सूर्यकांत त्रिपाठी निराला – जीवन परिचय, रचनाएं, भाषा शैली व काव्यगत विशेषताएं

सूर्यकांत त्रिपाठी निराला हिंदी छायावादी कवियों के चार स्तंभों में से एक थे। ये भारत के एक प्रमुख हिन्दी कवि, लेखक, उपन्यासकार, निबंधकार, कहानीकार और अनुवादक थे, तो चलिए आज के इस आर्टिकल के माध्यम से हम आपको ‘निराला’ जी के बारे में संपूर्ण जानकारी देंगे, ताकि आप परीक्षाओं में ज्यादा अंक प्राप्त कर सकें।

तो दोस्तों, आज के इस लेख में हमने “सूर्यकांत त्रिपाठी निराला का जीवन परिचय” (Suryakant Tripathi Nirala biography in Hindi) के बारे में बताया है। इसमें हमने सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ का जीवन परिचय, साहित्यिक परिचय, रचनाएं एवं कृतियां, कविताएं, भाषा शैली एवं साहित्य में स्थान और सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ का जन्म और मृत्यु व काव्यगत विशेषताएं को भी विस्तार पूर्वक सरल भाषा में समझाया है।

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इसके अलावा, इसमें हमने सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला जी के जीवन से जुड़े उन सभी प्रश्नों के उत्तर दिए हैं जो अक्सर परीक्षाओं में पूछे जाते हैं। यदि आप निराला जी के जीवन से जुड़े उन सभी प्रश्नों के उत्तर के बारे में जानना चाहते हैं, तो आप इस आर्टिकल को अंत तक अवश्य पढ़ें।

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सूर्यकांत त्रिपाठी निराला का संक्षिप्त परिचय

विद्यार्थी ध्यान दें कि इसमें हमने ‘निराला’ जी की जीवनी के बारे में संक्षेप में एक सारणी के माध्यम से समझाया है।
सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की जीवनी –

पूरा नामपं० सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’
उपनामनिराला
जन्म-तिथि21 फरवरी, 1897 ई. में
जन्मस्थानबंगाल के महिषादल राज्य के मेदिनीपुर जिले में
मृत्यु-तिथि15 अक्टूबर, 1961 ई. में
मृत्युस्थानउत्तर प्रदेश के इलाहाबाद (अब प्रयागराज) में
पिता का नामपं० रामसहाय त्रिपाठी
माता का नामरुकमणी देवी
पत्नी का नामश्रीमती मनोहरा देवी
संतानपुत्री सरोज व पुत्र रामकृष्ण त्रिपाठी
शिक्षाप्रारंभिक शिक्षा हाईस्कूल तक
व्यवसायकवि, लेखक, उपन्यासकार, निबंधकार, संपादक
साहित्य कालआधुनिक काल के छायावादी युग
सम्पादनसमन्वय और मतवाला
लेखन विधाकविता, कहानी, गद्य, उपन्यास, निबंध, आलोचना
भाषाखड़ीबोली
प्रमुख रचनाएंगीतिका, परिमल, तुलसीदास, अनामिका, अप्सरा, सरोज-स्मृति, सुकुल की बीवी, महाभारत और महाराणा प्रताप आदि।
पुरस्कारपद्मभूषण (मरणोपरांत)
अनुवादकरामचरितमानस (विनय भाग) (1948)
हिंदी साहित्य में स्थानछायावादी रचनाकार अथवा छायावाद के सुदृढ़ स्तंभों में से एक
सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की जीवनी

सूर्यकांत त्रिपाठी निराला हिंदी साहित्य में एक प्रभावशाली शख्सियत हैं। इनके लेखन ने कवियों की पीढ़ियों को प्रेरित किया है और इनकी सुन्दरता, गहराई, आध्यात्मिकता और समाजिक प्रासंगिकता के लिए माना जाता है। छायावाद आंदोलन में इनके योगदान और अद्वितीय साहित्यिक लेखन विधा ने हिंदी भाषा के सबसे महत्वपूर्ण कवियों में से एक के रूप में इन्हें भी स्थान दिलाया।

सूर्यकांत त्रिपाठी जी भारत के एक प्रसिद्ध हिंदी कवि, लेखक, उपन्यासकार, निबंधकार, कहानीकार और अनुवादक थे। और इन्हें आधुनिक हिंदी साहित्य के अग्रदूतों में से एक माना जाता है और अक्सर इन्हें “निराला” कहा जाता है, जिसका अर्थ है- ‘अद्वितीय’।

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सूर्यकांत त्रिपाठी निराला का जीवन परिचय

पण्डित कविवर ‘निराला’ का जन्म 21 फरवरी, सन् 1897 ईस्वी में बंगाल के महिषादल राज्य के मेदिनीपुर जिले में हुआ था। इनके पिता पण्डित रामसहाय त्रिपाठी उत्तर प्रदेश के बैसवाड़ा क्षेत्र के जिला उन्नाव के गढ़ाकोला ग्राम के निवासी थे। और महिषादल राज्य में जाकर राजकीय सेवा में कार्य कर रहे थे। इनकी माता का नाम रुकमणी देवी था और जब सूर्यकांत त्रिपाठी जी ढाई वर्ष के थे तभी इनकी माता का देहांत हो गया था। और इनके पालन-पोषण का भार इनके पिता के कंधों पर आ गया था।

सूर्यकांत त्रिपाठी निराला
सूर्यकांत त्रिपाठी निराला का जीवन परिचय

सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की प्रारंभिक शिक्षा महिषादल हाई स्कूल में संपन्न हुई। तथा संस्कृत, बंगला और अंग्रेजी का अध्ययन इन्होंने घर पर ही किया। बचपन से ही निराला जी को कुश्ती, घुड़सवारी और खेलों में बहुत अधिक रूचि थी। और मात्र 14 वर्ष की अल्पायु में ही इनका विवाह मनोहरा देवी के साथ सम्पन्न हुआ। लेकिन वे भी शीघ्र ही इनमें साहित्यिक संस्कार जगाकर एक पुत्र और पुत्री का भार इनके ऊपर छोड़कर इस संसार से विदा हो गई। पुत्री सरोज जब बड़ी हुई तो इन्होंने उसका विवाह किया लेकिन थोड़े ही दिनों में उसने भी आंखें मूंद ली। निराला जी अपनी इस विवाहिता पुत्री के निधन से अत्यधिक क्षुब्ध हो उठे। निधन के इस विक्षोभ को इन्होंने अपनी रचना “सरोजस्मृति” में वाणी दी।

सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी ने प्रारंभ में अपने परिवार के भरण-पोषण के लिए महिषादल राज्य में नौकरी की किंतु अपने स्वाभिमान से परिपूर्ण व्यक्तित्व के कारण उस सामन्ती वातावरण से ये सामंजस्य नहीं स्थापित कर सकें। जिसके फलस्वरूप वहां से अलग होकर इन्होंने कलकत्ता में अपनी रूचि के अनुरूप रामकृष्ण-मिशन के पत्र “समन्वय” और “मतवाला” का सम्पादन किया। 3 वर्ष बाद लखनऊ आकर ‘गंगा पुस्तकमाला’ का संपादन करने लगे तथा ‘सुधा’ के संपादकीय लिखने लगे।

सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी फक्कड़ और अक्खड़ स्वभाव के कारण इनकी यहां पर भी नहीं निभी और लखनऊ छोड़कर ये इलाहाबाद में रहने लगे। आर्थिक कष्ट भोगते हुए इन्होंने जनसाधारण के साथ अपने आप को एकात्मक कर दिया और प्रगतिशील काव्य रचनाओं के साथ बड़ी प्रसिद्धि प्राप्त की। 15 अक्टूबर, सन् 1961 ईस्वी को प्रयागराज (इलाहाबाद), उत्तर प्रदेश में इनका देहावसान हो गया था।

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सूर्यकांत त्रिपाठी निराला का साहित्यिक परिचय

महाकवि ‘निराला’ जी का उदय छायावादी कवि के रूप में हुआ। इन्होंने अपने साहित्यिक जीवन का प्रारंभ “जन्मभूमि की वन्दना” नाम की एक कविता की रचना करके किया। इन्होंने ‘सरस्वती’ और ‘मर्यादा’ पत्रिकाओं का निरंतर अध्ययन करके हिंदी का ज्ञान प्राप्त किया। “जुही की कली” नाम की एक कविता की रचना करके इन्होंने हिंदी जगत् में अपनी एक पहचान बना ली। छायावादी लेखक के रूप में प्रसाद, पन्त और महादेवी वर्मा के समकक्ष ही सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी की भी गणना की जाती है। ये छायावाद के चार स्तंभों में से एक माने जाते हैं।

सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की प्रमुख रचनाएं

निराला जी बहुमुखी प्रतिभा के सम्पन्न साहित्यकार थे। कविताओं के अलावा इन्होंने उपन्यास, निबंध, कहानी, आलोचना एवं संस्मरण भी लिखे हैं। इनकी प्रमुख काव्य रचनाएं कुछ इस प्रकार से हैं – परिमल, अनामिका, गीतिका, तुलसीदास, अपरा, अणिमा, कुकुरमुत्ता, अर्चना, नए पत्ते, बेला, आराधना आदि। और कुछ गद्य रचनाओं में – लिलि, चतुरी चमार, अलका, निरुपमा, अप्सरा और प्रभावती आदि इनके श्रेष्ठ गद्य रचनाएं हैं।

सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की भाषा शैली

निराला जी ने अपनी रचनाओं में शुद्ध एवं परिमार्जित खड़ीबोली का प्रयोग किया है। भाषा में अनेक स्थलों पर शुद्ध तत्सम शब्दों का भी प्रयोग किया गया है जिसके कारण इनके भावों को सरलता से समझने में कठिनाई होती है। इनकी छायावादी रचनाओं में जहां भाषा की क्लिष्टता मिलती है वहीं पर इसके विपरीत प्रगतिवादी रचनाओं की भाषा अत्यन्त सरल, सरस एवं व्यावहारिक होती है। छायावाद पर आधारित निराला जी की रचनाओं में कठिन एवं दुरूह शैली तथा प्रगतिवादी रचनाओं में सरल एवं सुबोध शैलियों का प्रयोग देखने को मिलता है।

सूर्यकांत त्रिपाठी निराला का साहित्यिक विशेषताएं

आधुनिक चेतना के विद्रोहशील स्वरूप की सर्वाधिक और सबसे समर्थ अभिव्यक्ति निराला जी के काव्य में है। बंगभूमि में जन्म होने के कारण बंगला भाषा और उसके आधुनिक चेतना से ओत-प्रोत साहित्य का इन्हें भली प्रकार अध्ययन अनुशीलन का अवसर मिला। बंगाल के धार्मिक महापुरुषों – श्री रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद आदि ने भी इन्हें प्रभावित किया। विश्वकवि रवीन्द्रनाथ की काव्य प्रतिभा का अभिनंदन करते हुए इन्होंने अपने प्रारंभिक रचनाकाल में ‘रवीन्द्र कविता कानन’ की रचना की। किन्तु इनका व्यक्तित्व स्वयं महाप्राणा था, इसीलिए ये सभी प्रभाव इनके भीतर पूर्णतः समाहित हो गए।

सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी की मातृभाषा हिंदी थी और उसके प्रति इनके मन में पर्याप्त अनुराग था। इसीलिए सरस्वती व मर्यादा आदि पत्रिकाओं के गंभीर अध्ययन के माध्यम से बंगला भाषियों के बीच रहते हुए भी इन्होंने हिंदी का अभ्यास किया और हिंदी में ही साहित्य का सृजन आरंभ किया।

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सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की रचनाएं एवं लेखन कार्य

निराला जी ने लगभग सन् 1920 ई. में अपने लेखन कार्य की शुरुआत की। और इन्होंने अपने साहित्यिक जीवन के प्रारंभ में ‘जन्मभूमि की वंदना’ नामक सबसे पहली कविता की रचना की थी। ‘जुही की कली’ नामक कविता की रचना करके इन्होंने हिंदी जगत् में अपनी एक अलग पहचान बनाई थी। कविता के अलावा, निराला जी ने गद्य रचनाओं में भी प्रचुर मात्रा में लेखन कार्य किया है।

सूर्यकांत त्रिपाठी निराला के काव्य-संग्रह

  • अनामिका (सन् 1923 ई.)
  • परिमल (सन् 1930 ई.)
  • गीतिका (सन् 1936 ई.)
  • अनामिका (द्वितीय) (सन् 1939 ई.) – {नोट- विद्यार्थी ध्यान दें कि, इसी संग्रह में “सरोज स्मृति” और “राम की शक्तिपूजा” जैसी प्रसिद्ध कविताओं का संकलन है}
  • तुलसीदास (सन् 1939 ई.)
  • कुकुरमुत्ता (सन् 1942 ई.)
  • अणिमा (सन् 1943 ई.)
  • बेला (सन् 1946 ई.)
  • नए पत्ते (सन् 1946 ई.)
  • अर्चना (सन् 1950 ई.)
  • आराधना (सन् 1953 ई.)
  • गीत कुंज (सन् 1954 ई.)
  • सांध्य काकली
  • अपरा (संचयन) ।

सूर्यकांत त्रिपाठी निराला के उपन्यास

  • अप्सरा (सन् 1931 ई.)
  • अलका (सन् 1933 ई.)
  • प्रभावती (सन् 1936 ई.)
  • निरूपमा (सन् 1936 ई.)
  • कुल्ली भाट (सन् 1938-39 ई.)
  • बिल्लेसुर बकरिहा (सन् 1942 ई.)
  • चोटी की पकड़ (सन् 1946 ई.)
  • काले कारनामे (सन् 1950 ई.) (अपूर्ण)
  • चमेली (अपूर्ण)
  • इन्दुलेखा (अपूर्ण) ।

सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की कहानी-संग्रह

  • लिलि (सन् 1934 ई.)
  • सखी (सन् 1935 ई.)
  • सुकुल की बीवी (सन् 1941 ई.)
  • चतुरी-चमार (सन् 1945 ई.) – [नोट- ‘सखी’ संग्रह की कहानियों का ही इस नए नाम से पुनर्प्रकाशन]
  • देवी (सन् 1947 ई.) – [नोट- ‘देवी’ संग्रह वस्तुतः पूर्व प्रकाशित संग्रहों से संचयन है। इसमें एकमात्र नई कहानी “जान की” संकलित है]

निराला जी के निबंध-आलोचना

  • रवीन्द्र कविता कानन (सन् 1929 ई.)
  • प्रबंध पद्म (सन् 1934 ई.)
  • प्रबंध प्रतिमा (सन् 1940 ई.)
  • चाबुक (सन् 1942 ई.)
  • चयन (सन् 1957 ई.)
  • संग्रह (सन् 1963 ई.) ।

निराला जी के पुराण-कथा

  • महाभारत (सन् 1939 ई.)
  • रामायण की अन्तर्कथाएं (सन् 1956 ई.)

निराला जी के बालोपयोगी साहित्य

  • भक्त ध्रुव (सन् 1926 ई.)
  • भक्त प्रहलाद (सन् 1926 ई.)
  • भीष्म (सन् 1926 ई.)
  • महाराणा प्रताप (सन् 1927 ई.)
  • सीखभरी कहानियां (ईसप की नीति कथाएं) (सन् 1969 ई.) ।

सूर्यकांत त्रिपाठी निराला के अनुवाद

  • रामचरितमानस (विनय भाग) (सन् 1948 ई.)
  • आनन्दमठ
  • विषवृक्ष
  • कृष्णकांत का वसीयतनामा
  • कपालकुंडला
  • दुर्गेश नन्दिनी
  • राजसिंह
  • राजरानी
  • देवी चौधरानी
  • युगलांगुलीय
  • चन्द्रशेखर
  • रजनी
  • श्रीराम कृष्णवचनामृत
  • परिव्राजक
  • भारत में विवेकानंद
  • राजयोग (अंशानुवाद) ।

सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की काव्यगत विशेषताएं

निराला जी की स्वच्छंदतावादी काव्य कला का प्रमुख स्वरुप इनके “परिमल” काव्य-संग्रह की रचनाओं में दृष्टिगत होता है। इसमें हमें सौन्दर्य चेतना के मानवीय, प्रकृति परक और आध्यात्मिक सभी रूप देखने को मिलते हैं। अतीत के भी भावना और कल्पना से अनुरञ्जित अनेक भव्य और प्रेरणाप्रद चित्र हैं। उनका सहज संवेदनशील हृदय समाज के अनेक पीड़ितों और प्रपीड़ितों के प्रति सहानुभूति से परिपूर्ण हो उठा हैं। इसी अनुभूति को लेकर इनका विद्रोही मन सजग हो उठा है और बड़ी ओजस्वी शब्दावली में व्यक्ति, समाज और संपूर्ण देश को विप्लव के लिए आह्वान करने लगा है।
इनके व्यक्तित्व के कोमल पक्ष का सहज अभिव्यंजना ‘गीतिका’ में है जिसके विभिन्न गीतों में बंगला के माध्यम से गृहीत पाश्चात्य संगीत के संविधान का उपयोग है।

विद्रोही-स्वर

निराला जी ने अपने विद्रोहशील व्यक्तित्व को लेकर मन के प्रबल भावा वेग को जब वाणी दी तो छंद के बंधन सहज ही विच्छिन्न हो गए और मुक्त छंद का आविर्भाव हुआ। कविता का यह स्वच्छंद स्वरूप इनकी प्रथम रचना ‘जुही की कली’ से ही दृष्टत्य है। साहित्य का स्वच्छंदतावादी संविधान सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी की रचनाओं में ही सबसे सशक्त रूप में प्रकट हुआ है। स्वच्छंदतावाद या छायावाद की मूलभूत प्रवृत्ति आत्मानुभूति के अंतरिक्ष स्पर्श से अलंकृत भाषा में अभिव्यक्त है जो मुक्त छंद के अतिरिक्त कभी-कभी गीत रूप भी ग्रहण करती है।

प्रकृति-चित्रण

सूर्यकांत त्रिपाठी निराला के काव्य में प्रकृति का सजीव एवं संश्लिष्ट चित्रांकन किया गया है। भारतीय संस्कृति के प्रति कवि के हृदय में पूर्ण अवस्था है। स्वदेश प्रेम के प्रचुर भाव भी उनके काव्य में मुखरित हुए हैं।

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सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की कविताएं

[प्रस्तुत रचना बादल-राग ‘परिमल’ नामक काव्य-संग्रह से अवतरित है।]

बादल-राग

झूम-झूम मृदु गरज गरज घन घोर!
राग-अमर! अम्बर में भर निज रोर!
झर झर झर निर्झर-गिरि सर में,
घर मरु तरु-मर्मर सागर में,
सरित-तड़ित गति चकित पवन में,
मन में, विजन गहन-कानन में,
आनन-आनन में रव घोर कठोर-
राग-अमर! अम्बर में भर निज रोर!
अरे वर्ष के हर्ष!
बरस तू बरस-बरस रस धार!
पार ले चल तू मुझको,
बहा दिखा मुझको भी निज
गर्जन भैरव-संसार!
उथल-पुथल कर हृदय-
मचा हलचल-
चल रे चल-
मेरे पागल बादल!
धॅंसता दलदल,
हॅंसता है नद खल-खल,
बहता, कहता कुल-कुल कल-कल कल-कल।
देख-देख नाचता हृदय
बहने का महा विकल बेकल,
इस मरोर से- इसी शोर से-
सघन घोर गुरु गहन रोर से
मुझे गगन का दिखा सघन वह छोर!
राग अमर! अम्बर में भर निज रोर!

सूर्यकांत त्रिपाठी निराला का साहित्य में स्थान

निराला जी छायावाद के सुदृढ़ स्तंभों में से एक थे। उनकी कविताएं और साहित्यिक योगदान को आज भी याद किया जाता है और उन्हें हिन्दी साहित्य के महान् कवियों में से एक के रूप में स्मरण किया जाता है। अतः इस प्रकार छायावादी कवियों में सबसे अधिक विद्रोहशील, सर्वाधिक उदात्त और जनजीवन के प्रति विशेष रूप से ‘निराला’ जी को सजग कहा जा सकता है।

FAQs. सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी के जीवन से जुड़े प्रश्न उत्तर

1. सूर्यकांत त्रिपाठी निराला का जन्म कब और कहां हुआ था?

सूर्यकांत त्रिपाठी निराला का जन्म 21 फरवरी, 1897 ई. में पश्चिम बंगाल के महिषादल राज्य के मेदिनीपुर जिले में हुआ था।

2. सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की मृत्यु कब और कहां हुई थी?

सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की मृत्यु 15 अक्टूबर, 1961 ई. को प्रयागराज (इलाहाबाद), उत्तर प्रदेश में हुई थी।

3. सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की पत्नी कौन थी?

सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की पत्नी मनोहरा देवी थी।

4. सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की भाषा क्या है?

सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी की मातृभाषा हिन्दी थी और उसके प्रति इनके मन में पर्याप्त अनुराग था। इसीलिए ‘सरस्वती’, ‘मर्यादा’ आदि पत्रिकाओं के गंभीर अध्ययन के माध्यम से बंगला-भाषियों के बीच रहते हुए भी इन्होंने हिन्दी का अभ्यास किया और हिन्दी में ही साहित्य का सृजन आरम्भ किया।

5. सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की प्रमुख रचनाएं कौन कौन सी हैं?

सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी की प्रमुख रचनाएं – परिमल, गीतिका, अनामिका, तुलसीदास, कुकुरमुत्ता, अणिमा, अपरा, बेला, नये पत्ते, आराधना, अर्चना, लिली, चतुरी चमार, अलका, प्रभावती, अप्सरा तथा निरुपमा आदि।

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