ट्रांजिस्टर परिभाषा, प्रकार, कार्यविधि, चित्र, उपयोग व अन्तर समझाइए | Transistor in Hindi

ट्रांजिस्टर क्या है? – इस अध्याय में हमनें ट्रांजिस्टर के बारे में विस्तार से सरल भाषा में अध्ययन किया है और इसमें हमनें ट्रांजिस्टर की परिभाषा प्रकार कार्यविधि चित्र आरेख उपयोग एवं अंतर तथा इसके अविष्कार के बारे में भी समझाया गया है। ताकि विद्यार्थियों को सम्पूर्ण जानकारी प्राप्त हो सकें।

ट्रांजिस्टर की परिभाषा

ट्रांजिस्टर एक ऐसी अर्द्धचालक, इलेक्ट्रॉनिक युक्ति होती है जो ट्रायोड वाल्व के स्थान पर उपयोग की जाती है। यह P व N प्रकार के अर्द्ध-चालकों से बनाई जाती है जिसका काम इलेक्ट्रॉन एवं विद्युत् को स्विच या ज्यादा करने के लिए किया जाता है। अतः यह विद्युत् एवं इलेक्ट्रॉन की गति को नियंत्रित कर सकता है।

ट्रांजिस्टर एक तीन सिरों वाली युक्ति है जिसका पहला सिरा ‘आधार’ (base), दूसरा सिरा ‘संग्राहक’ (collector) तथा तीसरा सिरा ‘उत्सर्जक’ (emitter) कहलाते है, जिसमें एक संधि से दूसरी संधि तक प्रतिरोध का स्थानांतरण होता है।

ट्रांजिस्टर का आविष्कार सन् 1948 में अमेरिका के वैज्ञानिकों बार्डिन (Bardeen), शोकले (Shokley) तथा बेरिन (W.H. Barttain) ने किया था। जिसके लिए इन्हें सन् 1956 में नोबेल पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था।

ट्रांजिस्टर के प्रकार

सामान्यतः दो प्रकार के ट्रांजिस्टर होते हैं –
(1). P-N-P संधि ट्रांजिस्टर
(2). N-P-N संधि ट्रांजिस्टर ।

P-N-P ट्रांजिस्टर की रचना

इसमें एक पतली N-प्रकार के अर्द्ध-चालक की पर्त को दो P-प्रकार के अर्द्ध-चालकों की पर्तों के बीच में सैंडविच कर दिया जाता है। जैसा कि चित्र-1 में दो P-N-P ट्रांजिस्टर तथा उनके सांकेतिक चिन्ह को चित्र में दिखाया गया है।

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P-N-P ट्रांजिस्टर
P-N-P ट्रांजिस्टर

अतः चित्र-1(a) में इस बहुत ही पतली पर्त N को आधार (B) तथा इसके बाएं व दाएं तरफ के क्रिस्टलों को उत्सर्जक (E) व संग्राहक (C) कहते हैं। इस प्रकार P-N-P ट्रांजिस्टर का प्रतीक चिन्ह चित्र-1(b) में दिखाया गया है। तथा इसमें एक तीर का निशान विद्युत् धारा की दिशा को प्रदर्शित करता है।

P-N-P ट्रांजिस्टर की कार्यविधि

P-N-P ट्रांजिस्टर का उभयनिष्ठ आधार परिपथ चित्र-2 में दिखाया गया है। इसके P-भाग में आवेश वाहक कोटर होते हैं तथा N-भाग में आवेश वाहक इलेक्ट्रॉन होते हैं। चित्र-2 में देखें।

P-N-P ट्रांजिस्टर की कार्यविधि

इसमें उत्सर्जक-आधार (p-n) संधि को अग्र अभिनति में तथा संग्राहक-आधार (n-p) संधि को उत्क्रम अभिनति में जोड़ा गया है। p-n संधि डायोड के P-भाग के कोटर आधार की ओर चलने लगते हैं। परंतु आधार की चौड़ाई बहुत कम होती है अतः P-भाग से आए अधिकतर कोटर, N-भाग को पार करके संग्राहक C तक पहुंच जाते हैं। (लगभग 95% से 98%) कोटर (होल) संग्राहक C तक पहुंचते हैं तथा 2% से 5% कोटर, N-भाग के इलेक्ट्रॉन के साथ संयोग करके नष्ट हो जाते हैं।
इस प्रकार N-भाग में जैसे ही कोई कोटर, इलेक्ट्रॉन से संयोग करता है, वैसे ही एक नया इलेक्ट्रॉन उत्सर्जक में बैटरी (Eeb) के ऋणात्मक सिरें से निकलकर इसमें प्रवेश करता है। इससे उत्सर्जक-आधार परिपथ में एक क्षीण आधार धारा Ib बहने लगती है।

अब जैसे ही कोई कोटर, संग्राहक C पर पहुंचता है, वैसे ही संग्राहक बैटरी (Ecb) के ऋणात्मक सिरें से एक इलेक्ट्रॉन निकलकर इसे अनावेशित कर देता है। इससे संग्राहक धारा Ic बहने लगती है। अतः प्रत्येक कोटर के संगत (जो आधार में अथवा संग्राहक क्षेत्र में इलेक्ट्रॉन से संयोग करके समाप्त हो जाता है।) उत्सर्जक E के समीप एक सह-संयोजक बंध टूट जाता है और मुक्त इलेक्ट्रॉन, उत्सर्जक E इलेक्ट्राॅड को छोड़कर बैटरी (Ecb) के धनात्मक सिरें में प्रवेश कर जाते हैं। इसमें उत्पन्न नया कोटर, उत्सर्जक संधि की ओर गति करता है, यही क्रिया बार-बार होती रहती है। इस क्रिया के फलस्वरूप उत्सर्जक धारा Ie बहने लगती है। अतः
\footnotesize \boxed{ I_e = I_c + I_b }
अर्थात् “P-N-P ट्रांजिस्टर में धारा प्रवाह कोटर (होल) के उत्सर्जक E से संग्राहक C की ओर चलने के कारण होता है, जबकि बाहरी परिपथ में धारा प्रवाह इलेक्ट्रॉनों के चलने के कारण होता है।”

N-P-N ट्रांजिस्टर की रचना

इसमें एक पतली P-प्रकार के अर्द्ध-चालक की पर्त को दो N-प्रकार के अर्द्ध-चालकों की पर्तों के बीच सैंडविच कर दिया जाता है। दो N-P-N ट्रांजिस्टर तथा इनका सांकेतिक प्रदर्शन को चित्र-3 में दिखाया गया है।

N-P-N ट्रांजिस्टर
N-P-N ट्रांजिस्टर

अतः चित्र-3(a) में इस पतली पर्त P को आधार (B) तथा इसके बाएं और दाएं और के क्रिस्टलों को उत्सर्जक (E) व संग्राहक (C) कहते हैं। इस प्रकार N-P-N ट्रांजिस्टर का प्रतीक चिन्ह चित्र-3(b) में दिखाया गया है तथा इसमें एक तीर का निशान विद्युत् धारा की दिशा को प्रदर्शित करता है।

N-P-N ट्रांजिस्टर की कार्यविधि

N-P-N ट्रांजिस्टर का उभयनिष्ठ आधार परिपथ चित्र-3 में दर्शाया गया है। इसके दोनों N-भाग में आवेश वाहक इलेक्ट्रॉन होते हैं जबकि बीच के P-भाग में आवेश वाहक कोटर (होल) होते हैं। चित्र-4 में देखें।

N-P-N ट्रांजिस्टर की कार्यविधि

इसमें उत्सर्जक-आधार (n-p) संधि को अग्र अभिनति में तथा आधार-संग्राहक (p-n) संधि को उत्क्रम अभिनति में जोड़ा जाता है। अतः उत्सर्जक-आधार (p-n) संधि के अग्र अभिनति होने के कारण उत्सर्जक N-भाग में उपस्थित इलेक्ट्रॉन आधार की ओर गति करते हैं, जबकि आधार P-भाग से कोटर उत्सर्जक की और गति करते हैं। लेकिन आधार (B) बहुत-ही पतला होने के कारण इसमें प्रवेश करने वाले अधिकतर इलेक्ट्रॉन इसको पार करके संग्राहक (C) तक पहुंच जाते हैं। अतः इनमें से बहुत कम आधार में उपस्थित कोटरों से संयोग कर लेते हैं। तथा जैसे ही कोई इलेक्ट्रॉन कोटर से संयोग करता है, वैसे ही बैटरी (Veb) के धनात्मक सिरें के निकट आधार में एक सह-संयोजक बंध टूट जाता है। अतः बंध टूटने से आधार में उत्पन्न इलेक्ट्रॉन टर्मिनल B से बैटरी (Veb) के धनात्मक सिरे से बैटरी में प्रवेश करता है।
ठीक इसी प्रकार एक इलेक्ट्रॉन बैटरी (Veb) के ऋणात्मक सिरें से निकलकर टर्मिनल E के द्वारा उत्सर्जक में प्रवेश करता है। आधार से एक इलेक्ट्रॉन के बैटरी (Veb) में प्रवेश करने पर आधार में एक कोटर उत्पन्न हो जाता है, जो संयोग के कारण नष्ट हुए कोटर की क्षतिपूर्ति करता है।

इस प्रकार, आधार-उत्सर्जक परिपथ में आधार धारा Ib बहती है। अतः आधार टर्मिनल B में प्रवेश करने वाली क्षीण धारा को आधार धारा Ib तथा संग्राहक टर्मिनल C में प्रवेश करने वाली संग्राहक धारा Ic मिलकर उत्सर्जक टर्मिनल E से निकलती है, अतः इसे उत्सर्जक धारा Ie कहते हैं। अतः
\footnotesize \boxed{ I_e = I_c + I_b }

P-N-P तथा N-P-N ट्रांजिस्टर में अंतर

इन दोनों प्रकार के ट्रांजिस्टरों की कार्य व्यवस्था एक जैसी ही होती है लेकिन P-N-P ट्रांजिस्टर में आवेश वाहक कोटर होते हैं, तथा N-P-N ट्रांजिस्टर में आवेश वाहक इलेक्ट्रॉन होते हैं। अतः इलेक्ट्रॉन, कोटरों की अपेक्षा अधिक गतिशील होते हैं। इस प्रकार उच्च आवृत्ति परिपथों तथा कंप्यूटरों में भी N-P-N ट्रांजिस्टर का ही प्रयोग होता है। अर्थात् यहां आवेश वाहकों का सिग्नलों के लिए अनुक्रिया बहुत अधिक शीघ्र होनी चाहिए।

नोट – बताइए कि P-N-P तथा N-P-N ट्रांजिस्टर में से कौन अधिक उपयोगी है और क्यों?

P-N-P व N-P-N ट्रांजिस्टर की उपयोगिता

N-P-N ट्रांजिस्टर अधिक उपयोगी है, क्योंकि इसमें धारा वाहक इलेक्ट्रॉन होते हैं, परंतु P-N-P ट्रांजिस्टर में धारा वाहक कोटर होते हैं। अतः धारा वाहक इलेक्ट्रॉन कोटर की अपेक्षा अधिक गतिशील होते हैं।

Note – ट्रांजिस्टर से सम्बन्धित प्रशन पूछें जाते हैं।
Q.1 ट्रांजिस्टर किसे कहते हैं? P-N-P तथा N-P-N ट्रांजिस्टर की कार्यविधि समझाइए।
Q.2 P-N-P व N-P-N ट्रांसिस्टर की रचना एवं कार्यविधि का सचित्र वर्णन कीजिए?
Q.3 ट्रांजिस्टर क्या है? इसकी परिभाषा, प्रकार एवं P-N-P व N-P-N ट्रांजिस्टर की कार्यविधि, उपयोग तथा इनके बीच अंतर समझाइए।

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