अर्द्ध-चालक, डायोड व ट्रांजिस्टर के लघु उत्तरीय प्रशन | Short Answer Type Questions on Semiconductor, Diode and Transistor in Hindi

प्रशन 1. ताप बढ़ने पर धातुओं की चालकता घटती है जबकि अर्द्ध-चालकों की चालकता बढ़ती है। क्यों?

उत्तर – ताप के बढ़ने पर अर्द्ध-चालक में अत्यधिक संयोजी इलेक्ट्रॉन सह संयोजक बन्धों को तोड़कर मुक्त हो जाते हैं यह मुक्त इलेक्ट्रॉन ही विद्युत् चालन में भाग लेते हैं। चूंकि ताप के बढ़ने पर मुक्त इलेक्ट्रॉनों की संख्या बढ़ जाती है अतः ताप के बढ़ने पर अर्धचालक की चालकता बढ़ जाती है।

अर्थात् धातुओं में मुक्त इलेक्ट्रॉन की संख्या बहुत अधिक होती है। ताप के बढ़ने पर इलेक्ट्रॉनों की गतिज ऊर्जा बढ़ जाती है जिससे उनकी परमाणुओं, आयनों तथा अन्य इलेक्ट्रॉनों के साथ टक्करों की संख्या बढ़ जाती है। अतः ताप के बढ़ने पर धातुओं की विधुत् चालकता घट जाती है।

प्रशन 2. उच्च ताप पर बाह्य अर्धचालक, शुद्ध अर्धचालक की भांति व्यवहार क्यों करते हैं?

उत्तर – ताप बढ़ाने पर अशुद्ध अर्ध-चालक की चालकता पर प्रभाव लगभग नगण्य पड़ता है, लेकिन शुद्ध अर्ध-चालक की चालकता बढ़ जाती है।

प्रशन 3. डायोड का स्थैतिक प्रतिरोध क्या है?

उत्तर – अग्र अभिनति में संधि डायोड पर आरोपित विभव तथा उसके संगत प्राप्त धारा की निष्पत्ति को उसका स्थैतिक या डीसी प्रतिरोध कहते हैं।

प्रशन 4. p-n संधि डायोड में अग्र अभिनति व पश्च अभिनति से क्या तात्पर्य है?

उत्तर – यदि जब संधि डायोड के p-क्षेत्र को धनात्मक व n-क्षेत्र को ऋणात्मक विभव पर रखा जाता है, तो उसे अग्र अभिनति में और जब p-क्षेत्र को ऋणात्मक विभव पर रखा जाता है तो उसे अग्र अभिनति में और जब p-क्षेत्र को ऋणात्मक विभव व n-क्षेत्र को धनात्मक विभव पर रखा जाता है तो उसे पश्च अभिनति में कहा जाता है।

प्रशन 5. ट्रांजिस्टर में बेस, एमीटर तथा कलेक्टर की तुलना में बहुत पतला तथा अल्प अपमिश्रित क्यों रखा जाता है?

उत्तर बेस का पतला तथा अल्प अपमिश्रित होना – ट्रांजिस्टर में बेस का कार्य एमीटर से कलेक्टर की ओर जाने वाले बहुसंख्यक-आवेश बाहकों p-n-p ट्रांजिस्टर में होल तथा n-p-n ट्रांजिस्टर में इलेक्ट्रॉन के प्रवाह को कंट्रोल करना है। वेस को पतला बनाकर तथा अल्प अपमिश्रित करके इसमें मुक्त इलेक्ट्रॉनों या होलों की संख्या बहुत कम रखी जाती है।

इस प्रकार, बेस में इलेक्ट्रॉन व होल के पुनः जुड़ने की प्रायिकता बहुत कम रह जाती है। एमीटर से आने वाले अधिकांश बहुसंख्यक आवेश बाहक इलेक्ट्रॉन या हॉल बेस में से विसरित होकर कलेक्टर तक पहुंच जाते हैं। फलस्वरूप कलेक्टर-धारा, एमीटर-धारा के लगभग बराबर होती है तथा बेस-धारा अपेक्षाकृत बहुत ही क्षीण होती है। उत्सर्जक एमीटर विन्यास में धारा लाभ तथा उत्सर्जक बेस विन्यास में शक्ति लाभ व वोल्टेज लाभ का मुख्य कारण यही होता है।

इसके विपरीत यदि बेस को पर्याप्त मोटा बनाया जाता है तथा अधिक अपमिश्रित किया जाता है, तो एमीटर से आने वाले अधिकांश बहुसंख्यक आवेश बाहक, वेस में पुनः संयोजित होकर लुप्त हो जाते हैं तथा कलेक्टर धारा नगण्य रह जाती है। इस स्थिति में ट्रांजिस्टर से कार्य लेना संभव नहीं होता है।

प्रशन 6. ट्रांजिस्टर की कार्य प्रणाली पर ताप के प्रभाव को समझाइए। तथा ऊष्मीय लोप क्या है?

उत्तर ट्रांजिस्टर की कार्य प्रणाली पर ताप का प्रभाव – n-प्रकार व p-प्रकार, दोनों प्रकार के अर्द्ध-चालकों की चालकता ताप बढ़ाने पर बढ़ती जाती है। इसका कारण है कि तापीय विक्षोभ बढ़ने पर सहसंयोजक बंध अत्यधिक मात्रा में टूटने लगते हैं जिससे इलेक्ट्रॉन व होल अत्यधिक मात्रा में उत्पन्न हो जाते हैं जिससे ताप वृद्धि में ट्रांजिस्टर के इनपुट व आउटपुट दोनों परिपथ में धारा बढ़ जाती है।

अतः परिणाम स्वरूप आधार-धारा का संग्राहक-धारा पर नियन्त्रण कम हो जाता है। तथा ट्रांजिस्टर की के कार्य करने पर ‘प्रतिकूल प्रभाव’ पड़ता है। यह प्रभाव संचयी रूप धारण कर लेता है।

अर्थात् ताप बढ़ने पर धारा में वृद्धि, जिससे पुनः ताप में वृद्धि के फलस्वरूप धारा में वृद्धि और फिर ताप में वृद्धि होगी। अतः यह क्रिया चलती रहेगी। इससे आवेश वाहक अनियमित गति करने लगते हैं तथा ट्रांजिस्टर संरचना नष्ट होकर ट्रांजिस्टर क्षतिग्रस्त हो सकता है। इस स्थिति को ही “ऊष्मीय लोप” कहते हैं।

प्रशन 7. ट्रांजिस्टर को प्रवर्धक की भांति उपयोग में लाने के लिए निवेशी प्रतिरोध अल्प तथा निर्गत प्रतिरोध उच्च मात्रा में रखा जाता है। क्यों?

उत्तर – निवेशी प्रतिरोध अल्प मात्रा में होने पर निवेशी सिरों पर सिग्नल वोल्टेज में अल्प परिवर्तन से उत्सर्जक धारा में बहुत अधिक परिवर्तन हो जाता है। तथा संग्राही वोल्टेज में बहुत अधिक परिवर्तन होने से संग्राही धारा में अल्प परिवर्तन होता है‌।

प्रशन 8. ट्रांजिस्टर को किस विधा में प्रवर्धक के रूप में प्रयुक्त करना अधिक लाभकारी होता है?

उत्तर – ट्रांजिस्टर को ‘उभयनिष्ठ-उत्सर्जक विधा’ में प्रयुक्त करना अधिक लाभकारी होता है। क्योंकि उभयनिष्ठ-उत्सर्जक विन्यास में धारा लाभ, उभयनिष्ठ-आधार विन्यास में धारा लाभ से बहुत अधिक होता है।

प्रशन 9. ट्रांजिस्टर को प्रवर्धक के रूप में उपयोग करने के लिए उभयनिष्ठ उत्सर्जक विधा ही क्यों श्रेष्ठ मानी जाती है?

उत्तर – उभयनिष्ठ उत्सर्जक विधा में धारा लाभ, वोल्टेज लाभ तथा शक्ति लाभ तीनों ही अन्य विधाओं की अपेक्षा अधिक होते हैं। तथा निर्गत व निवेशी प्रतिरोध का अनुपात भी लगभग 50 होता है जोकि बहु स्टेजी युग्मन के लिए उपयुक्त होता है।

प्रशन 10. ब्रेकडाउन विभव से क्या तात्पर्य है?

उत्तरब्रेकडाउन विभव जब डायोड को पश्च अभिनत में संबंधित किया जाता है, तो विभव बढ़ाने पर धारा का मान सूक्ष्म रूप में बढ़कर शीघ्र ही नियत हो जाता है। विभव का मान पुनः बढ़ाने पर एक निश्चित विभव पर धारा का मान अचानक तेजी से बढ़ जाता है। तथा प्रतिरोध अचानक घट जाता है और साधारण डायोड नष्ट हो जाता है। यही विभव “ब्रेकडाउन विभव” कहलाता है।

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