दो विश्व युद्ध के बीच की दुनिया, NCERT सार संग्रह | The world between the two world wars in Hindi

हेलो दोस्तों, आज के इस लेख में हम आपको संक्षिप्त इतिहास NCERT सार संग्रह “महेश कुमार वर्णवाल” Book का अध्याय “दो विश्व युद्ध के बीच की दुनिया” (The world between the two world wars in Hindi) के बारे में संपूर्ण जानकारी देंगे। इसमें हम आपको दो विश्व युद्ध के बाद की दुनिया की विशेषताएं एवं संधियों को विस्तार पूर्वक सरल भाषा में समझाएंगे, तो आप इस आर्टिकल को अंत तक अवश्य पढ़ें।

दो विश्व युद्ध के बीच की दुनिया

इस काल की विशेषताएँ-

  • प्रथम विश्व युद्ध को युद्ध-मात्र का दौर समाप्त कर देने वाला युद्ध कहा गया था। लोगों का विचार था कि इस युद्ध के बाद शांति, स्वतंत्रता, लोकतंत्र तथा प्रत्येक व्यक्ति के लिए बेहतर जीवन के युग का प्रादुर्भाव होगा।
  • सात महीने पश्चात् रूसी क्रांति हुई और सोवियत सरकार ने शांति का घोषणापत्र जारी किया, जिसमें सभी युद्धरत राष्ट्रों तथा जन-समाजों से ऐसी शांति वार्ता आयोजित करने के लिए अनुरोध किया गया, जिसमें किसी भी देश द्वारा किसी अन्य देश को भूमि को हथियाने और किसी प्रकार की क्षतिपूर्ति करने की बात न हो।
  • मित्र शक्तियों ने सोवियत सुझाव को ठुकरा दिया और जर्मनी ने रूस को युद्ध से अलग होने देने की उससे भारी कीमत वसूल की।

🔺8 जनवरी, 1918 को वुडरो विल्सन (अमेरिका के राष्ट्रपति) ने अपना शांति प्रस्ताव प्रस्तुत किया। यह प्रस्ताव चौदह सूत्री प्रस्ताव के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

  • इन चौदह सूत्रों में गुप्त कूटनीति को समाप्ति, समुद्रों के निर्बाध उपयोग की स्वतंत्रता और राष्ट्रीयता के सिद्धांत के आधार पर यूरोपीय देशों की सीमाओं के पुनर्निर्धारण के सुझाव शामिल थे।
  • उपनिवेशों के मामले में राष्ट्रीय आत्म-निर्णय के सिद्धांत की बात न करके औपनिवेशिक दावों में निष्पक्षतापूर्ण ताल-मेल बैठाने का अनुरोध किया गया।
  • इस प्रस्ताव के अंतिम सूत्र में छोटे-बड़े सभी राष्ट्रों की राजनीतिक स्वतंत्रता की पारस्परिक गारंटी देने के प्रयोजन से राष्ट्रों के एक सामान्य संघ की स्थापना की बात कही गई थी।
  • युद्ध के फलस्वरूप यूरोप का प्रभुत्व अत्यधिक क्षीण हो गया, यद्यपि उपनिवेशों पर उसकी पकड़ बनी रही। यूरोप में कई स्वतंत्र राष्ट्रों का उदय हुआ जो पूर्णतः तो नहीं, लेकिन सामान्यतः राष्ट्रीयता के सिद्धांत पर आधारित थे।
  • इस काल में संयुक्त राज्य अमेरिका विश्व की प्रमुख शक्ति बन गया। अधिकतर यूरोपीय अर्थव्यवस्थाएँ उसी पर निर्भर हो गई।
  • औद्योगीकृत देशों के युद्ध के पहले के समाज जिन आर्थिक तथा सामाजिक असमानताओं से ग्रस्त थे, वे विषमताएँ इस काल में भी बनी रहीं।
  • सन् 1929-33 के आर्थिक संकट से तत्कालीन व्यवस्था के बुनियादरी दोष पूरी तरह से उजागर हो गए।

शांति संधियाँ (थोपी गई शांति)

  • प्रथम विश्व युद्ध में मित्र-शक्तियों का प्रमुख शत्रु जर्मनी था। जर्मनी के साथ शांति-संधि का प्रारूप तैयार करने के लिए, मित्र राष्ट्रों का शांति सम्मेलन 18 जनवरी, 1919 को पेरिस में आरंभ हुआ।
  • संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति वुडरो विल्सन, ब्रिटिश प्रधानमंत्री लॉयड जार्ज और फ्रांसीसी प्रधानमंत्री जॉर्ज क्लेमेंसो का सम्मेलन पर प्रभाव बना रहा।
  • जर्मनी में इस शर्त पर आत्म समर्पण किया था कि वुडरो विल्सन के चौदह सूत्र तथा अन्य वक्तव्य शांति का आधार बनेंगे।

🔺चौदह सूत्रों के अलावा विल्सन ने यह घोषणा भी की थी कि किसी देश के किसी प्रदेश पर अधिकार नहीं किया जाएगा, किसी से कोई आर्थिक माँग नहीं की जाएगी और न किसी से दंडस्वरूप किसी भी प्रकार का कोई हर्जाना देने को कहा जाएगा।

  • सम्मेलन में न तो जर्मनी का और न ही किसी अन्य केन्द्रीय शक्ति का कोई प्रतिनिधि बुलाया गया।
  • प्रारूप को अंतिम रूप देने के बाद विजेताओं ने जर्मनी को पाँच दिन का समय दिया, जिसके अनुसार वह या तो इस पर हस्ताक्षर करे या आक्रमण का सामना करने के लिए तैयार रहे।
  • जर्मनी के सामने उस पर हस्ताक्षर करने के अलावा कोई उपाय नहीं रह गया था। जर्मनी ने इसे ‘थोपी गई शांति’ कहा। जर्मनी को युद्ध के लिए अपराधी स्वीकार करने पर भी विवश किया गया।

राष्ट्र संघ की स्थापना

  • शांति सम्मेलन के सबसे प्रमुख कार्यों में राष्ट्र संघ की स्थापना (अर्थात् विल्सन के चौदहवें सूत्र पर अमल) करना था।
  • राष्ट्र संघ के सम्मेलन में प्रतिज्ञापत्र को (औपचारिक शपथपूर्ण तथा बंधनकारी समझौते) अप्रैल, 1919 में स्वीकृति प्रदान की गई।
  • अंतर्राष्ट्रीय सहयोग, शांति तथा सुरक्षा को बढ़ावा देने सम्बंधी संघ के प्राथमिक लक्ष्य के लिए तीन अनुच्छेद विशेष रूप से महत्वपूर्ण थे।
  • 8वें अनुच्छेद में उल्लेख था, कि शांति कायम रखने के लिए राष्ट्रों के शस्त्रों के भंडार में कटौती जरूरी है।
  • 10वें अनुच्छेद में कहा गया था कि संघ के सदस्य यह वचन देते हैं, कि वे सभी सदस्यों की प्रादेशिक अखण्डता और वर्तमान राजनीतिक स्वतंत्रता का सम्मान करेंगे और बाहरी आक्रमण के विरूद्ध उनकी रक्षा करेंगे। यदि ऐसा आक्रमण हुआ तो परिषद् ऐसे उपाय सुझाएगी, जिनसे इस दायित्व का निर्वाह किया जा सकें।
  • 16वें अनुच्छेद में दबावों और शांति प्रयोग के बारे में बताया गया था। उसके अनुसार, यदि संघ का कोई सदस्य युद्ध का सहारा लेगा तो स्वतः ही मान लिया जाएगा कि उसने संघ के अन्य सभी सदस्यों के विरुद्ध युद्ध छेड़ दिया है।
  • इस अनुच्छेद में विधान किया गया था कि अन्य सदस्य उस सदस्य देश के साथ अपने सारे व्यापारिक और वित्तीय सम्बंध तोड़ लेंगे और परिषद् के अनुरोध पर युद्ध तथा सशस्त्र बलों का सामूहिक उपयोग करेंगे।

🔺संघ द्वारा बनाई गई दो एजेंसियों ने कुछ उपयोगी काम भी किए। इनमें एक अंतर्राष्ट्रीय न्याय के निमित्त स्थापित स्थायी न्यायालय (परमानेंट कोर्ट ऑफ इंटरनेशनल जस्टिस), जो वर्ल्ड कोर्ट या विश्व अदालत के नाम से प्रसिद्ध हुआ व दूसरा अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक संगठन को स्थापना करना था।

वर्साय की संधि

  • जर्मनी के साथ शांति संधि पर 28 जून, 1919 को हस्ताक्षर हुए। यह संधि वर्साय की संधि के नाम से प्रसिद्ध है।
  • इस संधि की शर्तों के अनुसार अल्सास-लॉरेन, जो जर्मनी ने 1871 ई. में फ्रांस से छीन लिए थे, अब फ्रांस को वापस कर दिए गए।
  • नव-स्थापित राज्य पोलैंड को लगभग 64 किलोमीटर का गलियारा देकर समुद्र तक पहुँचने का रास्ता सुलभ करा दिया गया।
  • डान्त्सिग को स्वतंत्र नगर बना दिया गया, जिस पर राष्ट्र संघ का राजनीतिक तथा पोलैंड का आर्थिक नियंत्रण था। बेल्जियम, डेनमार्क और लिथुआनिया को भी जर्मनी के कुछ प्रदेश प्राप्त हुए।
  • सार कोयला खान क्षेत्र को पंद्रह वर्षों के लिए राष्ट्र संघ के नियंत्रण में रख दिया गया और इस क्षेत्र की खानें मुआवजे के तौर पर फ्रांस को सौंप दी गईं।
  • जर्मनी को ऑस्ट्रिया के साथ संघ बनाने से प्रतिबंधित कर दिया। यह तय हुआ कि राइनलैंड को स्थायी रूप से विसैन्यीकृत कर दिया जाए और उस पर पंद्रह वर्षों तक मित्र शक्तियों की सेनाओं का अधिकार बना रहे।
  • जर्मन सेना के सैनिकों की संख्या एक लाख तक सीमित कर दी गई। उसे कोई वायु सेना और पनडुब्बियाँ रखने का भी अधिकार नहीं दिया गया। क्षतिपूर्ति की राशि का हिसाब बार में लगाया गया जो 660 करोड़ पौंड था।
  • जर्मनी से उसके सभी उपनिवेश छीन लिए गए और गुप्त संधि यों की शर्तों के अनुसार विजेता शक्तियों ने उन्हें आपस में बाँट लिया। राष्ट्रसंघ के प्रतिज्ञापत्र में मैंडेट या शासनाधिकार नामक एक प्रणाली की व्यवस्था की गई थी।
  • यह प्रणाली पराजित औपनिवेशिक शक्तियों के उपनिवेशों पर लागू की गई। प्रतिज्ञापत्र में कहा गया था कि इन उपनिवेशों और प्रदेशों में ऐसे लोग रहते हैं जो आधुनिक विश्व की विषम परिस्थितियों में अपने पैरों पर खड़े नहीं रह सकते और ऐसे लोगों का कल्याण और विकास सभ्य संसार का एक पवित्र कर्तव्य है।’
  • इस कर्तव्य को व्यावहारिक रूप देने के लिए प्रतिज्ञापत्र में कहा गया था कि इन उपनिवेशों और प्रदेशों में रहने वाले लोगों को उन्नत राष्ट्रों के संरक्षण में रख देना चाहिए।

ऑस्ट्रिया, हंगरी और तुर्की के साथ संधियाँ

  • 10 सितंबर, 1919 को ऑस्ट्रिया के साथ सेंट जर्मन की संधि पर हस्ताक्षर हुए।
  • इस संधि के अनुसार ऑस्ट्रिया को हंगरी, पोलैंड, चेकोस्लोवाकिया और यूगोस्लाविया को स्वतंत्रता को मान्यता देनी पड़ी और साथ ही इन्हें तथा इटली को अपने प्रदेश भी देने पड़े।
  • हंगरी के साथ एक अलग संधि पर हस्ताक्षर किए गए क्योंकि अब वह एक स्वतंत्र राज्य था। उसे अपने कुछ प्रदेश यूगोस्लाविया, चेकोस्लोवाकिया तथा रोमानिया को देने पड़े। अंतिम संधि तुर्की के साथ हुई। एक गुप्त समझौते के अनुसार, ब्रिटेन और फ्रांस उसके अरब प्रदेशों को पहले ही आपस में वितरित कर चुके थे।
  • सीरिया और लेबनान फ्रांस के नियंत्रण में तथा इराक, फिलिस्तीन और ट्रांसजॉर्डन ब्रिटिश अधिकार में आ गए थे।
  • ब्रिटेन और फ्रांस को इन राज्यों का नियंत्रण मेंडेट या शासनाधिकार के नाम पर सौंपा गया।
  • हेजाज एक अलग राज्य बन गया, लेकिन नज्द के शासक इब्न सऊद ने उसे शीघ्र जीत कर सऊदी अरब नामक राज्य स्थापित कर लिया।
  • तुर्की के विखंडन से तुर्की राष्ट्रवाद का जन्म हुआ। युनान और इटली ने तुर्की के बहुत बड़े हिस्से पर अधिकार कर लिया था। सितंबर, 1920 में तुर्की के सुल्तान ने एक संधिपत्र पर हस्ताक्षर किए, जिसका अर्थ तुर्की के संपूर्ण विखंडन पर सहमत होना था।
  • इस बीच मुस्तफा कमाल के नेतृत्व में राष्ट्रवादी आंदोलन पूरे तुर्की में फैल चुका था। कमाल ने अंकारा में एक सरकार भी स्थापित कर ली थी।
  • कमाल की सेना ने इटालवियों और यूनानियों को तुर्की से बाहर कर दिया और मित्र शक्तियों को जुलाई, 1923 में तुर्की के साथ एक नई संधि करनी पड़ी।

🔺तुर्की को गणतंत्र घोषित किया गया और इसके साथ ही एक आधुनिक धर्म-निरपेक्ष राज्य के रूप में उसका विकास प्रारम्प हो गया। खलीफा के पद को समाप्त कर दिया गया।

  • इन संधियों के फलस्वरूप प्रथम विश्व युद्ध औपचारिक रूप से समाप्त हो गया। किन्तु इन संधियों की कई धाराएँ यूरोप में नए तनावों का कारण बनीं। रूस और जर्मनी को आरंभ से ही सभी वार्ताओं एवं राष्ट्र संघ से अलग रखा गया।

पेरिस शांति सम्मेलन

  • जनवरी और जून, 1919 के बीच विजयी शक्तियों मित्र राष्ट्रों का एक सम्मेलन पहले पेरिस के उपनगर वर्साय में और फिर पेरिस में हुआ। हालाँकि इस सम्मेलन में 27 वेश भाग ले रहे थे मगर शांति-संधियों की शर्तें केवल तीन देश ब्रिटेन, फ्रांस और अमेरिका तय कर रहे थे।
  • अमेरिकी राष्ट्रपति वुडरो विल्सन, ब्रिटेन के प्रधानमंत्री लॉयड जॉर्ज और फ्रांस के प्रधानमंत्री जॉर्ज क्लीमेंसो के सम्मेलन में पराजित देशों को कोई प्रतिनिधित्व नहीं दिया गया।
  • सम्मेलन से रूस को भी बाहर रखा गया। दक्षिण-पश्चिम अफ्रीका और पूर्वी अफ्रीका में स्थित जर्मन उपनिवेश ब्रिटेन, बेल्जियम, दक्षिण अफ्रीका और पुर्तगाल को दे दिए गए।
  • प्रशांत क्षेत्र में स्थित उसके उपनिवेश तथा चीन में उसके सारे अधिकार क्षेत्र जापान को दे दिए गए। युद्ध के दौरान चीन मित्र राष्ट्रों का सहयोगी था। पेरिस सम्मेलन में चीन का प्रतिनिधि भी शामिल हुआ लेकिन जर्मनी के अधिकार या नियंत्रण करने वाले चीनी क्षेत्र चीन को नहीं लौटाए गए बल्कि वे जापान को दे दिए गए।
  • युद्ध में मित्र राष्ट्रों को जो क्षति हुई थी, उसका हर्जाना भी जर्मनी को भरना पड़ा, उसके लिए 6 अरब 50 करोड़ पौंड की भारी राशि निश्चित की गई।
  • जर्मनी के सहयोगियों के साथ अलग से संधियाँ की गई। ऑस्ट्रिया-हंगरी को विभाजित कर दिया गया। ऑस्ट्रिया से कहा गया कि वह हंगरी, चेकोस्लोवाकिया, यूगोस्लाविया और पोलैंड की स्वाधीनता को मान्यता दे। उसे अपने क्षेत्र भी इन देशों को और इटली को देने पड़े।
  • बाल्कन क्षेत्र में अनेक परिवर्तन किए गए। अनेक नए राज्य बनाए गए और उनके बीच भू-भागों का हस्तांतरण किया गया। बाल्टिक राज्य को पूरी तरह छिन्न-भिन्न कर दिया गया।
  • क्षेत्रों और देशों का यह हस्तांतरण जिस व्यवस्था के तहत किया गया उसे शासनादेश कहा जाता है। सिद्धांत रूप से शासनादेश पाने वाली शक्तियां अर्थात् ब्रिटेन और फ्रांस को इन देशों की जनता के हितों के लिए शासन चलाना था। लेकिन वास्तव में उनका शासन उपनिवेशों की तरह किया जाने लगा।
  • तुर्की के क्षेत्र का अधिकांश भाग यूनान और इटली को दे दिया गया और खुद तुर्की को एक बहुत छोटा-सा राज्य बनाने का निर्णय लिया गया।

🔺तुर्की में मुस्तफा कमाल के नेतृत्व में एक क्रांति हुई जिसमें सुल्तान को सभा से हटा दिया गया और तुर्की को 1922 ई. में गणराज्य घोषित कर दिया गया।

  • तुर्की ने एशिया माइनर और कुस्तुनतुनिया शहर पर पुनः अधिकार कर लिया और मित्र राष्ट्रों को उसके साथ पहले की गई संधि समाप्त करनी पड़ी।
  • इन शांति संधियों का एक प्रमुख अंग राष्ट्र संघ (लीग ऑफ नेशंस) की प्रसंविदा था। राष्ट्रपति विल्सन के 14 सूत्रों में शांति बनाए रखने के लिए एक अंतर्राष्ट्रीय संगठन की स्थापना और सभी राज्यों की स्वतंत्रता की जमानत भी सम्मिलित थी।
  • इस प्रकार राष्ट्र संघ की स्थापना हुई। उससे सभी स्वतंत्र राज्यों का एक विश्व संगठन बनाया जाएगा। इसके लक्ष्य थे- शांति और सुरक्षा बनाए रखना, अंतर्राष्ट्रीय विवादों का शांतिपूर्ण निपटारा करना और सदस्य देशों को युद्ध का सहारा न लेने के लिए बाध्य करना।
  • इसका एक महत्वपूर्ण प्रावधान प्रतिबंधों से सम्बंधित था। इसके अनुसार किसी भी आक्रमणकारी देश के विरुद्ध आर्थिक और सैनिक कार्रवाई करना शामिल था। इसके अनुसार सदस्य देशों को अपने यहाँ श्रमिकों की दशा और सामाजिक स्थिति को सुधारने के लिए वचनबद्ध किया।
  • इस उद्देश्य से अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन की स्थापना हुई जो आज भी संयुक्त राष्ट्र संघ की एक विशेषीकृत एजेंसी है।
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