पानीपत का तृतीय युद्ध, कारण एवं परिणाम | Third Battle of Panipat in Hindi

पानीपत का तृतीय युद्ध

दिसम्बर तक दोनों सेनाएँ अवसर की प्रतीक्षा में लगी रहीं। इस बीच मराठों की रसद समाप्त हो गई। इस समय मराठों ने लड़ने का निश्चय कर लिया। 14 जनवरी, 1761 को मराठों ने अफगान सेना पर आक्रमण किया। अब्दाली की सेना और मराठों की सेना में भयंकर युद्ध हुआ। इब्राहीमगार्दी खाँ ने अपने तोपखाने के लिए रुहेलों की सेना पर आक्रमण किया और सदाशिव राव भाऊ अपने चुने हुए अश्वारोहियों के साथ शत्रु सेना के मध्य भाग पर टूट पड़ा और उसे छिन्न-भिन्न कर दिया। दोपहर के बाद घमासान युद्ध हुआ। मराठे बिना दानापानी के एकदम थक गये परन्तु फिर भी बड़े धैर्य तथा साहस के साथ शत्रु का सामना कर रहे थे।

दुर्भाग्यवश पेशवा का ज्येष्ठ पुत्र विश्वास राव लड़ता हुआ मारा गया। उसकी मृत्यु का समाचार सुनकर भाऊ असावधान होकर शत्रु सेना में घुसकर युद्ध करने लगा, किन्तु वह भी लड़ता हुआ मारा गया। सेनापतियों की मृत्यु का समाचार पाकर मराठा सेना में भगदड़ मच गई और उचित नेतृत्व के अभाव में मराठा सैनिक युद्ध भूमि से भागने लगे। अब्दाली की सेना ने भागती हुई मराठा सेना का पीछा किया और उनके शिविर को बुरी तरह लूट लिया। इस प्रकार पानीपत के युद्ध में मराठों की भीषण पराजय और अब्दाली को विजय प्राप्त हुई।

मराठा सेना के विनाश सम्बन्ध में एक इतिहासकार ने लिखा है कि, “पानीपत के युद्ध ने मराठों की रीढ़ तोड़ दी। महाराष्ट्र में कोई ऐसा घर शेष नहीं रहा था जिसका कोई सदस्य इस युद्ध में काम न आया हो।” वास्तव में इस युद्ध में मराठों की एक पीढ़ी का अन्त हो गया।

पानीपत का तृतीय युद्ध के परिणाम

पानीपत का तीसरा युद्ध भारतीय इतिहास की महत्वपूर्ण घटना थी। इस युद्ध के परिणाम के विषय में इतिहासकारों में भारी मतभेद है। सभी मराठा इतिहासकार इस बात को स्वीकार करते हैं कि इस युद्ध में 45 हजार सैनिक मारे गये, किन्तु उनके लक्ष्य को कोई विशेष हानि नहीं पहुँची।

मराठा इतिहास के विशेषज्ञ सर देसाई ने लिखा है— “इस युद्ध क्षेत्र में मराठा जन-शक्ति का विनाश अवश्य हुआ किन्तु यह विनाश उनको शक्ति का अन्तिम निर्णायक नहीं था। वास्तव में इस युद्ध के लम्बे समय बाद महान् जाति के प्रसिद्ध पुरुष नाना फड़नवीस और महानदजी को चमका दिया था जोकि प्रलंयकारी दिन को बड़े आश्चर्यजनक रीति से मृत्यु से बचकर निकल गये थे और उन्होंने मराठों के पूर्व गौरव को पुनर्जीवित किया था। पानीपत के इस युद्ध में हुआ विनाश दैवीय प्रकोप के समान था। इसने मराठों की जीवन-शक्ति को नष्टकर दिया, किन्तु इससे उनके राजनीतिक जीवन का अन्त नहीं हो पाया। यह मान लेना कि पानीपत के विनाश ने मराठों के सार्वभौमिकता के स्वप्न को सदा के लिए नष्ट कर दिया, परिस्थिति को ठीक-ठीक न समझना है जैसाकि तत्कालीन लेखों से ज्ञात होता है।”

उपर्युक्त मत के विरोध में अपना मत प्रस्तुत करते हुए डॉ. यदुनाथ सरकार ने लिखा है कि— “इतिहास के पक्षपातरहित अध्ययन से ज्ञात होगा कि मराठों का यह जोरदार दावा कितना निर्मूल है। इसमें सन्देह नहीं कि मराठा सेना के निर्वासित मुगल सम्राट को सन् 1772 ई. में अपने पूर्वजों के सिंहासन पर फिर से आसीन किया था, किन्तु उस समय न तो राज्य निर्माता हुए और न मुगल साम्राज्य के वास्तविक शासक वरन् उनकी स्थिति तो नाममात्र के मन्त्रियों तथा सेनापतियों जैसी थी। इस प्रकार का गौरवपूर्ण पद तो केवल 1780 ई. में महानदजी सिंधिया और 1803 ई. में अंग्रेज ही प्राप्त कर पाये थे।

उक्त दोनों मतों के अध्ययन से पता चलता है कि यदुनाथ सरकार का मत अत्यन्त उपयुक्त एवं सत्य है। फिर भी पानीपत का तृतीय युद्ध में पराजय से मराठों को भीषण हानि हुई। संक्षेप में इस युद्ध के निम्नलिखित परिणाम हुए—

(1) अपार जनशक्ति का विनाश – इस युद्ध की अपार जन-शक्ति नष्ट हो गई। लगभग 45 हजार सैनिक युद्ध में काम आये। एक लाख व्यक्तियों में से केवल कुछ हजार व्यक्ति ही अपनी जान बचाकर महाराष्ट्र पहुँच सके। वास्तव में इस युद्ध में मराठों की एक पीढ़ी का अन्त हो गया।

(2) पेशवा के प्रभाव का पतन – इस युद्ध में मराठों की पराजय ने पेशवा प्रभाव का अन्त कर दिया और मराठा संघ की एकता नष्ट होने लगी। मराठों में पारस्परिक संघर्ष एवं कलह होने के कारण उनकी शक्ति को गहरा आघात पहुँचा। पेशवा इन मराठों को अपने नियन्त्रण में न कर सका और धीरे-धीरे उसकी शक्ति कम होती गई।

(3) उत्तरी भारत में मराठों का प्रभाव समाप्त होना – पानीपत की पराजय से उत्तरी भारत में मराठों का प्रभाव पूर्णतया समाप्त हो गया। दोआब तथा पंजाब प्रदेश उनके हाथ से निकल गये ।

(4) अंग्रेजों का उत्थान – मराठों की पराजय ने अंग्रेजों के उत्थान में विशेष योगदान दिया, क्योंकि अब भारत में ऐसी कोई शक्तिशाली जातिं न रही जो अंग्रेजी का मुकाबला कर सकती। अतएव अंग्रेजी शक्ति का बड़ी तेजी से उत्थान आरम्भ हो गया।

(5) मुगलों का पतन – पानीपत के युद्ध ने मुगलों को भी पतन के गर्त में डाल दिया। उनमें अब इतनी शक्ति न रह गई थी कि वे अंग्रेजी का सामना करने में सफल हो सकते।

(6) नैतिक प्रभाव – पानीपत की पराजय ने मराठों की मान और प्रतिष्ठा को धूल में मिला दिया। उनकी अजेय शक्ति का कोई मूल्य नहीं रह गया और राज्य उनकी मित्रता को प्राप्त करने में संकोच करने लगे।

पानीपत का तृतीय युद्ध में मराठों की पराजय के कारण

पानीपत के तीसरे युद्ध में मराठों की पराजय के निम्नलिखित कारण थे—

(1) मराठा सेनापति सदाशिव राव के व्यवहार से कई बड़े मराठा सेनापति तंग थे। वह प्रत्येक कार्य में अपनी मनमानी करता था और किसी से सलाह लेना आवश्यक नहीं समझता था।

(2) मराठा सेनापति सदाशिव राव के पास शुरू से ही धन का अभाव था । उनके पास एक विशाल सेना के लिए पर्याप्त भोजन सामग्री नहीं थी।

(3) मराठों की अपेक्षा अहमदशाह अब्दाली की सेना की अधिक संख्या थी और उसका नेतृत्व अहमदशाह अब्दाली स्वयं कर रहा था जो अत्यन्त वीर और साहसी युवक था।

(4) अब्दाली ने रोहिलखण्ड के नवाब और अवध के वजीर शुजाउद्दौला को अपने साथ मिला लिया था। इससे उसको सब तरह की आर्थिक और सैनिक सहायता मिल गई । उसे भोजन सामग्री की इतनी कठिनाई नहीं उठानी पड़ी, जितनी मराठों को। उसने अपनी सेना की सहायता से मराठों को भोजन सामग्री आने के सब मार्ग बन्द कर दिये।

(5) मराठों की सेना में अनुशासन की बहुत सख्त कमी थी। इन्दौर के महाराजा मल्हाराव होल्कर ग्वालियर के महाराजा सिन्धिया के भाऊ साहिब से अच्छे सम्बन्ध नहीं थे । मल्हार राव होल्कर ने पानीपत के मैदान में सुस्ती दिखाई और जब मराठों की हार हुई, तो अपनी सेना सहित भाग गया। इसके विपरीत अहमदशाह अब्दाली की सेना में कड़ा अनुशासन था।

(6) अफगानों का तोपखाना मराठों से श्रेष्ठ था। अफगानों की रण-पद्धति मराठों से बहुत अच्छी थी।

नोट – परीक्षाओं में पूछे जाने वाले प्रश्न —
प्रश्न 1. पानीपत का तृतीय युद्ध (सन् 1761 A.D.) का रेखाचित्र बनाइए तथा इसका संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
प्रश्न 2. पानीपत के तीसरे संग्राम का सचित्र वर्णन कीजिए और इसमें मराठों की पराजय के मुख्य कारणों की विवेचना कीजिए।
प्रश्न 3. पानीपत का तृतीय युद्ध के कारण एवं परिणामों की विस्तार पूर्वक विवेचना कीजिए।

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