही अपनी कमान के आरक्षित, सुप्रशिक्षित एवं कवचयुक्त अश्वारोही। (जिनकी संख्या 12,000 बताई जाती है) को राजपूत सेना पर निर्णायक आक्रमण करने का आदेश दे दिया, जो पूर्णरूपेण सफल रहा, क्योंकि पहले से ही थकी-हारी राजपूत सेना गोरी के इस नये आक्रमण का सामना करने में सर्वथा असमर्थ थी।

तुर्क सेना पर किया गया उनका प्रहार प्रभावकारी नहीं हो पा रहा था, इसके विपरीत नये जोश से भरे आरक्षित सेना के अश्वारोही सैनिक गोरी जैसे सेनानायक के कुशल निर्देशन में राजपूतों के शहीद होने के बावजूद तुर्क नेता का पलड़ा बराबर भारी होता। जा रहा था और उनकी आघात सामरिकी (Shock Tactics) ने अन्ततोगत्वा युद्ध का निर्णय उन्हीं के पक्ष में कर दिया। राजपूत सेना में भगदड़ मच गई। राजपूत सेना के अप्रभाग में स्थित गोविन्दराज तो मारा ही गया, सम्राट पृथ्वीराज को भी बन्दी बनाकर हत्या कर दी गई। इतना ही नहीं, उसके अधिकांश सहयोगी राजा भी इस निर्णायक संग्राम में तुर्क सेना द्वारा तलवार के घाट उतार दिये गये।

तराइन का द्वितीय युद्ध किसने जीता

इस प्रकार तराइन के इस संग्राम में मोहम्मद गोरी ने शानदार विजय प्राप्त कर न केवल इस रणक्षेत्र पर ही अपनी पिछली पराजय का कलंक धोया, अपितु उसने एक ऐसी आधारशिला भी स्थापित की जिस पर बना मुस्लिम साम्राज्य का प्रासाद अगली तीन शताब्दियों से भी अधिक समय तक अडिग टिका रहा। इस संग्राम में पृथ्वीराज चौहान की पराजय से राजपूत सामरिकी की ऐसी अनेक कमियाँ एवं भूलें उभरकर प्रकाश में आयीं जिनके कारण बहादुर राजपूत सेना को इस संग्राम में पराजय का मुख देखना पड़ा। पृथ्वीराज चौहान की इन कमजोरियों एवं पराजय के कारणों को नीचे दी जा रही सैन्य शिक्षाओं की सहायता से सरलता से स्पष्ट किया जा सकता है—

तराइन का द्वितीय युद्ध के कारण एवं सैन्य शिक्षाएँ

(1) पराजित सेना का तेजी से पीछा कर उसे पूर्णतः नष्ट करने का प्रयत्न करना चाहिए। प्रथम संग्राम में मोहम्मद गोरी के पराजित होने के बावजूद पृथ्वीराज चौहान न तो उसका सफलतापूर्वक पीछा ही कर सका और न ही उसकी सेना को पूर्णतः नष्ट ही कर सका । परिणामस्वरूप प्रथम संग्राम का घायल गोरी चोट खाये सर्प की भाँति पृथ्वीराज चौहान से बदला लेने के लिए कृत संकल्प प्रतीत हुआ जिससे अन्ततोगत्वा उसकी (पृथ्वीराज को) प्रथम जीत के बाद भी पराजय में परिवर्तित हो गई।

(2) शत्रु को अपनी राज्य की सीमाओं के बाहर ही रोकने का प्रयत्न करना चाहिए न कि सीमाओं के अन्दर । सम्भवतः पृथ्वीराज चौहान ने इस सिद्धान्त को सही अर्थों में समझ ही न सका अन्यथा उसने उसे (मोहम्मद गोरी को) पंजाब की सरहद पर ही रोक दिया होता। बड़ी विचित्र एवं दुर्भाग्यपूर्ण बात तो यह रही कि द्वितीय लड़ाई में समय होते हुए भी पृथ्वीराज ने उसे तराइन के पहले ही रोकने का प्रयत्न तक नहीं किया।

(3) राजपूत राजा स्थायी सामूहिक प्रतिरक्षा संगठन के महत्व और उसकी आवश्यकता को नहीं समझ सके अन्यथा उन्होंने मोहम्मद गोरी के आक्रमण से पूर्व ही अपने को संगठनबद्ध कर लिया होता और प्रथम जीत के बाद भी उन्होंने अपने को संगठित ही रखा होता। ऐसा प्रतीत होता है कि प्रथम संग्राम में गोरी की पराजय से राजपूतों ने बाह्य आक्रमणों को उपेक्षा की दृष्टि से देखना प्रारम्भ कर दिया था अथवा उन्हें मोहम्मद गोरी द्वारा दुबारा आक्रमण किये जाने की कोई सम्भावना नहीं थी । सम्भवतः इसीलिए सैन्य तैयारियों पर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया गया। अतः गोरी के अप्रत्याशित आक्रमण की अवस्था में पृथ्वीराज का व्यक्तित्व, शौर्य एवं पराक्रम भी सफल न हो सका। डॉ. पी. सी. चक्रवर्ती के शब्दों में, “Prithviraj thought out the issue with courage and determination, but no gallantary and on heroism can save a people from the result of neglecting war preparations.”

(4) युद्ध में सफलता प्राप्ति हेतु सैन्य संख्या के साथ-साथ सैन्य गुणों का विशेष महत्व होता है। सम्भवत: इसीलिए आघात सामरिकी (Shock Tactics) में प्रशिक्षित गतिशील कवचयुक्त अश्वारोही सेना ने पृथ्वीराज की कम गतिशील एवं अकुशल सेना से तराइन की द्वितीय लड़ाई सरलता से जीत ली।

(5) इस संग्राम में मोहम्मद गोरी की विजय से यह तथ्य भी स्पष्ट हुआ कि युद्ध की बदलती हुई परिस्थितियों को ध्यान में रखकर किसी भी कुशल कमाण्डर को अपने पास आरक्षित सेना रखनी चाहिए। इतना ही नहीं, सफल सैनिक कार्यवाही हेतु उच्चकोटि के सैन्य अनुशासन की तो आवश्यकता है ही, दूरदर्शितापूर्ण कुशल नेतृत्व भी आवश्यक है। मोहम्मद गोरी की तुलना में रखकर सेनानायक पृथ्वीराज चौहान, तराइन का द्वितीय युद्ध संग्राम में इन कसौटियों पर अधिक खरा नहीं उतर सका । परिणामस्वरूप उसे पराजित होना पड़ा।

ले. कर्नल गौतम शर्मा के शब्दों में, “The second battle was essentially a general’s battle and the triumpth of superior generalship opposed to mere numbers and valour and herosim.”

(6) पृथ्वीराज चौहान ने द्वितीय संग्राम से पूर्व शत्रु के फरेब में विश्वास कर अपने, अग्रिम सुरक्षा प्रयत्नों में ढील देकर ‘सुरक्षा’ जैसे सिद्धान्त का उल्लंघन किया, जिसके घातक परिणाम उसे स्वयं भुगतने पड़े ।

(7) राजपूत सैनिकों की धार्मिक कट्टरता और उसमें उनकी बँधी आस्था, जिसके कारण (इन्हें तीसरे पहर तक भूखे रहकर लड़ने के लिए विवश होना पड़ा), भी पराजय का एक कारण प्रमाणित हुई।

नोट – परीक्षाओं में पूछे जाने वाले प्रश्न —
प्रश्न 1. तराइन का द्वितीय युद्ध संग्राम (1192 ई.) का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
प्रश्न 2. एक चित्र की सहायता से तराइन के द्वितीय युद्ध संग्राम की व्याख्या कीजिए तथा यह भी स्पष्ट कीजिए कि मोहम्मद गोरी ने प्रथम संग्राम से प्राप्त शिक्षाओं का किस प्रकार प्रयोग किया?
प्रश्न 3. तराइन का द्वितीय युद्ध कब और किसके बीच हुआ? इस युद्ध में किसकी जीत हुई तथा इस लड़ाई के परिणाम व शिक्षाएं लिखिए।

Share This Post

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *