अप्रगामी तरंगें क्या है परिभाषा सूत्र, प्रगामी और अप्रगामी तरंगों में अंतर | Stationary Waves in Hindi

अप्रगामी तरंगें क्या है

जब समान आवृत्ति और तरंगदैर्ध्य की दो तरंगें किसी माध्यम में एक ही परन्तु विपरीत दिशा में चलती है, तो उनके अध्यारोपण से एक नवीन प्रकार की तरंग पैदा होती है जिसमें ऊर्जा का किसी दिशा में प्रवाह नहीं होता है। इस प्रकार की तरंग को “अप्रगामी तरंगें” कहते हैं। अर्थात् जैसा कि इन तरंगों के नाम से स्पष्ट है, कि इस प्रकार की तरंग गतिशील नहीं होती है, इसका अर्थ यह है कि अप्रगामी तरंग में श्रृंग या गर्त एक स्थान पर बने रहते हैं। और उनकी गति नहीं होती है।

निस्पनद तथा प्रस्पन्द क्या है

अप्रगामी तरंग पर माध्यम में कुछ बिन्दु ऐसे होते हैं। जिनका स्थायी रूप से कोई विस्थापन नहीं होता है‌। इन्हें ‘निस्पन्द’ कहते हैं। इसके विपरीत माध्यम में कुछ बिन्दु ऐसे भी होते हैं। जिनके कम्पन का आयाम अधिकतम होता है। और उन्हें ‘प्रस्पन्द’ कहते हैं।

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अप्रगामी तरंगों का गणितीय व्यंजक

जब दो समान तरंगदैर्ध्य तथा आयाम की दो प्रगामी तरंगें समान वेग से विपरीत दिशा में चलती हैं तो उनके अध्यारोपण से अप्रगामी तरंगे बनती हैं।
y1 = a sin \frac{2π}{λ} (vt – x) …(1)
(X-अक्ष की धनात्मक दिशा में चलने वाली)
y2 = a sin \frac{2π}{λ} (vt + x) …(2)
(X-अक्ष की ऋणात्मक दिशा में चलने वाली)
अर्थात् जब दोनों तरंगें समीकरण (1) व (2) माध्यम में अध्यारोपित होती है, तो इन तरंगों का परिणामी विस्थापन अध्यारोपण के सिद्धांत के अनुसार,
y = y1 + y2
y = a[sin \frac{2π}{λ} (vt – x) + sin \frac{2π}{λ} (vt + x)]
\footnotesize \boxed{ y = 2a sin \frac{2πvt}{λ} cos \frac{2πx}{λ} } …(3)
“यही अप्रगामी तरंग का समीकरण कहलाता है।”अर्थात्
(a).प्रस्पन्द (Antinodes) – अप्रगामी तरंग के उन बिन्दुओं पर जहां,
sin \frac{2πx}{λ} = 0 या cos \frac{2πx}{λ} = ± 1
अतः समीकरण (3) से स्पष्ट है कि उन स्थानों पर,
1.इन बिन्दुओं पर अन्य बिन्दुओं की अपेक्षा सबसे अधिक विस्थापन y होता है।
2.दूसरे बिन्दुओं की अपेक्षा इन बिन्दुओं का वेग भी अधिक होता है।
3.इन बिन्दुओं पर विकृति अर्थात् दाब परिवर्तन या घनत्व परिवर्तन शून्य होता है।
अर्थात् अप्रगामी तरंगों के लिए उपर्युक्त लक्षण वाले बिन्दुओं को “प्रस्पन्द” कहते हैं।

अब यदि हम दृढ़ सिरे से परावर्तित तरंग लें तब अप्रगामी तरंग की समीकरण निम्न प्रकार प्राप्त होगी।
\footnotesize \boxed{ y = - 2a cos \frac{2πvt}{λ} sin \frac{2πx}{λ} } …(4)
अर्थात् “यही अप्रगामी तरंग का समीकरण कहलाता है।”अर्थात्
(b).निस्पन्द (Nodes) – अप्रगामी तरंग के उन बिन्दुओं पर जहां,
cos \frac{2πx}{λ} = 0 या sin \frac{2πx}{λ} = ± 1
अतः समीकरण (4) से स्पष्ट है कि उन स्थानों पर,
1.विस्थापन सदैव शुरू होता है। अतः इन स्थानों पर कण कम्पन नहीं करते हैं।
2.वेग स्थायी रूप से शून्य होता हैं क्योंकि उस स्थान पर कण में गति नहीं है।
3.दूसरे स्थानों की अपेक्षा इन स्थानों पर विकृति अधिकतम अर्थात् दाब या घनत्व का परिवर्तन अधिकतम होता है।
अतः अप्रगामी तरंगों ऐसे बिन्दुओं को जोकि उपर्युक्त तीनों शर्तों को पूरा करते हैं, उन्हें “निस्पन्द” कहते हैं।

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अप्रगामी तरंगों की विशेषताएं

अप्रगामी तरंगों की मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं।

  • किसी बध्द माध्यम के कुछ कण सदैव अपने ही स्थान पर स्थिर रहते हैं। अर्थात् उनका विस्थापन शून्य होता है। यह ‘निस्पन्द’ कहलाते हैं यह समान दूरियों पर स्थित होते हैं। अप्रगामी तरंगों के अनुदैर्ध्य होने की दशा में निस्पन्दों पर दाब तथा घनत्व में परिवर्तन महत्तम होता है।
  • अप्रगामी तरंग में निस्पन्दों के बीच में कुछ बिन्दु ऐसे होते हैं जिनका विस्थापन महत्तम होता है। यह ‘प्रस्पन्द’ कहलाते हैं। अप्रगामी तरंगों के अनुदैर्ध्य होने की दशा में प्रस्पन्दों पर दाब तथा घनत्व में कोई परिवर्तन नहीं होता है।
  • दो क्रमागत निस्पन्दों अथवा दो क्रमागत प्रस्पन्दों के बीच की दूरी λ/2 होती है। एक निस्पन्द तथा उसके पास वाले प्रस्पन्द की दूरी λ/4 होती है।
  • किसी भी क्षण दो पास-पास स्थित निस्पन्दों के बीच सभी कणों की कला समान होती है। वह साथ-साथ गति करते हुए अपनी-अपनी अधिकतम विस्थापन की स्थिति में पहुंचते हैं तथा साथ ही साथ अपनी साम्यावस्था से गुजरते हैं।
  • किसी भी क्षण किसी निस्पन्द के दोनों ओर के कणों का कलान्तर 180° होता है अर्थात् दोनों और के कण विपरीत कला में कम्पन करते हैं।
  • माध्यम के सभी बिन्दु एक आवर्तकाल में दो बार एक साथ अपनी साम्यावस्था में गुजरते हैं। दूसरे शब्दों में दो बार अप्रगामी तरंग एक सीधी रेखा का रूप ग्रहण करती है।

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अप्रगामी तरंगों के उदाहरण

  1. तनी डोरियों अथवा तारों में – किसी डोरी में भेजी गई अनुप्रस्थ तरंगें डोरी के सिरे से परावर्तित हो जाती हैं तथा आपतित व परावर्तित तरंगों के अध्यारोपण से डोरी में अनुप्रस्थ अप्रगामी तरंगें बनती है। जैसे – वायलिन, गिटार तथा सितार आदि के तारों में उत्पन्न तरंगें अनुप्रस्थ अप्रगामी तरंगें होती हैं।
  2. वायु-स्तम्भों में – किसी पाइप के वायु स्तम्भ में भेजी गई अनुदैर्ध्य तरंग पाइप के सिरे से परिवर्तित हो जाती है तथा आपतित व परावर्तित तरंगों के अध्यारोपण से वायु-स्तम्भ में अनुदैर्ध्य अप्रगामी तरंगें बनती है। जैसे – बांसुरी, अनुनाद नली, वीणा तथा सीटी आदि के वायु-स्तम्भों में उत्पन्न तरंगें अनुदैर्ध्य अप्रगामी तरंगें होती हैं।

प्रगामी तथा अप्रगामी तरंगों में अंतर

प्रगामी तरंगेंअप्रगामी तरंगें
1.यह तरंगें माध्यम में एक निश्चित वेग से आगे बढ़ती रहती हैं।यह तरंगें किसी भी दिशा में आगे नहीं बढ़ती हैं। तथा ये तरंगें दो सीमाओं के बीच सीमित रहती हैं।
2.इन तरंगों में माध्यम के सभी कण कम्पन करते हैं तथा सभी कणों के आयाम तथा आवर्तकाल बराबर होते हैं।इन तरंगों में निस्पन्दों को छोड़कर माध्यम के सभी कण कम्पन करते हैं। उनका आवर्तकाल बराबर होता है परन्तु कम्पन का आयाम भिन्न-भिन्न होता है। निस्पन्दों पर आयाम शून्य व प्रस्पन्दों पर अधिकतम होता है।
3.इन तरंगों में माध्यम के प्रत्येक कण की कला लगातार बदलती रहती है।किसी भी क्षण आसपास के निस्पन्दों के बीच के सभी कणों की कला समान होती है और उनके दोनों और के कणों की कला विपरीत होती है।
4.किसी क्षण माध्यम के समस्त कण एक साथ माध्य स्थिति में नहीं आते और जब भी कोई कण माध्य स्थिति से गुजरता है तो उसके वेग का मान नियत रहता है।प्रत्येक आवर्तकाल में दो बार माध्यम के समस्त कण एक साथ माध्य स्थिति से गुजरते हैं। प्रस्पन्दों पर कणों का वेग अन्य बिन्दुओं की अपेक्षा सदैव अधिकतम रहता है।
5.इन तरंगों में माध्यम के सभी कण क्रमशः दाब और घनत्व परिवर्तन की समान दशाओं से गुजरते हैं अर्थात् सभी बिन्दुओं पर दाब और घनत्व में परिवर्तन होता है।इन तरंगों में निस्पन्दों पर दाब तथा घनत्व परिवर्तन सबसे अधिक तथा प्रस्पन्दों पर सबसे कम होता है।
6.अनुदैर्ध्य प्रगामी तरंग के संपीडन व विरलन तथा अनुप्रस्थ प्रगामी तरंग के श्रृंग व गर्त एक निश्चित वेग से आगे बढ़ते हैं।अनुदैर्ध्य अप्रगामी तरंग के संपीडन व विरलन तथा अनुप्रस्थ अप्रगामी तरंग के शीर्ष व पाद नियत स्थानों पर एकान्तर क्रम से उत्पन्न और विलीन होते रहते हैं परन्तु आगे नहीं बढ़ते।
7.इन तरंगों द्वारा माध्यम में ऊर्जा का संचरण होता है।इन तरंगों द्वारा ऊर्जा का संचरण नहीं होता है।

Note – सिद्ध कीजिए कि अप्रगामी तरंगों में ऊर्जा का संचरण नहीं होता है?

अप्रगामी तरंग में उर्जा का प्रवाह

किसी अप्रगामी तरंग में ऊर्जा का किसी भी तल में तथा किसी भी दिशा में संचरण नहीं होता अर्थात् तरंग में ऊर्जा धारा का मान शून्य होता है। इसकी पुष्टि गणितीय रूप में निम्न प्रकार की जा सकती है ।
माना कि अप्रगामी तरंग का समीकरण निम्नलिखित है –
y = 2a cos \frac{2πx}{λ} sin \frac{2πvt}{λ}
y = 2a cos \frac{2πx}{λ} sinωt
{चूंकि ω = 2πn = \frac{2πv}{λ} }
अप्रगामी तरंग के कारण माध्यम में दाब-आधिक्य,
P = – E × विकृति
P = – E × \frac{dy}{dx}
या P = \frac{2πaE}{λ} sin \frac{2πx}{λ} sinωt
यहां E माध्यम की आयतन प्रत्यास्थता और \frac{dy}{dx} आयतन विकृति है। अप्रगामी तरंग पर कण का वेग,
\frac{dy}{dt} = \frac{2πav}{λ} cos \frac{2πx}{λ} cos \frac{2πvt}{λ}
या v = \frac{dy}{dt}
या v = 2aω cos \frac{2πx}{λ} cosωt

अतः अप्रगामी तरंग के कारण दाब की अधिकता के विपरीत किया गया कार्य या प्रति एकांक क्षेत्रफल व सूक्ष्म समय dt में, संचरित ऊर्जा,
= दाब का परिवर्तन × कण का वेग × समय
= p × v × dt
यह एकांक क्षेत्रफल dt समय में प्रवाहित ऊर्जा के बराबर है।
अतः आवर्तकाल T में एकांक क्षेत्रफल से प्रवाहित ऊर्जा,
= \int^T_0 p × v × dt
अतः प्रति एकांक आयतन ऊर्जा प्रवाह की दर या ऊर्जा धारा
= \frac{1}{T} \int^T_0 p × v × dt
= \frac{1}{T} \int^T_0 ( \frac{2πaE}{λ} sin \frac{2πx}{λ} sinωt) × (2aω cos \frac{2πx}{λ} cosωt) × dt
= \frac{1}{T} \int^T_0 \frac{8πa^2ωE}{λ} sin \frac{2πx}{λ} cos \frac{2πx}{λ} × sinωt cosωt . dt
= \frac{4πa^2ωE}{λ . T} sin \frac{2πx}{λ} cos \frac{2πx}{λ} \int^T_0 \frac{1}{2} sin2ωt . dt
= \frac{4πa^2ωE}{λ . T} sin \frac{2πx}{λ} cos \frac{2πx}{λ} [0]
{चूंकि \int^T_0 sin2ωt . dt = 0 }

= 0

अतः “किसी अप्रगामी तरंग में ऊर्जा का किसी भी दिशा में तथा किसी भी तल में प्रवाह नहीं होता है।”

निष्कर्ष – हमें उम्मीद है कि यह आर्टिकल आपको पसन्द आया होगा तो इसे अपने दोस्तों में भेजें और यदि कोई सवाल या क्योरी हो, तो आप हमें कमेंट्स कर के बताएं हम जल्द ही उसका हल प्राप्त कर देंगे।

Note – अप्रगामी तरंग से सम्बन्धित प्रशन परीक्षाओं में पूछे जाते हैं।
Q.1 अप्रगामी तरंग से आप क्या समझते हैं? अप्रगामी तरंग के बनने की गणितीय व्याख्या कीजिए तथा इस तरंग के प्रमुख गुण समझाइए।
Q. 2 दर्शाइए कि किसी रेखीय परिबध्द माध्यम में अप्रगामी तरंगों से कोई ऊर्जा स्थानांतरित नहीं होती है ?
Q. 3 अप्रगामी तरंगें क्या होती हैं? परिभाषा सूत्र उदाहरण तथा इन तरंगों की मुख्य विशेषताएं लिखिए।
Q.4 प्रगामी तथा अप्रगामी तरंगों में क्या अन्तर होता है? स्पष्ट कीजिए।

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