ट्रांजिस्टर प्रवर्धक क्या है, P-N-P ट्रांजिस्टर उभयनिष्ठ आधार प्रवर्धक कैसे कार्य करता है?

ट्रांजिस्टर प्रवर्धक के रूप में

किसी दुर्बल प्रत्यावर्ती चिन्ह की तरंग प्रकृति को अपरिवर्तित रखते हुए उसकी क्षमता में वृद्धि कर देने की प्रक्रिया को ‘प्रवर्धन’ तथा ऐसी युक्तियां जिनके माध्यम से ऐसा संभव हो, तो वह ‘प्रवर्धक’ (Amplifier in Hindi) कहलाती है।
इलेक्ट्रॉनिक परिपथों में ट्रांजिस्टर का उपयोग एक प्रवर्धक की भांति अलग-अलग विन्यासों में किया जाता है, जो निम्न प्रकार है-
(1). उभयनिष्ठ-आधार प्रवर्धक
(2). उभयनिष्ठ-उत्सर्जक प्रवर्धक
(3). उभयनिष्ठ-संग्राहक प्रवर्धक ।

नोट – विद्यार्थी ध्यान दें कि इस अध्याय में हमने ‘उभयनिष्ठ-आधार प्रवर्धक’ के बारे में समझाया है। और बाकियों को अगले अध्याय में समझेंगे।

ट्रांजिस्टर प्रवर्धक क्या है

ट्रांजिस्टर प्रवर्धक एक ऐसा उपकरण होता है जो विद्युत् धारा के प्रवाह को नियंत्रित करता है और उसे बढ़ावा देता है। यह एक सेमीकंडक्टर डिवाइस होता है, जो प्राथमिक रूप से तीन वस्तुओं से बना होता है। जैसे – एमिटर, सेकण्डरी वेस और कलेक्टर। इस प्रकार, ट्रांजिस्टर प्रवर्धक सिग्नल को ऊपर बढ़ा देता है या फिर इसे कम कर देता है। ताकि उपयुक्त विधुत् प्रवाह विशेष विन्यासों में उपयोग के लिए उपलब्ध हो सकें।

इसे भी पढ़ें… ट्रांजिस्टर की परिभाषा, प्रकार, कार्यविधि, चित्र, उपयोग व अन्तर समझाइए।

ट्रांजिस्टर प्रवर्धक के रूप में अनुप्रयोग

ट्रांजिस्टर प्रवर्धक वह उपकरण है जो प्रत्यावर्ती धारा या परिवर्ती धारा अथवा वोल्टेज धारा की शक्ति को बढ़ा देता है। अर्थात् जिस प्रत्यावर्ती धारा या परिवर्ती अथवा वोल्टेज को जिसकी शक्ति बढ़ायी जाती है, उसे निवेशी वोल्टेज सिग्नल कहते हैं।

⇒ट्रांजिस्टर को प्रवर्धक के रूप में निम्नलिखित विन्यासों में जोड़ा जा सकता है:

P-N-P ट्रांजिस्टर उभयनिष्ठ आधार प्रवर्धक के रूप में

जब किसी ट्रांजिस्टर प्रवर्धक को उभयनिष्ठ आधार (CB) अभिविन्यास में जोड़ा जाता है, तो उत्सर्जक वोल्टेज में बहुत कम परिवर्तन करने पर उत्सर्जक धारा ie में बहुत अधिक परिवर्तन हो जाता है। अतः इसके संगत संग्राहक धारा ic में भी पर्याप्त परिवर्तन होता है।

इस प्रकार, यदि किसी प्रत्यावर्ती वोल्टेज को उत्सर्जक E पर लगाया जाता है, तो संग्राहक C से जुड़े लोड प्रतिरोध RL के सिरों के बीच एक उच्च प्रत्यावर्ती वोल्टेज उत्पन्न हो जाता है। अतः ट्रांजिस्टर को प्रवर्धक की तरह प्रयुक्त किया जा सकता है।

P-N-P ट्रांजिस्टर उभयनिष्ठ आधार प्रवर्धक का परिपथ आरेख

P-N-P ट्रांजिस्टर प्रवर्धक का उभयनिष्ठ आधार परिपथ को चित्र-1 में दिखाया गया है। इसमें उत्सर्जक-आधार (EB) निवेशी परिपथ को एक निम्न वोल्टेज बैटरी Veb के द्वारा अग्र अभिनति रखा जाता है जिससे कि निवेशी परिपथ का प्रतिरोध कम होता है।

और पढ़ें… CB CE तथा CC ट्रांजिस्टर प्रर्वधकों की विशेषताओं की तुलना कीजिए?

P-N-P ट्रांजिस्टर उभयनिष्ठ आधार प्रवर्धक
P-N-P ट्रांजिस्टर उभयनिष्ठ आधार प्रवर्धक

अब यदि संग्राहक आधार (CB) निर्गत परिपथ को एक उच्च वोल्टेज बैटरी Vcc के द्वारा उत्क्रम अभिनत में रखा जाता है जिससे कि निर्गत परिपथ का प्रतिरोध काफी अधिक होता है। चित्र में एक लोड प्रतिरोध RL को संग्राहक आधार परिपथ में जोड़ा गया है। अर्थात् निर्बल निवेशी प्रत्यावर्ती धारा वोल्टेज सिग्नल उत्सर्जक आधार (EB) परिपथ पर लगाया जाता है। तथा प्रवर्धित निर्गत सिग्नल संग्राहक-आधार (CB) परिपथ से प्राप्त किया है।

तब माना निवेशी प्रत्यावर्ती धारा वोल्टेज सिग्नल से पहले ie, ib तथा ic क्रमशः उत्सर्जक धारा, आधार धारा तथा संग्राहक धारा ही होते हैं, तो किरचाॅफ के धारा नियम के अनुसार,
ie = ib + ic
अतः संग्राहक धारा ic के कारण लोड प्रतिरोध RL में विभव पतन icRL है, तो संग्राहक C तथा आधार B के बीच विभवान्तर, अर्थात् संग्राहक-आधार वोल्टेज Vcb होगा –
Vcb = Vcc – icRL
यदि जब उत्सर्जक-आधार (EB) परिपथ पर निवेशी वोल्टेज लगाया जाता है, तो उत्सर्जक आधार वोल्टेज Veb परिवर्तित होता है। इससे उत्सर्जक धारा ie तथा संग्राहक धारा ic में भी परिवर्तन होता है इसके फलस्वरूप संग्राहक आधार वोल्टेज Vcb के अनुरूप परिवर्तित होता है तथा निवेशी वोल्टेज लगाने पर वोल्टेज Vcb में परिवर्तन प्रवर्धक निर्गत वोल्टेज के रूप में प्राप्त होता है।

उभयनिष्ठ-आधार ट्रांजिस्टर प्रवर्धक के लाभ

P-N-P ट्रांजिस्टर उभयनिष्ठ आधार प्रवर्धक में लाभ निम्न प्रकार है-
(1). A.C. धारा लाभ – यदि किसी एक नियत संग्राहक आधार वोल्टेज Vcb पर संग्राहक धारा ic तथा उत्सर्जक धारा ie में परिवर्तन के अनुपात को ही P-N-P ट्रांजिस्टर का ‘धारा लाभ’ कहते हैं। इसे α से व्यक्त करते हैं। तब
α = ( \frac{∆i_c}{∆i_e} )Vcb
अर्थात् α का मान 1 से थोड़ा कम होता है अतः इसमें कुछ धारा हानि भी होती है।

(2). प्रवर्धक वोल्टेज लाभ – निवेशी व निर्गत वोल्टेज में परिवर्तन के अनुपात को ही ‘वोल्टेज प्रवर्धन’ अथवा ‘वोल्टेज लाभ’ कहते हैं। इसे v से निरूपित करते हैं।

माना निवेशी धारा वोल्टेज लगाने पर उत्सर्जक धारा ie और संग्राहक धारा ic में परिवर्तन ∆ie व ∆ic होता है तथा यदि निवेशी व निर्गत परिपथों के प्रतिरोध R1 व R2 हो, तब
v = \frac{∆i_c × R_2}{∆i_e × R_1} = \frac{∆i_c}{∆i_e} × \frac{R_2}{R_1}
अतः \frac{∆i_c}{∆i_e} अनुपात AC धारा लाभ α है। तथा \frac{R_2}{R_1} को प्रतिरोध लाभ कहते हैं। अब
v = α × प्रतिरोध लाभ
अर्थात् इस प्रकार, प्रतिरोध लाभ काफी बड़ा होता है। अतः वोल्टेज लाभ av भी काफी बड़ा होता है, यद्यपि α का मान 1 से थोड़ा कम होता है।

(3). प्रवर्धक शक्ति लाभ – निवेशी व निर्गत शक्ति में परिवर्तन के अनुपात को ही ‘शक्ति प्रवर्धन’ अथवा ‘शक्ति लाभ’ कहते हैं इसे ap से दर्शाते हैं। माना, शक्ति = धारा × वोल्टेज
तथा शक्ति लाभ = धारा लाभ × वोल्टेज लाभ
तब शक्ति लाभ ap = α × av = α × α × प्रतिरोध लाभ
अर्थात् ap = α2 × प्रतिरोध लाभ ।

प्रवर्धक निवेशी व निर्गत सिग्नलों में कला संबंध

P-N-P ट्रांजिस्टर उभयनिष्ठ आधार प्रवर्धक में निवेशी व निर्गत वोल्टेज सिग्नल एक ही कला में होते हैं।
माना निवेशी वोल्टेज सिग्नल का पहला अर्द्ध-चक्र धनात्मक होता है। अतः इस अर्द्ध-चक्र के दौरान उत्सर्जक आधार परिपथ का अग्र अभिनत वोल्टेज बढ़ता जाता है। इससे उत्सर्जक धारा और संग्राहक धारा बढ़ती है। संग्राहक धारा के बढ़ने से संग्राहक आधार वोल्टेज घटता है।
अतः इस प्रकार, निवेशी वोल्टेज सिग्नल के धनात्मक अर्द्ध-चक्र के दौरान संग्राहक पर प्राप्त निर्गत वोल्टेज सिग्नल का अर्द्ध-चक्र भी धनात्मक होता है।

अब यदि निवेशी वोल्टेज सिग्नल के ऋणात्मक अर्द्ध-चक्र के दौरान उत्सर्जक आधार परिपथ का अग्र अभिनत वोल्टेज घटता है इससे उत्सर्जक धारा और संग्राहक धारा भी घटती है। अतः संग्राहक धारा के घटने से संग्राहक आधार वोल्टेज बढ़ता है। अर्थात् संग्राहक अधिक ऋणात्मक हो जाता है।
इस प्रकार, निवेशी वोल्टेज सिग्नल के ऋणात्मक अर्द्ध-चक्र के दौरान संग्राहक पर प्राप्त निर्गत वोल्टेज सिग्नल का अर्द्ध-चक्र भी ऋणात्मक होता है।
अतः स्पष्ट है कि “P-N-P ट्रांजिस्टर उभयनिष्ठ आधार प्रवर्धक में निवेशी व निर्गत वोल्टेज सिग्नल एक ही कला में होते हैं।”

उभयनिष्ठ आधार प्रवर्धक के उपयोग

  • P-N-P ट्रांजिस्टर उभयनिष्ठ आधार प्रवर्धक का उपयोग उच्च रेडियो आवृत्ति वोल्टेज सिग्नलों को प्रवर्धित करने में किया जाता है
  • P-N-P ट्रांजिस्टर उभयनिष्ठ आधार प्रवर्धक का उपयोग निम्न स्त्रोत प्रतिबाधा का उच्च लोड प्रतिबाधा से तुलना करने में किया जाता है।

Note – सम्बन्धित प्रशन –
Q.1 ट्रांजिस्टर प्रवर्धक से आप क्या समझते हैं? P-N-P ट्रांजिस्टर उभयनिष्ठ आधार प्रवर्धक के रूप में किस प्रकार कार्य करता है। इसका परिपथ आरेख खींचकर धारा लाभ, वोल्टेज लाभ, शक्ति लाभ और निवेशी व निर्गत सिग्नलों के बीच संबंध बताइए।
Q.2 परिपथ आरेख बनाकर उभयनिष्ठ आधार P-N-P ट्रांजिस्टर प्रवर्धक की क्रिया विधि समझाइए।

  1. यान्त्रिकी एवं तरंग गति नोट्स (Mechanics and Wave Motion)
  2. अणुगति एवं ऊष्मागतिकी नोट्स (Kinetic Theory and Thermodynamics)
  3. मौलिक परिपथ एवं आधारभूत इलेक्ट्रॉनिक्स नोट्स (Circuit Fundamental and Basic Electronics)
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