ट्रांजिस्टर बायसिंग

ट्रांजिस्टर बायसिंग: परिभाषा, प्रकार, विधियां, चित्र एवं लाभ व हानियां लिखिए | Transistor Biasing in Hindi

हेलों दोस्तों, इस आर्टिकल में हमने ‘ट्रांजिस्टर बायसिंग’ के बारे में समझाया है, इसमें हमने ट्रांजिस्टर बायसिंग की परिभाषा, प्रकार व विधियों को विस्तार पूर्वक सरल भाषा में समझाया है। और इसकी क्या आवश्यकता है एवं इसके लाभ और हानियों का भी उल्लेख किया गया है, तो आप इस अध्याय को पूरा जरूर पढ़ें।

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ट्रांजिस्टर बायसिंग क्या है

ट्रांजिस्टर बायसिंग एक ट्रांजिस्टर सर्किट के ऑपरेटिंग पॉइंट या बायस पॉइंट को सेट करने की प्रक्रिया है। इसमें ट्रांजिस्टर के टर्मिनलों पर उपयुक्त डीसी (D.C.) वोल्टेज (या धाराएं) लागू की जाती है। ताकि सही कार्य करना और उत्कृष्ट प्रदर्शन करना सुनिश्चित हो सकें।

ट्रांजिस्टर बायसिंग एक बहुत महत्वपूर्ण होती है क्योंकि यह डिवाइस के लिए उपयुक्त ऑपरेटिंग स्थितियों को स्थापित करता है। ये सुनिश्चित करता है कि ट्रांजिस्टर अपने सक्रिय क्षेत्र में कार्य करता है और सिग्नल को उचित प्रवर्धन या स्विचिंग की अनुमति देता है। ट्रांजिस्टर बायसिंग की स्थिरता, रैखिकता और शक्ति अपव्यय जैसे महत्वपूर्ण पैरामीटरों को भी प्रभावित करता है।

नोट – विद्यार्थी ध्यान दें कि ट्रांजिस्टर बायसिंग का मुख्य उद्देश्य ट्रांजिस्टर के तीनों प्रमुख यौगिकों (जैसे – बेस, एमिटर और कलेक्टर) के बीच सही संचार और धारा स्तर स्थापित करना होता है। सही बायसिंग से ट्रांजिस्टर अपनी नियंत्रण संचार सामर्थ्य को बढ़ा सकता है, ताप और वृद्धि को संचालित कर सकता है, स्थिरता और विशेषता बनाए रख सकता है और विभिन्न प्रकार के ट्रांजिस्टर अवयवों को समांतर या सामरिक तरीके से बायस कर सकता है।

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ट्रांजिस्टर बायसिंग के प्रकार

आमतौर पर उपयोग की जाने वाली विभिन्न प्रकार की ट्रांजिस्टर बायसिंग तकनीकें होती हैं, जो इस प्रकार हैं –

  • फिक्स्ड बायसिंग,
  • संग्राहक-आधार बायसिंग
  • वोल्टेज विभक्त बायसिंग
  • उत्सर्जक बायसिंग (या एमीटर बायसिंग)
  • एम्पलीफायर (फीडबैक) बायसिंग
  • रेजिस्टर एमीटर बायसिंग
  • सेल्फ बायसिंग
  • टर्न-ऑन बायसिंग
  • वरियंट बायसिंग तथा
  • एच-ब्रिज बायसिंग ।

1.फिक्स्ड बायसिंग (Fixed Biasing in Hindi) – इस ट्रांजिस्टर बायसिंग में एमीटर के संबंध में ट्रांजिस्टर के आधार टर्मिनल पर एक निश्चित D.C. डीसी वोल्टेज लगाया जाता है। यह सबसे सरल बायसिंग तकनीक है परंतु तापमान में भिन्नता या ट्रांजिस्टर बायसिंग के पैरामीटरों और विविधताओं की उपस्थिति में स्थिरता का अभाव होता है।

2.संग्राहक-आधार बायसिंग (Collector-Base Biasing in Hindi) – यह ट्रांजिस्टर बायसिंग स्थितियों को स्थापित करने के लिए संग्राहक और ट्रांजिस्टर के आधार के बीच जुड़े एक अवरोधक का उपयोग करती है। इस तकनीक में बायसिंग को रोकने वाला एक स्थिर बायस बिंदु सुनिश्चित करते हुए आधार-धारा को आधार-उत्सर्जक ट्रांजिस्टर से दूर ले जाते हैं।

3.वोल्टेज विभक्त बायसिंग (Voltage Divider Biasing in Hindi) – इसमें एक वोल्टेज विभाजक नेटवर्क है जिसमें प्रतिरोधक होते हैं। आपूर्ति वोल्टेज और ट्रांजिस्टर के आधार टर्मिनल के मध्य यह जुड़ा होता है। यह तकनीक एक स्थिर पूर्वाग्रह वोल्टेज प्रदान करती है, और व्यापक रूप से अनेक प्रवर्धक सर्किटों में ये उपयोग की जाती है।

4.एमीटर (या उत्सर्जक) बायसिंग (Emitter Biasing in Hindi) – इसमें उत्सर्जक टर्मिनल और ग्राउंड के मध्य एक रेजिस्टर को जोड़ा जाता है। यह ट्रांजिस्टर पैरामीटरों और तापमान में भिन्नता के विरोध स्थिरता प्रदान करता है, जिससे यह आमतौर पर छोटे-छोटे सिग्नलों प्रवर्धकों के लिए उपयोग किया जाता है।

5.फीडबैक (एम्पलीफायर) बायसिंग (Feedback Biasing in Hindi) – इस तकनीक में ट्रांजिस्टर सर्किट में प्रवर्धक के लिए तापमान और अपेक्षित आपूर्ति वोल्टेज के मध्य एक फीडबैक लूप बनाया जाता है। यह लूप ट्रांजिस्टर बायसिंग के पैरामीटरों को नियंत्रित करने के लिए उपयोगी होता है और यह इसके स्थायित्व को भी बढ़ाता है।

6.रेजिस्टर एमीटर बायसिंग (Resistor Emitter Biasing in Hindi) – इस तकनीक में एक रेजिस्टर एमीटर टर्मिनल और बायस स्थानांतरण के लिए आपूर्ति वोल्टेज के बीच जोड़ा जाता है। यह ट्रांजिस्टर बायसिंग की अंतरंग इंपेडेंस को नियंत्रित करने में मदद करता है और स्थिर बायस प्राप्त करता है।

7.सेल्फ बायसिंग (Self Biasing in Hindi) – इसमें ट्रांसिस्टर सर्किट में एक स्वचालित मानदंड प्रणाली होती है, जो बायसिंग के लिए जवाब देह होती है। इस तकनीक में बायस स्थानांतरण नहीं किया जाता है और ट्रांजिस्टर प्रारंभिक अवस्था में स्थापित हो जाता है।

8.टर्न-ऑन बायसिंग (Turn-On Biasing in Hindi) – इसमें ट्रांजिस्टर को वायस करने के लिए संचार के लिए आवश्यक बायस वोल्टेज को प्राप्त करने के लिए उपयुक्त संकेत दिया जाता है। यह तकनीक स्विचिंग उद्दीपन में उपयोगी होती है, जहां ट्रांजिस्टर को बहुत तेजी से चालू या बंद करना होता है।

9.वरियंट बायसिंग (Bootstrapping Biasing in Hindi) – इस तकनीक में उच्च आपूर्ति वोल्टेज पर बायसिंग प्रदान करने के लिए उपयोगी होती है। इसमें कैपेसिटर और डायोड का उपयोग किया जाता है, जो ट्रांजिस्टर के बायस वोल्टेज को उच्च आपूर्ति वोल्टेज से बढ़ाने में मदद करते हैं।

10.एच-ब्रिज बायसिंग (H-Bridge Biasing in Hindi) – इस तकनीक का उपयोग खासकर विद्युतीय उपकरणों में किया जाता है। यदि जहां दो ट्रांजिस्टर द्वारा एक एच-ब्रिज तंत्र बनाया जाता है। इसमें एक स्थिर बायसिंग तंत्र प्रयुक्त होता है जो संचार के लिए उचित प्रकार से ट्रांजिस्टर को बायस करता है।

ये ट्रांजिस्टर बायसिंग तकनीकों के कुछ ही उदाहरण हैं और बायसिंग विधि का चुनाव सर्किट की विशिष्ट आवश्यकताओं और उपयोग किए जा रहे ट्रांजिस्टर के प्रकार पर निर्भर करता है। उपर्युक्त ट्रांजिस्टर बायसिंग विभिन्न इलेक्ट्रॉनिक अनुप्रयोगों में ट्रांजिस्टर सर्किट के विश्वसनीय और इष्टतम प्रदर्शन को सुनिश्चित करता है।

ट्रांजिस्टर बायसिंग की विधियाॅं (Methods of Transistor Biasing in Hindi)

ट्रांजिस्टर बायसिंग (अभिनति) के लिए सामान्यतया निम्न विधियां प्रयुक्त की जाती हैं –

  • स्थिर-बायस या आधार-बायस
  • एमीटर (या उत्सर्जक) बायस तथा
  • विभव विभाजक सहित उत्सर्जक बायस ।

अब हम स्थिर-बायस या आधार-बायस को विस्तार से समझते हैं

1. स्थिर-बायस या आधार-बायस (fixed-bias or base-bias in Hindi)

स्थिर-बायस या आधार-बायस परिपथ निम्नांकित चित्र-1 में दिखाया गया है।

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ट्रांजिस्टर बायसिंग
ट्रांजिस्टर बायसिंग (स्थिर-बायस)

चित्र-1 में n-p-n ट्रांजिस्टर के आधार B तथा D.C. स्त्रोत VCC के धनात्मक सिरे के मध्य एक उच्च प्रतिरोध RB लगाया गया है। आवश्यक शून्य सिग्नल आधार-धारा तथा संग्राहक-धारा स्त्रोत VCC से ली जाती है। चूंकि n-p-n ट्रांजिस्टर का आधार-उत्सर्जक (B-E) के सापेक्ष धनात्मक है, अतः आधार-उत्सर्जक संधि अग्र अभिनत है। तथा परिपथ में जुड़े दो निम्न प्रतिघात संधारित्र परिपथ को इसके पहले तथा बाद के परिपथों से विलग करते हैं।

परिपथ का विश्लेषण (Circuit Analysis in Hindi)

इस परिपथ में आवश्यक शून्य सिग्नल संग्राहक-धारा IC = β.IB के लिए प्रतिरोध RB की गणना करते हैं। परिपथ में किरचाॅफ वोल्टेज नियम (KVL) लगाने पर,
VCC = IB.RB + VBE
या RB = \frac{V_{CC} - V_{BE}}{I_B} …(1)

चूंकि VBE का मान VCC की तुलना में बहुत ही कम है, अतः
RB = \frac{V_{CC}}{I_B} …(2)

चूंकि VCC एक निश्चित ज्ञात राशि है तथा IB का एक उपयुक्त मान चुना गया है,
अतः RB का मान निश्चित है। अतः इस विधि को “स्थिर-बायस” विधि कहा जाता है।

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स्थायित्व गुणक (Stability Factor in Hindi)

परिपथ में संग्राहक-धारा के लिए व्यंजक है –
IC = β.IB + (β + 1) ICBO …(3)
IB का मान समीकरण (2) में रखने पर,
IC = β \frac{V_{CC}}{R_B} + (β + 1) ICBO
ICBO के सापेक्ष अवकलन करने पर,
\frac{∆I_C}{∆I_{CBO}} = 0 + (β + 1) = β + 1
या स्थायित्व गुणक \footnotesize \boxed{ S = β + 1 }

अतः β = 49 के लिए S = 50 होगा।
अर्थात् “संग्राहक-धारा IC क्षरण-धारा ICBO की तुलना में 50 गुना तेजी से बढ़ती है।”

ट्रांजिस्टर बायसिंग परिपथ के लिए मूलभूत आवश्यकता

विश्वसनीय प्रवर्धन, के लिए एक उचित ट्रांजिस्टर बायसिंग परिपथ अति आवश्यक होता है। इस परिपथ को निम्नांकित आवश्यकताओं की पूर्ति करनी चाहिए –

(1). इसको उचित शून्य-सिग्नल संग्राहक-धारा बनाए रखना चाहिए।
(2). इसको उचित आधार-उत्सर्जक वोल्टेज अवश्य रखनी चाहिए।
(3). इसको VCE का मान किसी भी क्षण जर्मेनियम ट्रांजिस्टर के लिए 0.5 वोल्ट से कम तथा सिलिकॉन ट्रांजिस्टर के लिए 1.0 वोल्ट से कम नहीं होने देना चाहिए।
(4). कार्यकारी बिन्दु का स्थायित्व बना रहना चाहिए।

लाभ (advantages in Hindi)

(1). बायसिंग परिपथ सरल है, जिसमें केवल एक प्रतिरोध RB है।
(2). RB की सही गणना करके कार्यकारी बिन्दु का निर्धारण कर सकते हैं।

हानियां (disadvantages in Hindi)

(1). आधार-बायस (या स्थिर ट्रांजिस्टर बायसिंग) में स्थायित्व निम्न कोटि का है। यदि ताप बढ़ता है या β बढ़ता है, तो संग्राहक-धारा भी बढ़ेगी तथा कार्यकारी बिंदु विस्थापित हो जाएगा।
(2). स्थायित्व गुणक S इतना अधिक है कि परिपथ में ‘ऊष्मीय लोप’ की पूर्ण संभावना रहती है।

Note – सम्बन्धित प्रशन –
Q.1 ट्रांजिस्टर बायसिंग की विभिन्न विधियां बताइए? आधार विन्यास वाले उभयनिष्ठ-उत्सर्जक प्रवर्धक का परिपथ आरेख खींचकर इसकी क्रियाविधि समझाइए। तथा इसके स्थायित्व गुणक की गणना कीजिए एवं लाभों व हानियों का उल्लेख भी कीजिए।
Q.2 ट्रांजिस्टर बायसिंग परिपथ के लिए मूलभूत आवश्यकता क्या है? समझाइए।
Q.3 ट्रांजिस्टर बायसिंग किसे कहते हैं? इसके निम्न प्रकार व विधियों का विस्तार सहित वर्णन कीजिए तथा इसकी आवश्यकता समझाइए। ट्रांजिस्टर बायसिंग की सहायता से लाभ व हानियों का उल्लेख कीजिए।

  1. यान्त्रिकी एवं तरंग गति नोट्स (Mechanics and Wave Motion)
  2. अणुगति एवं ऊष्मागतिकी नोट्स (Kinetic Theory and Thermodynamics)
  3. मौलिक परिपथ एवं आधारभूत इलेक्ट्रॉनिक्स नोट्स (Circuit Fundamental and Basic Electronics)
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