सिख साम्राज्य का इतिहास, सैन्य व्यवस्था एवं युद्ध कला | Sikh Empire History in Hindi

सिख साम्राज्य का इतिहास

मुगलों की दमन नीति का प्रतिरोध करने के लिए सिक्खों ने संगठन की महत्ता को समझा, क्योंकि सिक्खों के 9वें गुरु तेगबहादुर को औरंगजेब ने निर्दयतापूर्वक कत्ल करा दिया। गुरु तेगबहादुर के पुत्र गोविन्दसिंह ने अन्ततः सिक्ख सैन्यवाद को जन्म दिया, उन्होंने ‘खालसा’ पंथ की स्थापना की। सिक्खों ने छोटे-छोटे दलों में अपना संगठन करना शुरू कर दिया। गुरु गोविन्दसिंह खालसा के लिए ‘पाहल’ (दीक्षा देना) का अनुष्ठान किया। उन्होंने इसके लिए पाँच ककार—केश, कंघा, कृपाण, कच्छा और कड़ा धारण करना अनिवार्य कर दिया, जिससे सिक्खों में कर्म व योद्धा के विशिष्ट गुणों का समावेश स्वाभाविक हो गया। सिक्खों ने दिनों-दिन सैनिक क्षेत्र में विकास किया और महाराजा रणजीतसिंह के समय में पूर्ण विकास कर चुके थे।

प्रारम्भ में सिक्ख सेना का संगठन, प्रशिक्षण और शस्त्रास्त्र सभी पुराने प्रकार के ही थे, किन्तु रणजीतसिंह ने यूरोपियनों के सहयोग से उन्हें नवीन आधुनिक रूप प्रदान किया। मेजर अल्फ्रेड डेविड ने सिक्ख सेना के विषय में कहा है कि “No troops could have fought better than the Sikh fought.”

सिख साम्राज्य की सैन्य पद्धति

सैनिक संगठन व व्यवस्था — प्रारम्भ में इनकी कोई स्थायी सेना नहीं थी। राजपूतों की भाँति सिक्ख सैनिक समझे जाते थे। नियमित एवं स्थायी सेना की विचारधारा महाराजा रणजीतसिंह को यूरोपीय सैन्य संगठन के अनुभवों से प्राप्त हुई थी। स्थायी राजकीय सेना के अतिरिक्त जागीरदारों द्वारा निमित्त अस्थायी एवं अनियमित सेनाओं का बहिष्कार नहीं किया।

महाराजा रणजीतसिंह द्वारा प्रस्तुत प्रयुक्त सेनाओं का संगठन निम्नलिखित प्रकार से है—
(1) फौजे आम — रणजीतसिंह की नियमित सेना (फौजे आम) के अन्तर्गत तीन प्रकार की सेना- पैदल सेना, अश्वारोही और तोपखाना सम्मिलित थी।
(i) पैदल सेना – पैदल सेना बटालियन के आधार पर संगठित थी, जिसका कमाण्डर कुमेदार कहलाता था। प्रत्येक बटालियन में आठ कम्पनी प्रत्येक कम्पनी में चार सैक्शन तथा प्रत्येक सैक्शन में 25 सैनिक होते थे। सैनिकों की भोजन व्यवस्था एवं अन्य प्रबन्धों के लिए प्रत्येक पैदल बटालियन के साथ कुछ असैनिक कर्मचारी भी होते थे।
(ii) अश्वारोही सेना – अश्वारोही सेना दो प्रकार के सैनिकों द्वारा निर्मित थी। एक भाग तो नियमित कुशल अश्वारोही सैनिकों का था, जो विदेशियों द्वारा प्रशिक्षित होते थे और दूसरा वर्ग देशी पद्धति पर संगठित एवं प्रशिक्षित घुड़चढ़ा सैनिकों का होता था। नियमित अश्वारोही सैनिकों को रेजीमेण्ट एवं रिसालों में संगठित करने की व्यवस्था थी। एक रेजीमेण्ट में चार या पाँच रिसालें और हर एक रिसाले में 150 से 200 अश्वारोही सैनिक होते थे।
(iii) तोपखाना – युद्ध में विजय प्राप्त करने में तोपखाने की महत्त्वपूर्ण भूमिका से प्रभावित होकर रणजीतसिंह ने तोपखाने के अधिकाधिक विकास का संकल्प किया और उसने दो विदेशी जनरलों-जनरल Count तथा जनरल Gardner को तोपखाने के समुचित विकास नियन्त्रण एवं प्रशिक्षण हेतु नियुक्त किया। परिणामस्वरूप इसने अपने जीवन में, अन्तिम दिनों तक सुव्यवस्थित तोपखाने का निर्माण कर लिया, जिसे निम्नलिखित तीन भागों में बाँटा जा सकता है—

(अ) तोपखाना-ए-जिन्सी – इसमें मिश्रित भारी तोपें होती थीं। इसमें घोड़ों द्वारा खींची जाने वाली तोपों का Aspi तोपखाना, बैलों द्वारा खींची जाने वाली तोपों Gawi तोपखाना, हाथियों द्वारा खींची जाने वाली तोपें File (फिले) तोपखान और ऊँटों द्वारा खींची जाने वाली तोपों को Shutri (शुत्रि) तोपखाना सम्मिलित था।
(ब) अश्वारोही तोपखाना – इसमें अश्वारोही सैनिकों द्वारा प्रयुक्त की जा सकने वाली हल्की तोपें रहती थीं।
(स) जम्बूरखाना – इसमें अन्य हल्की तोपें घुबारें जम्बूरिक तोपें आदि थीं। तोपखाने के समुचित विकास के लिए रणजीतसिंह ने लाहौर में एक कारखाने की स्थापना की। सेना से सम्बन्धित अन्य हथियारों के निर्माण हेतु उन्होंने लाहौर के अतिरिक्त अमृतसर, मुल्तान, जम्मू और श्रीनगर में भी सरकारी कारखाने खोले । जंग बिजली, फतेह जंग, जफर जंग, सूर्येमुखी, निस्तर जंग आदि तोपों के प्रमुख नाम थे। जो यूरोपीय तोपों से श्रेष्ठता में किसी प्रकार कम न थीं।

(2) फौज-ए-बेकवायद — अनियमित सेना (फौज-ए-बेकवायद) के अन्तर्गत विभिन्न वर्गों के घुड़सवार सैनिक सम्मिलित किये जाते थे। जमींदारों एवं अन्य विशिष्ट व्यक्तियों द्वारा प्रयुक्त अश्वारोही ही सैनिक ‘घुड़चढ़ाखास’ और विजित छोटे-छोटे सरकार उनके अश्वारोही, सैनिक ‘गिस्लदारी सवार’ कहलाते थे। ‘फौज-ए-बेकवायद’ के समुचित संगठन व प्रशिक्षण के अभाव के बावजूद राजा द्वारा वार्षिक निरीक्षण (दशहरा पर्व पर) की व्यवस्था रहती थी।

सिख साम्राज्य में सैनिक भर्ती एवं वेतन भत्ता व्यवस्था

सेना में जाट अधिक भर्ती किये जाते थे। वे स्वस्थ व साहसी होते थे। उनमें एकता तथा बलिदान की भावना होती थी। सिक्खों की सेना में योजना बनाने तथा सांग्रामिक कार्यों में परामर्श देने के लिए पाँच प्रमुख सरदारों की समिति होती थी।

प्रारम्भ में सिख साम्राज्य का इतिहास में सैनिकों को नियमित वेतन नहीं दिया जाता था, किन्तु बाद में महाराजा के प्रयासों द्वारा स्थायी सैनिकों को नियमित वेतन देने की व्यवस्था प्रारम्भ हुई। वेतन देने की दैनिक, मासिक एवं षटमासिक विधियों के बावजूद इस बात की कोई गारण्टी नहीं थी कि सैनिकों को निर्धारित समय पर नकद वेतन मिल जी जायेगा। अश्वारोही सैनिकों तथा पैदल सैनिकों के बीच वेतन की असमानता थी। कुछ सैनिक को फसली अनाज, जागीर अथवा भूमि सैनिक सेवा के बदले प्राप्त होती थी। इससे स्पष्ट है कि महाराजा चाहते हुए भी अर्थाभाव में नकद वेतन व्यवस्था को पूर्णरूपेण लागू नहीं कर सके। सैन्य प्रमुखों को शानदार सेवा के बदले ‘पंजाब का सितारा’ नामक पदक एवं जागीर देने की व्यवस्था थी। 30 प्रतिशत रिक्त स्थान सेवा-निवृत्त होने वाले सैनिकों के परिवारों के लिए रखे जाते थे। मृत और अपंग सैनिकों के परिवारों को धर्मार्थ के रूप में धन दिया जाता था।

सिख साम्राज्य के शस्त्रास्त्र

सेना के पास आक्रमणात्मक एवं सुरक्षात्मक संभी प्रकार शस्त्रास्त्र होते थे। तलवार, भाले, कृपाण, धनुष-बाण, बन्दूक आदि प्रमुख शस्त्र थे। सुरक्षात्मक हाथियारों में ढाल तथा कवच होते थे। सैनिक अपने हथियारों, अन्य साज-सामान तथा घोड़ों आदि की व्यवस्था स्वयं करते थे।

प्रशिक्षण एवं अनुशासन

सिक्ख नेता को यूरोपियन पद्धति का प्रशिक्षण देकर रणजीतसिंह ने उसे आधुनिक सेना बनाने के लिए सतत् प्रयत्न किया। पैदल सेना और तोपखाने के समुचित विकास के लिए उसने विदेशी प्रशिक्षकों की व्यवस्था की। सेना का सर्वोच्च कमाण्डर बनकर उसने प्रत्यक्ष नियन्त्रण एवं कमाण्ड की परम्परा स्थापित की।

महाराजा रणजीतसिंह ने अनुशासनहीनता एवं अव्यवस्थित सिक्खों को एकता के सूत्र में बाँधने और उनमें अनुशासन की भावना भरने का भरसक प्रयास किया। साथ ही उनके समक्ष गुरु एवं ईश्वर का आदर्श रखकर उनके मनोबल को पर्याप्त विकसित किया। अपने राजनैतिक स्वार्थों को छिपाकर महाराज विजय हेतु युद्धों को धार्मिक एवं सैद्धान्तिक रंग में रंगकर सैनिकों में अनवरत नवीन चेतना एवं उत्साह का संचार करते रहे। साथ ही सेना में समुचित अनुशासन बनाये रखने के लिए विभिन्न दिशा-निर्देश भी प्रसारित किया करते थे।

सिख साम्राज्य में दुर्ग व्यवस्था

महाराजा रणजीतसिंह ने दुर्ग निर्माण एवं उनकी सुरक्षा आदि पर विशेष बल दिया। मुल्तान, पेशावर, लाहौर, कश्मीर तथा कांगड़ा के दुर्गों में हजारों (लगभग 10,000) सशस्त्र सैनिक तो रखे ही, साथ ही इन किलों में पर्याप्त सैनिक साज-सामान, खाद्य-सामग्री आदि का भी संचय किया था। दुर्ग व्यवस्था हेतु दुर्ग के सर्वोच्च अधिकारी थानेदार के साथ अन्य अधिकारी भी रहते थे।

सिख साम्राज्य में युद्धकला एवं युद्ध नीति

राजपूत तथा मराठों की भाँति सिक्खों ने भी गुरिल्ला युद्ध पद्धति को अपनाया । शत्रु पर अचानक तीव्र आक्रमण कर क्षतिग्रस्त कर देते और उनके मनोबल को तोड़ देते। यदि शत्रु शक्तिशाली हुआ तो पीछे हटकर उसे धोखे में रखते हुए उचित अवसर पाकर उस पर पुनः पूर्ण शक्ति से तीव्र आक्रमण कर देते थे। महाराजा रणजीतसिंह के शासनकाल में उन्हें रोमन आधार पर युद्ध प्रशिक्षण दिया जाने लगा। परिणामस्वरूप प्राचीन सुरक्षात्मक युद्ध विधि आक्रमणात्मक बन गई। सामरिकी में इस प्रकार के परिवर्तनों के साथ-साथ उनके उच्च मनोबल एवं अनुशासन के कारण महाराजा रणजीतसिंह को कांगड़ा, मुल्तान, कश्मीर, पेशावर को अपने अधिकार में लेने का सुअवसर प्राप्त हुआ।

नोट – परीक्षाओं में पूछे जाने वाले प्रश्न —
प्रश्न 1. सिख साम्राज्य का इतिहास क्या है? सैन्य पद्धति, युद्धकला तथा संगठन का पूर्ण विवरण दीजिए।
प्रश्न 2. सिक्ख सैन्य शक्ति के निर्माण या उत्थान में महाराजा रणजीतसिंह के योगदान का उल्लेख कीजिए।
प्रश्न 3. “किसी भी भारतीय शासन की अपेक्षा महाराजा रणजीत सिंह की सेना सुचारु रूप से संगठित थी।” सिख साम्राज्य में सेना के संगठन की प्रमुख विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।

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