अर्द्धचालक क्या है, परिभाषा, प्रकार तथा आन्तरिक व बाह्य अर्द्ध-चालकों की तुलना कीजिए | Semiconductor in Hindi

अर्द्धचालक

अर्द्धचालक क्या है? – इस अध्याय में हमनें अर्द्धचालक के बारे में विस्तार से सरल भाषा में अध्ययन किया है। तथा इसमें अर्द्धचालक के प्रकार अथवा आन्तरिक व बाह्य अर्द्ध-चालकों को भी समझाया गया है।

अर्द्धचालक (Semiconductor in Hindi)

वे पदार्थ जिनकी चालकता चालकों व अचालकों के बीच रहती है, अथवा जिन पदार्थों की चालकता, अचालक पदार्थों से अधिक व चालक पदार्थों से कम होती है। अथवा जिन पदार्थों में वर्जित ऊर्जा अन्तराल लगभग 1.0 eV की कोटि का होता है और ताप बढ़ाने पर जिनका प्रतिरोध घटता है या चालकता बढ़ती है, “अर्द्धचालक” कहलाते हैं। तथा इनके प्रतिरोध का ताप गुणांक ऋणात्मक होता है।

आवर्त सारणी के चतुर्थ समूह के तत्व अर्द्धचालक होते हैं, उनकी अन्तिम कक्षा में 4 इलेक्ट्रॉन होते हैं, जैसे – कार्बन, सिलिकॉन व जर्मेनियम आदि, अर्द्ध-चालकों के उदाहरण हैं ।
अर्द्धचालक मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं –
(1). आन्तरिक या शुद्ध प्राकृतिक अर्द्धचालक (Intrinsic or pure semiconductor),
(2). बाह्य या अशुद्ध कृत्रिम अर्द्धचालक (Extrinsic or impure semiconductor)।

1. आन्तरिक या शुद्ध प्राकृतिक अर्द्धचालक

जिन अर्द्ध-चालकों की विद्युत् चालकता ऊष्मीय प्रक्षोभ से उत्पन्न आवेश वाहकों पर निर्भर करती है, “आन्तरिक या शुद्ध अर्द्धचालक” कहलाते हैं। ये तत्व चतुर्थ संयोजी होते हैं। अर्थात् इनकी बाहरी कक्षा में चार इलेक्ट्रॉन होते हैं।
जैसे – जर्मेनियम परमाणु क्रमांक 32 का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास- 2, 8, 18, 4 व सिलिकॉन परमाणु क्रमांक 14 का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास- 2, 8 व 4 होता है। स्पष्टत: इन पदार्थों के बाहरी कोश में 4 इलेक्ट्रॉन है तथा वह आंशिक रूप से भरी हुई है।

2. बाह्य या अशुद्ध कृत्रिम अर्द्धचालक

जिन अर्द्ध-चालकों की विद्युत् चालकता ऊष्मीय प्रक्षेप के साथ-साथ उनमें अपमिश्रित अपद्रव्य के परमाणुओं पर भी निर्भर करती है, “बाह्य या अशुद्ध अर्द्धचालक” कहलाते हैं।
ये भी दो प्रकार के होते हैं –
(1). p-प्रकार का अर्द्धचालक (p-Type semiconductor),
(2). n-प्रकार का अर्द्धचालक (n-Type semiconductor)।

(1). p-प्रकार का अर्द्धचालक

जब 4 संयोजकता वाले क्रिस्टल, जैसे – सिलिकॉन (Si) व जर्मेनियम (Ge) में 3 संयोजकता वाले अपद्रव्य परमाणु जैसे – Al, B आदि को अपमिश्रित किया जाता है तो उन पदार्थों के अन्दर धनावेशित विवर या Hole उत्पन्न हो जाते हैं, इस प्रकार के अर्द्ध-चालकों को “p-प्रकार का अर्द्धचालक” कहते हैं। तथा मिलायी गयी अशुद्धि “ग्राही अशुद्धि” कहलाती है।

(2). n-प्रकार का अर्द्धचालक

जब 4 संयोजकता वाले क्रिस्टल जैसे – सिलिकॉन (Si) व जर्मेनियम (Ge) में 5 संयोजकता वाले अपद्रव्य परमाणु जैसे – P, As व Sn को अपमिश्रित किया जाता है, तो उन पदार्थों के अन्दर मुक्त इलेक्ट्रॉन उत्पन्न हो जाते हैं। इस प्रकार के अर्द्ध-चालकों को “n-प्रकार का अर्द्धचालक” कहते हैं। और मिलायी गयी अशुद्धि “दाता अशुद्धि” कहलाती है।

“अशुद्ध अर्द्ध-चालकों में अर्द्धचालक व अशुद्ध परमाणुओं का अनुपात 108 : 1 होता है। शुद्ध अर्द्धचालक में अशुद्धि मिलाने से इनकी विद्युत् चालकता 16 गुनी बढ़ जाती है।”

आन्तरिक अथवा बाह्य अर्द्ध-चालकों की तुलना

  • शुद्ध या आन्तरिक अर्द्ध-चालकों की विद्युत् चालकता केवल ताप पर निर्भर करती है, जबकि बाह्य या अशुद्ध अर्द्ध-चालकों की विद्युत् चालकता ताप के साथ-साथ अपमिश्रित अपद्रव्य के परमाणुओं की संख्या पर भी निर्भर करती है।
  • शुद्ध या आन्तरिक अर्द्ध-चालकों में कोई बाहरी अपद्रव्य मिश्रित की जाती है, जबकि बाह्य या अशुद्ध अर्द्ध-चालकों में बाहरी अपद्रव्य की कुछ मात्रा मिश्रित की जाती है।
  • शुद्ध या आन्तरिक अर्द्ध-चालकों की विद्युत् चालकता की तुलना में बाह्य या अशुद्ध अर्द्ध-चालकों की विद्युत् चालकता का मान बहुत अधिक होता है।
  • शुद्ध या आन्तरिक अर्द्ध-चालकों में होलों की संख्या मुक्त इलेक्ट्रॉनों की संख्या के बराबर होती है। लेकिन n-प्रकार के बाह्य या अशुद्ध अर्द्ध-चालकों में मुक्त इलेक्ट्रॉनों की संख्या अधिकतम होती है, जबकि p-प्रकार के बाह्य या अशुद्ध अर्द्ध-चालकों में होलों की संख्या अधिकतम होती है।

Note – अर्द्धचालक से सम्बन्धित प्रशन परीक्षाओं में पूछें जाते हैं।
Q.1 अर्द्धचालक क्या हैं? ये कितने प्रकार के होते हैं? आन्तरिक व बाह्य अर्द्ध-चालकों की तुलना कीजिए।
Q 2 अर्द्धचालक क्या होते हैं? कोई तीन उदाहरण लिखो। तथा समझाइए कि ताप बढ़ाने पर अर्द्ध-चालकों की चालकता पर क्या प्रभाव पड़ता है?
Q.3 शुद्ध अर्द्धचालक में अशुद्धि मिलाकर बाह्य अर्द्धचालक बनाने का क्या उद्देश्य होता है? समझाइए।

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