शिवाजी महाराज का इतिहास, सेना व्यवस्था एवं युद्ध कला | Shivaji Maharaj History in hindi

शिवाजी महाराज का इतिहास

उत्तर भारत के राजपूतों की भाँति 17वीं शताब्दी में औरंगजेब के समय में दक्षिणी भारत में महाराष्ट्र के मराठों की शक्ति का विकास हुआ। मराठों ने मुगलों के चंगुल से हिन्दू जनता को मुक्त करने और हिन्दू साम्राज्य स्थापित करने का बीड़ा उठाया था। “छत्रपति शिवाजी महाराज ने ही मराठा साम्राज्य की नींव डाली थी।” महाराष्ट्र प्रदेश दोनों तरफ पहाड़ियों से घिरा था। वहाँ कँकरीली भूमि और न्यून वर्षा के कारण खेती-बाड़ी कम और कठिनाई से होती है। यही कारण था कि मराठे परिश्रमशील व्यक्ति थे। श्री सत्यनारायण दुबे के अनुसार, “जिन जातियों पर प्रकृति की कृपा अधिक नहीं होती, उनमें अध्यवसाय, आत्म-विश्वास, आत्म-निर्भरता, आत्म-सम्मान, भाई-चारा की भावना आदि गुण पाये जाते हैं।” उनका यह भी मत है कि “पर्वत प्रदेश स्वतन्त्रता के घर हैं। वहाँ बाहरी आक्रमणों से देश की सुरक्षा अधिक सरलतापूर्वक की जा सकती है।”

यह कथन वास्तव में मराठों के विषय में सत्य प्रतीत होता है। किन्तु परिस्थितियाँ मानव के चरित्र और कार्यों में परिवर्तन कर देती हैं। मुगलों के आक्रमण और राजनैतिक सम्बन्ध ने मराठों के जीवन में परिवर्तन किया जो मुगलों के ही विरुद्ध पड़ा। श्री सत्यनारायण दुबे का कथन है कि “मुसलमानों के आक्रमण तथा प्रतिद्वन्द्वी राज्यों के पारस्परिक संघर्षों के कारण मराठों में भी चालाकी तथा कूटनीति का विकास हो चुका था। इस प्रकार हम मराठा चरित्र में दो तत्वों का समन्वय पाते हैं। एक ओर साहस तथा आत्म-निर्भरता और दूसरी ओर चालाकी तथा कूटनीति।

शिवाजी ने मराठों के इस प्रकार के चरित्र से लाभ उठाया और शक्तिशाली मुगल सम्राट औरंगजेब का मुकाबला करने के लिए सुसंगठित और अनुशासित मराठा सेना का निर्माण किया। उनकी सैनिक व्यवस्था वास्तव में राजपूत से भी श्रेष्ठ थी जिसके बल पर मुगलों के छक्के छुड़ा दिये और हिन्दू राज्य की स्थापना की।

शिवाजी महाराज की सैन्य व्यवस्था

छत्रपति शिवाजी के पूर्व मुसलमान शासकों में मराठे कार्य करते थे। उस समय सैनिक अश्वारोही वर्ष का आधा समय सैनिक कार्य में और आधा समय खेती-बाड़ी में व्यतीत करते थे। किन्तु शिवाजी को मुगल सम्राट की शक्ति से सामना करना था । अतः उन्होंने स्थायी सेना पर बल दिया। राजपूतों की भाँति उन्होंने आवश्यकता के समय ही सैनिकों को एकत्रित करना उचित नहीं समझा। उनकी सेना में पैदल व अश्वारोही सेना ही मुख्य रूप से थी। उनकी सेना में हाथी तथा नौकाएँ भी थीं, किन्तु हाथियों पर अधिक विश्वास न था और नौकाओं का उपयोग जंजीरा द्वीप के विरुद्ध तथा मुगलों के व्यापारिक जहाजों को लूटने के लिए ही किया गया था। उनको भारतीय युद्ध में नहीं लगाया गया था।

छत्रपति शिवाजी महाराज के बाद मराठा नौसेना भी बन गयी, जिससे यूरोपीय जातियों की जल सेना से कई बार संघर्ष किया था और कितने वर्षों तक उन्हें भारत के पश्चिमी समुद्र तट को छूने तक नहीं दिया। यही कारण है कि औरंगजेब ने अपने साम्राज्य का विस्तार बंगाल की ओर से किया था, न कि दक्षिणी भारत की ओर से। मराठा नाविक उस समय श्रेष्ठ समझे जाते थे। किन्तु वे अश्वारोही सेना को ही अधिक प्रधानता देते थे। अश्वारोही सेना के कारण ही उनकी गति अत्यधिक थी जो शत्रु सेना को भयभीत व चकित कर देती थी। उनके घुड़सवार भाले, बल्लम, तलवार व धनुष-बाण का प्रयोग करते थे। सेना में उत्तम नस्ल के तीव्रगामी घोड़े रखे जाते थे।

सैन्य प्रशिक्षण एवं सेनांग

छत्रपति शिवाजी की घुड़सवार सेना की व्यवस्था भी सुन्दर थी। दो प्रकार के सैनिक से उनकी अश्व सेना बनी। जिन्हें राज्य की ओर से घोड़े, शस्त्रास्त्र तथा वेतन मिलता था। वे सैनिक वर्गीय कहलाते थे तथा जो सैनिक अपने तरफ से शस्त्र व घोड़े का क्रय करते थे उन्हें सिलेदार कहते थे। उनको युद्ध में कार्य करने के लिए राज्य से पूरा धन मिलता था। सबसे छोटी अश्वारोही सेना में 25 घुड़सवार होते थे, जिनके नायक को हवलदार कहते थे। पाँच हवलदारों ऊपर तक जुमलादार ओर 10 जुमलादारों के ऊपर एक हजारी होता था तथा पाँच हजारियों के ऊपर पंच हजारी तथा पाँच हजारियों के ऊपर सेनापति अर्थात सर नौबत होता था। इसी प्रकार उनके पैदल सेना की भी व्यवस्था थी। नौ पैदल सैनिकों की टुकड़ी का नायक, पाँच नायकों के ऊपर हवलदार, दो या तीन हवलदारों के ऊपर जुमलादार, दस जुमलादारों के ऊपर हजारी और सात हजारी के ऊपर सर नौबत रहता था।

कहा जाता है कि प्रारम्भ में शिवाजी के सेना की संख्या केवल 1,200 ही थी । अन्त में वह 60,000 तक पहुँच गयी थी। उनकी स्थायी सेना में 39 से 40 हजार तक अश्वारोही और 10,000 पैदल सैनिक थे।

आर. सी. मजूमदार का कथन है कि छत्रपति शिवाजी महाराज की सेना में लगभग 1,560 हाथी और लगभग 3,000 या 1,500 ऊँट थे। एक लेखक के अनुसार मराठा सेना में 1,50,000 अश्व सैनिक थे। उनकी सेना में तोपखाने का विशेष वर्णन नहीं मिलता, किन्तु बाद में मराठा शासकों ने पुर्तगाली और भारतीय ईसाइयों के नेतृत्व में तोपखाने का संगठन किया था। उस समय मराठी सेना में सभी वर्गों के नौसैनिक भर्ती किये जाते थे।

वेतन तथा भत्ते – सैनिकों को नियमित वेतन दिया जाता था। स्थायी सैनिकों को युद्ध के समय कार्य करने का उचित पारिश्रमिक मिलता था। सैनिकों की सभी सुविधाओं का ध्यान रखा जाता था । उनके रहने हेतु मकान की व्यवस्था थी।

शास्त्रास्त्र

मराठों की सेना में भी वही पुराने प्रकार के भारतीय शस्त्रास्त्र थे। जिनमें धनुष-बाण, बल्लम, भाले और तलवार मुख्य थे। शिवाजी ने सिंह नख नामक शस्त्र का भी नवीन प्रयोग किया। यह शेर के नाखूनों की भाँति का था, जिसे हाथ की अँगुलियों में पहना जाता था। उन्होंने इसका प्रयोग अफजल खाँ से अपनी रक्षा के लिए किया था। बरछों आदि का प्रयोग बहुत कम था। उनका प्रयोग बाद की मराठा सेना ने किया जबकि विदेशी और मुगलों से अधिक युद्ध करने पड़े थे।

दुर्ग रचना

दुर्गों की ओर प्राचीन काल से ध्यान जाता रहा है। शिवाजी महाराज ने भी किलों की दृढ़ता और सुरक्षा की ओर विशेष ध्यान दिया था। कहा जाता है कि उनके राज्य में लगभग 280 किले थे। भीमसेन विद्यालंकार ने उनकी संख्या 300 बताई है। उनके तीन प्रकार के दुर्ग थे-जल दुर्ग इन्हें जजीरा भी कहा जाता था और समतल किले जो भूमि कोट या कोट कहलाते थे। उनके किले सभी प्रकार से सुरक्षित थे। उनकी रक्षा के प्रबन्ध के लिए तीन व्यक्ति रहते थे, जिनमें एक मराठा हवलदार, एक ब्राह्मण सूबेदार तथा एक कायस्थ किलेदार होता था। आपत्ति के समय आस-पास के ग्रामीण इन्हीं किलों में शरण लेते थे, इसलिए किलों को वे अपनी माँ कहते थे।

शिवाजी महाराज की युद्ध कला

छत्रपति शिवाजी स्वयं युद्धकला विशेषज्ञ थे। वे भूमि और कौशलात्मक परिस्थिति का उपयोग करने में कुशल थे। उन्होंने राजपूतों की भाँति गुरिल्ला युद्ध विधि को ही अनाया। वे अपने अचानक आक्रमण से शत्रु सेना को चकित कर देते थे और छापा मारकर पहाड़ियों में छिप जाते थे। इसलिए एक मुस्लिम लेखक ने मरहठ्ठा शब्द को इस तरह व्याख्या की है— मारहटा अर्थात् मार कर हटा। इसी विधि से उन्होंने शत्रु पर विजय प्राप्त की। उनकी सेना मुगलों से कम थी । अतः यही विधि उपयोगी भी थी। उन्होंने कूटनीति का भी प्रयोग किया। अफजल खाँ को हराने के लिए उन्होंने तलवार का सहारा न लेकर बुद्धि का सहारा लिया। सम्भवतः उन्होंने कौटिल्य के सिद्धान्त का अध्ययन किया हो। उनकी किले की शक्ति भी प्रबल थी। उन्होंने गतिशील अश्व सेना को ही मुख्य शक्ति माना था। उनकी सेना के पास अधिक भारी सामान नहीं रहता था, ताकि वे शत्रु पर शीघ्रता से आक्रमण कर सकें।

व्यूह-रचना तथा युद्ध कौशल

शिवाजी की सेना में पिडारी जाति के विश्व सैनिक भी थी। ये लुटेरे बताये जाते हैं। इन सेना का मुख्य काम था कि जब शत्रु सेना मरहठा सेना से लड़ रही होती थी तो पीछे से उनकी रसद आदि पहुँचाने वाले भागों पर छापा मरती थी जिससे सेना आयुक्त सामग्री प्राप्त न कर सके। शत्रु की सेना पर पहाड़ी क्षेत्र में छिपकर छापा मारकर उसे छिन्न-भिन्न कर देती थी। वापस लौटती शत्रु सेना का पीछा भी करती थी जिससे थकी शत्रु सेना व्याकुल होकर भाग जाती थी।

छत्रपति शिवाजी महाराज की सेना का अनुशासन भी प्रसिद्ध है, उसकी आज्ञा थी कि छावनियों में रहने वाले सैनिक अपने पास की भोजन सामग्री पर गुजर करें उसके लिए नगर और गाँव की जनता को परेशान न करें। उनकी छावनी में कोई भी स्त्री, सैनिक, नर्तकी आदि नहीं रह सकती थी, क्योंकि इनसे सैनिकों का चरित्र व बल नष्ट होता है। मुगल छावनियों में इसका बिल्कुल उल्टा था। सैनिकों को किसी स्त्री को कैद करने की आज्ञा नहीं थी। इस प्रकार मराठा सैनिकों का अनुशासन अति श्रेष्ठ समझा जाता था।

नोट – परीक्षाओं में पूछे जाने वाले प्रश्न —
प्रश्न 1. “छत्रपति शिवाजी महाराज के काल में मराठा सेना अपने चरमोत्कर्ष पर थी।” इस कथन के सन्दर्भ में मराठा काल की प्रमुख सैन्य व्यवस्था का वर्णन कीजिए।
प्रश्न 2. “शिवाजी महाराज की प्रतिभा इसी से प्रत्यक्ष होती है कि उन्होंने उसी सैन्य पद्धति को अपनाया जो उसकी जाति के सैनिकों के चरित्र, प्रदेश की प्रकृति, आयुधों तथा उसके शत्रुओं की कमजोरियों के अनुकूल थी।” विवेचना कीजिए।

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